टिम बर्नर्स-ली

टिम बर्नर्स-ली: वर्ल्ड वाइड वेब का आविष्कार

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टिम बर्नर्स-ली: वर्ल्ड वाइड वेब का आविष्कार

यह कहानी उस महान क्रांतिकारी विचार की है जिसने इंसानी सभ्यता के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब दुनिया कंप्यूटरों के शुरुआती दौर से गुजर रही थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन पूरी दुनिया के ज्ञान को एक ही धागे में पिरोया जा सकता है। इस महागाथा के नायक थे टिम बर्नर्स-ली, एक ऐसा शांत स्वभाव का ब्रिटिश वैज्ञानिक जिसने अपनी असीम दूरदर्शिता और निस्वार्थ भावना से वैश्विक कनेक्टिविटी का जाल बुना।

टिम का जन्म लंदन में हुआ था और उनके माता-पिता दोनों ही गणितज्ञ और कंप्यूटर वैज्ञानिक थे, जिन्होंने दुनिया के पहले व्यावसायिक कंप्यूटर ‘फेरांती मार्क 1’ पर काम किया था। बचपन से ही टिम के घर का माहौल तार्किक सोच, गणितीय पहेलियों और तकनीकी चर्चाओं से भरा रहता था, जिसने उनके भीतर चीजों को गहराई से समझने और जोड़ने की ललक पैदा कर दी।

उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से भौतिकी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की, लेकिन उनका झुकाव हमेशा से सूचनाओं के प्रबंधन और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की तरफ रहा।

टिम एक ऐसे दूरदर्शी थे जो केवल वर्तमान की समस्याओं को हल नहीं करना चाहते थे, बल्कि वे भविष्य की उन संभावनाओं को देख रहे थे जहां इंसान और मशीन बिना किसी बाधा के एक-दूसरे से संवाद कर सकें। उनकी यही जिज्ञासा उन्हें यूरोप की सबसे प्रतिष्ठित प्रयोगशाला की ओर ले गई, जहां इतिहास रचा जाना बाकी था।

जिनेवा की प्रयोगशाला और विचार का जन्म

साल 1980 के दशक में टिम बर्नर्स-ली स्विट्जरलैंड के जिनेवा में स्थित ‘सर्न’ (CERN) यानी यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन में एक स्वतंत्र ठेकेदार के रूप में काम करने पहुंचे। सर्न दुनिया भर के हजारों वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और भौतिकविदों का एक बहुत बड़ा केंद्र था, जहां ब्रह्मांड के अनसुलझे रहस्यों पर प्रयोग किए जा रहे थे।

टिम ने वहां नोटिस किया कि सर्न में आने वाले वैज्ञानिकों के सामने एक बहुत ही अजीब और बड़ी समस्या आ रही थी। विभिन्न देशों से आए वैज्ञानिकों के पास अपने-अपने बेहतरीन शोध, डेटा और दस्तावेज होते थे, लेकिन वे सभी अलग-अलग कंप्यूटर सिस्टम और अलग-अलग फॉर्मेट में दर्ज थे।

अगर किसी वैज्ञानिक को दूसरे विभाग के साथी के शोध की आवश्यकता होती थी, तो उसे दूसरे कंप्यूटर पर जाकर लॉगिन करना पड़ता था, या फिर फाइलों को भौतिक रूप से एक जगह से दूसरी जगह ले जाना पड़ता था। सूचनाएं बिखरी हुई थीं, कंप्यूटर आपस में बात नहीं कर पा रहे थे और इस वजह से बहुमूल्य समय और ऊर्जा नष्ट हो रही थी।

टिम को लगने लगा कि ज्ञान का यह बिखराव वैज्ञानिक प्रगति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है, और इसे दूर करने के लिए एक सार्वभौमिक प्रणाली की जरूरत है।

इस गंभीर समस्या को हल करने के लिए टिम ने खाली समय में अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए ‘इन्क्वायर’ (Enquire) नामक एक छोटा सा सॉफ्टवेयर प्रोग्राम विकसित किया।

यह प्रोग्राम इंसानी दिमाग की तरह काम करता था, जो सूचनाओं को एक सीधी रेखा में रखने के बजाय उन्हें आपस में जोड़ने या एसोसिएट करने की सुविधा देता था। जैसे हमारा दिमाग एक विचार से दूसरे विचार पर छलांग लगाता है, ठीक वैसे ही इन्क्वायर सॉफ्टवेयर भी एक दस्तावेज को दूसरे दस्तावेज से जोड़ने की क्षमता रखता था।

हालांकि यह सॉफ्टवेयर केवल टिम के निजी कंप्यूटर तक ही सीमित था और बाहरी दुनिया के लिए उपलब्ध नहीं था, लेकिन इसने उस बड़े विचार की नींव रख दी जिसे आज हम हाइपरटेक्स्ट कहते हैं। टिम समझ गए थे कि अगर इस हाइपरटेक्स्ट की अवधारणा को इंटरनेट नामक नेटवर्क के साथ जोड़ दिया जाए, तो दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति किसी भी अन्य कोने में मौजूद जानकारी को पलक झपकते ही प्राप्त कर सकता है।

सर्न का यह व्यस्त और अंतरराष्ट्रीय माहौल टिम के क्रांतिकारी विचार को विकसित करने के लिए सबसे उपजाऊ जमीन साबित हुआ, जहां एक वैश्विक नेटवर्क का सपना धीरे-धीरे आकार लेने लगा था।

सर्न में चुनौती और पहली ऐतिहासिक प्रस्तावना

मार्च 1989 में टिम बर्नर्स-ली ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाया और सर्न के प्रबंधन के सामने एक आधिकारिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव का शीर्षक था “सूचना प्रबंधन: एक प्रस्ताव” (Information Management: A Proposal), जिसमें उन्होंने एक ऐसी वैश्विक हाइपरटेक्स्ट प्रणाली की रूपरेखा तैयार की थी जो इंटरनेट के माध्यम से काम कर सके। टिम का यह प्रस्ताव पूरी तरह से एक क्रांतिकारी दस्तावेज था, जिसमें उन्होंने विस्तार से समझाया था कि कैसे दुनिया भर के कंप्यूटरों में मौजूद दस्तावेजों को आपस में जोड़ा जा सकता है।

हालांकि, जब यह प्रस्ताव उनके बॉस माइक सेंडल के पास पहुंचा, तो उन्होंने इसे पूरी तरह से खारिज नहीं किया, बल्कि इसके कवर पेज पर एक ऐतिहासिक टिप्पणी लिखी—”अस्पष्ट लेकिन रोमांचक” (Vague but exciting)। उस समय सर्न का मुख्य उद्देश्य उच्च-ऊर्जा भौतिकी के प्रयोग करना था, न कि कंप्यूटर नेटवर्क या सॉफ्टवेयर का विकास करना, इसलिए टिम को इस काम के लिए कोई आधिकारिक बजट या विशेष टीम नहीं दी गई।

इसके बावजूद, टिम निराश नहीं हुए और उन्होंने हार मानने के बजाय अपने इस व्यक्तिगत प्रोजेक्ट पर सर्न के रोजमर्रा के कामों के बाद देर रात तक अकेले ही काम करना जारी रखने का फैसला किया।

साल 1990 के आते-आते टिम को इस काम में एक बेहद योग्य और उत्साही साथी मिला, जिनका नाम था रॉबर्ट कैलियाउ। रॉबर्ट एक बेल्जियन कंप्यूटर वैज्ञानिक थे जो सर्न में ही कार्यरत थे और वे भी सूचनाओं को साझा करने की टिम की इस अनूठी दृष्टि से बेहद प्रभावित हुए।

रॉबर्ट ने टिम के इस विचार को सर्न के भीतर प्रशासनिक और राजनीतिक सहयोग दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई, जिससे टिम को अपने तकनीकी प्रयोगों पर ध्यान केंद्रित करने का पूरा समय मिल सका। दोनों ने मिलकर इस प्रणाली के नामकरण पर विचार करना शुरू किया और कई नामों जैसे ‘एमआईएनएच’ या ‘इन्फॉर्मेशन मेश’ पर चर्चा करने के बाद आखिरकार टिम ने इसे “वर्ल्ड वाइड वेब” (World Wide Web) यानी ‘डब्लूडब्लूडब्लू’ नाम दिया।

यह नाम अपने आप में इस पूरी परियोजना के मूल उद्देश्य को पूरी तरह से बयां करता था—एक ऐसा जाल जो पूरी दुनिया को एक साथ बांधने की क्षमता रखता हो। टिम ने सर्न से एक अत्याधुनिक ‘नेक्स्ट’ (NeXT) कंप्यूटर हासिल किया, जो उस समय के सबसे शक्तिशाली कंप्यूटरों में से एक था, और इसी मशीन को उन्होंने दुनिया का पहला वेब सर्वर और पहला वेब ब्राउज़र बनाने के लिए अपना मुख्य हथियार बनाया।

