मैरी क्यूरी

मैरी क्यूरी: रेडियम की खोज

8
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

मैरी स्कोलोडोव्स्का क्यूरी (मैरी क्यूरी – मैडम क्यूरी) का जन्म पोलैंड के वारसॉ शहर में एक अत्यंत साधारण लेकिन शिक्षित परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर ज्ञान प्राप्त करने की एक तीव्र और कभी न बुझने वाली प्यास थी। उस दौर में पोलैंड में महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा के द्वार पूरी तरह से बंद थे, लेकिन मैरी के हौसले डिगने वाले नहीं थे।

उन्होंने गुप्त रूप से संचालित होने वाली ‘फ्लाइंग यूनिवर्सिटी’ में अपनी प्रारंभिक उच्च शिक्षा प्राप्त की और पाई-पाई जोड़कर पेरिस जाने का सपना देखा। पेरिस की सोरबोन यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद उनका जीवन संघर्षों और अभावों से घिर गया।

एक ठंडे, सीलन भरे छोटे से कमरे में रहकर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की, जहाँ कई बार उनके पास ठीक से खाने के लिए भोजन और खुद को गर्म रखने के लिए कोयला तक नहीं होता था।

इस कठिन समय में भी उनका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ भौतिकी और गणित के गूढ़ सिद्धांतों को समझने में लगा रहा।

उन्होंने अपनी गरीबी को कभी अपनी सफलता के आड़े नहीं आने दिया और अपनी अटूट लगन के बल पर विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया, जो उनके आने वाले महान और ऐतिहासिक भविष्य की एक छोटी सी झलक मात्र थी।

पेरिस में ही मैरी की मुलाकात एक बेहद शांत, गंभीर और प्रतिभाशाली फ्रांसीसी वैज्ञानिक पियरे क्यूरी से हुई, जो प्रयोगशाला में अपनी धुन में मग्न रहते थे।

दोनों के विचार, विज्ञान के प्रति उनका गहरा समर्पण और जीवन को देखने का दृष्टिकोण पूरी तरह से एक समान था, जिसके कारण वे जल्द ही एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए।

पियरे मैरी की तीक्ष्ण बुद्धि और विज्ञान के प्रति उनकी अगाध निष्ठा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मैरी को अपने जीवन और अनुसंधान दोनों में अपना जीवनसाथी बनाने का फैसला कर लिया।

इस तरह विज्ञान के इतिहास की सबसे प्रसिद्ध और आदर्श जोड़ी का जन्म हुआ, जिसने आने वाले समय में पूरी दुनिया को अपनी खोजों से चमत्कृत कर दिया। विवाह के बाद दोनों ने मिलकर एक अत्यंत छोटी, जर्जर और सुविधाओं से विहीन प्रयोगशाला में काम करना शुरू किया, जहाँ न तो कोई आधुनिक उपकरण थे और न ही मौसम की मार से बचने का कोई पुख्ता इंतजाम था।

लेकिन इन दोनों महान आत्माओं के लिए विज्ञान ही उनका ईश्वर था और अनुसंधान ही उनकी एकमात्र साधना थी, जिसके लिए वे हर कष्ट झेलने को तैयार थे।

अदृश्य किरणों का रहस्यमयी पीछा

उसी दौर में वैज्ञानिक हेनरी बेकरल ने यूरेनियम से निकलने वाली कुछ अजीब और रहस्यमयी अदृश्य किरणों की खोज की थी, जिसने वैज्ञानिक जगत में हलचल मचा दी थी।

मैरी क्यूरी ने अपने डॉक्टरेट की उपाधि के शोध के लिए इसी अनसुलझे और नए विषय को चुनने का एक बेहद साहसिक निर्णय लिया, जिसे उस समय कोई नहीं समझ पा रहा था। उन्होंने यूरेनियम की इन अदृश्य और शक्तिशाली किरणों को मापने के लिए पियरे क्यूरी द्वारा विशेष रूप से निर्मित किए गए एक अत्यंत संवेदनशील उपकरण ‘इलेक्ट्रोमीटर’ का उपयोग करना शुरू किया।

