सोनम वांगचुक: लद्दाख के पहाड़ों का जादूगर
सोनम वांगचुक का नाम सामने आते ही बर्फ से ढके ऊंचे पहाड़, कड़ाके की ठंड, और उन पहाड़ों के बीच मुस्कुराता हुआ एक ऐसा चेहरा याद आता है, जिसने अपनी बुद्धि और अनोखी सोच से प्रकृति को चुनौती देने के बजाय उसके साथ दोस्ती करना सिखाया।
भारत के सबसे खूबसूरत लेकिन सबसे कठिन केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के उबड़-खाबड़ रास्तों और बर्फीली वादियों में जन्मे सोनम वांगचुक केवल एक इंजीनियर, आविष्कारक या शिक्षा सुधारक नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे आधुनिक युग के ऋषि हैं जिन्होंने विज्ञान का उपयोग मानवता और प्रकृति की भलाई के लिए किया है।
आज पूरी दुनिया उन्हें एक ऐसे दूरदर्शी इंसान के रूप में जानती है जिसने लद्दाख की बंजर और प्यासी सूखी भूमि पर पानी की बूंद-बूंद को सहेजना सिखाया और दुनिया को यह दिखाया कि अगर आपके पास पक्का इरादा हो तो आप शून्य से नीचे के तापमान में भी बदलाव की एक नई और बेहद गर्म मशाल जला सकते हैं। उनका जीवन लद्दाख के उन सीधे-सादे लोगों की कहानी है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराना नहीं छोड़ते और प्रकृति के हर थपेड़े को एक नए अवसर के रूप में स्वीकार करते हैं।
इस अद्भुत इंसान की कहानी लद्दाख के लेह जिले के एक बेहद छोटे और सुदूर गांव उलयतोकपो में शुरू हुई थी, जहां सुख-सुविधाओं का नामोनिशान तक नहीं था। १ सितंबर १९६६ को जन्मे सोनम के पिता सोनम ग्यालत्सन एक राजनेता थे और बाद में जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी बने, लेकिन सोनम का शुरुआती बचपन चकाचौंध से दूर सीधे प्रकृति की गोद में बीता।
लद्दाख का वह इलाका इतना अलग-थलग था कि वहां कोई औपचारिक स्कूल नहीं था, जिसके कारण सोनम को ९ साल की उम्र तक किसी स्कूल में जाने का मौका ही नहीं मिला।
हालांकि, इसे वे अपनी बदकिस्मती नहीं बल्कि सबसे बड़ा वरदान मानते हैं क्योंकि इस दौरान उनकी मां ने उन्हें उनकी मातृभाषा लदाखी में बुनियादी शिक्षा दी और सबसे बढ़कर, उन्हें प्रकृति की खुली किताब को पढ़ना सिखाया।
पहाड़ों की मिट्टी, बहता हुआ पानी, बदलता हुआ मौसम और लद्दाख के लोगों की आत्मनिर्भर जीवनशैली ही सोनम वांगचुक के जीवन के सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षक बने, जिन्होंने उनके भीतर गहरी संवेदनशीलता और जिज्ञासा के बीज बोए।
जब सोनम वांगचुक ९ साल के हुए, तब उनका दाखिला श्रीनगर के एक स्कूल में कराया गया, लेकिन वहां का अनुभव उनके लिए किसी बुरे सपने जैसा साबित हुआ क्योंकि उन्हें वहां की भाषा समझ नहीं आती थी। लदाखी भाषा बोलने वाले सोनम को अचानक हिंदी और अंग्रेजी के माहौल में डाल दिया गया, जिससे शिक्षकों को लगा कि वे एक कमजोर या मंदबुद्धि बच्चे हैं जो पढ़ाई में ध्यान नहीं लगा पाता।
इस भाषा के अंतर और लोगों के संकीर्ण नजरिए के कारण सोनम को बहुत मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और खुद को साबित करने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। आखिरकार, वे दिल्ली आ गए और वहां के केंद्रीय विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की, जहां उनकी बुद्धिमत्ता को सही दिशा मिली और उन्होंने यह महसूस किया कि शिक्षा का असली मतलब रटना नहीं बल्कि चीजों को समझना है।
इसके बाद उन्होंने श्रीनगर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया, हालांकि उनके पिता चाहते थे कि वे सिविल इंजीनियरिंग करें, जिसके कारण उन्हें आर्थिक मदद मिलना बंद हो गई और उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर खुद अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया।
शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति और SECMOL की स्थापना
इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी करने के बाद सोनम वांगचुक ने महसूस किया कि लद्दाख के युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या वहां की दोषपूर्ण और बाहरी शिक्षा प्रणाली है, जो स्थानीय बच्चों की जरूरतों के बिल्कुल अनुकूल नहीं थी। साल १९८८ में, उन्होंने अपने कुछ दोस्तों और समान विचारधारा वाले युवाओं के साथ मिलकर SECMOL (Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh) नाम के एक संगठन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में जमीनी स्तर पर सुधार करना था।
उस समय लद्दाख में मैट्रिक यानी दसवीं कक्षा की परीक्षा में फेल होने वाले छात्रों का प्रतिशत लगभग ९५ प्रतिशत था, क्योंकि परीक्षाएं राज्य स्तर पर होती थीं और सवाल ऐसे होते थे जिनका लद्दाख के जीवन से कोई संबंध नहीं था। सोनम ने इस भयावह स्थिति को बदलने का संकल्प लिया और उन्होंने लद्दाख के सरकारी स्कूलों में जाकर शिक्षकों को आधुनिक और व्यावहारिक तरीकों से पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया, ताकि बच्चों को पढ़ाई बोझ न लगे।
सोनम वांगचुक का मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो केवल किताबों तक सीमित न रहकर बच्चों के हाथों, दिमाग और दिल तीनों का विकास करे, जिसे वे ३एच (Head, Hand, and Heart) की अवधारणा कहते थे। SECMOL का कैंपस लेह से कुुछ दूर फे गांव में पूरी तरह से सौर ऊर्जा से संचालित होने वाला एक ऐसा अनोखा परिसर बना, जहां उन बच्चों को दाखिला दिया जाता था जिन्हें पूरी दुनिया ‘फेल’ या नाकामयाब मानकर छोड़ देती थी।
इस कैंपस को खुद बच्चों ने मिलकर मिट्टी, पत्थरों और सौर तकनीकों का उपयोग करके बनाया था, जहां पढ़ाई का मतलब रटना नहीं बल्कि खेती करना, गाय पालना, खाना बनाना और सौर ऊर्जा के उपकरणों को खुद असेंबल करना था। सोनम ने एक ऐसा माहौल तैयार किया जहां फेल होना कोई अभिशाप नहीं बल्कि सीखने की शुरुआत माना जाता था और इसी का नतीजा था कि कुछ ही वर्षों में लद्दाख में दसवीं पास होने वाले बच्चों का प्रतिशत ५ से बढ़कर ७५ प्रतिशत से अधिक हो गया, जिसने पूरे देश के शिक्षाविदों को हैरान कर दिया।
SECMOL का यह परिसर पूरी तरह से आत्मनिर्भर था और यहां की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि सर्दियों में जब लद्दाख का तापमान शून्य से ३० डिग्री सेल्सियस नीचे चला जाता था, तब भी इस परिसर के अंदर बिना किसी हीटर या कोयले को जलाए तापमान लगभग १५ से २० डिग्री सेल्सियस बना रहता था। सोनम ने इसमें मिट्टी की मोटी दीवारों और कांच के ऐसे कॉम्बिनेशन का उपयोग किया था जो दिनभर सूरज की गर्मी को सोखते थे और रात में उसे कमरों के अंदर छोड़ते थे, जिसे पैसिव सोलर आर्किटेक्चर कहा जाता है।
