डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम: अखबार बेचने से राष्ट्रपति बनने की महागाथा

10
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम: अखबार बेचने से राष्ट्रपति बनने की महागाथा

भारत के दक्षिणी क्षितिज पर बसे तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम नामक एक छोटे से तटीय शहर में, जहाँ लहरें निरंतर श्रद्धा और शांति के गीत गाती हैं, १५ अक्टूबर १९३१ को एक ऐसे असाधारण व्यक्तित्व का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर पूरे राष्ट्र की नियति और सोच को एक नई दिशा दी।

जैनुलाब्दीन और आशियाम्मा के घर जन्मे इस बालक का पूरा नाम अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम था, जिसे दुनिया ने बाद में बड़े ही आदर और स्नेह के साथ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम से पुकारा।

कलाम साहब का बचपन किसी शाही वैभव या विलासिता के साए में नहीं, बल्कि अत्यंत साधारण, अभावों से भरे और संघर्षपूर्ण परिवेश में बीता, जहाँ उनके पिता एक सीधे-साधे नाविक थे जो स्थानीय स्तर पर तीर्थयात्रियों को नाव से समंदर के पार ले जाने का काम करते थे और माता एक अत्यंत धार्मिक और ममतामयी गृहिणी थीं।

उनका परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं था, और विश्व युद्ध के समय उत्पन्न हुई विषम परिस्थितियों के कारण घर की माली हालत और भी ज्यादा बिगड़ गई थी, जिसने इस नन्हे बालक को बहुत कम उम्र में ही जीवन के कठोर धरातल और जिम्मेदारियों का अहसास करा दिया था।

अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति को थोड़ा सहारा देने और अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के उद्देश्य से बाल्यकाल में ही कलाम साहब ने रामेश्वरम रेलवे स्टेशन पर सुबह-सुबह आने वाली ट्रेन से फेंके जाने वाले अखबारों के बंडलों को इकट्ठा करना और उन्हें पूरे शहर में घर-घर जाकर बेचना शुरू कर दिया था।

यह कोई साधारण नौकरी नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसे महान भविष्य की नींव थी जहाँ एक बालक भोर की पहली किरण के साथ ज्ञान और सूचनाओं के पन्नों को बाँटते हुए खुद को आंतरिक रूप से सुदृढ़ और अनुशासित बना रहा था, जिसने उन्हें समय की कीमत, कड़े परिश्रम का महत्व और जीवन में कभी हार न मानने का सबसे पहला और अमूल्य व्यावहारिक पाठ सिखाया।

रामेश्वरम की तंग गलियों में अखबार बाँटते हुए भी कलाम साहब की आँखों में हमेशा आकाश की असीम गहराइयों को छूने और ऊँचे आसमान में उड़ते पक्षियों की तरह उड़ान भरने के अद्भुत सपने तैरते रहते थे, जो उनके भीतर छिपी अदम्य जिज्ञासा और ज्ञान की तीव्र पिपासा को दर्शाते थे।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम के ही एक प्राथमिक विद्यालय में हुई, जहाँ उनके एक शिक्षक शिवसुब्रमण्य अय्यर ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला और एक दिन कक्षा के सभी बच्चों को समंदर के किनारे ले जाकर पक्षियों के उड़ने की कलावाजी तथा उनके पंखों की गतिशीलता को साक्षात दिखाकर कलाम के मन में विमानन विज्ञान और उड़ान के प्रति एक ऐसा परमानेंट जुनून पैदा कर दिया जिसने उनके भविष्य की दिशा को हमेशा-विमानन के क्षेत्र की ओर मोड़ दिया।

प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए वे रामनाथपुरम के श्वार्ट्ज हाई स्कूल चले गए, जहाँ उन्होंने अपने भीतर के जुझारू छात्र को और निखारा और फिर बाद में तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज से १९५४ में भौतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री पूरी की, हालाँकि भौतिकी की इस पढ़ाई के दौरान उन्हें लगातार यह महसूस होता रहा कि उनका असली झुकाव और दिल तो इंजीनियरिंग और व्यावहारिक विज्ञान की उन बारीकियों में बसा है जो सीधे तौर पर मशीनों और उड़ने वाली तकनीकों से जुड़ी हुई हैं।

अपने इसी सपने को साकार करने की जिद और अटूट हौसले के दम पर उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में दाखिला लिया, जहाँ फीस भरने के लिए उनकी बहन ज़ोहरा को अपने सोने के कंगन और गहने तक गिरवी रखने पड़े थे, और बहन के इस सर्वोच्च त्याग ने कलाम साहब के भीतर जिम्मेदारी और कड़े परिश्रम की भावना को इतना तीव्र कर दिया कि उन्होंने दिन-रात एक करके अपने प्रोजेक्ट्स को समय पर और बेहतरीन तरीके से पूरा किया, जिससे प्रभावित होकर उनके प्रोफेसरों ने भी उनकी अद्भुत प्रतिभा को दिल से सराहा।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की बेहद कठिन और तकनीकी पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद कलाम साहब के सामने करियर के दो मुख्य रास्ते खुलकर सामने आए थे, जिसमें से पहला रास्ता भारतीय वायु सेना में एक फाइटर पायलट बनकर देश के आसमान की रक्षा करने का था और दूसरा रास्ता रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय में एक वैज्ञानिक के रूप में सेवा देने का था।

बचपन से ही आसमान में उड़ने का ख्वाब देखने के कारण वे वायु सेना में शामिल होने के लिए बेहद उत्साहित थे और इसके लिए बकायदा देहरादून में आयोजित परीक्षा और साक्षात्कार में भी शामिल हुए, लेकिन किस्मत को शायद उनके माध्यम से देश के लिए कुछ और ही बड़ा और युगांतरकारी कार्य करवाना मंजूर था, जिसके कारण वे चयन सूची में नौवें स्थान पर रहे जबकि कुल सीटें केवल आठ ही थीं।

इस शुरुआती और बेहद दिल तोड़ने वाली असफलता से कलाम साहब बेहद निराश और हताश हो गए थे, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय इसे ईश्वर का एक अलग संकेत समझा और ऋषिकेश जाकर स्वामी शिवानंद से मुलाकात की, जिन्होंने उन्हें जीवन के इस मोड़ पर निराश न होने और अपने कर्म पथ पर अडिग रहने की आध्यात्मिक प्रेरणा दी,

जिसके बाद कलाम साहब ने वैज्ञानिक के पद को सहर्ष स्वीकार कर लिया और वर्ष १९५८ में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के तकनीकी केंद्र में एक वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की जहाँ उन्होंने शुरू में भारतीय सेना के लिए एक छोटे से होवरक्राफ्ट का डिजाइन तैयार करके अपनी विशिष्ट तकनीकी सोच का लोहा मनवाया।

डीआरडीओ में कुछ साल काम करने के बाद कलाम साहब के जीवन में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब वर्ष १९६९ में उनका स्थानांतरण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में हो गया, जहाँ उन्हें भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान (SLV-III) के निर्माण परियोजना के मुख्य परियोजना निदेशक के रूप में एक बेहद ऐतिहासिक और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।

इसरो में काम करने के दौरान उन्हें भारत के महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई और प्रोफेसर सतीश धवन जैसे विजनरी गुरुओं का मार्गदर्शन और सानिध्य मिला, जिन्होंने कलाम साहब के भीतर छिपी नेतृत्व क्षमता, प्रबंधकीय कौशल और कठिन परिस्थितियों में टीम को एक साथ लेकर चलने के हुनर को पूरी तरह से निखारा और उन्हें देश को अंतरिक्ष के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के मिशन में झोंक दिया।

वर्ष १९७९ में एसएलवी-३ का पहला प्रक्षेपण तकनीकी खराबी के कारण पूरी तरह से असफल रहा और रॉकेट उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने के बजाय सीधे बंगाल की खाड़ी में जा गिरा, जिससे पूरी टीम गहरे सदमे और निराशा में डूब गई थी, लेकिन उस समय इसरो के अध्यक्ष सतीश धवन ने खुद आगे बढ़कर प्रेस कॉन्फ्रेंस का सामना किया और असफलता की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली,

