परछाइयों का कोलाहल

परछाइयों का कोलाहल | परिवार के काले रहस्य और मिटाई गई यादों की कहानी |

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परछाइयों का कोलाहल-Part 1

गोवा की ढलती शाम अमूमन सैलानियों के लिए एक हसीन ख्वाब जैसी होती है, लेकिन उस समुद्र तटीय पुराने विला के बंद कमरों में पसरी खामोशी कुछ और ही बयां कर रही थी। समंदर की लहरों का शोर जब पथरीले किनारों से टकराता, तो ऐसा लगता मानो कोई सदियों पुराना राज खुद को उजागर करने के लिए तड़प रहा हो। इस विला की जर्जर दीवारें और धूल से सने झूमर अपनी भव्यता खो चुके थे, मगर उनके भीतर छिपा अंधेरा अब भी पूरी तरह जीवंत था। पुर्तगाली वास्तुकला से बने इस मकान के मुख्य द्वार पर लगे भारी लोहे के ताले को आज कई दशकों बाद खोला जा रहा था, जिसकी गूंज दूर तक सुनाई दी थी।

समरजीत ने जैसे ही उस भारी-भरकम दरवाजे को धक्का दिया, एक अजीब सी ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया, जिसने उसके बदन में सिहरन पैदा कर दी। वह पेशावर से आया एक स्वतंत्र खोजी पत्रकार था, जिसे पुरानी और रहस्यमयी संपत्तियों के इतिहास को कुरेदने का अजीब जुनून था। उसे स्थानीय लोगों ने इस विला के बारे में कई तरह की चेतावनियां दी थीं, लेकिन उन अनसुनी बातों ने उसके कौतूहल को और बढ़ा दिया था। हाथ में पकड़ी टॉर्च की पीली रोशनी जब हॉल की दीवारों पर पड़ी, तो वहां टंगे धुंधले तैलचित्र अजीब से मुस्कुराते हुए प्रतीत हुए, मानो वे उसके आने का ही इंतजार कर रहे हों।

हॉल के बीचों-बीच एक बड़ा सा महोगनी की लकड़ी का पुराना संदूक रखा था, जो अजीब तरह से साफ था, मानो कोई नियमित रूप से इसकी देखभाल करता हो। समरजीत ने अपनी उंगलियों से उस संदूक की नक्काशी को छुआ, तो उसे महसूस हुआ कि लकड़ी के भीतर कुछ अजीब सी थरथराहट हो रही थी। उसने अपनी जेब से एक पुराना ताला तोड़ने का औजार निकाला और बिना समय गंवाए उस संदूक के सदियों पुराने जंग लगे लॉक पर काम करना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों की मशक्कत के बाद एक भारी आवाज के साथ वह संदूक खुल गया, जिसके भीतर केवल एक काली मखमली डायरी और एक अजीब सी धातु की चाबी रखी थी।

उस डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे और उन पर लिखी स्याही कई जगहों पर फीकी पड़ चुकी थी, लेकिन शुरुआती शब्दों ने ही समरजीत के होश उड़ा दिए। डायरी में किसी ‘अनामिका’ नाम की महिला का जिक्र था, जिसने साल 1974 में इस विला के भीतर घटने वाली एक ऐसी खौफनाक घटना को दर्ज किया था, जिसका जिक्र किसी सरकारी दस्तावेज में नहीं था। पन्नों को पलटते हुए समरजीत की नजरें एक ऐसी तारीख पर टिकीं, जो उसके अपने परिवार के इतिहास से अजीब तरह से मेल खाती थी। उसे अचानक अपनी मां की कही वे बातें याद आने लगीं, जिन्हें वह बचपन में महज एक बुरा सपना समझकर पूरी तरह भूल चुका था।

डायरी में लिखा था कि इस विला के नीचे एक गुप्त तहखाना है, जहां इंसानी दिमाग की स्मृतियों को बदलने और उन्हें पूरी तरह मिटाने का एक भयावह खेल खेला जाता था। समरजीत का सिर चकराने लगा जब उसने पढ़ा कि उस दौर के कुछ रसूखदार लोगों ने अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए अपने ही करीबियों की यादों को हमेशा के लिए दफन कर दिया था। इस खेल का मुख्य सूत्रधार कोई और नहीं, बल्कि वही शख्स था जिसे समरजीत आज तक अपना आदर्श मानता आया था, यानी उसके दिवंगत दादाजी। इस कड़वे सच ने समरजीत के पैरों तले से जमीन खिसका दी और उसका पूरा वजूद एक पल में बिखरने लगा।

जैसे-जैसे समरजीत डायरी के पन्नों में गहराई से उतरता गया, उसे महसूस हुआ कि यह कोई साधारण वैज्ञानिक प्रयोग नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी सामाजिक साजिश थी। डायरी में इस बात का भी उल्लेख था कि कैसे प्रयोग के दौरान कई मासूमों ने अपनी मानसिक चेतना खो दी थी और वे जीते-जी एक जिंदा लाश बन गए थे। कमरे का तापमान अचानक गिरने लगा था और समरजीत को ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य ताकत उसकी हर हरकत पर पैनी नजर रख रही हो। हवा में तैरते धूल के कण टॉर्च की रोशनी में तैरते हुए किसी भूतिया जाल की तरह लग रहे थे, जो उसे अपने भीतर समेटना चाहता था।

उसने डायरी के अगले पन्ने पर देखा कि वहां कुछ रासायनिक समीकरण लिखे थे, जो सामान्य चिकित्सा विज्ञान की समझ से पूरी तरह परे थे। उन समीकरणों के नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था कि इस प्रक्रिया का असर केवल पीड़ित पर नहीं, बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ियों के मस्तिष्क पर भी पड़ सकता है। समरजीत को अचानक अपने जीवन के वे अजीब पल याद आने लगे जब वह बिना किसी वजह के अवसाद से घिर जाता था और उसे अजीबोगरीब आवाजें सुनाई देती थीं। उसे ऐसा लगने लगा कि उसका इस विला में आना कोई इत्तेफाक नहीं था, बल्कि किसी पुरानी अधूरी कहानी का अगला हिस्सा था।

विला की खिड़कियों से छनकर आती समंदर की हवा अब एक डरावनी सीटी जैसी आवाज पैदा कर रही थी, जो समरजीत के सब्र का इम्तिहान ले रही थी। उसने अपने कांपते हाथों से उस धातु की चाबी को उठाया, जिस पर प्राचीन पुर्तगाली भाषा में कुछ अजीब से चिन्ह खुदे हुए थे। चाबी का वजन उसकी उम्मीद से कहीं ज्यादा था और उसे छूते ही एक अजीब सी ठंडक उसकी हथेलियों से होती हुई सीधे उसके दिल तक पहुंच गई। उसने महसूस किया कि इस चाबी के पीछे छिपा रहस्य उसकी पूरी जिंदगी की सच्चाई को पूरी तरह से बदलने की ताकत रखता था।

समरजीत ने गहरी सांस ली और अपने चश्मे को साफ करते हुए कमरे के चारों तरफ दोबारा नजर दौड़ाई ताकि वह किसी भी सुराग को छोड़ न दे। दीवारों पर लगी पुरानी घड़ियां रुकी हुई थीं, लेकिन उनकी सुइयां एक ही विशेष समय पर थमी हुई थीं—ठीक रात के बारह बजकर पैंतालीस मिनट पर। डायरी में भी इसी समय का जिक्र बार-बार किया गया था, जिसे प्रयोग के चरम बिंदु के रूप में दर्ज किया गया था। इस समानता ने समरजीत के मन में भय और जिज्ञासा का एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया, जिसने उसकी तार्किक सोच को पूरी तरह पंगु बना दिया था।

वह सोचने लगा कि क्या उसकी मां को भी इसी जगह लाया गया था और क्या उनकी मानसिक बीमारी का कारण वास्तव में कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि यही खौफनाक प्रयोग था। उसके पिता ने हमेशा इस विषय पर बात करने से मना किया था और हर बार सवाल पूछने पर वे हिंसक या अत्यधिक भावुक हो जाते थे। अब सारे बिंदु एक-दूसरे से जुड़ रहे थे और एक ऐसी भयावह तस्वीर सामने आ रही थी जिसे देख पाना किसी भी आम इंसान के बस की बात नहीं थी। समरजीत ने तय किया कि वह इस काले सच के अंतिम छोर तक जाकर ही दम लेगा, चाहे इसकी कीमत कुछ भी हो।

परछाइयों का कोलाहल-Part 2

समरजीत ने उस धातु की चाबी को मजबूती से पकड़ा और डायरी में दिए गए गुप्त नक्शे के अनुसार हॉल के सुदूर कोने में बिछे पुराने कालीन को हटाया। कालीन के नीचे एक भारी, जंग लगा लोहे का दरवाजा छिपा था जो फर्श की लकड़ियों के बीच इस तरह फिट था कि कोई सामान्य इंसान इसे देख ही न पाए। चाबी को जैसे ही उसने उस प्राचीन लॉक में डाला, एक भारी घड़घड़ाहट के साथ वह दरवाजा खुला और नीचे अंधेरी सीढ़ियों का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया। सीढ़ियों से नीचे उतरते समय हवा में सड़न, पुरानी किताबों और अज्ञात रसायनों की एक तीखी गंध तैर रही थी, जो सांसों को भारी कर रही थी।

टॉर्च की रोशनी जैसे-जैसे नीचे के कमरों पर पड़ी, वहां रखे अजीबोगरीब कांच के जार, पुरानी मशीनें और जंग लगे मेडिकल उपकरण दिखाई देने लगे जो किसी कसाईखाने जैसे लग रहे थे। तहखाने के मुख्य कक्ष में एक बहुत बड़ी स्क्रीन लगी थी, जिसके सामने एक पुरानी आरामकुर्सी रखी थी, जिस पर किसी का कंकाल आज भी वैसी ही स्थिति में बैठा था।

समरजीत ने हिम्मत जुटाई और उस कंकाल के करीब जाकर उसके गले में लटके एक पुराने चांदी के लॉकेट को देखा, जिसे खोलते ही उसके भीतर उसकी अपनी मां की बचपन की तस्वीर दिखाई दी। उसके दिमाग में अचानक एक जोरदार धमाका हुआ और बचपन की वे धुंधली यादें बिल्कुल साफ होने लगीं, जो अब तक दफन थीं।

उसे याद आया कि कैसे बचपन में उसे एक बंद अंधेरे कमरे में ले जाया जाता था और कुछ लोग सफेद कोट पहने उसकी आंखों के सामने अजीब रोशनी चमकाते थे। उसे समझ आ गया कि वह कोई स्वतंत्र पत्रकार नहीं था जो इस विला की कहानी ढूंढने आया था, बल्कि उसे एक सोची-समझी साजिश के तहत यहां वापस खींचा गया था। तभी कमरे के कोने से एक परछाईं निकलकर सामने आई, जिसके हाथ में एक प्राचीन रिवाल्वर थी और उसके चेहरे पर एक कुटिल, जानी-पहचानी मुस्कान तैर रही थी। वह कोई और नहीं बल्कि समरजीत का अपना सगा चाचा था, जिसे उसने सालों पहले एक कार दुर्घटना में मृत मान लिया था।

चाचा ने जोर से हंसते हुए कहा कि इस विला का असली राज कभी बाहर नहीं जाना चाहिए था, और समरजीत की यादों का मिटाया जाना ही उसके जिंदा रहने की एकमात्र वजह थी। उसने बताया कि कैसे हर तीस साल बाद इस परिवार का एक सदस्य अपनी खोई हुई पहचान की तलाश में खुद-ब-खुद यहां चला आता है और हमेशा के लिए इसी अंधेरे में दफन हो जाता है। चाचा ने यह भी खुलासा किया कि समरजीत की पूरी जिंदगी, उसकी पत्रकारिता की नौकरी और इस विला के बारे में मिली हर जानकारी एक बुना हुआ जाल थी ताकि उसे वापस इस प्रयोगशाला में लाया जा सके।

इस विला के नीचे बहने वाला भूमिगत पानी एक ऐसे दुर्लभ रसायन से दूषित था जो इंसानी दिमाग की यादों को एक खास आवृत्ति पर पूरी तरह मिटा देता था और नए विचार डाल देता था। समरजीत को अब समझ आया कि क्यों उसे अक्सर अपनी जिंदगी के शुरुआती पंद्रह साल पूरी तरह खाली और बेमानी लगते थे, जैसे वे साल कभी उसकी जिंदगी में थे ही नहीं।

वह अपनी ही जिंदगी का एक ऐसा मोहरा बन चुका था जिसे खेल खत्म होने पर बुरी तरह पिटना ही था, और इस खेल के खिलाड़ी उसके अपने ही लोग थे। उसके भीतर का पत्रकार अब दम तोड़ चुका था और उसकी जगह केवल एक बेबस, ठगा हुआ इंसान बाकी रह गया था।

चाचा ने रिवाल्वर का निशाना सीधे समरजीत के माथे पर साधते हुए कहा कि अब समय आ गया है जब इस पीढ़ी के आखिरी गवाह को भी हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाए। समरजीत ने देखा कि चाचा की उंगली जैसे ही ट्रिगर पर दबी, कमरे की जर्जर बिजली की लाइन में एक जोरदार शॉर्ट सर्किट हुआ और पूरी रोशनी एक पल के लिए गुल हो गई। इसी अंधेरे का फायदा उठाते हुए समरजीत ने अपनी भारी टॉर्च को सीधे चाचा के चेहरे पर दे मारा, जिससे रिवाल्वर की गोली चूक गई और दीवार से जा टकराई। कमरे में चारों तरफ कांच के टूटने की आवाजें गूंजने लगीं और रसायनों की गंध और भी तेज हो गई।

समरजीत ने बिना सोचे-समझे वहां रखे रसायनों के एक बड़े ड्रम को लात मारकर गिरा दिया, जिससे पूरे तहखाने के फर्श पर एक ज्वलनशील तरल पदार्थ फैल गया। शॉर्ट सर्किट से निकली चिंगारियों ने जैसे ही उस तरल को छुआ, पूरे तहखाने में नीले रंग की एक भयानक आग भड़क उठी जिसने मशीनों को अपनी चपेट में ले लिया।

आग की लपटों के बीच समरजीत ने उस काली मखमली डायरी को अपने सीने से लगाया और सीढ़ियों की तरफ पागलों की तरह दौड़ पड़ा, जबकि पीछे उसका चाचा उस आग के घेरे में बुरी तरह घिर चुका था। चाचा की चीखें विला की दीवारों से टकराकर और भी खौफनाक लग रही थीं, लेकिन समरजीत अब पीछे मुड़ने वाला नहीं था।

वह हांफते हुए, जलते हुए मलबे से बचते हुए किसी तरह विला के मुख्य द्वार से बाहर खुला आसमान के नीचे कंक्रीट के रास्ते पर आ गिरा। उसके बाहर निकलते ही पूरा विला एक के बाद एक कई भयानक विस्फोटों के साथ ढह गया और उसकी सदियों पुरानी मीनारें समंदर की रेत में समा गईं।

सुबह की पहली किरण जब समंदर की लहरों पर पड़ी, तो समरजीत वहीं तट पर बैठा उस जलते हुए मलबे को देख रहा था जो उसके परिवार के काले इतिहास को मिटा रहा था। उसने अपने हाथ में पकड़ी उस डायरी को देखा और महसूस किया कि कुछ सच इतने काले और डरावने होते हैं कि उन्हें याद रखने से बेहतर उनका हमेशा के लिए मिट जाना ही बेहतर होता है।

रक्त और राख | प्यार, धोखा और खौफनाक बदला |

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