इस परिसर में रहने वाले छात्र खुद अपना अखबार निकालते थे, रेडियो स्टेशन चलाते थे और अपनी छोटी सरकार भी चुनते थे जो पूरे कैंपस की व्यवस्था को संभालती थी। सोनम वांगचुक ने दुनिया को यह दिखा दिया कि अगर बच्चों को उनकी मातृभाषा में और उनके परिवेश के अनुसार व्यावहारिक शिक्षा दी जाए, तो कोई भी बच्चा कभी फेल नहीं हो सकता और हर बच्चा समाज के लिए एक अनमोल संपत्ति बन सकता है।
आइस स्तूप का चमत्कार: पानी का अनोखा बैंक
शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने के बाद सोनम वांगचुक का ध्यान लद्दाख की सबसे गंभीर और विकराल समस्या पर गया, जो थी पानी की भारी किल्लत और जलवायु परिवर्तन का बढ़ता हुआ खतरनाक असर। लद्दाख एक ठंडा रेगिस्तान है जहां सालभर में बहुत ही कम बारिश होती है, और वहां के किसान पूरी तरह से ग्लेशियरों के पिघलने से मिलने वाले पानी पर निर्भर रहते हैं, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये ग्लेशियर बहुत तेजी से पीछे खिसक रहे थे।
किसानों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत अप्रैल और मई के महीनों में आती थी जब उन्हें फसलों की बुवाई के लिए पानी की सख्त जरूरत होती थी, लेकिन उस समय ठंड के कारण पहाड़ों पर ग्लेशियर पिघलते नहीं थे और नदियों में पानी नहीं होता था, जबकि जून-जुलाई में जब पानी की जरूरत कम होती थी तब ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगते थे और पानी बहकर बर्बाद हो जाता था।
इस समस्या का समाधान खोजने के लिए सोनम वांगचुक ने प्रकृति के नियमों का गहराई से अध्ययन किया और साल २०१३ में उन्होंने एक बेहद साधारण लेकिन क्रांतिकारी विचार पर काम करना शुरू किया, जिसे आज पूरी दुनिया ‘आइस स्तूप’ (Ice Stupa) के नाम से जानती है।
सोनम ने देखा कि सर्दियों के महीनों में लद्दाख की नदियां और चश्मे रात में बेकार बहते रहते हैं क्योंकि उस समय कोई खेती नहीं होती, इसलिए उन्होंने इस बहते हुए पानी को पाइपों के जरिए निचले इलाकों में लाने की योजना बनाई। उन्होंने ग्रैविटी यानी गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का उपयोग किया, जिसमें पानी को बिना किसी बिजली या पंप के ऊंचाई से नीचे लाया जाता है और जब यह पानी एक बारीक नोजल के जरिए फव्वारे के रूप में हवा में ऊपर फेंका जाता है, तो शून्य से नीचे के तापमान के कारण यह हवा में ही जम जाता है।
यह जमा हुआ पानी धीरे-धीरे नीचे गिरकर एक विशाल शंकु या पिरामिड का आकार ले लेता था, जो दिखने में बिल्कुल बौद्ध स्तूप जैसा लगता था, इसलिए सोनम ने इसका नाम ‘आइस स्तूप’ रखा। इस शंकु के आकार की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खूबी यह थी कि इसका सतही क्षेत्रफल बहुत कम होता था, जिसके कारण सूरज की सीधी किरणें पड़ने पर भी यह बहुत धीरे-धीरे पिघलता था और लंबे समय तक सुरक्षित रहता था।
पहला सफल आइस स्तूप लगभग ६० फीट ऊंचा था जिसमें लगभग डेढ़ लाख लीटर पानी जमा था और यह अप्रैल के अंत तक धीरे-धीरे पिघलकर स्थानीय किसानों को उनकी फसलों के लिए पानी देता रहा। इस अविश्वसनीय आविष्कार के लिए सोनम वांगचुक को साल २०१६ में प्रतिष्ठित ‘रोलेक्स अवार्ड फॉर एंटरप्राइज’ से नवाजा गया, और उन्होंने पुरस्कार में मिली सारी धनराशि को लद्दाख में और अधिक आइस स्तूप बनाने तथा पर्यावरण अनुसंधान के लिए दान कर दिया।
थ्री इडियट्स के ‘फुंसुख वांगडू’ और वैश्विक पहचान
सोनम वांगचुक के इन असाधारण और जमीनी स्तर के आविष्कारों की गूंज जब बॉलीवुड तक पहुंची, तो मशहूर फिल्म निर्देशक राजकुमार हिरानी और लेखक अभिजात जोशी उनसे बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने साल २००९ की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के मुख्य किरदार ‘फुंसुख वांगडू’ को आंशिक रूप से सोनम के जीवन और विचारों पर आधारित किया।
आमिर खान द्वारा निभाया गया यह किरदार देश के करोड़ों युवाओं के दिलों को छू गया, जिसने यह संदेश दिया कि कामयाबी के पीछे मत भागो बल्कि काबिल बनो, कामयाबी खुद तुम्हारे पीछे झक मारकर आएगी। हालांकि सोनम हमेशा विनम्रता से कहते हैं कि वे पूरी तरह से फुंसुख वांगडू नहीं हैं और फिल्म में कुछ चीजें सिनेमाई मनोरंजन के लिए जोड़ी गई थीं, लेकिन इस फिल्म ने निश्चित रूप से लद्दाख के इस दूरदराज के इंजीनियर की अनूठी सोच और उनके काम को पूरी दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया।
इस वैश्विक पहचान के बाद भी सोनम वांगचुक के पैर हमेशा जमीन पर ही रहे और उन्होंने इस प्रसिद्धि का उपयोग लद्दाख की कला, संस्कृति और वहां की संवेदनशील पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए किया। उन्होंने महसूस किया कि लद्दाख जैसे नाजुक पर्वतीय क्षेत्रों पर अनियंत्रित पर्यटन और शहरीकरण का बहुत बुरा असर पड़ रहा है, जिससे यहां के प्राकृतिक संसाधन तेजी से नष्ट हो रहे हैं।
सोनम ने लगातार दुनिया भर के मंचों पर जाकर यह बात उठाई कि शहरों में रहने वाले लोगों की विलासितापूर्ण जीवनशैली की कीमत लद्दाख और हिमालय के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले सीधे-सादे आदिवासियों को अपने अस्तित्व को दांव पर लगाकर चुकानी पड़ रही है। उन्होंने ‘लाइव सिंपली’ (सरलता से जिएं) का नारा दिया और लोगों से अपील की कि वे शहरों में अपनी जीवनशैली को सुधारें ताकि पहाड़ों पर ग्लेशियर सुरक्षित रह सकें और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बच सके।
सोनम का अगला बड़ा सपना एक ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना करना था जो पूरी दुनिया में वैकल्पिक और व्यावहारिक शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र बन सके, जिसे उन्होंने HIAL (Himalayan Institute of Alternative Ladakh) का नाम दिया। इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य दुनिया भर के पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं जैसे पानी की कमी, जलवायु परिवर्तन और सांस्कृतिक नुकसान का व्यावहारिक समाधान खोजना और ऐसे युवाओं को तैयार करना है जो पर्यावरण के अनुकूल उद्यम शुरू कर सकें।
इसके लिए सोनम ने क्राउडफंडिंग के जरिए पैसे जुटाए और दुनिया भर से विशेषज्ञों को जोड़ना शुरू किया ताकि एक ऐसा अनुसंधान केंद्र बने जो केवल डिग्री न बांटे बल्कि समाज को वास्तविक रूप से बदलने वाले लीडर्स तैयार करे। उनके इस विज़न को देखते हुए साल २०१८ में उन्हें एशिया का नोबेल पुरस्कार माने जाने वाले ‘रेमन मैगसेसे पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया, जिसने उनके प्रयासों पर वैश्विक स्तर पर मुहर लगा दी।
लद्दाख के पर्यावरण और अधिकारों के लिए महासत्याग्रह
सोनम वांगचुक केवल अपनी प्रयोगशाला या स्कूल तक ही सीमित रहने वाले वैज्ञानिक नहीं हैं, बल्कि जब भी लद्दाख की मिट्टी, संस्कृति और वहां के लोगों के अधिकारों पर आंच आई है, वे हमेशा सबसे आगे खड़े नजर आए हैं। साल २०१९ में जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद ३७० हटाया गया और लद्दाख को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तो शुरुआत में वहां के लोगों ने इसका स्वागत किया था क्योंकि उनकी लंबे समय से यह मांग थी।
लेकिन जल्द ही लद्दाख के लोगों को यह अहसास हुआ कि बिना किसी लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और विधानसभा के, लद्दाख के संवेदनशील पर्यावरण और जमीनी अधिकारों को बड़े उद्योगपतियों और अनियंत्रित खनन से भारी खतरा पैदा हो गया है। इसके बाद सोनम वांगचुक ने लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर एक बड़ा जन आंदोलन शुरू कर दिया।
साल २०२३ और २०२४ के कड़ाके की ठंड के महीनों में, जब लेह का तापमान शून्य से २० और ३० डिग्री सेल्सियस नीचे चला जाता था, सोनम वांगचुक ने २१ दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल (क्लाइमेट फास्ट) शुरू की, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा।
वे खुले आसमान के नीचे केवल पानी और नमक के सहारे लेह के बर्फीले मैदान में बैठे रहे ताकि सरकार सोई हुई नींद से जागे और लद्दाख के ग्लेशियरों, वहां की प्राचीन जनजातीय संस्कृति और स्थानीय युवाओं के रोजगार को बचाने के लिए किए गए वादों को पूरा करे।
उनकी इस भूख हड़ताल में लद्दाख के हजारों आम नागरिकों, बौद्ध भिक्षुओं, महिलाओं और बच्चों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और यह आंदोलन लद्दाख के इतिहास का सबसे शांतिपूर्ण और सबसे बड़ा जन आंदोलन बन गया जिसने गांधीजी के सत्याग्रह की यादें ताजा कर दीं।
सोनम वांगचुक का यह संघर्ष केवल लद्दाख के लिए नहीं है, बल्कि वे इसे पूरी पृथ्वी को बचाने की एक बड़ी लड़ाई के रूप में देखते हैं क्योंकि हिमालय को दुनिया का ‘तीसरा ध्रुव’ (Third Pole) कहा जाता है और अगर यहां के ग्लेशियर पिघल गए तो एशिया की अरबों आबादी पानी के लिए तरस जाएगी।
वे लगातार सोशल मीडिया और अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से देश के युवाओं से अपील करते आ रहे हैं कि वे लद्दाख की चीख को सुनें और कार्बन उत्सर्जन को कम करके एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाएं। सोनम वांगचुक की यह कहानी हमें सिखाती है कि एक सच्चा देशभक्त और वैज्ञानिक वही है जो अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर अपनी धरती मां की रक्षा के लिए सबसे कठिन परिस्थितियों में भी डटकर खड़ा रहे।
उनका जीवन आज के आधुनिक युग में सादगी, उच्च विचार, अटूट साहस और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम की एक ऐसी बेमिसाल दास्तान है जो आने वाली कई सदियों तक मानवता को सही रास्ता दिखाती रहेगी।
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सोनम वांगचुक
प्रस्तुति: Saying Central Team