श्रीकृष्ण

जब अक्रूर श्रीकृष्ण को लेने गोकुल पहुंचे और मार्ग में हुआ दिव्य दर्शन

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जब अक्रूर श्रीकृष्ण को लेने गोकुल पहुंचे

मथुरा का अत्याचारी राजा कंस दिन-रात भय में जी रहा था। भविष्यवाणी हो चुकी थी कि उसकी मृत्यु उसकी बहन देवकी के आठवें पुत्र के हाथों होगी। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर रखा था, उनके छह पुत्रों की हत्या कर दी थी, लेकिन फिर भी उसका भय समाप्त नहीं हुआ। अब उसे समाचार मिल चुका था कि गोकुल में पल रहे नंदलाल ही वही कृष्ण हैं, जिनसे उसका अंत निश्चित है।

कंस ने अनेक राक्षस भेजे, लेकिन हर बार वे मारे गए। पूतना, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर—कोई भी कृष्ण का कुछ नहीं बिगाड़ पाया। अब कंस समझ चुका था कि कृष्ण साधारण बालक नहीं हैं।
तभी उसके मन में एक नई योजना आई।

उसने मथुरा में विशाल धनुष यज्ञ और मल्लयुद्ध का आयोजन करवाया और निश्चय किया कि किसी तरह कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाकर वहीं उनका वध कर दिया जाए।

लेकिन प्रश्न था—उन्हें बुलाने कौन जाएगा?
तभी कंस को याद आया अपने संबंधी और भक्त स्वभाव वाले अक्रूर का नाम।
अक्रूर यादव वंश के अत्यंत धर्मात्मा और श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वे बाहर से कंस के अधीन थे, लेकिन मन से हमेशा कृष्ण के चरणों में जुड़े रहते थे।
कंस ने उन्हें दरबार में बुलाया।

जब अक्रूर राजसभा में पहुंचे, तो कंस ने बनावटी मुस्कान के साथ कहा,
“अक्रूर, तुम तुरंत गोकुल जाओ और नंद के दोनों पुत्रों—कृष्ण और बलराम—को धनुष यज्ञ में भाग लेने के लिए मथुरा लेकर आओ।”
अक्रूर समझ गए कि कंस के मन में कोई कपट अवश्य है। लेकिन जैसे ही उन्होंने कृष्ण का नाम सुना, उनका हृदय आनंद से भर उठा।

“क्या सचमुच मुझे प्रभु के दर्शन मिलेंगे?”
वे भीतर ही भीतर भावविभोर हो उठे।
अगले ही दिन अक्रूर रथ लेकर गोकुल की ओर निकल पड़े। पूरे मार्ग में उनका मन कृष्ण के विचारों में डूबा रहा।

वे सोचते जा रहे थे—
“आज मेरा जीवन सफल हो जाएगा। जिनके दर्शन के लिए ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं, उन्हें मैं अपनी आंखों से देखूंगा।”
उनकी आंखों से बार-बार आनंद के आंसू बहने लगते।
उधर गोकुल में हमेशा की तरह आनंद का वातावरण था। ग्वाल-बाल खेल रहे थे, गोपियां गीत गा रही थीं और कृष्ण अपनी लीलाओं में मग्न थे।

तभी दूर से धूल उड़ती दिखाई दी। अक्रूर का रथ धीरे-धीरे नंद भवन की ओर बढ़ रहा था।
जैसे ही अक्रूर ने पहली बार श्रीकृष्ण को देखा, वे स्तब्ध रह गए।

सांवला दिव्य रूप… पीतांबर… मुकुट में मोरपंख… चेहरे पर मधुर मुस्कान…
अक्रूर कुछ क्षणों तक उन्हें देखते ही रह गए। उनका शरीर कांपने लगा।
अगले ही पल वे रथ से उतरकर दौड़ते हुए कृष्ण के चरणों में गिर पड़े।

उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी।
“प्रभु… आज मेरा जन्म सफल हो गया।”
श्रीकृष्ण ने प्रेम से उन्हें उठाया और गले लगा लिया। बलराम भी मुस्कुराते हुए पास खड़े थे।
उस समय अक्रूर को ऐसा लग रहा था मानो स्वयं परमात्मा ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया हो।
नंद बाबा ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया। कुछ देर बाद अक्रूर ने कंस का संदेश सुनाया कि कृष्ण और बलराम को मथुरा चलना होगा।

यह समाचार सुनते ही पूरे गोकुल में उदासी छा गई।
गोपियों की आंखें भर आईं। यशोदा माता का हृदय कांप उठा।
उन्हें लग रहा था कि अब उनका लाला उनसे दूर चला जाएगा।

लेकिन श्रीकृष्ण शांत थे। वे जानते थे कि अब समय आ चुका है—कंस के अंत का समय।
अगले दिन सुबह कृष्ण और बलराम अक्रूर के रथ पर बैठकर मथुरा के लिए निकल पड़े।
पूरा गोकुल रो रहा था। गोपियां रथ के पीछे-पीछे दौड़ रही थीं।

“कन्हैया, हमें छोड़कर मत जाओ!”
यशोदा माता की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। नंद बाबा भी भीतर से टूट चुके थे।
लेकिन कृष्ण सबको सांत्वना देते हुए आगे बढ़ते रहे।
कुछ दूर चलने के बाद रथ यमुना किनारे पहुंचा। अक्रूर ने कृष्ण से अनुमति लेकर स्नान करने का निवेदन किया।

वे यमुना में उतरे और जैसे ही जल में डुबकी लगाई…
उन्हें अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।
उन्होंने देखा—यमुना के दिव्य जल में स्वयं श्रीकृष्ण चार भुजाओं वाले भगवान विष्णु के रूप में विराजमान हैं। उनके साथ शेषनाग हैं, देवता उनकी स्तुति कर रहे हैं और पूरा ब्रह्मांड उनके भीतर समाया हुआ है।
अक्रूर की सांसें थम गईं।

वे तुरंत जल से बाहर आए और रथ की ओर देखा।
कृष्ण और बलराम वहां सामान्य रूप से बैठे मुस्कुरा रहे थे।
अक्रूर फिर विस्मित होकर जल में गए।
इस बार उन्होंने वही दिव्य स्वरूप फिर देखा।
अब उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि कृष्ण कोई साधारण मानव नहीं, स्वयं परम भगवान हैं।
वे कांपते हुए बाहर आए और सीधे कृष्ण के चरणों में गिर पड़े।

“प्रभु… अब मुझे सब समझ आ गया। आप ही नारायण हैं, आप ही सृष्टि के स्वामी हैं।”
कृष्ण बस मुस्कुराते रहे।
उन्होंने अक्रूर को उठाया और प्रेम से कहा,
“अक्रूर, तुम्हारी भक्ति ने तुम्हें यह दर्शन दिए हैं।”
अक्रूर की आंखों से लगातार आंसू बहते रहे। उनका हृदय आनंद और भक्ति से भर चुका था।
इसके बाद रथ फिर मथुरा की ओर बढ़ चला।

लेकिन अब अक्रूर पहले जैसे नहीं रहे थे।
वे केवल कृष्ण को मथुरा ले जाने वाले दूत नहीं थे…
वे उस भक्त में बदल चुके थे जिसे मार्ग में ही अपने भगवान का साक्षात् दिव्य दर्शन प्राप्त हो गया था।

जब श्रीकृष्ण ने भौमासुर का अंत कर हजारों स्त्रियों को भय और अपमान की कैद से मुक्त कराया

प्राग्ज्योतिषपुर का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे पर भय उतर आता था। वह राज्य कभी समृद्ध और शांत माना जाता था, लेकिन अब वहां अंधकार का शासन था। उस राज्य पर भौमासुर नाम का अत्याचारी असुर राज करता था, जिसे नरकासुर भी कहा जाता था। शक्ति और विजय के अहंकार ने उसे इतना निर्दयी बना दिया था कि वह स्वयं को पूरी पृथ्वी का स्वामी समझने लगा था।

उसने केवल राजाओं को ही नहीं, देवताओं तक को चुनौती दे डाली थी। जहां-जहां उसकी सेना जाती, वहां विनाश छोड़ जाती। राज्यों की राजकुमारियों और सुंदर स्त्रियों का अपहरण कर उन्हें अपने महल की कालकोठरियों में कैद कर लेना उसका सबसे बड़ा अत्याचार बन चुका था।

हजारों स्त्रियां वर्षों से उसकी कैद में बंद थीं।
वे न अपने घर लौट सकती थीं, न अपने परिवार से मिल सकती थीं। दिन-रात भय, अपमान और निराशा में उनका जीवन बीत रहा था।

भौमासुर का आतंक इतना बढ़ चुका था कि उसने देवराज इंद्र के स्वर्गलोक तक पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्र की माता अदिति के दिव्य कुंडल छीन लिए और वरुण देव का अद्भुत छत्र भी लूट लिया। देवता अपमान और भय से भर उठे।
अंततः सभी देवता द्वारका पहुंचे।
देवराज इंद्र folded hands बोले,
“हे द्वारकाधीश, भौमासुर का अत्याचार अब असहनीय हो गया है। यदि उसे नहीं रोका गया, तो धर्म और मर्यादा दोनों समाप्त हो जाएंगे।”

श्रीकृष्ण शांत भाव से सब सुनते रहे। उनकी आंखों में गंभीरता उतर आई।
“अब समय आ गया है कि अधर्म का अंत किया जाए।”
उसी समय सत्यभामा भी वहां उपस्थित थीं। जैसे ही उन्होंने उन स्त्रियों के दुख और अपमान के बारे में सुना, उनका हृदय क्रोध और करुणा से भर उठा।
उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा,
“प्रभु, मैं भी आपके साथ चलूंगी।”
कृष्ण मुस्कुराए और सहमति दे दी।

अगले ही दिन गरुड़ पर सवार होकर श्रीकृष्ण और सत्यभामा प्राग्ज्योतिषपुर की ओर निकल पड़े। मार्ग में आकाश गर्जना कर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं प्रकृति किसी बड़े परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रही हो।

भौमासुर का राज्य साधारण नहीं था। उसके चारों ओर मायावी सुरक्षा कवच बना हुआ था। विशाल पर्वतों जैसी दीवारें, अग्नि के घेरे, घातक अस्त्र और असुरों की विशाल सेनाएं उसकी रक्षा कर रही थीं। कोई साधारण योद्धा वहां तक पहुंच भी नहीं सकता था।
लेकिन जैसे ही गरुड़ आकाश से उतरे, पूरा प्राग्ज्योतिषपुर कांप उठा।
असुर सेना तुरंत युद्ध के लिए तैयार हो गई।
भयंकर शंखनाद गूंजा।

अगले ही क्षण युद्ध शुरू हो गया।
आकाश तीरों और अग्निबाणों से भर गया। असुरों की सेना चारों ओर से टूट पड़ी। लेकिन श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र बिजली की तरह घूम रहा था। जहां-जहां वह जाता, वहां असुरों की पंक्तियां धराशायी हो जातीं।
भौमासुर का सबसे शक्तिशाली सेनापति मुर नामक राक्षस था। उसके पांच विशाल सिर थे और उसकी गर्जना से धरती कांप उठती थी। वह क्रोध में भरकर विशाल गदा लेकर कृष्ण की ओर दौड़ा।

उसने एक साथ कई दिव्य अस्त्र छोड़े। अग्नि और बिजली से पूरा आकाश चमक उठा।
लेकिन श्रीकृष्ण शांत रहे।
अचानक उनका सुदर्शन चक्र चमका…
और अगले ही पल मुर के पांचों सिर धड़ से अलग होकर भूमि पर गिर पड़े।

उसकी भयानक गर्जना पूरे राज्य में गूंज उठी।
मुर के मरते ही असुर सेना भयभीत हो गई। इसी कारण श्रीकृष्ण “मुरारी” कहलाए—अर्थात मुर का अंत करने वाले।
अब स्वयं भौमासुर क्रोध में भरकर युद्धभूमि में उतरा।
उसका शरीर पर्वत के समान विशाल था। आंखों से अग्नि निकल रही थी और हाथों में भयंकर शक्ति अस्त्र चमक रहे थे। उसका क्रोध देखकर साधारण योद्धा कांप उठते।

वह गर्जा,
“कृष्ण! आज मैं तुम्हें और तुम्हारे अभिमान को समाप्त कर दूंगा!”
उसने तुरंत अपने दिव्य अस्त्र छोड़ दिए। पूरा आकाश कांप उठा। बिजली की तरह चमकते अस्त्र गरुड़ की ओर बढ़े।
लेकिन श्रीकृष्ण ने एक-एक अस्त्र को सहजता से नष्ट कर दिया।

युद्ध और भी भयंकर होता गया। धरती कांपने लगी। देवता भी आकाश से यह दृश्य देखने लगे।
भौमासुर पूरी शक्ति से बार-बार हमला करता, लेकिन कृष्ण के सामने उसकी सारी शक्ति व्यर्थ साबित हो रही थी।
अचानक उसने सत्यभामा की ओर घातक अस्त्र फेंका।
यह देखकर श्रीकृष्ण की आंखों में दिव्य तेज चमक उठा।

उन्होंने तुरंत सुदर्शन चक्र उठाया।
एक प्रचंड प्रकाश पूरे आकाश में फैला…
और अगले ही क्षण सुदर्शन चक्र बिजली की गति से भौमासुर की ओर बढ़ा।
कुछ पल के लिए समय मानो थम गया।
फिर…
भौमासुर का विशाल सिर धड़ से अलग होकर भूमि पर गिर पड़ा।

उसकी भयानक गर्जना के साथ पूरा प्राग्ज्योतिषपुर कांप उठा।
अत्याचार का अंत हो चुका था।
जैसे ही भौमासुर मरा, आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी। देवताओं के चेहरों पर राहत दिखाई देने लगी। वर्षों बाद भय का अंधकार समाप्त हुआ था।
लेकिन तभी श्रीकृष्ण की नजर उस विशाल कारागार पर पड़ी जहां हजारों स्त्रियां कैद थीं।
उन्होंने तुरंत कारागार के द्वार खुलवाए।

दरवाजे खुलते ही भीतर से हजारों स्त्रियां बाहर आईं। उनके चेहरों पर वर्षों का दर्द, भय और अपमान साफ दिखाई दे रहा था। वे कांपती हुई आंखों से श्रीकृष्ण को देखने लगीं।

उनमें से एक स्त्री रोते हुए बोली,
“प्रभु… अब हम कहां जाएं? संसार हमें स्वीकार नहीं करेगा। लोग हमें अपमानित करेंगे, जबकि हमारा कोई दोष नहीं।”
बाकी स्त्रियां भी रोने लगीं।

उनके शब्द सुनकर सत्यभामा की आंखें नम हो गईं।
श्रीकृष्ण कुछ क्षण शांत रहे। फिर उन्होंने करुणा भरे स्वर में कहा,
“जिसका सम्मान अधर्म ने छीन लिया हो, उसका सम्मान लौटाना ही सच्चा धर्म है। आज से तुम सब भय और अपमान से मुक्त हो।”
उनके शब्द सुनते ही उन स्त्रियों की आंखों में वर्षों बाद आशा की चमक लौट आई।

इसके बाद श्रीकृष्ण अदिति के दिव्य कुंडल और देवताओं के छिने हुए रत्न वापस लेकर स्वर्ग पहुंचे। देवताओं ने उनका भव्य स्वागत किया। पूरा स्वर्ग “जय श्रीकृष्ण!” के घोष से गूंज उठा।
जब श्रीकृष्ण द्वारका लौटे, तब पूरे नगर में दीप जलाए गए। लोगों ने उत्सव मनाया, क्योंकि फिर एक बार धर्म ने अधर्म पर विजय प्राप्त की थी।

लेकिन उस दिन केवल एक असुर का वध नहीं हुआ था…
उस दिन हजारों टूटी हुई स्त्रियों को फिर से सम्मान और जीने की आशा मिली थी।
और संसार ने देखा था कि श्रीकृष्ण केवल दुष्टों का संहार करने वाले भगवान नहीं, बल्कि अपमानित और पीड़ित लोगों के सबसे बड़े रक्षक भी हैं।

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लेखक / मूल रचनाकार: श्री कृष्ण की कथाएं
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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