सोन मछली

सोन मछली (रूसी कहानी)

12
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

सोन मछली (रूसी कहानी)

यह कहानी एक छोटे बच्चे की यादों से शुरू होती है, जब वह अपने माता-पिता के साथ रहता था। उसके पिता एक शिक्षक थे जो भूगोल पढ़ाते थे और अधिकतर समय किताबों में डूबे रहते थे। माँ अक्सर उनसे शिकायत करती थी कि वे कभी उसके लिए छोटे-छोटे उपहार नहीं लाते, जिससे घर में हल्की नाराज़गी का माहौल बना रहता था। बच्चा यह सब चुपचाप देखता और समझने की कोशिश करता था कि बड़े लोग आपस में क्यों इतना अलग सोचते हैं।

एक दिन पिता बहुत खुश होकर घर लौटे और माँ को एक ब्रीफकेस दिया, यह कहते हुए कि आज वह जरूर खुश हो जाएगी। माँ ने उत्साह में ब्रीफकेस खोला लेकिन अंदर से एक पुरुषों के इस्तेमाल का परफ्यूम निकला। यह देखकर वह निराश हो गईं और उन्हें लगा कि उनके पति अब भी उनकी भावनाओं को नहीं समझते। बच्चे ने पहली बार महसूस किया कि उपहार सिर्फ चीजें नहीं होते, बल्कि भावनाओं का भी महत्व होता है।

धीरे-धीरे बच्चा अपने पिता से एक खास मांग करने लगता है—एक सुनहरी मछली, जिसे वह परी कथाओं से जानता था। उसे लगता था कि अगर वह जादुई मछली घर में आ गई तो शायद उसकी माँ हमेशा खुश रहेगी और घर में कभी कोई शिकायत नहीं होगी। पिता पहले हैरान होते हैं लेकिन बच्चे के बार-बार कहने पर आखिरकार वह मछली लाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

कुछ दिनों बाद वे दोनों एक दुकान से काँच के जार में एक सुनहरी मछली लेकर आते हैं। घर में उसे एक छोटे से काँच के बर्तन में रखा जाता है और बच्चा उसे बड़े ध्यान से देखता है। वह मछली को अपना दोस्त मान लेता है और उसके साथ खेलने लगता है, जैसे वह सचमुच उसकी बातें समझती हो। उसे विश्वास हो जाता है कि यह कोई साधारण मछली नहीं, बल्कि जादुई है।

एक दिन जब घर में कोई नहीं होता, बच्चा मछली को हाथ में लेकर उससे अपनी इच्छा कहता है कि उसकी माँ को एक सुगंधित परफ्यूम मिल जाए। उसे लगता है कि मछली उसकी बात समझ रही है और सच में उसकी इच्छा पूरी हो जाएगी। अगले ही दिन पिता घर आते हैं और माँ के लिए एक सुंदर परफ्यूम लेकर आते हैं, जिससे बच्चा बहुत खुश हो जाता है और उसका विश्वास और भी मजबूत हो जाता है।

इसके बाद बच्चे की इच्छाएँ बढ़ने लगती हैं। वह मछली से एक तीन पहियों वाली साइकिल मांगता है और आश्चर्यजनक रूप से उसे अगली सुबह वही साइकिल मिल जाती है। अब उसे लगने लगता है कि यह मछली हर इच्छा पूरी कर सकती है। वह सोचता है कि अगर वह माँ की मदद करता रहे तो और भी चीजें मिलती रहेंगी और घर में हमेशा खुशी बनी रहेगी।

लेकिन एक दिन वह अपने पालतू बिल्ली को मछली के पास ले आता है। बिल्ली खेलते-खेलते अचानक मछली को खा जाती है। यह देखकर बच्चा टूट जाता है और जोर-जोर से रोने लगता है। उसे लगता है कि अब उसकी सारी खुशियाँ खत्म हो गई हैं और अब कुछ भी अच्छा नहीं मिलेगा। वह गुस्से में बिल्ली को मारने की कोशिश करता है और अपने पिता को बुलाता है।

पिता उसे समझाते हैं कि रोने से कुछ नहीं बदलेगा और जो हुआ उसे स्वीकार करना होगा। धीरे-धीरे समय बीतता है और बच्चा समझने लगता है कि असली “सोन मछली” कोई जादुई जीव नहीं था। बल्कि उसके पिता ही वह व्यक्ति थे जो चुपचाप उसकी और माँ की हर इच्छा पूरी करते थे और परिवार के लिए मेहनत करते थे। बड़े होकर उसे एहसास होता है कि असली जादू प्यार, त्याग और जिम्मेदारी में होता है, न कि किसी जादुई मछली में।

अमर घोड़ा (लातवियाई कहानी)

यह कहानी घोड़ों की एक बड़ी सभा से शुरू होती है, जहाँ दुनिया भर के घोड़े इकट्ठा हुए थे। हर घोड़ा अलग रंग, कद और स्वभाव का था—कुछ सफेद, कुछ काले, कुछ भूरे और कुछ कत्थई। इन सभी के बीच एक सफेद अरबी घोड़ा सबसे अलग और प्रभावशाली दिखाई देता था, जो घोड़ों का सरदार माना जाता था।

उसने गंभीर स्वर में सभी को चेतावनी दी कि उनका अस्तित्व खतरे में है क्योंकि आधुनिक विज्ञान ने रेलगाड़ी, कार, बस, स्कूटर और हवाई जहाज जैसी चीजें बना दी हैं, जिससे घोड़ों की उपयोगिता कम होती जा रही है।

सरदार घोड़े की बात सुनकर सभा में चिंता फैल गई। सभी घोड़े समझ रहे थे कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो उनकी नस्लें धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी। तभी एक कत्थई घोड़े ने सुझाव दिया कि क्यों न एक “अमर घोड़ा” बनाया जाए, जो कभी खत्म न हो और उनकी जाति को हमेशा सुरक्षित रखे। यह विचार सभी को पसंद आया, लेकिन कोई नहीं जानता था कि ऐसा घोड़ा कैसे बनाया जाए।

सफेद घोड़े ने अपनी कल्पना से एक योजना बताई। उसके अनुसार अमर घोड़ा नीले रंग का होगा, उसके पंख होंगे और वह केवल नीले फूल और नीले पानी पर जीवित रहेगा। वह किसी से बात नहीं करेगा और अकेला रहेगा, जिससे वह साधारण घोड़ों से अलग और रहस्यमय बना रहेगा। उसने यह भी घोषणा की कि पास की दो नीली पहाड़ियों के बीच स्थित नीली झील तक जो घोड़ा सबसे पहले पहुँचेगा, वही अमर घोड़ा बनेगा।

सभी घोड़े उस झील की ओर दौड़ पड़े और अंत में एक दुबला-पतला लेकिन तेज घोड़ा सबसे पहले पहुँच गया। उसे सम्मानित किया गया और फिर उसे झील में छलाँग लगाने को कहा गया। जैसे ही उसने झील में छलाँग लगाई, वह नीले रंग का सुंदर पंखों वाला घोड़ा बन गया। अब वह “अमर घोड़ा” बन चुका था, लेकिन उसे चेतावनी दी गई कि वह किसी से नहीं मिलेगा और न ही सामान्य भोजन करेगा, वरना उसकी अमरता खत्म हो जाएगी।

शुरुआत में नीला घोड़ा स्वतंत्र होकर आकाश में उड़ता रहा और दुनिया के सुंदर दृश्यों का आनंद लेता रहा। लेकिन समय के साथ उसे अकेलापन महसूस होने लगा। उसके पास न कोई दोस्त था, न कोई बातचीत करने वाला। धीरे-धीरे उसकी खुशी उदासी में बदल गई और उसे समझ आने लगा कि अमरता का कोई अर्थ नहीं, अगर उसमें साथ और अपनापन न हो।

अंत में वह उसी झील के पास लौट आया और घोड़ों की सभा को पुकारा। उसने अपना दुख बताया और कहा कि वह अकेलेपन से तंग आ चुका है। सभी घोड़ों ने मिलकर निर्णय लिया कि अब वह भोर और शाम के समय बस्ती में आ सकता है और सपनों में लोगों से बात कर सकता है। इस निर्णय से नीला घोड़ा खुश हो गया और उसने फिर से स्वतंत्रता और थोड़ी निकटता के साथ जीवन जीना शुरू किया।

इसके बाद नीला घोड़ा कभी-कभी शहरों और बागों के आसपास दिखाई देने लगा। वह अचानक आता और फिर गायब हो जाता, जिससे लोग उसे रहस्यमय मानते थे। एक दिन एक छोटी लड़की इनता अपने नीले फूलों वाले छाते के साथ बाग में पढ़ रही थी। जब वह घर लौटी तो उसने देखा कि उसके छाते के नीले फूल गायब हो चुके थे, जिससे वह बहुत दुखी हो गई।

रात में इनता को सपना आया जिसमें वही नीला घोड़ा उससे मिला। उसने बताया कि वह अकेला था और लोगों से बात करना चाहता था। उसने यह भी कहा कि वह जानबूझकर नीले फूल नहीं ले गया था, बल्कि वह केवल ध्यान आकर्षित करना चाहता था। दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई, जहाँ इनता ने अपनी जिंदगी और किताबों के बारे में बताया और घोड़े ने अपनी यात्राओं की कहानियाँ साझा कीं।

सुबह जब इनता जागी, तो वह दुखी नहीं थी बल्कि उसके मन में एक अजीब-सी शांति थी। उसे लगा जैसे उसने किसी खास और अद्भुत मित्र से मुलाकात की हो। इस तरह अमर घोड़े की कहानी यह संदेश देती है कि अकेलापन चाहे कितना भी महान क्यों न हो, अंत में हर प्राणी को साथ और संवाद की जरूरत होती है।

बालाई वाला फ़क़ीर (उर्दू कहानी)

लखनऊ शहर अपनी विविधता और अजीबोगरीब लोगों के लिए जाना जाता था। यहाँ अमीरों से लेकर गरीबों तक, हर वर्ग के लोग अपने-अपने ढंग से जीवन जीते थे। खासकर शहर की सड़कों और पुलों के नीचे रहने वाले भिखारियों की दुनिया भी अपने अनोखे नियमों और आदतों से भरी हुई थी। सिटी स्टेशन और जुबली कॉलेज के बीच बने रेल के पुल के नीचे तो जैसे भिखारियों का एक स्थायी अड्डा ही बन गया था, जहाँ लंगड़े, अंधे और बीमार भिखारी रहते थे।

इसी जगह एक अजीब भिखारी रहता था, जिसे लोग “बालाई वाला फ़क़ीर” कहते थे। वह हमेशा एक ही रट लगाए रहता था—“एक पैसा बाबा, एक पैसा।” उसकी आवाज़ इतनी करुण और प्रभावशाली होती थी कि कोई भी उसे अनसुना नहीं कर पाता था। उसकी हालत देखकर लोग उसे पहुँचा हुआ फकीर मानते थे, और समझते थे कि वह अपनी जरूरत के लिए नहीं बल्कि आध्यात्मिक कारणों से भीख माँगता है।

हर रोज़ कॉलेज के छात्र, शिक्षक और राहगीर उसे कुछ न कुछ दे जाते थे। कई लोग उसे फल, मिठाई और अच्छे भोजन तक भी देते थे। खासकर एक छात्र हमीद उसे बहुत मानता था और हर दिन उसके लिए घर से कुछ न कुछ लाता था। धीरे-धीरे हमीद और उसके दोस्तों को शक होने लगा कि फकीर वास्तव में इतना गरीब नहीं है, जितना वह दिखाता है। उन्हें लगा कि उसके पास कोई छिपा हुआ रहस्य जरूर है।

फिर एक दिन छात्रों ने तय किया कि वे फकीर की सच्चाई जानेंगे। उन्होंने उसकी गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की। कुछ दिनों बाद उन्होंने देखा कि एक बालाई (मलाई) बेचने वाला व्यक्ति रोज़ उसे शीरमाल और मलाई देता था, और फकीर उन्हें बड़े आराम से खाता था। यह देखकर हमीद को बहुत गुस्सा आया क्योंकि उसे लगा कि फकीर लोगों को धोखा दे रहा है।

हमीद ने जाकर फकीर से सीधे पूछ लिया कि जब उसे इतनी अच्छी चीजें मिलती हैं, तो वह फिर भी “एक पैसा बाबा” क्यों कहता रहता है। फकीर ने बहुत सरलता से जवाब दिया कि अगर वह वह स्वादिष्ट भोजन न खाए, तो उसकी आवाज़ में वह करुणा और असर नहीं रहेगा, जिससे लोग उसे भीख देंगे। उसका मतलब था कि यह सब उसकी “कला” और “धंधा” का हिस्सा था।

इस जवाब ने हमीद और उसके दोस्तों की सोच बदल दी। वे समझ गए कि यह केवल धोखा नहीं बल्कि एक तरह का पेशा भी था, जिसमें लोग भावनाओं का इस्तेमाल करते थे। इसके बाद छात्रों ने लोगों को फकीर के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया, जिससे उसकी आमदनी धीरे-धीरे कम होने लगी। लोग उसे कम पैसे देने लगे और उसकी जिंदगी कठिन होती चली गई।

कुछ ही दिनों में फकीर को पुल के नीचे की जगह छोड़नी पड़ी और वह शाह मीना के मजार के पास रहने लगा। लेकिन वहाँ उसे न तो सुरक्षा मिली और न ही ठीक से रहने की सुविधा। एक सर्द रात में वह बारिश और ओलों में भीगता रहा और आखिरकार उसकी मौत हो गई। जब लोगों ने उसके शरीर की तलाशी ली तो उसके पास बड़ी मात्रा में पैसे मिले, जिससे सभी हैरान रह गए।

उसकी मौत के बाद हमीद बहुत सोच में पड़ गया। उसे लगा कि समाज और सरकार को मिलकर ऐसे लोगों के लिए कोई व्यवस्था करनी चाहिए ताकि कोई भी इस तरह सड़क पर न मरे। वह यह सवाल लेकर रह गया कि आखिर सरकार हर शहर में ऐसे घर क्यों नहीं बना सकती जहाँ जरूरतमंद लोग सुरक्षित रह सकें। यह कहानी समाज, भिक्षावृत्ति और इंसानियत पर एक गहरा सवाल छोड़ जाती है।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

बालकथाएँ बच्चों के लिए रोचक, सरल और प्रेरणादायक कहानियाँ होती हैं। ये उनकी कल्पनाशक्ति, नैतिक मूल्यों, भाषा कौशल और रचनात्मक सोच को विकसित करती हैं। मनोरंजन के साथ-साथ जीवन की महत्वपूर्ण सीख भी प्रदान करती हैं।

बालकथाएँ 
प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES