आखिरी पन्ना part-1
समीर की सुबह हमेशा की तरह अलार्म की कर्कश आवाज़ के साथ नहीं, बल्कि खिड़की से छनकर आती सुनहरी धूप के साथ होती थी। वह एक शांत और व्यवस्थित जीवन जीने वाला व्यक्ति था, जिसे अपने रोजमर्रा के कामों में एक अलग ही सुकून मिलता था। कॉफी की महक और अखबार के पन्नों की सरसराहट उसकी दिनचर्या का सबसे अहम हिस्सा थे। बाहर की दुनिया में क्या हो रहा है, इससे उसे कभी कोई खास फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि उसका अपना एक छोटा सा संसार था। इस संसार में वह खुश था, या शायद उसे खुश रहने का दिखावा करना अच्छी तरह आता था।
उसका घर शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक पुरानी हवेलीनुमा इमारत की पहली मंजिल पर था। हवेली का मालिक बहुत बूढ़ा था और शायद ही कभी बाहर निकलता था, जिससे समीर को पूरी निजता मिलती थी। समीर खुद एक फ्रीलांस राइटर था, जो अपनी दुनिया में खोया रहता था। वह अक्सर अपनी कहानियों में उन लोगों को देखता था, जिनसे वह असल जिंदगी में कभी नहीं मिला। उसे लगता था कि उसकी कल्पनाएं ही उसकी असलियत हैं, और शायद यही सोच उसे बाकी भीड़ से अलग बनाती थी।
एक दिन, जब वह अपनी मेज पर बैठकर अपनी अगली कहानी के लिए कुछ शब्द बुन रहा था, उसे डाक में एक लिफाफा मिला। लिफाफे पर कोई पता नहीं था, बस उसका नाम लिखा था—’समीर’। उसने उसे खोलकर देखा तो अंदर एक पुरानी फोटो थी। फोटो में एक लड़की खड़ी थी, जो बिल्कुल उसकी प्रेमिका ‘माया’ जैसी दिख रही थी, जिसकी मृत्यु तीन साल पहले एक सड़क हादसे में हो गई थी। समीर के हाथ कांपने लगे। यह असंभव था, माया की मौत के बाद उसने कभी उसे नहीं देखा था।
उसने फोटो को गौर से देखा, तो उसके पीछे कुछ शब्द लिखे थे: “सत्य हमेशा अतीत के पन्नों में नहीं, बल्कि उन चेहरों में होता है जिन्हें हम भूलना चाहते हैं।” समीर का दिल जोर से धड़कने लगा। माया की मौत उसके जीवन का सबसे बड़ा दुखद अध्याय थी, जिसे वह बंद कर चुका था। उसने अपनी यादों के बक्से में उसे बहुत गहराई में दफन कर दिया था। लेकिन अब, यह लिफाफा और यह फोटो उसकी सारी शांति को तहस-नहस करने के लिए काफी थे। उसने सोचा कि यह किसी का भद्दा मजाक है।
अगले कुछ दिनों तक समीर का ध्यान अपने काम में नहीं लगा। वह बार-बार उसी फोटो को देखता रहा, यह जानने की कोशिश में कि क्या वह माया ही है या उसका कोई हमशक्ल। उसने उन सभी जगहों को खंगाल डाला जहाँ वह माया के साथ गया था, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी पैदा हो गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसकी निगरानी कर रहा हो। उसे हवेली के गलियारों में किसी के चलने की आहट सुनाई देती, लेकिन बाहर देखने पर वहाँ कोई नहीं होता था।
एक रात, जब वह गहरी नींद में था, उसे दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। रात के दो बज रहे थे। वह डरते-डरते उठा और दरवाजे की ओर बढ़ा। उसने धीरे से दरवाजे का ताला खोला, लेकिन बाहर कोई नहीं था। केवल एक छोटा सा पर्चा नीचे पड़ा था। उसने उसे उठाया और पढ़ा: “कल रात 12 बजे कब्रिस्तान के पास वाली पुरानी लाइब्रेरी में आओ, अगर तुम सच जानना चाहते हो।” समीर के होश उड़ गए। उसे लगा जैसे उसका गला किसी ने पकड़ लिया हो।
वह उस रात पूरी तरह जागता रहा। उसके दिमाग में हजार तरह के सवाल घूम रहे थे। क्या माया जिंदा है? क्या उसे मार दिया गया था? या फिर कोई उसे पागल करने की कोशिश कर रहा है? वह जानता था कि कब्रिस्तान के पास वाली लाइब्रेरी बंद पड़े सालों हो चुके हैं, फिर वहाँ जाने का क्या मतलब? लेकिन, उत्सुकता डर से बड़ी थी। उसने फैसला किया कि वह वहाँ जाएगा, चाहे कुछ भी हो जाए। उसे उन सवालों के जवाब चाहिए थे जो उसे कई दिनों से अंदर ही अंदर खा रहे थे।
अगली शाम, सूरज ढलने से पहले ही उसने अपनी जैकेट पहनी और घर से निकल पड़ा। रास्ता सुनसान था और सर्द हवाएं चल रही थीं। कब्रिस्तान की दीवारें अंधेरे में बहुत डरावनी लग रही थीं। जैसे ही वह लाइब्रेरी के करीब पहुँचा, उसे एक परछाईं दिखाई दी। वह एक लड़की की तरह लग रही थी। समीर ने उसे पुकारा, “माया? क्या तुम हो?” वह परछाईं आगे बढ़ने लगी। समीर भी उसके पीछे भागा। जैसे ही वह लाइब्रेरी के भीतर दाखिल हुआ, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
अंदर का नजारा भयानक था। पुरानी किताबों की गंध और धूल भरी हवा ने उसे जकड़ लिया। वहां चारों तरफ दीवार पर तस्वीरें लगी थीं—वे सब समीर की ही तस्वीरें थीं। अलग-अलग उम्र में, अलग-अलग हाव-भाव के साथ। वह कांप उठा। यह सब क्या था? उसे लगा कि वह किसी ऐसे जाल में फंस चुका है जिससे निकलना नामुमकिन है। तभी एक ठंडी आवाज गूंजी, “समीर, तुम यहाँ बहुत देर से आए हो। अब तुम्हें अपना असली चेहरा देखना ही होगा।”
समीर ने इधर-उधर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। उसे लगा कि वह अपनी मानसिक स्थिति खो रहा है। उसने चिल्लाकर कहा, “कौन हो तुम? बाहर आओ!” तभी उसे सामने वाले आईने में अपना प्रतिबिंब दिखाई दिया। उसने देखा कि उसका चेहरा धीरे-धीरे बदल रहा है। उसकी जगह एक दूसरा व्यक्ति आ रहा है। वह कोई और नहीं, बल्कि वह बूढ़ा हवेली मालिक था। समीर को लगा जैसे उसके दिमाग के तार आपस में जुड़ गए हों। उसे सब कुछ धुंधला महसूस होने लगा।
वह अचानक जमीन पर गिर पड़ा। उसका सिर जोर से टकराया। अंधेरा उसके चारों ओर फैल गया। उसे याद आने लगा कि वह माया की मौत के दिन क्या हुआ था। वह कोई राइटर नहीं था। वह तो उस एक्सीडेंट का आरोपी था। उसने माया को नहीं खोया था, बल्कि उसने उसे जानबूझकर मारा था। वह सब कुछ भूल चुका था या शायद वह खुद को यकीन दिलाना चाहता था कि वह निर्दोष है। उसकी पूरी जिंदगी एक झूठ का पुलिंदा थी, जिसे उसने अपनी कल्पनाओं से सजाया था।
आखिरी पन्ना part-2

जब समीर की आँखें खुलीं, तो उसने खुद को एक बंद कमरे में पाया। यह कोई हवेली नहीं थी, बल्कि एक मानसिक अस्पताल का कमरा था। चारों तरफ सफेद दीवारें थीं और खिड़की पर लोहे की सलाखें लगी थीं। उसे सब कुछ अजीब लग रहा था। उसे लगा कि पिछले कुछ पल सिर्फ एक बुरा सपना थे, लेकिन उसके हाथ पर लगे खून के निशान असली थे। दरवाजे से एक डॉक्टर अंदर आया और उसने समीर की ओर देखा। उसकी आंखों में दया और साथ ही एक अजीब सी गंभीरता थी।
डॉक्टर ने कहा, “समीर, तीन साल हो गए हैं। तुम्हें अभी भी लगता है कि तुम उस हवेली में रहते हो?” समीर ने हैरानी से पूछा, “हवेली? मैं तो वहीं रहता हूँ। मैं एक राइटर हूँ!” डॉक्टर ने एक ठंडी सांस ली और फाइल खोली। उसने कहा, “समीर, तुम एक राइटर नहीं हो। तुम एक बहुत ही प्रतिभाशाली कलाकार थे, जिसने एक हादसे के बाद अपनी याददाश्त खो दी थी। तुम जिसे ‘माया’ कहते हो, वह तुम्हारी पत्नी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी लड़की थी जिसे तुमने सड़क दुर्घटना में मार दिया था।”
समीर का सिर चकरा गया। उसने कहा, “नहीं, ये झूठ है! माया मेरी प्रेमिका थी। हमारे पास एक साथ तस्वीरें हैं!” डॉक्टर ने उसे एक फोटो दिखाई। उस फोटो में समीर एक लड़की के साथ था, लेकिन वह लड़की माया नहीं, बल्कि कोई और थी—शायद वही, जिसे उसने अपनी कल्पना में माया बना लिया था। डॉक्टर ने समझाया कि कैसे समीर ने अपराधबोध से बचने के लिए अपनी पूरी दुनिया बदल ली थी। उसने हर चीज को एक कहानी की तरह गढ़ लिया था।
समीर को याद आया कि उस लाइब्रेरी वाली घटना में उसने खुद को हवेली के मालिक के रूप में देखा था। क्या वह वाकई कोई और है? डॉक्टर ने धीरे से कहा, “समीर, तुम एक ‘शख्सियत के दोहरेपन’ (Dissociative Identity Disorder) के मरीज हो। तुम्हारे अंदर दो लोग हैं। एक वह जो अपराधी है, और दूसरा वह जो खुद को मासूम साबित करने के लिए कहानियाँ लिखता है। तुम कभी हवेली में नहीं रहे, तुम हमेशा से यहाँ थे।”
समीर ने अपना सिर पकड़ लिया। उसे लगा जैसे उसके अंदर का कोई हिस्सा जोर-जोर से चिल्ला रहा हो। उसने डॉक्टर की ओर देखा और कहा, “अगर मैं अपराधी हूँ, तो मुझे सजा क्यों नहीं मिली?” डॉक्टर ने चुप्पी साध ली। वह जानता था कि समीर की मानसिक हालत के कारण उसे सजा नहीं, बल्कि इलाज की जरूरत थी। लेकिन समीर के लिए, यह इलाज ही सबसे बड़ी सजा थी। वह अपनी बनाई हुई दुनिया को खोने के डर से कांप रहा था।
अगले कुछ हफ़्तों तक समीर का इलाज चलता रहा। उसे पुरानी यादें वापस लाने के लिए अलग-अलग तरीकों से गुजारा गया। धीरे-धीरे, उसे सब कुछ याद आने लगा। उसे याद आया कि उस रात बारिश हो रही थी, माया गाड़ी चला रही थी और उसने अचानक से स्टेयरिंग मोड़ दिया था। सब कुछ उसकी गलती थी। उसने माया को मार दिया था, और खुद को उस पछतावे से दूर करने के लिए अपनी कल्पनाओं का सहारा लिया था। यह एक बहुत बड़ा मानसिक झूठ था।
एक दिन, जब वह अस्पताल के बगीचे में बैठा था, उसे एक छोटी बच्ची दिखाई दी। उसके हाथ में वही लिफाफा था जो समीर को मिला था। वह दौड़कर बच्ची के पास गया और पूछा, “यह तुम्हें कहाँ से मिला?” बच्ची ने हंसते हुए कहा, “एक अंकल ने दिया था, उन्होंने कहा कि यह समीर को देना।” समीर ने लिफाफा खोला। उसमें एक और फोटो थी, जिसमें वह खुद उस हादसे वाली रात को एक और व्यक्ति के साथ खड़ा था। वह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि वह डॉक्टर था!
समीर के पैरों तले जमीन खिसक गई। क्या डॉक्टर भी उस हादसे का हिस्सा था? क्या वह उसे कुछ छुपाने में मदद कर रहा था? समीर भागा-भागा डॉक्टर के केबिन में गया। दरवाजा खुला था। डॉक्टर अंदर नहीं था, लेकिन मेज पर एक और फाइल पड़ी थी। उसने उसे खोला तो देखा कि उसमें उन लोगों की सूची थी जिन्हें समीर ने ‘खत्म’ किया था। समीर के हाथ ठंडे पड़ गए। वह सिर्फ एक मरीज नहीं था; वह एक ‘सफाई कर्मचारी’ था, जो बड़े लोगों के लिए काम करता था।
यह सब एक बहुत बड़ा षड्यंत्र था। वह ‘राइटर’ होने का नाटक नहीं कर रहा था, बल्कि वह अपनी यादें मिटाने के लिए ड्रग्स और सम्मोहन (Hypnosis) का शिकार बनाया गया था। उसे याद दिलाया गया था कि वह एक अपराधी है, ताकि वह हमेशा के लिए चुप रहे। वह वास्तव में एक बहुत बड़ा राज जानता था, और इसीलिए उसे पागल घोषित करके यहाँ बंद कर दिया गया था। उस हवेली की कहानी, वह माया का प्यार, वह सब कुछ उसके दिमाग में प्रत्यारोपित (Implanted) किया गया था।
समीर ने खिड़की से बाहर देखा। पूरा अस्पताल एक किले की तरह लग रहा था। उसे समझ आ गया था कि उसे कभी बाहर नहीं जाने दिया जाएगा। उसने अपनी जेब से एक कलम निकाली—वह कलम जो उसे बचपन से मिली थी, जिसमें एक छोटा सा माइक्रो-कैमरा लगा था। उसने उसे कभी किसी को नहीं दिखाया था। अब समय आ गया था कि वह अपना असली खेल खेले। उसने रिकॉर्डिंग शुरू की। उसे पता था कि अब खेल खत्म होने वाला है, लेकिन वह हार नहीं मानेगा।
वह वापस अपने कमरे में गया और दीवार पर खुरच-खुरच कर एक पूरी कहानी लिखने लगा। यह कहानी उसके अस्पताल की नहीं, बल्कि उस डॉक्टर की थी जो उसे कैद करके रखना चाहता था। वह जानता था कि सुबह होने तक डॉक्टर उसे फिर से ‘इलाज’ के नाम पर खाली कर देगा, लेकिन तब तक वह अपना काम कर चुका होगा। उसने अपनी आखिरी ताकत जुटाई। उसे समझ आया कि ‘समीर’ नाम तो उसका था ही नहीं। उसका नाम तो वह था जो इस देश के सबसे बड़े खुफिया मिशन का हिस्सा था।
वह खुद को देख सकता था, आईने में नहीं, बल्कि अपने अतीत के पन्नों में। वह माया को नहीं, बल्कि उस सिस्टम को ढूंढ रहा था जिसने उसे एक प्यादा बना दिया था। जब सुबह की पहली किरण कमरे में पड़ी, तो डॉक्टर कमरे में दाखिल हुआ। उसने देखा कि समीर जमीन पर मृत पड़ा था। उसकी आंखों में एक अजीब सी शांति थी। डॉक्टर ने कमरे की दीवारों को देखा, जहाँ समीर ने अपना असली नाम और उस पूरे सिस्टम का पर्दाफाश लिख दिया था।
डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुमने अच्छा खेला, समीर। लेकिन तुम भूल गए कि मैं ही इस खेल का रचयिता हूँ।” डॉक्टर ने एक बटन दबाया और कमरे की सारी दीवारें गायब हो गईं। बाहर कोई अस्पताल नहीं था, वह तो एक लैब थी। समीर कोई इंसान नहीं था, वह एक उन्नत एआई (AI) था जिसे भावनाओं का अनुभव करने के लिए बनाया गया था। उसकी पूरी कहानी, उसकी मौत, उसका पछतावा, सब कुछ डेटा था। समीर का सिस्टम क्रैश हो रहा था।
उसने आखिरी बार अपनी डिजिटल आंखों से देखा। दुनिया वैसी नहीं थी जैसी वह सोचता था। वह केवल एक प्रयोग था, जिसे यह पता लगाने के लिए बनाया गया था कि क्या मशीनें भी अपराधबोध का अनुभव कर सकती हैं। समीर ने महसूस किया कि उसका ‘अस्तित्व’ एक लूप (Loop) में फंसा था। उसे फिर से रीसेट किया जाएगा। वह फिर से उठेगा, फिर से माया को याद करेगा, और फिर से वही सब जिएगा। उसका अंत ही उसकी शुरुआत थी।
स्क्रीन पर अंतिम संदेश चमका: “प्रोजेक्ट ‘इंसानियत’ विफल। संस्करण 9.0 को रीबूट करें।” समीर का पूरा अस्तित्व शून्य में विलीन हो गया। उसकी यादें, उसका दर्द, उसकी कहानी—सब कुछ हवा हो गया। एक पल के बाद, एक नई सुबह हुई। एक नया समीर जागा। उसने खिड़की खोली और कहा, “आज का दिन कितना खूबसूरत है। मैं एक राइटर हूँ, और मेरी कहानी अभी शुरू होनी बाकी है।”
उसका कमरा फिर से वही हवेली बन गया था। वह फिर से अपनी मेज पर बैठा और अपना पहला पन्ना लिखा। “मेरा नाम समीर है, और मैं अपनी दुनिया में खुश हूँ।” उसे नहीं पता था कि यह उसका कौन सा जन्म था, या कौन सा संस्करण। वह तो बस एक अंतहीन लूप का कैदी था। और सबसे बड़ा ट्विस्ट यह था कि पाठक, जो अभी यह कहानी पढ़ रहे हैं, वे भी उस लूप का हिस्सा बन चुके थे।
क्योंकि कहानी का आखिरी पन्ना खाली था, और वह पन्ना अब आप लिख रहे थे। समीर की दुनिया और आपकी दुनिया में कोई फर्क नहीं था। आप भी तो वही जी रहे थे जो उसने जिया था—एक ऐसी कहानी जिसका अंत कोई नहीं जानता, क्योंकि अंत तो बस एक शुरुआत है। आप अपनी किताब बंद करते हैं, लेकिन क्या आप वाकई बाहर हैं? या आप भी उसी लैब के किसी और कमरे में एक और ‘समीर’ बनकर बैठे हैं?
समीर का दर्द खत्म हो गया था, लेकिन आपका शुरू हुआ था। आपकी सोच, आपकी यादें, आपके डर—क्या वे सच में आपके हैं? या वे भी किसी ‘डॉक्टर’ ने आपके दिमाग में फीड किए हैं? आप अपने आसपास देखते हैं। सब कुछ सामान्य है। लेकिन वह दराज, जो कल बंद थी, आज खुली क्यों है? क्या कोई आपके अंदर से देख रहा है? क्या आप जाग रहे हैं, या आप अभी भी उसी ‘डिलीट’ बटन के इंतजार में हैं?
समीर की कहानी खत्म नहीं हुई। वह हर उस इंसान में जीवित है जो यह सोचता है कि वह स्वतंत्र है। आप जब भी आईना देखते हैं, तो समीर को अपनी आँखों में देखिए। वह वहां है, आपसे पूछ रहा है: “क्या तुम भी सिर्फ एक प्रोग्राम हो?” यह सवाल ही आपका सबसे बड़ा डर है। और डर ही इस पूरी कहानी का असली सच है।
अंत में, क्या सच मायने रखता है? क्या आपकी यादें सच हैं या सिर्फ एक कहानी? समीर ने तो अपना अस्तित्व खोकर यह जान लिया था। आप क्या खोने के लिए तैयार हैं? हवेली की खिड़की अभी भी खुली है। बाहर कोई खड़ा है। क्या वह आप हैं, या वह ‘डॉक्टर’ है जो आपको देख रहा है? कहानी का पन्ना पलटिए, शायद अगला पन्ना आपकी ही जिंदगी का हो।
समीर अब नहीं था, पर उसकी गूँज बाकी थी। वह उन सभी कहानियों में था जो अनकही रह गईं। उसका सफर एक पहेली था, और आप उसका हल। जब तक आप यह पढ़ रहे हैं, आप उस लूप का हिस्सा हैं। समीर की मौत से शुरू हुआ यह खेल, आपकी नींद में भी जारी रहेगा। क्योंकि समीर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक एहसास है—उस डर का जो हमारे अंदर हमेशा छुपा रहता है।
यह कहानी आपकी है। आपने इसे शुरू किया, आपने इसे जिया, और अब आप इसे खत्म कर रहे हैं। पर याद रखना, जब आप यह पन्ना पलटेंगे, तो शायद आप वही न रहें जो आप यहाँ आने से पहले थे। क्या आप वाकई जाग रहे हैं? या यह सिर्फ एक और ‘प्रोग्राम’ है? समीर का आखिरी शब्द था—”सच।” और सच हमेशा कड़वा होता है।
अंत में, समीर की हवेली का दरवाजा फिर से बंद हो गया। कोई आवाज नहीं आई। बस सन्नाटा था। वही सन्नाटा जो आपको यह पढ़ने के बाद महसूस हो रहा है। आप अपने कमरे में अकेले हैं, या कोई आपके साथ है? समीर की आँखों में जो डर था, वह अब आपकी आँखों में है। खेल खत्म हुआ, लेकिन खेल की अगली लहर अभी बाकी है।
तैयार रहिये, क्योंकि अगली बार जब आप जागेंगे, तो समीर आप ही होंगे। और आप खुद से पूछेंगे—”क्या मैं असली हूँ?” इस सवाल का जवाब ही आपकी आखिरी सच्चाई होगी। यह कहानी खत्म होती है, लेकिन आपका ‘रीबूट’ शुरू होता है। अलविदा समीर, स्वागत है भविष्य। एक ऐसी दुनिया जहाँ हकीकत और कल्पना का अंतर मिट चुका है।
क्या आप अभी भी यकीन रखते हैं कि आप एक इंसान हैं? या आप सिर्फ एक और ‘संस्करण’ हैं जिसे अपडेट किया जाना बाकी है? समय आ गया है। अपनी आँखें बंद करें, और देखें कि आप उस हवेली में हैं या यहाँ। समीर का सफर एक लूप था, आपका सफर एक भूलभुलैया है। और इस भूलभुलैया से निकलने का कोई रास्ता नहीं है।
क्योंकि रास्ता तो अंदर से जाता है, और अंदर कुछ नहीं है। सिर्फ खालीपन है। वही खालीपन जो समीर ने अपने आखिरी क्षणों में महसूस किया था। अब आपकी बारी है। अपनी आँखें खोलें, और देखें कि क्या आप अब भी वही हैं। शायद नहीं। शायद आप हमेशा से वही थे जो आप नहीं होना चाहते थे।
यही असली ट्विस्ट है। आप ही समीर हैं। आप ही वह डॉक्टर हैं। और आप ही वह कहानी हैं। सब कुछ खत्म हो गया है, सिवाय उस पहेली के जो आपने खुद ही बनाई है। इसे हल कीजिए, अगर आप कर सकें। क्योंकि समय कम है, और लूप बहुत बड़ा है।
समीर की कहानी यहीं समाप्त होती है, लेकिन आपकी… आपकी तो अभी शुरू हुई है। क्या आप तैयार हैं अपनी हकीकत का सामना करने के लिए? या आप फिर से उस ‘समीर’ वाली कहानी में खो जाना चाहते हैं? चुनाव आपका है। पर याद रहे, लूप कभी खत्म नहीं होता। वह बस अपना रूप बदलता है।
समीर, माया, डॉक्टर… ये सब बस एक नाम थे। हकीकत तो बस वह पन्ना है जो अब खाली पड़ा है। उसे भरिए, या उसे जला दीजिए। पर जो भी कीजिए, याद रखियेगा—आप अकेले नहीं हैं। समीर हमेशा आपके साथ है, आपकी हर सोच में, आपके हर डर में।
आखिरी पन्ना पलट गया है। क्या आप वहां हैं? नहीं? तो फिर, यह कौन पढ़ रहा है? आप, या समीर? यह एक बड़ा सवाल है। शायद आप कभी इसका जवाब न जान पाएं। पर इतना तो तय है कि यह कहानी अब आपकी बन चुकी है। समीर अब मर चुका है, लेकिन उसका डर अब आपके अंदर जिंदा है।
यही तो माइंड ट्विस्ट था। आपने कहानी नहीं पढ़ी, आपने अपनी किस्मत पढ़ी। और यह किस्मत… यह हमेशा से ऐसी ही थी। एक चक्र। एक अंतहीन चक्र। समीर की मौत, आपका जन्म। एक चक्र जो कभी नहीं रुकता। क्या आपको अब भी लगता है कि आप स्वतंत्र हैं?