स्टीव जॉब्स: आईफोन के जनक
साल 2005 की शुरुआत हो चुकी थी और एप्पल कंपनी अपने आईपॉड की अभूतपूर्व सफलता का जश्न मना रही थी। लेकिन इस भारी सफलता के बीच भी एप्पल के दूरदर्शी सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स के मन में एक गहरा डर लगातार पनप रहा था जो उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रहा था।
जॉब्स ने बेहद ध्यान से बाजार का विश्लेषण किया और पाया कि मोबाइल फोन निर्माता कंपनियां अब अपने हैंडसेट में धीरे-धीरे म्यूजिक प्लेयर की सुविधा शामिल करने लगी थीं। उन्हें तुरंत इस बात का आभास हो गया कि यदि किसी एक डिवाइस में बेहतरीन फोन और बेहतरीन म्यूजिक प्लेयर दोनों मिल जाएं, तो लोग आईपॉड खरीदना पूरी तरह बंद कर देंगे।
स्टीव जॉब्स किसी दूसरे के द्वारा एप्पल के बाजार को खत्म करने का इंतजार नहीं कर सकते थे, बल्कि वे खुद अपने ही आईपॉड के बाजार को एक नए आविष्कार से चुनौती देने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए थे। इसी सोच ने तकनीकी इतिहास के सबसे बड़े और सबसे साहसिक प्रोजेक्ट को जन्म दिया जिसने आने वाले समय में पूरी दुनिया के संचार माध्यमों को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।
जॉब्स ने तुरंत अपनी सबसे भरोसेमंद इंजीनियरों और डिजाइनरों की एक गुप्त टीम को इकट्ठा किया और उन्हें एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम करने का आदेश दिया जिसे पूरी तरह गोपनीय रखा जाना था।
इस गुप्त मिशन को कंपनी के भीतर ‘प्रोजेक्ट पर्पल’ का नाम दिया गया था और इसके बारे में एप्पल के चुनिंदा शीर्ष अधिकारियों के अलावा किसी को भी जानने की इजाजत नहीं थी। इस प्रोजेक्ट की गोपनीयता का आलम यह था कि जिस बिल्डिंग में टीम काम कर रही थी, वहां सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम थे और कर्मचारियों को भी आपस में इस पर बात करने की मनाही थी।
स्टीव जॉब्स एक ऐसा फोन बनाना चाहते थे जो सिर्फ एक साधारण कॉलिंग डिवाइस न होकर एक क्रांतिकारी प्रोडक्ट हो जिसमें कंप्यूटर जैसी क्षमताएं मौजूद हों। उन्होंने अपनी टीम के सामने एक बेहद कठिन और असंभव सी लगने वाली चुनौती रखी कि इस फोन में कोई भी फिजिकल कीपैड या प्लास्टिक के बटन नहीं होने चाहिए।
जॉब्स का मानना था कि बटन वाले पारंपरिक फोन स्क्रीन की जगह घेरते हैं और यूजर के अनुभव को पूरी तरह से सीमित कर देते हैं।
स्क्रीन का जादू और मल्टी-टच तकनीक
प्रोजेक्ट पर्पल के शुरुआती दिनों में इंजीनियरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे इनपुट माध्यम को विकसित करने की थी जो बिना किसी कीपैड के काम कर सके। एप्पल की एक अलग टीम पहले से ही एक ऐसी टैबलेट तकनीक पर काम कर रही थी जिसमें बिना किसी स्टाइलस यानी प्लास्टिक पेन के, सीधे उंगलियों से स्क्रीन को नियंत्रित किया जा सकता था।
