दादी माँ की कहानियाँ

दादी माँ की कहानियाँ- गढ़ा हुआ खज़ाना

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दादी माँ की कहानियाँ- गढ़ा हुआ खज़ाना

एक छोटे से गाँव में एक मेहनती किसान रहता था। उसका जीवन बहुत साधारण था, लेकिन वह अपने काम से कभी पीछे नहीं हटता था। सुबह सूरज निकलने से पहले ही वह अपने खेतों में पहुँच जाता और देर शाम तक मेहनत करता। गाँव के लोग उसकी ईमानदारी और बुद्धिमानी की बहुत प्रशंसा करते थे। उसके खेत गाँव के सबसे उपजाऊ खेतों में गिने जाते थे। किसान का विश्वास था कि मेहनत और समझदारी से हर मुश्किल का सामना किया जा सकता है।

एक दिन किसान अपने खेत में हल चला रहा था। मौसम सुहावना था और चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। तभी उसकी नजर खेत के एक कोने पर पड़ी, जहाँ एक छोटा-सा बौना मिट्टी खोद रहा था। बौना अजीब कपड़े पहने हुए था और इधर-उधर देखकर जल्दी-जल्दी मिट्टी हटाने में लगा हुआ था। किसान को यह देखकर आश्चर्य हुआ। वह उसके पास गया और बोला, “अरे भाई, तुम मेरे खेत में क्या कर रहे हो? यहाँ मिट्टी क्यों खोद रहे हो?”

वह बौना बहुत चालाक और धूर्त था। दरअसल उसने पहले ही वहाँ एक घड़े में कुछ पत्थर भरकर दबा दिए थे। ऊपर से उसने एक चमकता हुआ सोने का सिक्का रख दिया था, ताकि देखने वाला लालच में आ जाए। किसान को देखकर उसने वही सिक्का उठाया और उत्साहित होने का नाटक करते हुए बोला, “अरे वाह! लगता है यहाँ बहुत बड़ा खज़ाना दबा हुआ है। देखो, अभी-अभी मुझे यह सोने का सिक्का मिला है!”

सोने का सिक्का देखकर किसान भी थोड़ा चौंका। उसने तुरंत कहा, “यह खेत मेरा है, इसलिए यहाँ जो भी खज़ाना दबा है, वह मेरा हुआ।” बौना मुस्कुराया और बोला, “खज़ाना भले ही तुम्हारे खेत में हो, लेकिन उसे ढूँढा तो मैंने है। इसलिए यदि तुम यह खज़ाना चाहते हो, तो तुम्हें मेरी एक शर्त माननी होगी।”

किसान समझ गया कि बौना कुछ चाल चल रहा है, लेकिन उसने शांत रहकर पूछा, “क्या शर्त है?”
बौना बोला, “अगले दो वर्षों तक तुम अपने खेत में जो भी फसल उगाओगे, उसका आधा हिस्सा मेरा होगा और आधा तुम्हारा।”
किसान कुछ देर सोचता रहा। फिर उसने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, मुझे यह शर्त मंजूर है।”

यह सुनते ही बौना मन-ही-मन बहुत खुश हो गया। उसे लगा कि उसने किसान को मूर्ख बना लिया है। लेकिन जब किसान ने उसके चेहरे की चालाक मुस्कान देखी, तो उसे संदेह हो गया कि जरूर कोई चाल चल रही है। किसान स्वयं भी बहुत बुद्धिमान था। उसने तुरंत कहा, “लेकिन मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई है।”

बौना थोड़ा चौंका और बोला, “क्या मतलब?” किसान बोला, “अगले दो वर्षों तक खेत में जो कुछ भी उगेगा, उसका बँटवारा इस तरह होगा—ज़मीन के ऊपर जो हिस्सा उगेगा, वह सब तुम्हारा होगा और ज़मीन के नीचे जो हिस्सा उगेगा, वह मेरा होगा। बोलो, मंजूर है?”

बौना यह सुनकर और भी खुश हो गया। उसने सोचा, “कैसा मूर्ख किसान है! खेत में गेहूँ, चावल, जौ, मक्का और बाकी सारी फसलें ऊपर ही तो उगती हैं। नीचे तो केवल जड़ें होती हैं। असली फायदा तो मुझे ही होगा।”

उसने तुरंत हाँ कर दी। उसे विश्वास था कि अगले दो वर्षों में वह किसान की आधी से ज्यादा कमाई आसानी से ले जाएगा।
लेकिन किसान बिल्कुल भी मूर्ख नहीं था। उसने अपनी समझदारी का इस्तेमाल किया। अगले दो वर्षों तक उसने अपने खेतों में केवल आलू, गाजर, मूली और शकरकंद जैसी फसलें बोईं। ये सारी फसलें जमीन के नीचे उगती थीं। ऊपर केवल उनके पत्ते दिखाई देते थे।

जब फसल तैयार हुई, तब समझौते के अनुसार जमीन के ऊपर का हिस्सा बौने को मिला। बेचारे बौने को केवल सूखे पत्ते और बेकार डंठल ही हाथ लगे। असली फसल—आलू और गाजर—सब किसान के हिस्से में आई। किसान ने खूब लाभ कमाया और उसका घर अनाज और सब्जियों से भर गया।

दो वर्षों तक यही चलता रहा। बौना हर बार उम्मीद करता कि इस बार उसे फायदा होगा, लेकिन हर बार उसके हाथ सिर्फ पत्ते ही आते। दूसरी ओर किसान लगातार लाभ कमाता रहा। अब बौने को अपनी गलती का एहसास होने लगा था, लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था क्योंकि समझौता उसी ने स्वीकार किया था।

आखिर दो वर्ष पूरे हो गए। अब वह समय आ गया जब खेत में दबे खज़ाने को निकाला जाना था। बौना मन-ही-मन बहुत खुश था। उसने सोचा, “जब किसान को घड़े में पत्थर मिलेंगे, तब उसे अपनी मूर्खता पर पछतावा होगा।”

किसान और बौना दोनों उस जगह पहुँचे जहाँ खज़ाना दबा होने की बात कही गई थी। दोनों ने मिलकर मिट्टी खोदनी शुरू की। कुछ देर बाद उन्हें एक घड़ा मिला। बौना मुस्कुराने लगा, क्योंकि उसे पता था कि उसमें केवल पत्थर हैं। लेकिन जैसे ही उन्होंने थोड़ा और खोदा, वहाँ एक दूसरा घड़ा भी दिखाई दिया।

किसान ने आश्चर्य से दूसरा घड़ा खोला। उसे देखकर दोनों की आँखें फैल गईं। वह घड़ा सचमुच चमचमाते सोने के सिक्कों से भरा हुआ था। किसान खुशी से झूम उठा। बौना स्तब्ध रह गया। उसने केवल धोखा देने के लिए नकली खज़ाना दबाया था, लेकिन उसी जगह सचमुच का खज़ाना निकल आया।

किसान ने भगवान को धन्यवाद दिया। उसकी मेहनत, धैर्य और बुद्धिमानी ने उसे धन और अनाज दोनों दिला दिए। दूसरी ओर बौना अपनी चालाकी पर पछताता रह गया।

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि केवल चालाकी से हमेशा सफलता नहीं मिलती। सच्ची बुद्धिमानी वही है, जो धैर्य और समझदारी के साथ काम करे। भगवान भी उसी का साथ देते हैं, जो ईमानदारी और बुद्धि से काम लेता है।

डरपोक खरगोश

एक घने जंगल के किनारे हरी-भरी घास के बीच एक छोटा-सा ख़रगोश रहता था। उसका नाम चिंकू था। चिंकू देखने में बहुत प्यारा था। उसकी मुलायम सफेद फर, छोटी गुलाबी नाक और लंबे कान सबको आकर्षित करते थे, लेकिन उसकी एक आदत उसे हमेशा परेशान करती थी। वह बहुत ज़्यादा डरता था।

हवा ज़रा तेज चलती तो वह कांपने लगता, पेड़ से पत्ता गिरता तो वह बिल में छिप जाता, और अगर कोई जानवर प्यार से उसके पास आने की कोशिश करता, तब भी वह घबराकर भाग खड़ा होता। जंगल के दूसरे जानवर अक्सर उसकी इस आदत पर हंसते थे। कोई उसे “डरपोक” कहता, तो कोई “कायर” कहकर चिढ़ाता। चिंकू बाहर से तो मुस्कुरा देता, लेकिन अंदर ही अंदर उसे बहुत दुख होता था।

एक दिन वह अकेला बैठा सोच रहा था, “हे भगवान! आपने मुझे इतना डरपोक क्यों बनाया? मैं हर छोटी-सी बात से डर जाता हूँ। बाकी जानवर कितने निडर हैं। हिरण तेज दौड़ लेते हैं, बंदर पेड़ों पर कूदते-फांदते रहते हैं, शेर तो पूरे जंगल पर राज करता है, लेकिन मैं… मैं तो एक आवाज़ सुनकर ही कांपने लगता हूँ।” वह अपने डर से बहुत परेशान हो चुका था। उसने तय किया कि अब वह अपनी इस आदत को बदलेगा। उसने मन ही मन कहा, “आज से मैं बहादुर बनूंगा। मैं किसी से नहीं डरूंगा। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं भागूंगा नहीं।”

अगली सुबह चिंकू बड़े आत्मविश्वास के साथ अपने बिल से बाहर निकला। उसने सोचा कि आज वह पूरे जंगल में घूमेगा और किसी भी चीज़ से नहीं डरेगा। वह धीरे-धीरे घास के मैदान से गुजर रहा था। शुरुआत में सब ठीक लग रहा था। उसने खुद को समझाया कि डर केवल उसके मन में है। तभी अचानक पास की झाड़ियों में सरसराहट हुई।

आवाज़ सुनते ही उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसके कान खड़े हो गए और पैर कांपने लगे। वह खुद को रोकना चाहता था, लेकिन डर ने उसे फिर से घेर लिया। अगले ही पल वह तेज़ी से भागने लगा। दौड़ते-दौड़ते वह जंगल के एक पुराने तालाब के पास पहुंच गया।

तालाब के किनारे कई मेढक खेल रहे थे। कोई पानी में तैर रहा था, कोई पत्थरों पर उछल रहा था और कुछ छोटे मेढक आपस में मस्ती कर रहे थे। चिंकू हांफते हुए वहीं रुक गया। तभी मेढकों ने उसके आने की आहट सुनी। वे इतने डर गए कि बिना एक पल गंवाए छपाक से पानी में कूद पड़े। कुछ पानी के अंदर छिप गए और कुछ कमल के पत्तों के पीछे जाकर बैठ गए। यह देखकर चिंकू हैरान रह गया। उसने पहली बार महसूस किया कि जैसे वह दूसरों से डरता है, वैसे ही कुछ जीव उससे भी डरते हैं।

चिंकू कुछ देर तक तालाब के किनारे बैठा सोचता रहा। उसके मन में एक नई समझ पैदा हुई। उसने सोचा, “मैं खुद को दुनिया का सबसे बड़ा डरपोक समझता था, लेकिन ये मेढक तो मुझसे भी ज़्यादा डर गए। इसका मतलब यह है कि डरना केवल मेरी कमजोरी नहीं है। दुनिया का हर जीव किसी-न-किसी चीज़ से डरता है।” उसने आसपास देखा। पेड़ों पर बैठे पक्षी शिकारी बाज़ से डरते थे, हिरण शेर से डरते थे, और यहां तक कि ताकतवर हाथी भी इंसानों के जाल से सावधान रहते थे। उसे समझ में आने लगा कि डर हमेशा बुरा नहीं होता। कई बार डर हमें खतरे से बचाता है और सावधान रहना सिखाता है।

उसी समय एक बूढ़ा कछुआ धीरे-धीरे चलता हुआ वहां आया। उसने चिंकू को उदास बैठे देखा और पूछा, “क्या बात है बेटा, तुम इतने परेशान क्यों हो?” चिंकू ने उसे अपनी सारी परेशानी बता दी। उसने कहा, “मैं हमेशा सोचता था कि डरना बहुत बुरी बात है। मैं चाहता था कि मैं बिल्कुल न डरूं, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया।”

कछुए ने मुस्कुराकर कहा, “डरना गलत नहीं है। असली समझदारी यह है कि डर के बावजूद सही काम करना सीखो। अगर कोई खतरा हो और तुम सावधान न रहो, तो मुसीबत में पड़ सकते हो। बहादुरी का मतलब यह नहीं कि इंसान या जानवर कभी न डरे। बहादुरी का मतलब है डर को समझना और फिर भी हिम्मत के साथ आगे बढ़ना।”

कछुए की बातें चिंकू के दिल को छू गईं। उसने पहली बार अपने आप को दोष देना बंद किया। अब वह समझ चुका था कि डर हर जीव के जीवन का हिस्सा है। फर्क केवल इतना है कि कोई अपने डर को समझदारी में बदल लेता है और कोई उसी से हार मान लेता है। उस दिन के बाद चिंकू पहले जैसा नहीं रहा। वह अब भी सावधान रहता था, लेकिन हर छोटी आवाज़ पर घबराकर भागता नहीं था। धीरे-धीरे उसने अपने डर पर काबू पाना सीख लिया।

कुछ समय बाद जंगल के दूसरे जानवरों ने भी चिंकू में बदलाव देखा। अब वह पहले से ज्यादा आत्मविश्वासी हो गया था। अगर कोई अचानक आवाज़ होती, तो वह पहले समझने की कोशिश करता कि मामला क्या है। वह जान चुका था कि डर कमजोरी नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक भावना है। जरूरत केवल इतनी है कि डर हमें नियंत्रित न करे।

इस तरह डरपोक समझा जाने वाला छोटा-सा खरगोश जीवन की एक बड़ी सीख समझ गया कि दुनिया में हर कोई किसी-न-किसी से डरता है। यहां तक कि सबसे ताकतवर जीव भी किसी शक्ति या परिस्थिति से सावधान रहते हैं। इसलिए अपने से ज्यादा ताकतवर जीव से डरना और सतर्क रहना कोई बुरी बात नहीं है, बल्कि यह समझदारी की निशानी है।

पाँच हिस्से

रूस नाम का एक बहुत बड़ा और समृद्ध देश था। वहाँ दूर-दूर तक फैले खेत, घने जंगल और छोटी-छोटी बस्तियाँ थीं। उसी देश के एक गाँव में एक मेहनती और ईमानदार किसान रहता था। उसका जीवन बहुत साधारण था, लेकिन उसके विचार बहुत ऊँचे थे। वह हर दिन सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता, अपने बैलों को लेकर खेतों में चला जाता और देर शाम तक मेहनत करता। गाँव के लोग उसकी ईमानदारी और समझदारी की बहुत प्रशंसा करते थे। किसान का परिवार बड़ा नहीं था। उसके बूढ़े माता-पिता, उसकी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी थी। वह अपने परिवार से बहुत प्रेम करता था और हमेशा चाहता था कि सब सुखी रहें।

एक दिन की बात है। किसान अपने खेत में हल चला रहा था। मौसम सुहावना था और खेतों में हरियाली फैली हुई थी। तभी अचानक वहाँ राज्य के महाराज अपने सैनिकों और मंत्रियों के साथ घूमते हुए पहुँचे। महाराज अक्सर अपने राज्य का हाल जानने के लिए अलग-अलग जगहों पर जाया करते थे। जब उनकी नज़र किसान पर पड़ी, तो वे कुछ देर वहीं खड़े होकर उसे काम करते हुए देखने लगे। किसान पूरी लगन और मेहनत से खेत जोत रहा था। उसके चेहरे पर थकान तो थी, लेकिन संतोष भी साफ दिखाई दे रहा था।

कुछ देर बाद महाराज किसान के पास आए और बोले, “किसान, तुम बहुत मेहनत करते हो। बताओ, महीने भर की इतनी मेहनत के बाद कितना कमा लेते हो?” किसान ने विनम्रता से झुककर प्रणाम किया और बोला, “महाराज, मैं महीने में अस्सी रूबल कमा लेता हूँ।” महाराज ने फिर पूछा, “और इन अस्सी रूबल का क्या करते हो? क्या तुम इन्हें अपने परिवार पर खर्च कर देते हो?” किसान मुस्कुराया और बोला, “महाराज, मैं अपनी कमाई के पाँच हिस्से करता हूँ।”

महाराज को उसकी बात सुनकर उत्सुकता हुई। उन्होंने कहा, “अच्छा! ज़रा विस्तार से बताओ कि उन पाँच हिस्सों का क्या करते हो?” किसान ने बड़े शांत स्वर में उत्तर दिया, “महाराज, पहला हिस्सा मैं राज्य का कर चुकाने में खर्च करता हूँ। दूसरा हिस्सा मैं अपना कर्ज चुकाने में लगाता हूँ। तीसरा हिस्सा मैं उधार दे देता हूँ। चौथे हिस्से से घर का खर्च चलता है और पाँचवाँ हिस्सा मैं दान में दे देता हूँ।”

किसान की बात सुनकर महाराज आश्चर्य में पड़ गए। वे सोचने लगे कि एक साधारण किसान इतनी अजीब बात कैसे कर सकता है। उन्होंने कहा, “तुम्हारी दो बातें तो समझ में आती हैं कि तुम कर चुकाते हो और घर का खर्च चलाते हो, लेकिन यह समझ में नहीं आया कि तुम हर महीने कर्ज भी चुकाते हो, उधार भी देते हो और दान भी करते हो। आखिर इसका क्या अर्थ है?”

किसान ने आदरपूर्वक उत्तर दिया, “महाराज, मेरे माता-पिता ने मुझे बचपन से पाला-पोसा, मुझे चलना, बोलना और मेहनत करना सिखाया। उन्होंने अपने सुख त्यागकर मेरी हर ज़रूरत पूरी की। आज जो कुछ भी मैं हूँ, उन्हीं की वजह से हूँ। उनका यह उपकार मेरे ऊपर एक कर्ज की तरह है। इसलिए मैं अपनी कमाई का एक हिस्सा उनकी सेवा और देखभाल में खर्च करता हूँ। इस तरह मैं उनका कर्ज चुकाने की कोशिश करता हूँ।”

महाराज ध्यान से उसकी बातें सुन रहे थे। किसान आगे बोला, “अब रही बात उधार देने की। मेरा एक बेटा है। मैं उसकी पढ़ाई, भोजन, कपड़े और बाकी ज़रूरतों पर खर्च करता हूँ। मैं उसे अच्छे संस्कार और शिक्षा दे रहा हूँ। यह सब मैं ऐसे समझता हूँ जैसे उसे उधार दे रहा हूँ। जब वह बड़ा होगा और हमारी सेवा करेगा, तब मैं मानूँगा कि उसने मेरा उधार चुका दिया।”

अब महाराज को किसान की समझदारी पर हैरानी होने लगी। उन्होंने पूछा, “और दान वाली बात?” किसान हल्की मुस्कान के साथ बोला, “महाराज, मेरी एक बेटी भी है। मैं उसकी परवरिश पर भी खर्च करता हूँ। एक दिन उसका विवाह होगा और वह दूसरे घर चली जाएगी। तब वह अपने नए परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाएगी। इसलिए मैं जो कुछ उसके लिए करता हूँ, उसे दान समझकर करता हूँ। मुझे उससे बदले में कुछ पाने की उम्मीद नहीं रहती।”

किसान की बातें सुनकर महाराज बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने महसूस किया कि यह किसान केवल मेहनती ही नहीं, बल्कि बहुत बुद्धिमान और दूरदर्शी भी है। उसके विचारों में जीवन का गहरा अनुभव और परिवार के प्रति सच्चा प्रेम छिपा हुआ था। महाराज ने अपने मंत्रियों की ओर देखा और बोले, “यह किसान सचमुच बहुत चतुर और समझदार है। जो व्यक्ति अपने परिवार, अपने कर्तव्यों और भविष्य के महत्व को इतनी अच्छी तरह समझता हो, वह राज्य के लिए भी बहुत उपयोगी साबित हो सकता है।”

उसी समय महाराज ने किसान को अपने साथ महल चलने का निमंत्रण दिया। पहले तो किसान घबरा गया, लेकिन महाराज ने उसे सम्मानपूर्वक समझाया। महल पहुँचकर महाराज ने पूरे दरबार के सामने किसान की बुद्धिमानी की प्रशंसा की और उसे राज्य का न्याय-मंत्री नियुक्त कर दिया। दरबारियों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि एक साधारण किसान अपनी समझदारी के कारण इतना बड़ा सम्मान पा गया।

उस दिन के बाद किसान ने पूरे राज्य में न्याय और ईमानदारी के साथ काम किया। लोग उसकी बुद्धिमानी और निष्पक्षता की सराहना करने लगे। उसकी कहानी दूर-दूर तक फैल गई और लोग अपने बच्चों को यह सीख देने लगे कि सच्ची बुद्धिमानी धन या बड़े पद में नहीं, बल्कि सही सोच और अच्छे संस्कारों में होती है।

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दादी माँ की कहानियाँ प्यार, संस्कार, अनुभव और जीवन की अनमोल सीख से भरपूर होती हैं। ये रोचक कथाएँ बच्चों और बड़ों को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्य, पारिवारिक प्रेम और अच्छे आचरण की प्रेरणा देती हैं।

दादी माँ की कहानियाँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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