बहुत समय पहले की बात है। तोतानगर गांव में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था। कहने को तो उसकी जिंदगी बहुत खुशहाल थी। उसके पास भगवान का दिया सब कुछ था। सुंदर-सुशील पत्नी, होशियार बच्चे, खेत-खलिहान, ज़मीन-पैसे इत्यादि। लेकिन ब्राह्मण में बस एक ही कमी थी, वो था उसका आलस। उसकी ज़मीन बहुत उपजाऊ थी, जिसमें वो अपनी मनमर्जी की फसल उगाकर अच्छा मुनाफा कमा सकता था। लेकिन अपने आसल के चलते वो कोई भी काम नहीं करता था।
उसकी पत्नी उसे समझा-समझा कर थक गई थी, लेकिन ब्राह्मण के कान पर जूं ही नहीं रेंगती थी। उसकी पत्नी हमेशा कहती थी, कि काम पर जाकर देखो, लेकिन वो हमेशा कहता था – “मैं काम नहीं करुंगा”। ब्राह्मण की पत्नी अपने पति के इस व्यवहार से बहुत ज्यादा परेशान हो गई थी, और वो अपने पति के सदबुद्धि की प्रार्थना के लिए मंदिरों में जाने लगी।
ब्राह्मण को मिला मुंह मांगा वरदान
एक दिन मंदिर में ब्राह्मण की पत्नी को एक साधु मिला, जिसे उसने घर आने का न्यौता दिया। साधु जब ब्राह्मण के घर आया तो ब्राह्मण ने उसका ख़ूब आदर-सत्कार किया। ब्राह्मण की सेवा देखकर साधु बहुत खुश हुआ और उसने ब्राह्मण से कहा – ‘मैं तुम्हारे सम्मान व आदर से बेहद ख़ुश हूं, मांगों तुम्हें क्या वरदान चाहिए।


