पद्मश्री कल्पना सरोज- की अद्वितीय जीवन यात्रा
दलित समाज की एक अत्यंत निर्धन बस्ती में जन्मी एक नन्ही बच्ची जब दुनिया के सबसे बड़े कॉर्पोरेट साम्राज्यों में से एक की कमान संभालती है, तो वह केवल एक व्यापारिक सफलता नहीं होती, बल्कि सदियों पुरानी सामाजिक रूढ़ियों और आर्थिक बेड़ियों को छिन्न-भिन्न करने वाली एक जीवंत क्रांति बन जाती है।
महाराष्ट्र के अकोला जिले के रोपरखेड़ा गांव में एक पुलिस कांस्टेबल के घर जब कल्पना सरोज का जन्म हुआ, तब किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह बच्ची एक दिन सौ करोड़ से अधिक के औद्योगिक साम्राज्य का नेतृत्व करेगी। उनका प्रारंभिक जीवन उन तमाम सामाजिक विसंगतियों, जातिगत भेदभावों और घोर रूढ़िवादिता के बीच बीता, जो किसी भी सामान्य व्यक्ति के आत्मबल को पूरी तरह से तोड़ देने के लिए पर्याप्त थीं।
सरकारी क्वार्टर के एक छोटे से कमरे में रहकर बड़ी हो रही कल्पना को बचपन से ही इस बात का अहसास करा दिया गया था कि समाज की मुख्यधारा में उनके जैसे लोगों के लिए रास्ते बेहद संकरे और कटीले हैं। स्कूल के दिनों से ही उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा, जहाँ उन्हें अन्य बच्चों से अलग बैठने के लिए मजबूर किया जाता था और उनकी प्रतिभा को हमेशा नजरअंदाज करने का प्रयास किया जाता था, परंतु उनके भीतर स्वाभिमान की एक ऐसी अदृश्य अग्नि प्रज्वलित थी जिसने उन्हें कभी भी परिस्थितियों के सामने झुकने नहीं दिया।
जैसे-जैसे कल्पना बड़ी हो रही थीं, उनके आसपास का सामाजिक ताना-बाना उनकी स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए लगातार जाल बुन रहा था, जिसके परिणामस्वरूप उनके परिवार पर कम उम्र में ही उनकी शादी करने का भारी सामाजिक दबाव बनने लगा। मात्र बारह वर्ष की अबोध आयु में, जब अन्य बच्चे अपनी शिक्षा और खेलकूद में व्यस्त होते हैं, कल्पना का विवाह मुंबई की एक मलिन बस्ती (धारावी) में रहने वाले एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति से कर दिया गया, जहाँ से उनके जीवन का सबसे अंधकारमय अध्याय प्रारंभ हुआ।
मुंबई के उस तंग और अंधेरे कमरे में कल्पना को न केवल शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा, बल्कि उन्हें भरपेट भोजन तक के लिए तरसाया गया, जिसने उनके बाल मन को झकझोर कर रख दिया। ससुराल वालों के अमानवीय व्यवहार, दिन भर के कड़े परिश्रम और लगातार मिलने वाले तानों ने उनके आत्मसम्मान को पूरी तरह कुचलने का प्रयास किया, लेकिन उनके भीतर का जीवंत व्यक्तित्व इस कैद से आजाद होने के लिए लगातार छटपटा रहा था।
जब उनके पिता अपनी बेटी की इस दयनीय और मरणासन्न स्थिति को देखने मुंबई आए, तो उनका कलेजा कांप उठा और उन्होंने सामाजिक लोकलाज की परवाह न करते हुए कल्पना को उस नर्क से वापस अपने गांव ले जाने का एक अत्यंत साहसिक निर्णय लिया।
सामाजिक बहिष्कार और जीवन का निर्णायक मोड़
ससुराल के नर्क से मुक्त होकर जब कल्पना वापस अपने पैतृक गांव रोपरखेड़ा पहुंचीं, तो उन्हें लगा कि अब वे राहत की सांस ले सकेंगी, परंतु ग्रामीण समाज का क्रूर और संकीर्ण चेहरा अभी उनके सामने आना बाकी था। उस दौर में एक परित्यक्ता और तलाकशुदा युवती का अपने मायके में वापस लौटकर रहना समाज को पूरी तरह नागवार गुजरा, जिसके कारण पूरे परिवार को हुक्का-पानी बंद होने और सामाजिक बहिष्कार जैसी भीषण विसंगतियों का सामना करना पड़ा।