जिससे कलाम साहब ने यह महान सीख सीखी कि एक सच्चा नेता असफलता के समय अपनी टीम के आगे ढाल बनकर खड़ा होता है और सफलता का श्रेय पूरी टीम को देता है; और इसी सीख के दम पर ठीक एक साल बाद १८ जुलाई १९८० को कलाम साहब के नेतृत्व में भारत ने ‘रोहिणी’ उपग्रह को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दुनिया भर में अपनी तकनीकी क्षमता का डंका बजा दिया और भारत इस श्रेणी के चुनिंदा देशों के क्लब में गर्व से शामिल हो गया।

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में मिली इस अभूतपूर्व सफलता और उपग्रह प्रक्षेपण यान तकनीक में हासिल महारत के बाद भारत सरकार ने कलाम साहब की इस अद्वितीय प्रतिभा का उपयोग देश की सैन्य सुरक्षा और रणनीतिक रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए करने का फैसला किया,

जिसके परिणामस्वरूप वर्ष १९८२ में उनकी दोबारा डीआरडीओ में वापसी हुई जहाँ उन्हें ‘एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम’ (IGMDP) का मुख्य सर्वेसर्वा और मुख्य कार्यकारी बनाया गया। कलाम साहब के इस दूरदर्शी और ऊर्जावान नेतृत्व के तहत भारत ने रक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने के संकल्प के साथ एक के बाद एक कई स्वदेशी मिसाइलों के निर्माण की बेहद महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर काम शुरू किया, जिसके तहत अग्नि, पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश और नाग जैसी विश्वस्तरीय मारक क्षमता वाली मिसाइल प्रणालियों का विकास अत्यंत गोपनीय और तीव्र गति से किया गया।

इन सभी मिसाइलों में से ‘पृथ्वी’ और विशेष रूप से लंबी दूरी तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल ‘अग्नि’ के सफल परीक्षणों ने वैश्विक पटल पर सैन्य शक्ति के संतुलन को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया और पश्चिमी देशों के तमाम तकनीकी प्रतिबंधों और दबावों के बावजूद भारत को एक अजेय सैन्य महाशक्ति के रूप में स्थापित कर दिया, जिसने कलाम साहब को पूरे राष्ट्र के जनमानस में ‘मिसाइल मैन’ के एक बेहद आदरणीय और गौरवमयी नाम से हमेशा के लिए सुशोभित कर दिया।

कलाम साहब के वैज्ञानिक जीवन का सबसे बड़ा, ऐतिहासिक और अत्यंत संवेदनशील क्षण वर्ष १९९८ में आया, जब वे प्रधानमंत्री के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार और डीआरडीओ के प्रमुख के रूप में भारत के दूसरे परमाणु परीक्षण मिशन के मुख्य रणनीतिकार और कर्ताधर्ता बने।

राजस्थान के पोखरण के तपते रेगिस्तान में मई १९९८ के भीषण गर्मी के दिनों में अमेरिकी जासूसी उपग्रहों और खुफिया एजेंसियों की चौबीसों घंटे टकटकी लगाए बैठी नजरों से बचते हुए, कलाम साहब और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. आर. चिदंबरम ने सेना की वर्दी में छद्म नाम ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ अपनाकर पूरी वैज्ञानिक टीम के साथ अत्यंत गोपनीयता से इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया।

११ और १३ मई १९९८ को पोखरण में किए गए इन पांच सफल भूमिगत परमाणु विस्फोटों ने पूरी दुनिया को पूरी तरह से चौंका दिया और भारत ने स्वयं को एक आधिकारिक परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र घोषित कर दिया, जिसने वैश्विक महाशक्तियों के अहंकार को तोड़ते हुए देश की संप्रभुता को एक अटूट सुरक्षा कवच प्रदान किया और इस पूरे राष्ट्रीय गौरव के क्षण के पीछे कलाम साहब की दूरदर्शी सोच, अभूतपूर्व नेतृत्व और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा की सबसे बड़ी भूमिका थी।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में राष्ट्र को दी गई इन सर्वोत्कृष्ट और अद्वितीय सेवाओं के सम्मान स्वरूप भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा, जिसमें १९८१ में पद्म भूषण, १९९० में पद्म विभूषण और अंततः १९९७ में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया जाना शामिल था, जो उनके एक साधारण नागरिक से लेकर राष्ट्र के अनमोल रत्न बनने के सफर की प्रामाणिक गवाही देता है।

कलाम साहब के जीवन की कहानी में एक और बेहद अकल्पनीय और स्वर्णिम अध्याय तब जुड़ा जब वर्ष २००२ में देश के तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार ने उन्हें भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद यानी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया, जिसे मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित लगभग सभी राजनीतिक दलों ने सर्वसम्मति से अपना समर्थन दे दिया क्योंकि कलाम साहब की बेदाग छवि, देशभक्ति और योग्यता पर पूरे देश को पूर्ण विश्वास था।

२५ जुलाई २००२ को डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भारत के ११वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और राष्ट्रपति भवन, जो अब तक आम जनता की पहुँच से दूर केवल एक औपचारिक और शाही आलीशान निवास माना जाता था,

उसे कलाम साहब ने अपने सरल स्वभाव, सादगी और खुलेपन से आम लोगों, किसानों, मजदूरों और विशेष रूप से स्कूली बच्चों के लिए पूरी तरह से खोल दिया, जिसके कारण उन्हें भारतीय इतिहास में बेहद सम्मान और प्यार से ‘जनता के राष्ट्रपति’ (People’s President) के नाम से जाना जाने लगा।

राष्ट्रपति के रूप में अपने पांच वर्षों के गौरवशाली कार्यकाल के दौरान कलाम साहब ने कभी भी पद की गरिमा को केवल औपचारिक फाइलों पर दस्तखत करने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने इस पद का उपयोग राष्ट्र के युवाओं को प्रेरित करने, शिक्षा के स्तर को सुधारने और देश के विकास के लिए ‘विजन २०२०’ का एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करने के लिए किया,

जिसके तहत वे भारत को एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी उनकी सादगी का आलम यह था कि वे अपने भोजन का खर्च स्वयं उठाते थे, अपने व्यक्तिगत रिश्तेदारों के प्रवास का खर्च अपनी जेब से भरते थे और जब वे अपना कार्यकाल पूरा करके राष्ट्रपति भवन से विदा हुए, तो उनके पास व्यक्तिगत संपत्ति के नाम पर केवल कुछ जोड़ी कपड़े,

उनकी प्रिय किताबें, एक वीणा और एक पुराना सूटकेस ही था, जो उनकी अत्यंत पावन और निष्काम जीवनशैली को दर्शाता है। राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद भी वे एक पल के लिए भी शांत नहीं बैठे, बल्कि उन्होंने तुरंत देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे आईआईएम शिलांग, आईआईएम अहमदाबाद और आईआईएम इंदौर में एक विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में छात्रों को पढ़ाना और उनके बीच जाकर व्याख्यान देना शुरू कर दिया, क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास था कि देश का भविष्य युवाओं और बच्चों के कमरों में तैयार हो रहा है और उन्हें सही दिशा देना ही उनका परम कर्तव्य है।

कलाम साहब बच्चों और युवाओं से संवाद करने का कोई भी अवसर कभी हाथ से जाने नहीं देते थे और अपने जीवन के आखिरी क्षण तक वे इसी पवित्र कार्य में पूरी तरह से लीन रहे; २७ जुलाई २०१५ को जब वे आईआईएम शिलांग में ‘रहने योग्य पृथ्वी’ विषय पर छात्रों को एक व्याख्यान दे रहे थे, तभी अचानक मंच पर उन्हें दिल का भीषण दौरा पड़ा और वे गिर पड़े, जिसके बाद इस महान आत्मा ने हमेशा के लिए अपनी आँखें मूंद लीं और पूरा राष्ट्र गहरे शोक की लहर में डूब गया।

रामेश्वरम के समंदर के किनारे अखबार बेचने वाले एक अत्यंत साधारण और गरीब लड़के से लेकर देश के सबसे बड़े अंतरिक्ष और रक्षा वैज्ञानिक बनने और फिर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद को सुशोभित करने का उनका यह संपूर्ण जीवन सफर दुनिया भर के करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का एक ऐसा जलता हुआ दीपक है जो सिखाता है कि सपने वो नहीं होते जो हम सोते हुए देखते हैं, बल्कि सपने वो होते हैं जो हमें रात में सोने नहीं देते।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES