ज्योति कुमारी

ज्योति कुमारी: हौसले का सफर और साइकिल पर टिकी दुनिया

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ज्योति कुमारी: हौसले का सफर और साइकिल पर टिकी दुनिया

मार्च का महीना साल 2020 में एक ऐसा मंजर लेकर आया जिसने पूरी दुनिया की रफ्तार पर एक झटके में ब्रेक लगा दिया। कोरोना महामारी के अचानक बढ़ते प्रकोप को देखते हुए जब पूरे देश में पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा हुई, तो लाखों प्रवासी मजदूरों के पैरों तले से जमीन खिसक गई। हरियाणा के गुरुग्राम की तंग और अजनबी गलियों में बिहार के दरभंगा जिले के सिरहुल्ली गांव का एक छोटा सा परिवार भी इस खौफनाक सन्नाटे के बीच फंस चुका था।

इस परिवार में मोहन पासवान अपनी पंद्रह वर्षीय किशोर बेटी ज्योति कुमारी के साथ रहते थे। मोहन गुरुग्राम में रहकर ऑटो चलाकर किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे, लेकिन लॉकडाउन ने उनके पहियों को हमेशा के लिए जाम कर दिया था। दुकान-बाजार सब बंद हो चुके थे, सड़कों पर गाड़ियां चलना बंद हो गई थीं और चारों तरफ एक अजीब सी दहशत का माहौल बन गया था।

इस बड़े शहर में जहां हर कोई अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में लगा हुआ था, वहां इस गरीब बाप-बेटी की सुध लेने वाला कोई नहीं था। मकान मालिक का किराया चुकाने के पैसे नहीं थे और हर बीतते दिन के साथ राशन का डिब्बा खाली होता जा रहा था। इस भयानक अनिश्चितता के दौर में ज्योति अपनी छोटी आंखों से इस बड़े संकट को चुपचाप देख रही थी और सोच रही थी कि आगे क्या होगा।

गुरुग्राम की उस छोटी सी कोठरी में जहां सूरज की रोशनी भी बमुश्किल पहुंचती थी, वहां भुखमरी का खतरा साफ मंडराने लगा था। मोहन पासवान कुछ समय पहले ही एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए थे, जिसके कारण उनका पैर बुरी तरह फ्रैक्चर हो गया था।

वह चलने-फिरने में पूरी तरह से असमर्थ थे और बिस्तर पर पड़े-पड़े बेबसी के आंसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे थे। डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह आराम की सलाह दी थी और पैर पर भारी प्लास्टर चढ़ा हुआ था, जिसके कारण वह अपने दम पर खड़े भी नहीं हो सकते थे। ऐसी स्थिति में पूरे कमरे की जिम्मेदारी और पिता की देखभाल का पूरा जिम्मा पंद्रह साल की ज्योति के कंधों पर आ गया था।

शहर में काम पूरी तरह ठप हो चुका था और जेब में बचे हुए चंद सिक्के भी धीरे-धीरे राशन और दवाओं में खर्च हो रहे थे। जब मकान मालिक ने किराए के लिए दबाव बनाना शुरू किया और बिजली-पानी काटने की धमकी दी, तो दोनों के सामने गहरा संकट खड़ा हो गया। ज्योति ने कई लोगों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन इस वैश्विक आपदा के समय हर कोई खुद को सुरक्षित करने में व्यस्त था। उस समय ज्योति को समझ आ गया था कि अगर वे इस अनजान और मतलबी शहर में ज्यादा दिन रुके, तो बीमारी से पहले भूख उन्हें मार डालेगी।

इस निराशाजनक माहौल में जब चारों तरफ से रास्ते बंद नजर आ रहे थे, तब ज्योति के मन में अपने गांव लौटने की तीव्र इच्छा जागी। लेकिन गांव जाने की राह इतनी आसान नहीं थी क्योंकि रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पूरी तरह से सील कर दिए गए थे। मोहन पासवान ने अपनी लाचारी को देखते हुए बेटी से कहा कि वे दोनों यहीं भगवान भरोसे रुक जाते हैं, क्योंकि इस हालत में सफर करना मुमकिन नहीं था।

