मुरलीकांत पेटकर — घायल सैनिक से पैरालंपिक गोल्ड मेडल जीतने तक
भारतीय खेल इतिहास के पन्नों में कई ऐसी कहानियाँ दर्ज हैं जो हमें न केवल प्रेरित करती हैं बल्कि यह भी सिखाती हैं कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो नियति को भी अपना फैसला बदलना पड़ता है। ऐसी ही एक अद्वितीय और रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान है भारत के पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर की।
यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे जांबाज सैनिक की कहानी है जिसने युद्ध के मैदान में मौत को मात दी और फिर खेल के मैदान में उतरकर दुनिया के सामने तिरंगे का मान बढ़ाया। मुरलीकांत पेटकर का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि इंसान शरीर से नहीं, बल्कि अपने हौसलों और अपनी अटूट इच्छाशक्ति से जीता या हारता है।
मुरलीकांत पेटकर का जन्म महाराष्ट्र के सांगली जिले के पेठ इस्लामपुर गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर कुछ असाधारण करने की ललक थी और वे कुश्ती के खेल के प्रति बेहद आकर्षित थे। गाँव की मिट्टी और अखाड़े की खुशबू ने उनके भीतर एक मजबूत खिलाड़ी को जन्म दिया था, लेकिन किस्मत उन्हें किसी और बड़े मोर्चे के लिए तैयार कर रही थी।
बचपन के दिनों में वे बेहद नटखट और साहसी थे, जिसके कारण कभी-कभी उन्हें स्थानीय स्तर पर मुश्किलों का सामना भी करना पड़ता था। लेकिन यही साहस आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा संबल बनने वाला था, जिसने उन्हें एक साधारण लड़के से देश का गौरव बना दिया।
वे देश की सेवा करने के लिए इतने उत्सुक थे कि उन्होंने भारतीय सेना में शामिल होने का फैसला किया और अंततः वे भारतीय सेना के इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर्स (EME) कोर में एक शिल्पकार के रूप में भर्ती हो गए। सेना के अनुशासित माहौल ने उनकी खेल प्रतिभा को एक नई दिशा दी और उन्होंने यहाँ आकर मुक्केबाजी यानी बॉक्सिंग में हाथ आजमाना शुरू किया।
मुरलीकांत की फुर्ती और उनके सटीक मुक्कों ने जल्द ही सेना के वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। वे बहुत कम समय में सेना के एक बेहतरीन मुक्केबाज के रूप में उभरकर सामने आए और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनानी शुरू कर दी, जिससे उनका भविष्य बेहद उज्ज्वल दिखाई दे रहा था।
सेना का सफर और 1965 के युद्ध का वो भयानक दिन
सेना में रहते हुए मुरलीकांत पेटकर का खेल करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था और उनका चयन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भी होने लगा था। साल 1964 में उन्होंने टोक्यो में आयोजित इंटरनेशनल सर्विसेज स्पोर्ट्स मीट में मुक्केबाजी में हिस्सा लिया और बेहतरीन प्रदर्शन किया।
उनके जीवन का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर जा रहा था और हर कोई मान रहा था कि यह युवा मुक्केबाज आने वाले समय में विश्व पटल पर भारत का नाम रोशन करेगा। लेकिन तभी साल 1965 आया, जब भारत और पाकिस्तान के बीच अचानक युद्ध छिड़ गया और मुरलीकांत को खेल के मैदान से सीधे युद्ध के मैदान में देश की रक्षा के लिए जाना पड़ा।
साल 1965 का वह युद्ध मुरलीकांत पेटकर के जीवन को हमेशा-हमेशा के लिए बदलने वाला साबित हुआ। उनकी तैनाती कश्मीर के सियालकोट सेक्टर में थी, जहाँ हर तरफ से गोलियों की बौछार और बमों के धमाके हो रहे थे। एक सैनिक के तौर पर मुरलीकांत बिना अपनी जान की परवाह किए दुश्मनों का डटकर मुकाबला कर रहे थे।
तभी अचानक पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने उनके कैंप पर हवाई हमला कर दिया, जिससे चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। उस भीषण हमले के दौरान मुरलीकांत को एक के बाद एक कई गोलियां लगीं, जिससे वे बुरी तरह घायल हो गए और जमीन पर गिर पड़े।
वह मंजर बेहद खौफनाक था क्योंकि मुरलीकांत के शरीर में नौ गोलियां धंस चुकी थीं और वे खून से लथपथ होकर बेहोश हो चुके थे। इसी दौरान सेना की एक गाड़ी भी अनजाने में उनके ऊपर से गुजर गई, जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई।
युद्ध का मैदान शांत होने के बाद जब शवों और घायलों को समेटा जा रहा था, तब मुरलीकांत को मृत समझ लिया गया था। लेकिन जब डॉक्टरों ने उनके शरीर में हल्की सी हरकत देखी, तो उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। वे लगभग दो साल तक कोमा में रहे और जब उन्हें होश आया, तो दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी।
अपंगता का दर्द और जिंदगी की नई शुरुआत
जब मुरलीकांत पेटकर को दो साल के लंबे इंतजार के बाद होश आया, तो डॉक्टरों ने उन्हें एक ऐसी कड़वी सच्चाई बताई जिसे स्वीकार करना किसी भी इंसान के लिए जीते जी मरने जैसा था।
डॉक्टरों ने कहा कि वे अब कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाएंगे क्योंकि उनकी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह टूट चुकी थी और उनके शरीर का निचला हिस्सा हमेशा के लिए लकवाग्रस्त यानी पैरालाइज्ड हो चुका था। एक ऐसा नौजवान जो कुछ समय पहले तक अखाड़े में विरोधियों को चित करता था और रिंग में मुक्के बरसाता था, वह अब पूरी तरह से एक व्हीलचेयर पर सिमट कर रह गया था।
शुरुआती दिन मुरलीकांत के लिए बेहद दर्दनाक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले थे। वे अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए अक्सर अपने अतीत को याद करते और सोचते कि अब उनके जीवन का क्या उद्देश्य बचा है। समाज और आस-पास के कुछ लोगों की सहानुभूति भरी नजरें उन्हें और ज्यादा कमजोर बनाती थीं, लेकिन मुरलीकांत पेटकर का जन्म हार मानने के लिए नहीं हुआ था।
उन्होंने तय किया कि वे इस अपंगता को अपनी नियति नहीं बनने देंगे और बैसाखियों या व्हीलचेयर के सहारे ही सही, लेकिन एक बार फिर से अपनी जिंदगी की नई जंग की शुरुआत करेंगे।
इस कठिन समय में सेना के डॉक्टरों और उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने मुरलीकांत का बहुत साथ दिया और उन्हें खेल की दुनिया में वापस लौटने की सलाह दी। चूंकि वे अब मुक्केबाजी नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने अपने शरीर के ऊपरी हिस्से की ताकत का इस्तेमाल करने के लिए तैराकी यानी स्विमिंग को चुना।
पानी में उतरना उनके लिए एक नया अनुभव था क्योंकि यहाँ उनके पैरों का कोई सहयोग नहीं था, उन्हें सिर्फ अपने हाथों और कंधों के दम पर पानी को चीरना था। उन्होंने दिन-रात पानी में पसीना बहाना शुरू किया और धीरे-धीरे तैराकी में महारत हासिल कर ली।
1972 का हीडलबर्ग पैरालंपिक और ऐतिहासिक स्वर्ण पदक
मुरलीकांत पेटकर की कड़ी मेहनत और कभी न खत्म होने वाले हौसले ने जल्द ही रंग दिखाना शुरू कर दिया। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की पैरा-एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और तैराकी के साथ-साथ टेबल टेनिस, शॉटपुट और जेवलिन थ्रो जैसे खेलों में भी अपनी पकड़ मजबूत की।
साल 1968 में उन्होंने इजराइल के तेल अवीव में आयोजित पैरालंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जहाँ वे पदक जीतने से चूक गए लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी कमियों को सुधारा और साल 1972 में जर्मनी के हीडलबर्ग में आयोजित होने वाले पैरालंपिक खेलों के लिए खुद को पूरी तरह झोंक दिया।