राह चलते लोग कल्पना पर फब्तियां कसते, उन्हें अपशकुनी मानते और उनके माता-पिता को इस बात के लिए लगातार कोसते थे कि उन्होंने अपनी बेटी का घर उजाड़कर उसे वापस क्यों बुला लिया। इस मानसिक उत्पीड़न, लगातार मिलने वाले सामाजिक तानों और अपने परिवार की दुर्दशा को देखकर कल्पना के भीतर आत्मग्लानि की भावना इतनी गहरी बैठ गई कि उन्होंने अपने जीवन को ही समाप्त करने का एक आत्मघाती कदम उठा लिया।
मात्र सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने कीटनाशक दवा पीकर अपनी जीवन लीला समाप्त करने का प्रयास किया, जिसके बाद उन्हें अत्यंत गंभीर स्थिति में अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों के अथक प्रयासों से उनकी जान तो बच गई, लेकिन इस घटना ने उनके सोचने का पूरा नजरिया ही बदल दिया।
मौत के मुंह से बाहर आने के बाद जब कल्पना ने अपनी रोती हुई मां और असहाय पिता के चेहरों को देखा, तो उनके भीतर एक अभूतपूर्व आत्म-साक्षात्कार हुआ कि जब वे मरने से नहीं डरीं, तो फिर इस क्रूर समाज और परिस्थितियों से क्यों डरें। उन्होंने दृढ़ संकल्प लिया कि वे अब कभी भी लाचारी के आंसू नहीं बहाएंगी, बल्कि अपने जीवन को एक ऐसी मिसाल बनाएंगी कि पूरी दुनिया उनके कदमों में नतमस्तक हो जाए।
अपने जीवन के इस नए जन्म को उन्होंने एक मिशन के रूप में स्वीकार किया और यह तय किया कि वे अब गांव की संकीर्ण दीवारों के बीच घुट-घुट कर नहीं मरेंगी, बल्कि मुंबई जैसे महानगर में जाकर अपनी किस्मत खुद अपने हाथों से लिखेंगी। सन १९७२ में, मात्र कुछ रुपयों और असीम साहस की पूंजी लेकर वे दोबारा मुंबई की ओर रवाना हुईं, लेकिन इस बार वे एक असहाय पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि अपनी नियति को चुनौती देने वाली एक वीरांगना के रूप में कदम रख रही थीं।
मुंबई की तेज रफ्तार जिंदगी में अपनी जगह बनाना उनके लिए बेहद कठिन था, लेकिन उनके भीतर की आग ने उन्हें हर विपरीत परिस्थिति से लड़ने और जीतने का एक अदम्य साहस प्रदान किया था।
मुंबई का संघर्ष और उद्यमिता का उदय

मुंबई के विशाल जनसमूह के बीच खुद को स्थापित करने के लिए कल्पना ने शुरुआत में एक गारमेंट फैक्ट्री में मात्र दो रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर धागा काटने और सिलाई करने का काम शुरू किया, जहाँ वे दिन-रात कठिन परिश्रम करती थीं। उनकी लगन, काम के प्रति ईमानदारी और तेजी को देखकर फैक्ट्री के मालिक ने जल्द ही उन्हें प्रमोट कर दिया, जिससे उनकी आमदनी में थोड़ी वृद्धि हुई और उन्होंने सिलाई के हुनर को पूरी तरह से सीखकर खुद का कुछ काम शुरू करने की योजना बनाई।
अपने इसी अनुभव के बल पर उन्होंने कुछ समय बाद लोन के लिए आवेदन किया और सरकारी योजनाओं के माध्यम से पचास हजार रुपये का ऋण प्राप्त करके कुछ सिलाई मशीनें खरीदीं और अपना खुद का एक लघु उद्योग स्थापित किया। इस सिलाई केंद्र के माध्यम से उन्होंने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारा, बल्कि अपने जैसी कई अन्य जरूरतमंद और पीड़ित महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक अत्यंत सराहनीय और व्यावहारिक कदम उठाया।
कपड़े के इस व्यवसाय से होने वाली आय को उन्होंने बेहद समझदारी से संचित किया और धीरे-धीरे रियल एस्टेट तथा जमीन की खरीद-बिक्री के क्षेत्र में अपने कदम बढ़ाने शुरू किए, जहाँ उनकी व्यावसायिक सूझबूझ ने सबको चमत्कृत कर दिया।
जमीन के कारोबार में उतरते ही कल्पना को मुंबई के बड़े-बड़े भू-माफियाओं, स्थानीय गुंडों और भ्रष्ट नौकरशाही के गठजोड़ का सामना करना पड़ा, जिन्होंने एक दलित महिला को इस क्षेत्र में आगे बढ़ते देख तरह-तरह की अड़चनें और जानलेवा धमकियां देना शुरू कर दिया।
एक बार तो एक विवादित जमीन के सौदे को लेकर उन पर जानलेवा हमला भी किया गया, लेकिन कल्पना ने बिना डरे और बिना पीछे हटे कानूनी रास्ते और अपनी कूटनीतिक सूझबूझ से उन सभी चुनौतियों का डटकर मुकाबला किया और जीत हासिल की। उन्होंने बेहद कम समय में रियल एस्टेट के बाजार में अपनी एक ऐसी साख स्थापित कर ली कि बड़े-बड़े इन्वेस्टर्स और बिजनेसमैन उनकी निर्णय क्षमता और ईमानदारी के कायल हो गए।
कपड़े के व्यापार से शुरू हुआ उनका यह सफर अब धीरे-धीरे एक विशाल व्यावसायिक विविधीकरण की ओर बढ़ रहा था, जिसने उन्हें आर्थिक रूप से इतना सुदृढ़ बना दिया कि वे किसी भी बड़े उद्योग में निवेश करने की स्थिति में आ गईं। इस सफलता ने उनके भीतर के उस आत्मविश्वास को और अधिक मजबूत किया जो बचपन की प्रताड़नाओं के कारण कहीं दब गया था, और अब वे एक बड़ी औद्योगिक क्रांति के लिए पूरी तरह तैयार थीं।
कमानी ट्यूब्स का अधिग्रहण और औद्योगिक क्रांति
कल्पना सरोज के जीवन का सबसे ऐतिहासिक और टर्निंग पॉइंट तब आया जब उनके सामने ‘कमानी ट्यूब्स’ नामक एक बेहद प्रतिष्ठित लेकिन पूरी तरह से दिवालिया हो चुकी कंपनी को पुनर्जीवित करने की एक अत्यंत जटिल और असंभव सी चुनौती आई। यह कंपनी पिछले सत्रह वर्षों से बंद पड़ी थी, इसके ऊपर करोड़ों रुपये का कर्ज था, यूनियनों के आपसी विवाद चरम पर थे और इसके सैकड़ों मजदूर भुखमरी की कगार पर पहुंचकर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे थे।
जब कंपनी के मजदूर संघ के लोग कल्पना के पास मदद की गुहार लेकर आए, तो उन्होंने इस चुनौती को केवल एक व्यापारिक अवसर के रूप में नहीं, बल्कि उन सैकड़ों गरीब परिवारों के अस्तित्व को बचाने के एक मानवीय दायित्व के रूप में स्वीकार किया।
सन २००० में उन्होंने इस घाटे में चल रही और मुकदमों के जाल में फंसी कंपनी की कमान अपने हाथों में ली, जिसे देखकर पूरे कॉर्पोरेट जगत ने उनका उपहास उड़ाया कि एक अदिक्षत महिला इस विशाल और मृतप्राय औद्योगिक इकाई को कैसे संभाल पाएगी। उन्होंने सबसे पहले कंपनी के ऋणदाताओं, बैंकों और सरकारी विभागों के साथ मैराथन बैठकें कीं, अपनी व्यक्तिगत संपत्ति को दांव पर लगाया और एक ऐसी अचूक रणनीतिक योजना तैयार की जिसने सबको हैरत में डाल दिया।
अपनी बेजोड़ प्रबंधन क्षमता का परिचय देते हुए कल्पना ने कमानी ट्यूब्स के करोड़ों रुपये के कर्ज को बेहद सूझबूझ के साथ सेटल किया, बंद पड़ी मशीनों को दोबारा चालू करवाया और मजदूरों के भीतर एक नया विश्वास फूंक कर उन्हें काम पर वापस बुलाया। उन्होंने कंपनी की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लागू की, फिजूलखर्ची को पूरी तरह से रोका और बाजार की आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन की गुणवत्ता में व्यापक सुधार किए, जिससे कंपनी देखते ही देखते मुनाफे में आ गई।
जो कंपनी कभी पूरी तरह से बंद होने की कगार पर थी, वह कल्पना सरोज के कुशल नेतृत्व में कुछ ही वर्षों के भीतर सौ करोड़ से अधिक के टर्नओवर वाली एक बेहद सफल और अग्रणी औद्योगिक इकाई बनकर उभरी। इस चमत्कारिक औद्योगिक पुनरुद्धार ने भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास में कल्पना सरोज को ‘स्टीली लेडी’ के रूप में स्थापित कर दिया और देश-विदेश के बड़े-बड़े बिजनेस स्कूलों में उनकी इस केस स्टडी को प्रबंधन के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाने लगा।
उन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि आपके पास सही विजन, दृढ़ इच्छाशक्ति और मानवीय संवेदनाएं हों, तो आप राख के ढेर से भी एक भव्य और समृद्ध साम्राज्य का निर्माण कर सकते हैं।
सामाजिक सरोकार, राष्ट्रीय सम्मान और अमर विरासत
कमानी ट्यूब्स की अभूतपूर्व सफलता के बाद कल्पना सरोज ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, उड्डयन और कृषि जैसे कई अन्य क्षेत्रों में भी अपने व्यापार का विस्तार किया, जिससे उनका कुल व्यावसायिक साम्राज्य कई सौ करोड़ के आंकड़े को पार कर गया।
व्यापारिक ऊंचाइयों को छूने के बाद भी वे अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलीं और उन्होंने समाज के वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन और संसाधन समर्पित करने का एक अत्यंत सराहनीय सिलसिला शुरू किया। उन्होंने ‘कल्पना सरोज फाउंडेशन’ की स्थापना की जिसके माध्यम से हजारों गरीब बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति, बेसहारा महिलाओं को रोजगार के साधन और ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
उनके इस अद्वितीय और प्रेरणादायी योगदान को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष २०१३ में उन्हें देश के अत्यंत प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा, जो उनकी इस लंबी और कटीली यात्रा पर राष्ट्र की एक बहुत बड़ी और गौरवपूर्ण मुहर थी। इसके अतिरिक्त उन्हें कई प्रतिष्ठित बैंकों के निदेशक मंडल में शामिल किया गया और वैश्विक स्तर पर उन्हें महिला सशक्तिकरण के सबसे बड़े रोल मॉडल के रूप में सम्मानित किया गया।
आज कल्पना सरोज केवल एक सफल उद्योगपति का नाम नहीं है, बल्कि वह दुनिया की हर उस महिला, हर उस दलित और हर उस शोषित व्यक्ति के लिए एक जीवंत प्रकाश स्तंभ हैं जो अपनी परिस्थितियों से हार मान लेते हैं। उनका पूरा जीवन इस बात का साक्षात प्रमाण है कि इंसान की पहचान उसके जन्म, उसकी जाति या उसकी गरीबी से नहीं, बल्कि उसके कर्मों, उसके हौसलों और उसकी कभी न हार मानने वाली ज़िद्दी प्रवृत्ति से तय होती है।
एक छोटे से गांव की झोपड़ी से शुरू होकर मुंबई के आलीशान कॉर्पोरेट मुख्यालय तक पहुंचने वाली उनकी यह अमर कहानी आने वाली कई पीढ़ियों को यह संदेश देती रहेगी कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि आपके भीतर अपने सपनों को सच करने का अटूट संकल्प है, तो इस ब्रह्मांड की कोई भी ताकत आपको आपकी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।
उनका जीवन आज भी लगातार सक्रिय है और वे हर दिन समाज के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि वास्तविक उद्यमिता वही है जो समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में खुशहाली और स्वाभिमान का सवेरा ला सके।
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पद्मश्री कल्पना सरोज
प्रस्तुति: Saying Central Team