मगर ज्योति हार मानने वालों में से नहीं थी, उसकी रगों में एक अजीब सा साहस और पिता को बचाने की जिद दौड़ रही थी। उसने महसूस किया कि अगर वे यहीं बैठे रहे तो घुट-घुट कर मर जाएंगे, इससे बेहतर है कि बाहर निकलकर अपनी किस्मत को आजमाया जाए। उसने अपने पिता ढाढस बंधाया और कहा कि चाहे जो हो जाए, वह उन्हें इस तरह तड़पने के लिए अकेले नहीं छोड़ेगी। पिता के पैर का दर्द और उनकी बेबसी ज्योति के लिए एक प्रेरणा बन गई जिसने उसे एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लेने पर मजबूर कर दिया। यहीं से उस सफर की नींव पड़ी जिसने बाद में पूरी दुनिया को हैरान कर दिया और एक मिसाल कायम की।

एक साहसी फैसला और पुरानी साइकिल का वो अनोखा सौदा

जब सारे पारंपरिक साधन पूरी तरह से बंद हो चुके थे और पैदल चलना भी मोहन पासवान के लिए नामुमकिन था, तब ज्योति ने कुछ अलग करने की सोची। उसने अपने पिता से कहा कि वे एक साइकिल खरीदेंगे जिसके सहारे वे अपने गांव तक का सफर तय कर सकें। मोहन पासवान ने जब यह सुना तो उन्हें लगा कि उनकी बेटी नासमझी में यह सब कह रही है क्योंकि गुरुग्राम से बिहार का उनका गांव करीब बारह सौ किलोमीटर दूर था।

इतनी लंबी दूरी एक छोटी बच्ची साइकिल चलाकर कैसे तय कर सकती थी, वह भी तब जब पीछे एक भारी-भरकम बीमार इंसान बैठा हो। लेकिन ज्योति के इरादे फौलादी हो चुके थे और उसने अपने फैसले को बदलने से साफ इनकार कर दिया। उसने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए कमरे में बचे हुए आखिरी पैसों को इकट्ठा किया, जो कि बमुश्किल कुछ सौ रुपये थे।

उसने एक स्थानीय परिचित से बात की जिसके पास एक पुरानी, कबाड़ जैसी हो चुकी साइकिल पड़ी हुई थी। ज्योति ने उस व्यक्ति के सामने हाथ जोड़े, अपनी मजबूरी बताई और मिन्नतें करके वह पुरानी साइकिल खरीदने में कामयाबी हासिल की।

वह साइकिल कोई आधुनिक या गियर वाली साइकिल नहीं थी, बल्कि एक साधारण, भारी और जंग लगी हुई लेडीज साइकिल थी। उसके टायर घिसे हुए थे, चेन ढीली थी और उसकी गद्दी भी इतनी आरामदायक नहीं थी कि उस पर लगातार कई दिनों तक सफर किया जा सके।

जब ज्योति उस साइकिल को खींचकर अपने कमरे तक लाई, तो पड़ोसियों ने उसका मजाक उड़ाया और उसके पिता को रोकने की कोशिश की। लोगों का कहना था कि यह लड़की पागल हो गई है और रास्ते में ही दोनों की जान चली जाएगी, क्योंकि धूप और गर्मी अपने चरम पर थी।

मगर ज्योति ने लोगों की बातों को एक कान से सुना और दूसरे कान से निकाल दिया, क्योंकि उसका ध्यान सिर्फ अपने पिता की जान बचाने पर था। उसने साइकिल की चेन को ठीक किया, टायरों में हवा भरी और पीछे वाले कैरियर पर एक छोटा सा कपड़ा लपेटकर उसे बैठने लायक बनाया। उसने एक छोटी सी पोटली में थोड़ा सा पानी और रास्ते के लिए कुछ सूखे बिस्कुट रखे, जो उनके पास बचे हुए थे।

सफर शुरू करने की उस सुबह मोहन पासवान के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, उन्हें लग रहा था कि वे अपनी बेटी को मौत के मुंह में ढकेल रहे हैं। लेकिन ज्योति ने मुस्कुराते हुए अपने पिता के पैर छुए और उन्हें हौसला देते हुए साइकिल के पीछे वाले हिस्से पर बैठने के लिए कहा।

मोहन ने किसी तरह अपने भारी और लाचार पैर को संभाला और साइकिल के कैरियर पर बैठ गए, जबकि ज्योति ने कसकर हैंडल संभाला। जैसे ही ज्योति ने पहला पैडल मारा, उसके मन में एक अजीब सी घबराहट थी लेकिन पैरों में गजब की ताकत और आंखों में मंजिल का साफ रास्ता था।

गुरुग्राम की उन सूनी सड़कों पर वह अकेली लड़की अपने पिता के पूरे वजूद को अपनी साइकिल पर लादे हुए आगे बढ़ चली। धूप धीरे-धीरे तेज हो रही थी और हवाएं विपरीत दिशा से चल रही थीं, लेकिन ज्योति का संकल्प इन सब पर भारी पड़ रहा था। वह जानती थी कि यह सफर सिर्फ एक रास्ता पार करना नहीं है, बल्कि अपनी किस्मत और इस आपदा के खिलाफ एक सीधी जंग है।

बारह सौ किलोमीटर की वो खौफनाक और थका देने वाली राह

गुरुग्राम की सीमा को पार करते ही ज्योति के सामने असली और डरावनी हकीकत खड़ी हो गई क्योंकि राष्ट्रीय राजमार्ग पर सन्नाटा पसरा हुआ था। मई के महीने की वो भीषण और चुभने वाली गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी, जिसमें कोलतार की सड़कें पिघल रही थीं और गर्म हवा के थपेड़े चेहरे को झुलसा रहे थे।

ज्योति लगातार पैडल मार रही थी, उसके छोटे-छोटे पैर इस भारी वजन को खींचने में पूरी ताकत लगा रहे थे, जिससे उसकी सांसें फूलने लगी थीं। हर कुछ किलोमीटर के बाद उसके पैर कांपने लगते थे, लेकिन पीछे बैठे पिता के कराहने की आवाज सुनते ही उसके भीतर फिर से ऊर्जा का संचार हो जाता था। रास्ते में छाया नाम की कोई चीज नहीं थी और लॉकडाउन के कारण हाईवे पर बने तमाम ढाबे, होटल और दुकानें पूरी तरह से बंद थीं।

पीने के पानी के लिए भी उन्हें तरसना पड़ रहा था, क्योंकि रास्ते में लगे हैंडपंप या तो सूखे थे या फिर संक्रमण के डर से लोग उन्हें छूने नहीं दे रहे थे। इन तमाम बंदिशों और मुश्किलों के बावजूद ज्योति ने हिम्मत नहीं हारी और लगातार अपनी साइकिल के पहियों को घुमाती रही।

सफर के दूसरे और तीसरे दिन ज्योति के पैरों में बड़े-बड़े छाले पड़ गए थे और हाथों की हथेलियां हैंडल को लगातार पकड़ने के कारण छिल चुकी थीं। दोपहर के समय जब भूख और प्यास से उसका गला सूख जाता, तो वह सड़क के किनारे किसी पेड़ की छांव में चंद मिनटों के लिए रुकती।

मोहन पासवान अपनी बेटी की यह हालत देखकर फूट-फूट कर रोते थे और कहते थे कि उन्हें यहीं छोड़ दे और खुद किसी गाड़ी वाले की मदद से निकल जाए। लेकिन ज्योति अपने पिता के आंसू पोंछती और कहती कि यदि हम मरेंगे भी तो साथ में ही मरेंगे, मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली।

रास्ते में कई बार रात के समय उन्हें खुले आसमान के नीचे या किसी पेट्रोल पंप के कोने में सोना पड़ा, जहां कीड़ों और मच्छरों का आतंक था। सुरक्षा के लिहाज से भी एक युवा लड़की के लिए हाईवे पर रात बिताना बेहद खतरनाक था, इसलिए ज्योति रात में भी ठीक से सो नहीं पाती थी और जागकर पिता की रखवाली करती थी। सुबह की पहली किरण फूटते ही वह फिर से साइकिल पर सवार हो जाती और अपनी अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ती।

इस लंबी और थका देने वाली यात्रा के दौरान ज्योति को कई तरह के मानवीय अनुभवों से गुजरना पड़ा, जहां कुछ अच्छे तो कुछ बेहद बुरे अनुभव हुए। रास्ते में कुछ जगहों पर अन्य प्रवासियों ने उनकी लाचारी देखकर अपने पास से थोड़ा बहुत खाना या पानी शेयर किया, जिससे उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत मिली।

एक जगह पर एक ट्रक वाले ने उन्हें देखकर अपनी गाड़ी रोकी और कुछ दूरी तक लिफ्ट देने की पेशकश की, जिससे ज्योति को कुछ घंटों का आराम मिल सका। लेकिन अधिकांश रास्ता ज्योति को खुद अपने दम पर ही तय करना पड़ा, जिसमें उत्तर प्रदेश के विशाल मैदान और नदियां शामिल थीं।

जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, ज्योति का शरीर कमजोर हो रहा था लेकिन उसकी मानसिक शक्ति और मजबूत होती जा रही थी। उसने रास्ते में आने वाले हर छोटे-बड़े चढ़ाव और ढलान का मुकाबला अपनी साइकिल के पैडल से किया, मानो वह समय को पीछे छोड़ देना चाहती हो। सात दिनों तक लगातार बिना रुके, बिना थके और बिना किसी शिकायत के वह लड़की अपनी धुन में चलती रही, जिसे देखकर रास्ते के लोग भी हैरान थे।

दरभंगा की सीमा पर कदम और अपनों के बीच मिला नया जीवन

आखिरकार सात दिनों के उस जानलेवा और ऐतिहासिक सफर के बाद वह पल आया जब ज्योति ने बिहार की सीमा में प्रवेश किया और दरभंगा जिले की तरफ बढ़ी। जब उसकी साइकिल अपने पैतृक गांव सिरहुल्ली की मिट्टी के करीब पहुंची, तो वहां के लोगों को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। एक पंद्रह साल की दुबली-पतली लड़की गुरुग्राम से बारह सौ किलोमीटर दूर अपने बीमार पिता को साइकिल पर बिठाकर सुरक्षित वापस ले आई थी।

गांव की सीमा पर पहुंचते ही ज्योति के शरीर की बची-खुची ताकत मानो खत्म हो गई और वह साइकिल रोकते ही वहीं जमीन पर बैठ गई। गांव वालों ने जब इस अविश्वसनीय बहादुरी की कहानी सुनी, तो पूरे इलाके में सनसनी फैल गई और लोग इस जांबाज बेटी को देखने के लिए उमड़ पड़े।

स्थानीय प्रशासन को तुरंत इसकी सूचना दी गई, क्योंकि उस समय बाहर से आने वाले लोगों के लिए क्वारंटाइन नियमों का पालन करना अनिवार्य था। ज्योति और उसके पिता को तुरंत प्राथमिक उपचार दिया गया, उनके स्वास्थ्य की जांच की गई और उन्हें गांव के ही एक स्कूल में बनाए गए क्वारंटाइन सेंटर में रखा गया।

क्वारंटाइन सेंटर में पहुंचने के बाद ज्योति को पहली बार एक सुकून की नींद आई और उसके चेहरे पर अपने पिता को सुरक्षित घर पहुंचाने की संतुष्टि साफ दिख रही थी। डॉक्टरों की टीम ने मोहन पासवान के पैर की जांच की और उन्हें उचित दवाइयां प्रदान कीं, जिससे उनकी सेहत में सुधार होने लगा।

गांव के लोग ज्योति की इस अदम्य वीरता से इतने प्रभावित थे कि वे उसके लिए घर से तरह-तरह के पकवान और फल लेकर आने लगे। सोशल मीडिया के इस दौर में ज्योति कुमारी की यह कहानी जंगलों की आग की तरह फैल गई और देखते ही देखते वह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गई।

विदेशी मीडिया से लेकर देश के बड़े-बड़े अखबारों और टीवी चैनलों ने ज्योति को ‘साइकिल गर्ल’ का खिताब दिया और उसकी तुलना पौराणिक चरित्रों से होने लगी। लोग इस बात से दंग थे कि जिस दूरी को तय करने में अच्छे-अच्छे नौजवानों के पसीने छूट जाएं, उसे एक बच्ची ने केवल एक पुरानी साइकिल के दम पर फतह कर लिया था।

ज्योति कुमारी का यह साहसिक कारनामा केवल एक बेटी के प्यार की कहानी नहीं था, बल्कि यह उस दौर के व्यवस्थागत संकट और मानवीय जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज बन गया था। अमेरिका के राष्ट्रपति की बेटी इवांका ट्रंप ने भी ट्वीट करके ज्योति के इस असाधारण साहस और लगन की तारीफ की, जिससे वह वैश्विक पटल पर चमक उठी।

विभिन्न खेल संगठनों, जैसे कि भारतीय साइकिलिंग महासंघ ने ज्योति को दिल्ली आकर ट्रायल देने का न्योता दिया और उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने की बात कही। कई राजनीतिक हस्तियों, समाजसेवियों और फिल्मी सितारों ने ज्योति के परिवार को आर्थिक मदद भेजी, जिससे उनकी गरीबी और तंगहाली के दिन हमेशा के लिए दूर हो गए।

मोहन पासवान की आंखों में अब बेबसी के आंसू नहीं थे, बल्कि अपनी बेटी के लिए गर्व और सम्मान के आंसू थे, जिसने उन्हें एक नया जीवन दिया था। ज्योति ने साबित कर दिया था कि अगर मन में सच्ची निष्ठा और अटूट संकल्प हो, तो साधन की कमी कभी भी आपकी मंजिल के आड़े नहीं आ सकती।

हौसले की नई इबारत और आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ी सीख

आज ज्योति कुमारी की कहानी देश के करोड़ों युवाओं और विशेषकर बेटियों के लिए प्रेरणा का एक ऐसा अटूट स्रोत बन चुकी है जो युगों-युगों तक याद रखा जाएगा। सरकार ने उसकी इस बहादुरी को सम्मानित करते हुए उसे प्रतिष्ठित ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ से नवाजा, जो उसके इस महान त्याग का सच्चा सम्मान है।

जिस गांव में कभी इस परिवार को तंगहाली के कारण कोई खास तवज्जो नहीं मिलती थी, आज वहां का नाम ज्योति के कारण पूरी दुनिया में सम्मान से लिया जाता है। ज्योति को कई सरकारी योजनाओं का लाभ मिला, उनके लिए पक्का मकान बनवाया गया और उसकी शिक्षा के लिए उचित और उच्च स्तरीय प्रबंध किए गए।

लेकिन इन सब चमक-दमक और प्रसिद्धि के बीच भी ज्योति के पैर जमीन पर ही रहे और वह आज भी एक बेहद सरल और संस्कारी बेटी की तरह अपने माता-पिता की सेवा में लगी रहती है। वह अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है और उसका सपना है कि वह भविष्य में देश के लिए कुछ ऐसा काम करे जिससे उसकी पहचान और मजबूत हो सके।

ज्योति की यह कहानी हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में घुटने टेकने के बजाय संकट का डटकर सामना करना ही जीवन का असली नाम है। जब आपके पास कोई विकल्प न बचे, तो आपका खुद पर अटूट विश्वास ही आपका सबसे बड़ा हथियार बन जाता है, जैसा कि ज्योति ने अपनी पुरानी साइकिल को बनाया।

आज भी उस ऐतिहासिक और कड़े सफर की गवाह बनी वह पुरानी साइकिल उनके घर में एक अमूल्य धरोहर की तरह सुरक्षित रखी हुई है, जो हर देखने वाले को साहस का पाठ पढ़ाती है। यह कहानी भारतीय समाज में बेटियों की स्थिति और उनकी असीमित क्षमताओं को लेकर एक नई और प्रगतिशील सोच पैदा करती है, जो यह दर्शाती है कि बेटियां सिर्फ बोझ नहीं बल्कि संकट के समय पूरे परिवार का सबसे मजबूत सहारा होती हैं।

जब-जब इतिहास में कोरोना काल के उस भीषण और दर्दनाक दौर का जिक्र किया जाएगा, तब-तब ज्योति कुमारी और उसकी उस जादुई साइकिल की गाथा सुनहरे अक्षरों में याद की जाएगी। ज्योति ने अपने साहस से यह साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन और अंधेरी क्यों न हों, हौसले के एक पैडल से पूरी दुनिया को बदला जा सकता है।

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ज्योति कुमारी
प्रस्तुति: Saying Central Team

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