जब स्टीव जॉब्स ने उस शुरुआती टैबलेट के प्रोटोटाइप पर मल्टी-टच तकनीक का प्रदर्शन देखा, तो उनकी आंखें चमक उठीं और उन्होंने तुरंत एक बड़ा फैसला लिया। जॉब्स ने टैबलेट के प्रोजेक्ट को कुछ समय के लिए रोक दिया और पूरी टीम को उस मल्टी-टच तकनीक को एक छोटे मोबाइल फोन की स्क्रीन पर लागू करने के काम में लगा दिया।
यह एक बेहद जटिल काम था क्योंकि उंगलियों के स्पर्श को बिल्कुल सटीक तरीके से पहचानना और स्क्रीन पर बिना किसी रुकावट के स्क्रॉलिंग को संभव बनाना तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल था। इंजीनियरों ने दिन-रात एक करके इस मल्टी-टच सेंसिंग तकनीक को फोन के अनुकूल बनाया ताकि यूजर का अनुभव जादुई हो सके।
डिजाइन के मामले में भी स्टीव जॉब्स किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में बिल्कुल नहीं थे और वे हर एक छोटी से छोटी डिटेल को खुद परख रहे थे। शुरुआती प्रोटोटाइप में फोन की स्क्रीन को सुरक्षित रखने के लिए मजबूत प्लास्टिक का इस्तेमाल किया गया था, जैसा कि उस दौर के अन्य सभी फोन में होता था।
लेकिन एक दिन जब जॉब्स ने उस प्रोटोटाइप फोन को अपनी जेब में चाबियों के साथ रखा, तो उन्होंने देखा कि प्लास्टिक की स्क्रीन पर बहुत सारे खरोंच के निशान आ गए थे। जॉब्स तुरंत गुस्से में आ गए और उन्होंने कहा कि आईफोन की स्क्रीन शीशे जैसी चमकदार और पूरी तरह से स्क्रैच-प्रतिरोधी होनी चाहिए जिसे जेब में रखने पर कोई नुकसान न हो।
इसके बाद एप्पल ने कॉर्निंग कंपनी के साथ संपर्क किया जो उस समय ‘गोरिल्ला ग्लास’ नाम की एक नई और बेहद मजबूत कांच की तकनीक पर काम कर रही थी। जॉब्स ने कॉर्निंग के सीईओ को मनाकर बेहद कम समय में आईफोन के लिए लाखों की संख्या में इस विशेष ग्लास का उत्पादन करने के लिए राजी कर लिया।
सॉफ्टवेयर की जंग और आंतरिक चुनौतियां
आईफोन के केवल बाहरी हिस्से को खूबसूरत बनाना ही काफी नहीं था, बल्कि उसके भीतर एक ऐसा शक्तिशाली सॉफ्टवेयर डालना था जो कंप्यूटर की तरह काम कर सके। एप्पल के भीतर इस बात को लेकर दो गुटों में भारी बहस छिड़ गई थी कि फोन के ऑपरेटिंग सिस्टम का आधार क्या होना चाहिए और इसे कैसे डिजाइन किया जाए।
एक गुट का मानना था कि आईपॉड के सॉफ्टवेयर को ही थोड़ा और विकसित करके फोन के अनुकूल बना दिया जाना चाहिए क्योंकि वह तकनीक पहले से जादुई और परखी हुई थी। लेकिन सॉफ्टवेयर इंजीनियर स्कॉट फॉर्स्टल के नेतृत्व वाले दूसरे गुट का मानना था कि आईफोन में मैक कंप्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम ‘ओएस एक्स’ का एक छोटा और शक्तिशाली रूप इस्तेमाल होना चाहिए।
स्टीव जॉब्स ने स्कॉट फॉर्स्टल की बात को स्वीकार किया क्योंकि वे आईफोन को सिर्फ एक फोन नहीं बल्कि जेब में समा जाने वाला एक बेहतरीन कंप्यूटर बनाना चाहते थे। इस तरह आईओएस (iOS) की नींव रखी गई जो मोबाइल सॉफ्टवेयर की दुनिया में एक बहुत बड़ी और अभूतपूर्व क्रांति साबित होने वाली थी।
जैसे-जैसे साल 2006 का अंत करीब आ रहा था, वैसे-वैसे प्रोजेक्ट पर्पल की टीम पर मानसिक और शारीरिक दबाव अपने चरम स्तर पर पहुंच चुका था।
इंजीनियर हफ्तों तक अपने घर नहीं जा पा रहे थे और वे एप्पल के दफ्तरों में ही सोकर लगातार चौबीसों घंटे कोडिंग और हार्डवेयर की कमियों को दूर करने में जुटे हुए थे। आईफोन का ऑपरेटिंग सिस्टम बार-बार क्रैश हो रहा था, कॉल्स बीच में ही कट जा रही थीं और बैटरी बैकअप उम्मीद के मुताबिक बिल्कुल नहीं मिल पा रहा था।
स्टीव जॉब्स हर हफ्ते टीम की मीटिंग लेते थे और छोटी सी भी गलती दिखने पर पूरी डिजाइन को फिर से नए सिरे से शुरू करने का आदेश दे देते थे। कई मौकों पर ऐसा लगा कि यह प्रोजेक्ट समय पर कभी पूरा नहीं हो पाएगा और एप्पल को इतिहास की सबसे बड़ी असफलता का सामना करना पड़ेगा।
लेकिन जॉब्स की दृढ़ इच्छाशक्ति और टीम के अटूट समर्पण ने हर तकनीकी बाधा को धीरे-धीरे पार कर लिया और फोन को एक स्थिर रूप देने में सफलता हासिल की।
वह ऐतिहासिक दिन और जादुई प्रस्तुति

आखिरकार वह ऐतिहासिक दिन आ ही गया जिसका पूरी दुनिया की तकनीकी बिरादरी को बेसब्री से इंतजार था और जो इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज होने वाला था। 9 जनवरी, 2007 को सैन फ्रांसिस्को के मॉस्कोन सेंटर में एप्पल का सालाना मैकवर्ल्ड इवेंट आयोजित किया गया था, जहां स्टीव जॉब्स मुख्य भाषण देने वाले थे।
मंच पर जाने से पहले बैकस्टेज का माहौल बेहद तनावपूर्ण था क्योंकि आईफोन का जो प्रोटोटाइप जॉब्स इस्तेमाल करने वाले थे, वह अभी भी पूरी तरह से दोषमुक्त नहीं था। सॉफ्टवेयर में कई ऐसी कमियां थीं कि अगर जॉब्स ने तय किए गए खास क्रम के अलावा कुछ और क्लिक कर दिया, तो पूरा फोन तुरंत क्रैश हो सकता था।
इंजीनियरों ने बैकस्टेज पर प्रार्थनाएं शुरू कर दी थीं और खुद स्टीव जॉब्स भी अपने जीवन के सबसे बड़े और सबसे जोखिम भरे लाइव प्रदर्शन के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर रहे थे। जब स्टीव जॉब्स काली टर्टलनेक टी-शर्ट और नीली जींस पहनकर मंच पर आए, तो पूरा हॉल दर्शकों की गड़गड़ाहट और तालियों से गूंज उठा।
स्टीव जॉब्स ने अपने भाषण की शुरुआत बेहद सधे हुए अंदाज में की और कहा कि आज हम मिलकर कुछ ऐसा करने जा रहे हैं जो इतिहास को हमेशा के लिए बदल देगा।
उन्होंने दर्शकों को सस्पेंस में रखते हुए कहा कि आज एप्पल तीन क्रांतिकारी प्रोडक्ट्स पेश करने जा रहा है: पहला एक टच-कंट्रोल वाला वाइडस्क्रीन आईपॉड, दूसरा एक क्रांतिकारी मोबाइल फोन और तीसरा एक अभूतपूर्व इंटरनेट कम्युनिकेटर डिवाइस।
उन्होंने इसी बात को बार-बार दोहराया जिससे दर्शकों के बीच उत्सुकता और कौतूहल का माहौल अपने चरम पर पहुंच गया कि ये तीन अलग डिवाइस कौन से हैं। फिर जॉब्स ने मुस्कुराते हुए कहा कि ये तीन अलग-अलग डिवाइस नहीं हैं, बल्कि यह एक ही डिवाइस है और हम इसे ‘आईफोन’ कह रहे हैं।
जब स्क्रीन पर आईफोन की पहली झलक दिखाई दी, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति दंग रह गया क्योंकि उस फोन में कोई कीपैड नहीं था, बल्कि सिर्फ एक बड़ी और शानदार ग्लास स्क्रीन थी।
दुनिया का बदलना और एक नए युग की शुरुआत
स्टीव जॉब्स ने मंच पर लाइव प्रदर्शन करते हुए आईफोन की स्क्रीन पर अपनी उंगली से ‘स्वाइप टू अनलॉक’ करके दिखाया, जिसे देखकर दर्शकों ने दांतों तले उंगलियां दबा लीं। उन्होंने एल्बम आर्ट को उंगली से स्क्रॉल करके दिखाया, जिसे ‘कवर फ्लो’ कहा जाता था, और यह दृश्य उस समय किसी जादू से कम नहीं लग रहा था।
जब उन्होंने दो उंगलियों को फैलाकर एक तस्वीर को ज़ूम इन और ज़ूम आउट करके दिखाया, तो पूरा हॉल खड़े होकर तालियां बजाने लगा क्योंकि ऐसी तकनीक दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी थी। जॉब्स ने मंच से ही लाइव कॉल की, इंटरनेट पर वेबसाइटें खोलीं और गूगल मैप्स का इस्तेमाल करके पास की एक कॉफी शॉप से चार हजार लाटे कॉफी का ऑर्डर देने का मजाक भी किया।
यह प्रस्तुति तकनीकी इतिहास की सबसे बेहतरीन और सबसे प्रभावशाली प्रस्तुति मानी जाती है क्योंकि इसमें बिना किसी तकनीकी गड़बड़ी के आईफोन ने अपना पूरा जादू बिखेर दिया था। आईफोन ने स्मार्टफोन की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल दिया और नोकिया, मोटोरोला और ब्लैकबेरी जैसी तत्कालीन दिग्गज कंपनियों के साम्राज्य को हिलाकर रख दिया।
जब जून 2007 में आईफोन आधिकारिक तौर पर बिक्री के लिए स्टोर्स में आया, तो लोगों के बीच इसे खरीदने के लिए अभूतपूर्व दीवानगी देखने को मिली।
एप्पल स्टोर्स के बाहर लोग कई दिनों पहले से टेंट लगाकर लाइनों में खड़े हो गए थे ताकि वे इस ऐतिहासिक डिवाइस को खरीदने वाले पहले व्यक्ति बन सकें। आईफोन ने न केवल एप्पल को दुनिया की सबसे मूल्यवान और अमीर कंपनी बना दिया, बल्कि इसने इंसानी सभ्यता के जीने, काम करने और एक-दूसरे से जुड़ने के तरीके को भी पूरी तरह से बदल दिया।
स्टीव जॉब्स का यह आविष्कार केवल एक गैजेट नहीं था, बल्कि यह उनकी अटूट दूरदर्शिता, जिद और कला को तकनीक के साथ मिलाने के जुनून का साक्षात परिणाम था। स्टीव जॉब्स ने आईफोन के जरिए साबित कर दिया कि जो लोग दुनिया को बदलने का पागलपन रखते हैं, असल में वही दुनिया को बदलने में कामयाब होते हैं।
आईफोन की यह पूरी कहानी आज भी हर नवप्रवर्तक और इंजीनियर को यह सिखाती है कि सीमाओं से परे जाकर सोचना ही असली क्रांति की शुरुआत होती है।
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प्रस्तुति: Saying Central Team