प्रयोगों के दौरान मैरी ने पाया कि यूरेनियम के यौगिकों से निकलने वाली यह रहस्यमयी ऊर्जा पूरी तरह से उस तत्व की कुल मात्रा पर निर्भर करती है, न कि उसकी रासायनिक स्थिति या बाहरी तापमान पर। इस क्रांतिकारी निष्कर्ष ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह ऊर्जा परमाणु के भीतर से ही निकल रही है, जो कि उस समय के विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत था।

इस अभूतपूर्व और बिल्कुल नई घटना को परिभाषित करने के लिए मैरी क्यूरी ने इतिहास में पहली बार ‘रेडियोधर्मिता’ (Radioactivity) शब्द का प्रतिपादन किया, जो आगे चलकर आधुनिक विज्ञान का एक नया स्तंभ बना।

मैरी की जिज्ञासा यहीं पर शांत नहीं हुई, बल्कि उनके मन में यह तीव्र शंका पैदा हो गई कि प्रकृति में यूरेनियम के अलावा भी कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं जो इससे कहीं अधिक रेडियोधर्मी हैं।

अपने इसी संदेह की पुष्टि करने के लिए उन्होंने ‘पिचब्लेंड’ (Pitchblende) नामक एक अत्यंत जटिल, काले और भारी खनिज अयस्क का गहनता से परीक्षण करने का मन बनाया, जो मुख्य रूप से यूरेनियम का एक अवशिष्ट रूप माना जाता था।

जब मैरी ने पिचब्लेंड की रेडियोधर्मिता की जांच की, तो उसके परिणाम इतने चौंकाने वाले थे कि उन्हें खुद अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि उसकी रेडियोधर्मिता शुद्ध यूरेनियम की तुलना में कई गुना अधिक थी। इसका सीधा और स्पष्ट मतलब यह था कि इस काले अयस्क के भीतर कोई ऐसा अज्ञात और बेहद शक्तिशाली तत्व छिपा हुआ था, जिसे आज तक दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक खोज नहीं पाया था।

इस महान रहस्य को सुलझाने और उस अदृश्य तत्व को दुनिया के सामने लाने के लिए पियरे क्यूरी ने भी अपने खुद के सारे महत्वपूर्ण शोध कार्यों को हमेशा के लिए रोक दिया और वे पूरी तरह से अपनी पत्नी मैरी के इस कठिन और चुनौतीपूर्ण अभियान में शामिल हो गए।

जर्जर शेड में आधी रात की तपस्या

मैरी क्यूरी
मैरी क्यूरी

अब इस महान वैज्ञानिक जोड़े के सामने सबसे बड़ी और पहाड़ जैसी चुनौती उस अज्ञात, अदृश्य तत्व को पिचब्लेंड के विशाल कचरे से अलग करके पूरी दुनिया के सामने साबित करने की थी।

उनके पास इस भारी और अत्यधिक खर्चीले काम को करने के लिए न तो कोई बड़ी और सुसज्जित प्रयोगशाला थी और न ही किसी प्रकार की कोई सरकारी या निजी वित्तीय सहायता उपलब्ध थी। पेरिस के स्कूल ऑफ फिजिक्स के एक पुराने, जर्जर और परित्यक्त लकड़ी के शेड को ही उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया, जिसकी छत से बारिश में पानी टपकता था और सर्दियों में वह बर्फ की तरह ठंडा हो जाता था।

इस बेहद दयनीय और विषम परिस्थिति वाले शेड में मैरी और पियरे ने लगातार चार वर्षों तक बिना रुके, बिना थके अत्यंत कठिन और थका देने वाला शारीरिक और मानसिक श्रम किया। वे पिचब्लेंड के भारी-भरकम बोरों को खुद अपने हाथों से उठाते थे, उन्हें बड़े-बड़े बर्तनों में उबलते थे, रसायनों के साथ मिलाते थे और घंटों तक एक भारी लोहे की छड़ से हिलाते रहते थे।

उस शेड के भीतर का वातावरण हमेशा हानिकारक, दमघोंटू गैसों और तीखे रसायनों के धुएं से भरा रहता था, जो धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य को अंदर से पूरी तरह से नष्ट कर रहा था।

मैरी क्यूरी दिन के उजाले से लेकर रात के घने अंधेरे तक, बिना अपनी जान की परवाह किए, पूरी निष्ठा के साथ उस उबलते हुए रासायनिक मिश्रण के सामने डटी रहती थीं।

इस अंतहीन और बेहद थका देने वाली प्रक्रिया के दौरान, साल 1898 में उन्होंने सबसे पहले एक नए तत्व की खोज की, जिसका नाम मैरी ने अपने प्यारे देश पोलैंड के सम्मान में ‘पोलोनियम’ रखा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, क्योंकि पिचब्लेंड के भीतर अभी भी एक और इससे भी कहीं अधिक शक्तिशाली और अत्यधिक रेडियोधर्मी तत्व मौजूद था, जो रासायनिक रूप से अलग होने से लगातार बच रहा था।

इस दूसरे अज्ञात तत्व को पूरी तरह से शुद्ध रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने हज़ारों किलोग्राम पिचब्लेंड के कचरे को बार-बार छानने, उबालने और क्रिस्टलीकरण (Crystallization) करने का एक अत्यंत दुरूह और लंबा सिलसिला जारी रखा।

इस अथक और कठोर तपस्या के बाद, आखिरकार साल 1902 की एक बेहद ठंडी रात को, उन्होंने पिचब्लेंड के कई टन कचरे में से मात्र एक ग्राम का दसवां हिस्सा यानी कुछ मिलीग्राम शुद्ध ‘रेडियम क्लोराइड’ निकालने में सफलता प्राप्त की।

जब वे रात के अंधेरे में अपनी उस जर्जर प्रयोगशाला में वापस लौटे, तो उन्होंने देखा कि अंधेरे में छोटी-छोटी कांच की शीशियों में रखा वह पदार्थ एक दिव्य, अलौकिक और हल्की नीली-हरी रोशनी से चमक रहा था, जो उनके जीवन की सबसे खूबसूरत और ऐतिहासिक रात थी।

इतिहास का अनोखा आविष्कार और उसकी पृष्ठभूमि

मैरी और पियरे क्यूरी द्वारा खोजा गया यह नया तत्व ‘रेडियम’ (Radium) पूरी मानव जाति के इतिहास में एक ऐसा क्रांतिकारी और युगांतरकारी आविष्कार साबित हुआ, जिसने विज्ञान की पूरी दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।

रेडियम की यह अद्भुत विशेषता थी कि वह बिना किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत के, अपने आप ही लगातार अत्यधिक मात्रा में प्रकाश और तीव्र ऊष्मा उत्सर्जित करता रहता था, जिसने स्थापित भौतिकी के नियमों को हिला दिया था।

इस महान और अभूतपूर्व खोज के पीछे की पृष्ठभूमि पूरी तरह से मानवीय कल्याण, नि:स्वार्थ सेवा और ब्रह्मांड के गहरे रहस्यों को समझने की एक तीव्र, निश्छल इच्छा से प्रेरित थी। मैरी क्यूरी के इस आविष्कार ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक नए और स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत की, क्योंकि यह पाया गया कि रेडियम की शक्तिशाली किरणें मानव शरीर के भीतर मौजूद जानलेवा कैंसर की कोशिकाओं को नष्ट करने में पूरी तरह सक्षम थीं।

इस पद्धति को आगे चलकर ‘क्यूरी थेरेपी’ और आधुनिक समय में ‘रेडियोथेरेपी’ के नाम से जाना गया, जिसने दुनिया भर के लाखों-करोड़ों कैंसर पीड़ितों को एक नया और स्वस्थ जीवनदान दिया।

इस महान आविष्कार की सबसे अनोखी और प्रेरणादायक बात यह थी कि मैरी और पियरे क्यूरी ने रेडियम को अलग करने की इस बेहद मूल्यवान औद्योगिक प्रक्रिया का पेटेंट कराने से साफ तौर पर इनकार कर दिया।

यदि वे चाहते तो इस अद्भुत प्रक्रिया का पेटेंट कराकर रातों-रात दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों की सूची में शामिल हो सकते थे और एक आलीशान जीवन जी सकते थे। लेकिन उनका स्पष्ट मानना था कि विज्ञान की खोजें पूरी मानवता की साझी संपत्ति हैं और इस पर किसी एक व्यक्ति का व्यावसायिक एकाधिकार या मालिकाना हक कभी नहीं होना चाहिए।