साल 1972 का हीडलबर्ग पैरालंपिक भारतीय खेल इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय बनने वाला था, जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा। मुरलीकांत पेटकर ने 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और जब वे डाइव लगाकर पानी में उतरे, तो उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी के दर्द, संघर्ष और गुस्से को अपनी ताकत में बदल दिया।
उन्होंने बिना रुके, पूरी रफ्तार के साथ पानी की लहरों को पीछे छोड़ते हुए मात्र 37.33 सेकंड का समय निकाला और फिनिशिंग लाइन को छू लिया। यह न केवल एक नया विश्व रिकॉर्ड था, बल्कि खेल इतिहास का एक महाचमत्कार भी था।
मुरलीकांत पेटकर ने प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया और वे पैरालंपिक खेलों में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी बन गए। जब हीडलबर्ग के खेल स्टेडियम में भारत का राष्ट्रगान गूंजा और तिरंगा ऊपर उठा, तो वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम थीं।
एक ऐसा इंसान जिसे कभी डॉक्टरों ने मृत समझ लिया था और जिसके शरीर में आज भी एक गोली धंसी हुई थी, उसने दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर सोने का तमगा जीतकर यह साबित कर दिया कि इंसानी जज्बा किसी भी शारीरिक अक्षमता से बहुत बड़ा होता है।
गुमनामी का अंधेरा और देश का सर्वोच्च सम्मान

पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद मुरलीकांत पेटकर जब भारत लौटे, तो उन्हें वह सम्मान और पहचान तुरंत नहीं मिली जिसके वे हकदार थे। उस दौर में क्रिकेट और मुख्यधारा के खेलों के सामने पैरालंपिक खेलों को बहुत कम तवज्जो दी जाती थी, जिसके कारण मुरलीकांत की इस ऐतिहासिक उपलब्धि को मीडिया और सरकार द्वारा लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया।
वे टाटा मोटर्स (तत्कालीन टेल्को) में नौकरी करने लगे और पुणे में एक साधारण और शांत जीवन जीने लगे। उन्होंने कभी भी अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा नहीं पीटा और गुमनामी के अंधेरे में रहकर भी समाज की सेवा करते रहे।
दशकों तक गुमनामी में रहने के बावजूद मुरलीकांत पेटकर के मन में कभी कोई कड़वाहट नहीं आई और वे हमेशा नए खिलाड़ियों को प्रेरित करते रहे। लेकिन कहते हैं कि इतिहास अपने नायकों को कभी नहीं भूलता। कई सालों के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार देश ने अपने इस असली हीरो को पहचाना।
साल 2018 में भारत सरकार ने मुरलीकांत पेटकर को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा। जब राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में वे व्हीलचेयर पर बैठकर सम्मान लेने पहुंचे, तो पूरा हॉल खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था, जो उनके दशकों पुराने संघर्ष को मिला एक सच्चा सलाम था।
हाल के वर्षों में मुरलीकांत पेटकर के जीवन पर एक बॉलीवुड फिल्म ‘चंदू चैंपियन’ भी बनी, जिसने उनकी इस अविश्वसनीय कहानी को देश के बच्चे-बच्चे तक पहुंचा दिया। आज मुरलीकांत पेटकर करोड़ों युवाओं और विशेष रूप से दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का एक ऐसा जलता हुआ दीया हैं, जो यह सिखाता है कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर आपके पास अटूट विश्वास है तो आप हर मुश्किल को पार कर सकते हैं।
उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि परिस्थितियां हमें कमजोर कर सकती हैं, लेकिन हमारी आत्मा को कभी हरा नहीं सकतीं और असली चैंपियन वही है जो गिरने के बाद दोबारा उठ खड़ा होता है।
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मुरलीकांत पेटकर
प्रस्तुति: Saying Central Team