विश्वास की दरारें

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विश्वास की दरारें part – 1

समीर सिंघानिया अपनी आलीशान कोठी के विशाल कांच की खिड़की के पास खड़े थे। बाहर बरसती बारिश की बूंदें कांच से टकराकर नीचे गिर रही थीं, ठीक वैसे ही जैसे उनके परिवार के रिश्ते बिखर रहे थे। शहर के सबसे बड़े स्टील एम्पायर के मालिक होने के बावजूद, समीर के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। आज उनके बड़े बेटे, शौर्य का विदेश से दस साल बाद वापस लौटने का दिन था।

कमरे में शांति थी, लेकिन समीर का दिल पुरानी यादों के शोर से गूंज रहा था। दस साल पहले, जब शौर्य ने अपनी पढ़ाई पूरी की थी, तब एक भयंकर बहस के बाद वह घर छोड़कर चला गया था। समीर ने हमेशा अपने बच्चों के लिए सिर्फ सर्वश्रेष्ठ चाहा था, लेकिन उनके सख्त अनुशासन को शौर्य ने अपनी आजादी पर बंदिश समझ लिया था। अब जब वह लौट रहा था, तो समीर को डर था कि क्या वे कभी पहले जैसे हो पाएंगे।

तभी सीढ़ियों से उतरते हुए देविका, समीर की पत्नी, हॉल में आईं। उनके चेहरे पर एक माँ की व्याकुलता और आँखों में बरसों का इंतजार साफ झलक रहा था। देविका ने हमेशा परिवार को बांधकर रखने की कोशिश की थी, लेकिन पति के गौरव और बेटे के स्वाभिमान के बीच वह हमेशा पिसती रहीं। उन्होंने समीर के कंधे पर हाथ रखा, जैसे वह बिना कुछ कहे उनका हौसला बढ़ा रही हों।

“वह आ गया है, जी,” देविका की आवाज में एक कंपन था जिसे वह छुपा नहीं सकीं। समीर ने मुड़कर देखा, और सामने मुख्य दरवाजे पर शौर्य खड़ा था। लंबा, गंभीर और पहले से कहीं अधिक परिपक्व, शौर्य की आँखें अपने पुराने घर को देख रही थीं। लेकिन उन आँखों में कोई खुशी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा ठंडापन और दूरी थी जो सबको महसूस हो रही थी।

शौर्य के ठीक पीछे उसका छोटा भाई, कबीर, भी खड़ा था जो उसे एयरपोर्ट से लेने गया था। कबीर स्वभाव से चंचल था, लेकिन आज उसका चेहरा भी गंभीर था। कबीर ने हमेशा अपने बड़े भाई को एक आदर्श की तरह देखा था, लेकिन उनके जाने के बाद, बिजनेस की सारी जिम्मेदारी कबीर पर आ गई थी। कबीर के मन में भी इस बात को लेकर एक दबी हुई शिकायत थी।

लंच टेबल पर पूरा सिंघानिया परिवार इकट्ठा था, जहाँ दुनिया भर के बेहतरीन व्यंजन परोसे गए थे। अमीर परिवारों की इस चमक-दमक के पीछे अक्सर गहरे सन्नाटे छिपे होते हैं, और आज भी ऐसा ही था। चम्मचों की खनक के अलावा पूरे हॉल में कोई आवाज नहीं थी। समीर ने बात शुरू करने की कोशिश की, “शौर्य, तुम्हारी आगे की क्या योजनाएं हैं? क्या अब तुम बिजनेस संभालोगे?”

शौर्य ने अपनी प्लेट पर ध्यान केंद्रित रखते हुए जवाब दिया, “मैं यहाँ बिजनेस के लिए नहीं आया हूँ, डैड। मैं सिर्फ अपनी माँ से मिलने और कुछ कानूनी कागजात पर आपके दस्तखत लेने आया हूँ।” इस ठंडे जवाब ने टेबल पर मौजूद हर व्यक्ति को चौंका दिया। समीर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, लेकिन उन्होंने खुद पर काबू रखा, क्योंकि वह पहले ही दिन कोई तमाशा नहीं चाहते थे।

देविका ने माहौल को संभालने की कोशिश करते हुए कहा, “शौर्य, बेटा, इतने सालों बाद आए हो, कुछ दिन तो शांति से बैठो। तुम्हारा कमरा आज भी वैसा ही है जैसा तुम छोड़कर गए थे।” शौर्य ने अपनी माँ की तरफ देखा और उसकी आँखों में थोड़ी नरमी आई। “माँ, चीजें बदल चुकी हैं, और मैं भी। अतीत की परछाइयों में जीना अब मेरे लिए मुमकिन नहीं है।”

शाम को कबीर शौर्य के कमरे में गया, जहाँ शौर्य अपनी पुरानी किताबों को देख रहा था। कबीर ने दरवाजे पर दस्तक दी और अंदर आते हुए कहा, “भाई, आपको क्या लगता है कि सिर्फ आपने ही भुगता है? जब आप चले गए, तो डैड की सारी उम्मीदें और उनका गुस्सा मुझ पर टूट पड़ा। मुझे कभी वह करने की आजादी नहीं मिली जो मैं करना चाहता था।”

शौर्य ने मुड़कर कबीर को देखा, उसकी आवाज में एक दर्द था। “कबीर, तुम नहीं जानते कि उस रात क्या हुआ था। तुम बहुत छोटे थे। डैड ने सिर्फ मेरी जिंदगी के फैसले नहीं लिए थे, बल्कि उन्होंने मुझसे मेरी पहचान छीन ली थी।” कबीर ने हैरान होकर पूछा, “आप किस बारे में बात कर रहे हैं भाई? डैड ने तो हमेशा हमें दुनिया की हर खुशी देने की कोशिश की है।”

शौर्य ने एक गहरी सांस ली और खिड़की की तरफ देखने लगा। “अमीर होने का मतलब यह नहीं होता कि आपके पास सब कुछ है, कबीर। कभी-कभी बड़ी हवेलियों में सबसे बड़े राज दफन होते हैं।” कबीर भाई की बातों का मतलब नहीं समझ पा रहा था, लेकिन उसे इतना जरूर अहसास हो गया था कि यह लड़ाई सिर्फ बाप-बेटे के अहंकार की नहीं, बल्कि किसी बहुत गहरे जख्म की है।

रात के सन्नाटे में, समीर अपने स्टडी रूम में अकेले बैठे थे और हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी। वह तस्वीर शौर्य के बचपन की थी, जब वह समीर की उंगली पकड़कर चलना सीख रहा था। समीर की आँखों से एक आंसू टपक कर तस्वीर पर गिर गया। वह सोच रहे थे कि कहाँ उनसे ऐसी चूक हो गई कि उनका अपना ही खून आज उनके सामने एक अजनबी बनकर खड़ा था।

विश्वास की दरारें part -2

विश्वास की दरारें
विश्वास की दरारें

अगली सुबह, घर का माहौल और भी तनावपूर्ण हो गया था जब सिंघानिया ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के मुख्य वकील, मिस्टर मेहता, घर आए। समीर, देविका, शौर्य और कबीर सभी लिविंग रूम में मौजूद थे। शौर्य ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और उसे टेबल पर रख दिया। “डैड, मुझे इस ट्रस्ट फंड के पेपर्स पर आपके साइन चाहिए, जो दादाजी ने मेरे नाम किया था।”

समीर ने पेपर्स को देखा और फिर शौर्य की तरफ, उनकी आवाज में इस बार गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा दुख था। “शौर्य, तुम्हें क्या लगता है कि मैं तुम्हें तुम्हारी संपत्ति से दूर रखना चाहता हूँ? यह सब कुछ जो मैंने बनाया है, वह किसके लिए है? तुम्हारे और कबीर के लिए ही तो है।” शौर्य ने कड़वाहट से हंसते हुए कहा, “क्या वाकई यह सब हमारे लिए है, डैड? या सिर्फ आपके नाम के लिए?”

तनाव अपने चरम पर था तभी देविका बीच में आईं और उन्होंने शौर्य के हाथ से पेपर्स ले लिए। “बस करो शौर्य! तुम अपने पिता से इस तरह बात नहीं कर सकते। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इस परिवार के लिए कुर्बान कर दी है।” शौर्य ने अपनी माँ की तरफ देखा, उसकी आँखें नम हो गईं। “माँ, आप आज भी सच नहीं जानतीं। आप आज भी उस इंसान का साथ दे रही हैं जिसने हमसे झूठ बोला।”

“कैसा झूठ, शौर्य?” कबीर ने चिल्लाते हुए पूछा, उसका सब्र अब जवाब दे रहा था। शौर्य ने समीर की तरफ देखा, जो अब अपनी नजरें नीचे कर चुके थे। शौर्य ने आगे बढ़कर कहा, “दस साल पहले, जिस एक्सीडेंट में मेरी सगी माँ, यानी डैड की पहली पत्नी की मौत हुई थी, वह कोई हादसा नहीं था। वह डैड की लापरवाही का नतीजा था, जिसे इन्होंने पैसे के दम पर दबा दिया।”

इस खुलासे ने पूरे कमरे में जैसे एक बम फोड़ दिया। देविका के पैरों तले जमीन खिसक गई और वह सोफे पर बैठ गईं। कबीर हैरान रह गया और उसने समीर की तरफ देखा, “डैड… क्या यह सच है?” समीर खामोश रहे, उनका सिर झुका हुआ था और उनके हाथ कांप रहे थे। इस आलीशान कोठी का सबसे बड़ा और सबसे अंधेरा राज आज सबके सामने आ चुका था।

शौर्य ने आगे कहा, “हाँ कबीर, डैड उस रात शराब पीकर गाड़ी चला रहे थे। कोर्ट और पुलिस को खरीदने के लिए इन्होंने करोड़ों रुपये खर्च किए ताकि इनका नाम खराब न हो। और जब मुझे यह सच पता चला, तो इन्होंने मुझे चुप रहने के लिए कहा। मुझे घर से निकाला नहीं गया था, मैं इस गुनाह की कमाई और इस झूठे नाम के साथ नहीं रह सकता था इसलिए मैं खुद गया था।”

कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया, सिर्फ देविका के सिसकने की आवाज आ रही थी। समीर ने आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ी, उनकी आवाज भारी और फटी हुई थी। “हाँ, शौर्य सही कह रहा है। मुझसे वह बहुत बड़ी गलती हुई थी, और मैंने उस सच को छुपाने की कोशिश की। लेकिन मैंने वह सब इसलिए नहीं किया कि मैं अपनी जान बचाना चाहता था, बल्कि इसलिए किया क्योंकि मैं तुम दोनों को अनाथ नहीं देखना चाहता था।”

समीर उठकर शौर्य के पास गए, उनकी आँखों में पश्चाताप के आंसू थे। “अगर मैं उस वक्त जेल चला जाता, तो तुम दोनों का क्या होता? सिंघानिया साम्राज्य बिखर जाता और दुनिया तुम्हें जीने नहीं देती। मैंने एक पिता होने के नाते, अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए उस सच को दफन कर दिया। मेरा तरीका गलत था, लेकिन मेरी नीयत सिर्फ तुम्हें बचाना था।”

शौर्य ने अपने पिता के चेहरे को देखा, जहाँ अब कोई अमीर बिजनेसमैन नहीं, बल्कि एक बूढ़ा और टूटा हुआ पिता खड़ा था। दस सालों का गुस्सा और नफरत, पिता के इस रोते हुए रूप को देखकर धीरे-धीरे पिघलने लगी। कबीर ने समीर को गले लगा लिया, “डैड, आपने हमसे इतना बड़ा सच क्यों छुपाया? हम साथ मिलकर इस दर्द को बांट सकते थे।”

देविका उठीं और उन्होंने शौर्य और समीर के हाथों को एक साथ जोड़ा। “जो बीत गया, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन जो आज हमारे पास है, उसे हम अपने हाथों से तबाह नहीं कर सकते। शौर्य, तुम्हारे पिता ने अपनी आत्मा को मारकर तुम्हें यह जिंदगी दी है। क्या तुम उन्हें एक मौका भी नहीं दोगे?” शौर्य ने अपनी माँ के आंसू पोंछे और फिर अपने पिता की तरफ देखा।

शौर्य ने टेबल पर रखे ट्रस्ट पेपर्स को उठाया और उन्हें फाड़कर फेंक दिया। उसने आगे बढ़कर समीर के पैर छुए और फिर उन्हें कसकर गले लगा लिया। दस साल की दूरी, गलतफहमियां और छिपे हुए सच, पश्चाताप और क्षमा के आंसुओं में बह गए। सिंघानिया परिवार की वह आलीशान कोठी आज पहली बार सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि अपनों के सच्चे प्यार और अहसास से महक रही थी।

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