उन्होंने रेडियम बनाने की पूरी विधि को बिना किसी शुल्क के, दुनिया भर के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के लिए पूरी तरह से सार्वजनिक कर दिया, ताकि इसका लाभ हर गरीब और अमीर इंसान को समान रूप से मिल सके।

उनका यह नि:स्वार्थ, महान और त्याग से भरा कदम यह साबित करता है कि वे न केवल एक महान वैज्ञानिक थीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील और उदार मानवतावादी भी थीं।

उनके इस ऐतिहासिक और महान आविष्कार के लिए साल 1903 में मैरी क्यूरी, पियरे क्यूरी और हेनरी बेकरल को संयुक्त रूप से भौतिकी का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया, जिससे मैरी इतिहास की पहली महिला नोबेल पुरस्कार विजेता बनीं।

अमर विरासत और सर्वोच्च बलिदान

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद भी मैरी क्यूरी का जीवन सरल और सादगी से भरा रहा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था, जब साल 1906 में एक सड़क दुर्घटना में उनके पति पियरे क्यूरी का अचानक और असामयिक निधन हो गया।

इस गहरे और असहनीय सदमे ने मैरी को अंदर से पूरी तरह झकझोर कर रख दिया, लेकिन उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी और पियरे के अधूरे वैज्ञानिक कार्यों को पूरा करने का दृढ़ संकल्प लिया। वे सोरबोन यूनिवर्सिटी में पियरे के रिक्त पद पर नियुक्त हुईं और इस तरह वे इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाली इतिहास की पहली महिला प्रोफेसर भी बनीं।

उन्होंने अपने शोध को और अधिक ऊंचाइयों पर पहुँचाया और साल 1911 में उन्हें शुद्ध रेडियम को पूरी तरह से अलग करने और पोलोनियम की खोज के लिए रसायन विज्ञान का दूसरा नोबेल पुरस्कार दिया गया।

इस तरह वे दुनिया के इतिहास में दो अलग-अलग विज्ञान के क्षेत्रों (भौतिकी और रसायन) में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली एकमात्र और अद्वितीय वैज्ञानिक बनीं, जो एक ऐसा रिकॉर्ड है जिसे आज तक कोई नहीं तोड़ पाया है।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, मैरी क्यूरी ने अपनी प्रयोगशाला को छोड़कर सीधे युद्ध के मैदान में घायल सैनिकों की मदद करने का एक अत्यंत साहसिक और मानवतावादी निर्णय लिया।

उन्होंने खुद अपनी गाड़ियों में एक्स-रे मशीनें स्थापित कीं, जिन्हें ‘लिटिल क्यूरीज़’ कहा जाता था, और अपनी बेटी इरेन के साथ अग्रिम मोर्चे पर जाकर हज़ारों घायल सैनिकों के शरीर में धंसी गोलियों और छर्रों का सटीक पता लगाकर डॉक्टरों को तुरंत इलाज करने में मदद की। जीवन भर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के, अत्यधिक रेडियोधर्मी तत्वों और हानिकारक एक्स-रे किरणों के सीधे संपर्क में रहने के कारण उनका शरीर अंदर से धीरे-धीरे पूरी तरह जर्जर हो चुका था।

अंततः, साल 1934 में ‘एप्लास्टिक एनीमिया’ नामक एक अत्यंत दुर्लभ और घातक रक्त की बीमारी के कारण विज्ञान की इस अमर देवी ने दुनिया से हमेशा के लिए विदा ले ली। मैरी क्यूरी की प्रयोगशाला के नोट्स, उनकी डायरियाँ और यहाँ तक कि उनके व्यक्तिगत कपड़े आज भी पेरिस के पुस्तकालय में अत्यधिक रेडियोधर्मी होने के कारण सीसे के विशेष बक्से में सुरक्षित रखे गए हैं।

मैरी क्यूरी का पूरा जीवन, उनकी अद्भुत खोजें, उनका नि:स्वार्थ त्याग और विज्ञान के प्रति उनका यह सर्वोच्च बलिदान आने वाली हर पीढ़ी के लिए हमेशा एक महान और अमर प्रेरणास्रोत बना रहेगा।

अगर आपको ऐसी ही दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ना पसंद है, तो हमारे WhatsApp चैनल से जुड़िए — वहाँ रोज़ नई stories सबसे पहले मिलती हैं
प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES