बोगानगाइ का रक्षक Part-1
सन् 1450 के असम का एक छोटा सा गाँव, जिसे लोग ‘बोगानगाइ’ कहते थे, घने और रहस्यमयी जंगलों से घिरा हुआ था। वहाँ की सुबह हमेशा एक अजीब सी धुंध और पक्षियों की चीखों के साथ शुरू होती थी। गाँव के लोग अपनी सुरक्षा के लिए एक दिव्य पुरुष यानी एक डेमी-गॉड ‘अबोतोम’ की पूजा करते थे, जो सदियों से उनकी रक्षा कर रहा था। अबोतोम को एक ऐसे रक्षक के रूप में देखा जाता था जिसके पास अलौकिक शक्तियां थीं और जो केवल रात के सन्नाटे में प्रकट होता था।
गाँव का मुखिया, माधब, हर अमावस्या को ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे एक विशेष अनुष्ठान का आयोजन करता था। इस अनुष्ठान का एकमात्र उद्देश्य अबोतोम को प्रसन्न रखना था ताकि जंगल के भयानक नरभक्षी जीव गाँव पर हमला न करें। गाँव वालों का मानना था कि अगर किसी दिन यह पूजा रुकी, तो पूरा बोगानगाइ खून की नदियों में डूब जाएगा। इस साल की सर्दियों में यह धुंध कुछ ज़्यादा ही गहरी हो गई थी और गाँव में एक अजीब सा खौफ फैल रहा था।
मुकुल नाम का एक युवा योद्धा, जो हाल ही में अहोम साम्राज्य की सेना से लौटकर आया था, इस परंपरा पर पूरी तरह भरोसा नहीं करता था। उसने अपनी आँखों से युद्ध देखे थे, इंसानी चालें देखी थीं, इसलिए उसे इस रहस्यमयी रक्षक की कहानी में कुछ अधूरा सा लगता था। उसने तय किया कि इस बार अमावस्या की रात वह छिपकर इस पूरे अनुष्ठान को बहुत करीब से देखेगा। वह यह जानना चाहता था कि जिसे लोग डेमी-गॉड कहते हैं, उसकी असलियत क्या है।
अमावस्या की वह रात आ गई जब आसमान में चाँद का एक कतरा भी दिखाई नहीं दे रहा था और हवा बेहद ठंडी थी। माधब ने अपने हाथों में मशाल थामी और गाँव के बुजुर्गों के साथ नदी के उस पार बने प्राचीन पत्थरों के चबूतरे की तरफ बढ़ना शुरू किया। मुकुल बहुत ही सावधानी से, सूखी पत्तियों पर बिना पैर रखे, उनके पीछे-पीछे घने पेड़ों की आड़ में चलता रहा। नदी के पानी की लहरें किसी के धीरे-धीरे फुसफुसाने जैसी आवाज़ कर रही थीं।
चबूतरे पर पहुँचकर मुखिया माधब ने एक अजीब सी भाषा में मंत्रोच्चार करना शुरू किया, जो असमिया या संस्कृत नहीं थी। अचानक, जंगल के बीच से एक गूंजती हुई भारी आवाज़ आई, जिसने पूरी धरती को हिलाकर रख दिया। पेड़ों की टहनियां अपने आप टूटने लगीं और हवा में एक तेज गति से उड़ती हुई विशाल आकृति चबूतरे पर आकर उतरी। मुकुल ने अपनी आँखें सिकोड़कर देखा, वह सचमुच एक अद्भुत और डरावना दृश्य था।
वह आकृति इंसानी कद से दोगुनी बड़ी थी, जिसके शरीर पर सोने की तरह चमकने वाले दिव्य कवच लगे हुए थे। उसका चेहरा एक प्राचीन मुखौटे जैसा था, जिसमें से नीली रोशनी की किरणें बाहर निकल रही थीं। गाँव के सभी लोग तुरंत अपने घुटनों के बल बैठ गए और सम्मान में अपने सिर जमीन पर टिका दिए। अबोतोम ने अपने दाहिने हाथ को हवा में उठाया, और देखते ही देखते वहाँ रखा सारा अन्न और फल हवा में गायब हो गए।
मुकुल का दिल जोर से धड़क रहा था, लेकिन उसकी खोजी आँखें कुछ और ही नोटिस कर रही थीं। उसने ध्यान दिया कि जब वह डेमी-गॉड बोल रहा था, तो उसकी आवाज़ हवा से नहीं, बल्कि पत्थरों के पीछे लगे किसी धातु के यंत्र से टकराकर आ रही थी। इसके अलावा, जब वह आकृति हवा में उड़ी, तो उसके पीछे कोई पंख नहीं थे, बल्कि एक अजीब सा काला धुआं निकल रहा था। मुकुल को अहसास हुआ कि यहाँ कुछ ऐसा है जो दैवीय तो बिल्कुल नहीं है।
अगले दिन, मुकुल ने चुपके से उस चबूतरे के आस-पास के इलाके की जांच करने का फैसला किया जब सब सो रहे थे। पत्थरों के बीच छानबीन करते समय उसका पैर एक छिपे हुए लोहे के लीवर पर पड़ा, जिसे दबाते ही जमीन का एक हिस्सा खिसक गया। नीचे एक अंधेरी सुरंग बनी हुई थी, जिसमें से किसी मशीन के चलने की हल्की सी गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी। मुकुल अपनी तलवार कसकर पकड़कर उस ठंडी और संकरी सुरंग के अंदर उतर गया।
सुरंग के अंदर की दुनिया देखकर मुकुल के होश उड़ गए, क्योंकि वहाँ दीवारें मिट्टी की नहीं बल्कि अजीब चमकदार धातुओं की थीं। वहाँ कई तरह की अजीबोगरीब लाल और हरी बत्तियां जल-बुझ रही थीं, जिन्हें उसने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था। सुरंग के आखिरी छोर पर एक बड़ा सा कमरा था, जहाँ गाँव का मुखिया माधब किसी बहुत बड़े, पारदर्शी कांच के बक्से के सामने खड़ा था। उस बक्से के अंदर कोई दैवीय शक्ति नहीं, बल्कि एक बेहद बूढ़ा, कमजोर इंसान लेटा हुआ था।
मुकुल को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था जब उसने देखा कि वह बूढ़ा व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि अबोतोम था। लेकिन वह कोई भगवान नहीं था, बल्कि उसके शरीर से अनगिनत तारें और नलिकाएं जुड़ी हुई थीं जो एक बड़ी मशीन में जा रही थीं। माधब उस बूढ़े व्यक्ति के सामने हाथ जोड़कर खड़ा था और कह रहा था, “प्रभु, आपका कवच अब कमजोर हो रहा है, गाँव वालों को शक होने लगा है।” मुकुल ने पीछे से चिल्लाकर कहा, “यह क्या ढोंग है, मुखिया?”
माधब ने चौंककर पीछे देखा और मुकुल को वहाँ पाकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया, लेकिन वह डरा नहीं। उसने एक गहरी सांस ली और कहा, “मुकुल, तुम जिसे ढोंग कह रहे हो, वह इस गाँव को जिंदा रखने का इकलौता तरीका है।” मुकुल ने गुस्से में अपनी तलवार आगे बढ़ाई और पूछा, “यह मशीनें क्या हैं? यह चमकती हुई धातु क्या है? तुम लोग भगवान के नाम पर पूरे बोगानगाइ को बेवकूफ बना रहे हो!”
बूढ़े व्यक्ति ने कांच के बक्से के अंदर से बहुत ही क्षीण आवाज़ में बात करने के लिए एक यंत्र का इस्तेमाल किया। उसकी आवाज़ वही गूंजती हुई डेमी-गॉड वाली आवाज़ थी, जिसने मुकुल को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। उसने कहा, “युवक, मैं इस धरती का नहीं हूँ, न ही मैं इस काल का हूँ। जिसे तुम 1450 कह रहे हो, वह समय का केवल एक चक्र है, और मेरी कहानी तुम्हारी सोच से कहीं अधिक पुरानी और भयानक है।”
बोगानगाइ का रक्षक Part-1

अबोतोम ने एक बटन दबाया जिससे कमरे की दीवारों पर बड़ी-बड़ी तैरती हुई तस्वीरें उभर आईं, जिन्हें देखकर मुकुल भयभीत हो गया। उन तस्वीरों में गगनचुंबी इमारतें, उड़ने वाले जहाज और फिर एक बहुत बड़ा परमाणु विस्फोट दिखाई दे रहा था जो पूरी पृथ्वी को नष्ट कर रहा था। अबोतोम ने बताना शुरू किया, “मैं कोई भगवान नहीं हूँ, बल्कि साल 4050 का एक वैज्ञानिक हूँ, जो एक भयानक वैश्विक युद्ध के बाद समय यात्रा करके यहाँ अतीत में बच निकला था।”
उसने आगे बताया कि भविष्य में इंसानों ने अपनी ही तकनीक से पूरी दुनिया को तबाह कर दिया था, और केवल कुछ ही लोग टाइम मशीन से अतीत में भाग पाए थे। जब वह इस 1450 के असम में पहुँचा, तो उसकी मशीन क्रैश हो गई और वह यहीं फंस गया। यहाँ के आदिम इंसानों को जंगली जानवरों और महामारियों से बचाने के लिए उसने अपनी बची-खुची तकनीक का इस्तेमाल किया और खुद को एक ‘डेमी-गॉड’ के रूप में स्थापित किया।
मुकुल ने हैरान होते हुए पूछा, “अगर तुम भविष्य के इंसान हो, तो यह सब करने की क्या जरूरत थी? सीधे सच क्यों नहीं बताया?” मुखिया माधब ने बीच में टोकते हुए कहा, “क्योंकि तब के सीधे-सादे इंसान विज्ञान को नहीं समझते, वे केवल शक्ति और डर को समझते हैं। अगर इन्हें सच पता चलता, तो वे इन मशीनों को शैतान समझकर नष्ट कर देते और खुद भी जंगली जानवरों का शिकार होकर खत्म हो जाते।”
अबोतोम ने खांसते हुए कहा, “मेरी यह मशीन, जो मुझे पांच सौ सालों से जिंदा रखे हुए है, अब पूरी तरह से खत्म होने वाली है। इसका ईंधन, जो एक विशेष प्रकार का यूरेनियम तत्व है, अब समाप्त हो चुका है। अगर यह मशीन बंद हुई, तो मेरा सुरक्षा कवच हट जाएगा, और इस जंगल के नीचे दबे वो भयानक म्यूटेंट (विकृत जीव) जाग जाएंगे जिन्हें मैंने अपनी तरंगों से सुलाकर रखा है।” मुकुल को समझ आया कि जिन्हें वे नरभक्षी समझ रहे थे, वे असल में भविष्य के परमाणु युद्ध के बचे हुए राक्षस थे।
मुकुल के सामने अब एक बहुत बड़ा धर्मसंकट था कि वह गाँव को सच बताए या इस भयानक रहस्य को अपने सीने में दफन कर ले। उसने तय किया कि वह इस तकनीक को बचाने में मदद करेगा ताकि उसका गाँव सुरक्षित रह सके। उसने अबोतोम से पूछा कि वह ईंधन कहाँ से ला सकता है, क्योंकि 1450 के असम में यूरेनियम जैसी चीज़ का मिलना नामुमकिन था। अबोतोम ने एक नक्शा दिखाया जो बोगानगाइ की सबसे गहरी गुफा की तरफ इशारा कर रहा था।
मुकुल अपनी तलवार और एक विशेष तकनीकी यंत्र लेकर, जिसे अबोतोम ने दिया था, उस गहरी गुफा की तरफ निकल पड़ा। गुफा के अंदर का माहौल बहुत ही खौफनाक था और वहाँ हवा में एक अजीब सी गंध थी जो सांस लेना दूभर कर रही थी। जैसे-जैसे वह अंदर गया, उसे कुछ भयानक आकृतियां दिखाई दीं—वे सचमुच म्यूटेंट थे, जिनके कई सिर और अजीब अंग थे, जो सो रहे थे। यंत्र की मदद से उसने उस नीली चमक वाली चट्टान को ढूंढ निकाला जो ईंधन थी।
उसने बहुत ही सावधानी से चट्टान के टुकड़े को काटा और उसे अपने थैले में रख लिया, लेकिन तभी उसका पैर एक म्यूटेंट की पूंछ पर पड़ गया। वह जीव एक भयानक चीख के साथ जाग गया और उसके साथ ही पूरी गुफा में हलचल मच गई। मुकुल ने अपनी अहोम सेना की पूरी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करते हुए उन जीवों पर हमला किया और खुद को बचाते हुए गुफा से बाहर की तरफ भागा। वह लहूलुहान हो चुका था, लेकिन ईंधन सुरक्षित था।
वह किसी तरह दौड़ते हुए वापस उस भूमिगत प्रयोगशाला में पहुँचा और वह चमकदार टुकड़ा माधब के हाथों में सौंप दिया। माधब ने तुरंत उसे मशीन के कोर में डाला, जिससे पूरी प्रयोगशाला एक बार फिर तेज नीली रोशनी से जगमगा उठी। कांच के बक्से के अंदर लेटे अबोतोम की सांसें स्थिर हो गईं और उसकी आँखें खुल गईं। उसने मुकुल की तरफ देखा और कहा, “तुमने आज मानवता के भविष्य को एक बार फिर से बचा लिया है, युवा योद्धा।”
मुकुल थका हुआ था लेकिन संतुष्ट था कि उसने अपने गाँव को एक अदृश्य और भयानक विनाश से बचा लिया था। वह प्रयोगशाला से बाहर निकलकर खुली हवा में आया और सुबह के उगते हुए सूरज को देखने लगा। उसे लगा कि अब सब कुछ ठीक हो चुका है और बोगानगाइ का यह रक्षक हमेशा की तरह उनकी रक्षा करता रहेगा। उसने मुखिया माधब की तरफ देखा और मुस्कुराया, यह सोचते हुए कि कुछ झूठ सचमुच मासूमों की जान बचाने के लिए जरूरी होते हैं।
तभी अचानक, भूमिगत प्रयोगशाला के अंदर से एक अलार्म की तेज आवाज़ गूंजने लगी और पूरी जमीन तेजी से हिलने लगी। मुकुल तुरंत अंदर भागा और देखा कि अबोतोम का कांच का बक्सा पूरी तरह से टूट चुका था और वह बूढ़ा वैज्ञानिक जमीन पर गिरा हुआ था। मशीन की स्क्रीन पर लाल अक्षरों में एक चेतावनी चमक रही थी, जिसे मुकुल पढ़ नहीं सकता था, लेकिन माधब का चेहरा देखकर वह समझ गया कि कुछ बहुत गलत हो गया है।
माधब रोते हुए घुटनों के बल बैठ गया और बोला, “मुकुल, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई, वह चट्टान ईंधन नहीं थी।” अबोतोम ने अपनी आखिरी सांसें लेते हुए मुकुल का हाथ पकड़ा और हांफते हुए कहा, “वह टुकड़ा… वह ईंधन नहीं था, बल्कि वह एक ‘टाइम-लूप स्टेबलाइजर’ का मुख्य हिस्सा था जिसे मैंने वहाँ छुपाया था। उसे अपनी जगह से हटाने का मतलब है कि समय का चक्र पूरी तरह से टूट चुका है।” मुकुल की आँखें फटी की फटी रह गईं।
अबोतोम ने मरते-मरते जो आखिरी शब्द कहे, उसने पूरी कहानी को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। उसने कहा, “यह बोगानगाइ गाँव… यह साल 1450 नहीं है मुकुल। यह साल असल में 5050 है, और तुम सब कोई प्राचीन इंसान नहीं हो। तुम सब मेरी ही प्रयोगशाला में क्लोन किए गए वो इंसान हो जिनकी यादें मैंने मिटाकर तुम्हें इस भ्रम में रखा था कि तुम अतीत में जी रहे हो ताकि तुम शांति से रह सको।”
जैसे ही अबोतोम के प्राण पखेरू उड़े, बोगानगाइ के आसमान का नीला रंग अचानक गायब हो गया और वहाँ एक विशाल होलोग्राफिक स्क्रीन दिखाई देने लगी, जो टूटकर बिखर रही थी। जंगल, नदियां, और वे खूबसूरत पहाड़ धीरे-धीरे गायब होने लगे और उनकी जगह एक सूखी, जली हुई और काली बंजर धरती उभर आई। मुकुल ने चौंककर अपने हाथों की तरफ देखा, उसकी त्वचा भी किसी मशीन के पुर्जों की तरह बिखरने लगी थी।
पूरा गाँव और वहाँ के लोग असल में एक विशाल कंप्यूटर सिमुलेशन का हिस्सा थे, जिसे उस भविष्य के वैज्ञानिक ने अपनी आत्मग्लानी को कम करने के लिए बनाया था। मुकुल को अब समझ आया कि उसकी युद्ध की यादें, उसका अहोम साम्राज्य, सब कुछ महज़ एक कोरी कल्पना थी जो उसके दिमाग में फीड की गई थी। समय का वह भ्रम टूटते ही, पूरा बोगानगाइ ब्रह्मांड के उस अनंत शून्य में विलीन हो गया, जहाँ न कोई रक्षक था और न कोई युग।
टूटा हुआ आईना – बनारस की एक हवेली में छिपे रहस्यों,परिवार, रिश्तों और विश्वास की भावुक कहानी