वेब के तीन स्तंभ और पहला लाइव सर्वर

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अकेले और बिना किसी बड़े वित्तीय सहयोग के काम करते हुए टिम बर्नर्स-ली ने साल 1990 के आखिरी महीनों में वह कर दिखाया जो कंप्यूटर विज्ञान के इतिहास में एक चमत्कार से कम नहीं था।

उन्होंने वर्ल्ड वाइड वेब को सुचारू रूप से चलाने के लिए तीन बुनियादी तकनीकों का आविष्कार किया, जो आज भी आधुनिक इंटरनेट की रीढ़ की हड्डी बनी हुई हैं। इनमें से पहली तकनीक थी ‘एचटीएमएल’ (HTML – HyperText Markup Language), जो वेब पेजों को लिखने और उन्हें फॉर्मेट करने की एक सरल भाषा थी ताकि कोई भी कंप्यूटर उसे आसानी से पढ़ सके।

दूसरी तकनीक थी ‘यूआरआई’ या ‘यूआरएल’ (URL – Uniform Resource Locator), जो इंटरनेट पर मौजूद हर एक दस्तावेज या वेब पेज को एक विशिष्ट और अनूठा पता देती थी ताकि उसे ढूंढना आसान हो। और तीसरी तकनीक थी ‘एचटीटीपी’ (HTTP – HyperText Transfer Protocol), जो यह तय करती थी कि वेब ब्राउज़र और वेब सर्वर आपस में सूचनाओं का आदान-प्रदान किस नियम और सुरक्षा के तहत करेंगे।

इन तीनों तकनीकों के समन्वय से टिम ने एक ऐसी संपूर्ण प्रणाली तैयार कर दी जो दुनिया के किसी भी कंप्यूटर पर मौजूद फाइल को पल भर में किसी भी अन्य स्क्रीन पर प्रदर्शित कर सकती थी।

दिसंबर 1990 तक टिम ने न केवल इन तकनीकों को सैद्धांतिक रूप से तैयार कर लिया था, बल्कि उन्होंने दुनिया का पहला वेब ब्राउज़र और एडिटर प्रोग्राम भी पूरी तरह से लिख लिया था। उन्होंने सर्न के भीतर ही अपने ‘नेक्स्ट’ कंप्यूटर पर दुनिया का पहला वेब सर्वर लाइव किया और उस पर पहली वेबसाइट को होस्ट किया, जिसका पता ‘info.cern.ch’ था।

इस पहली ऐतिहासिक वेबसाइट पर वर्ल्ड वाइड वेब परियोजना के बारे में बुनियादी जानकारियां दी गई थीं, जैसे कि वेब क्या है, यह कैसे काम करता है, और कोई भी व्यक्ति अपने कंप्यूटर पर वेब सर्वर कैसे स्थापित कर सकता है। टिम ने अपने इस पहले सर्वर वाले कंप्यूटर पर एक लाल रंग के पेन से एक स्टीकर चिपका दिया था, जिस पर लिखा था—”यह मशीन एक सर्वर है।

इसे कृपया बंद न करें!” क्योंकि अगर कोई भूलकर भी उस कंप्यूटर को बंद कर देता, तो पूरी दुनिया का इकलौता वेब नेटवर्क उसी समय ठप हो जाता। यह वह ऐतिहासिक क्षण था जब इंसानी इतिहास में पहली बार सूचनाओं का एक ऐसा लोकतंत्रीकरण हुआ था, जिसने आगे चलकर ज्ञान के प्रसार के तरीके को पूरी तरह से बदलकर रख दिया।

एक निस्वार्थ निर्णय और वैश्विक क्रांति का आरंभ

जैसे ही 1991 की शुरुआत हुई, टिम बर्नर्स-ली ने वर्ल्ड वाइड वेब को केवल सर्न की प्रयोगशाला तक सीमित रखने के बजाय इसे पूरी दुनिया के लिए खोलने का एक बहुत बड़ा और साहसिक फैसला किया।

अगस्त 1991 में टिम ने इंटरनेट के ‘alt.hypertext’ नामक एक सार्वजनिक न्यूज़ग्रुप पर अपनी इस परियोजना की घोषणा की और दुनिया भर के प्रोग्रामर्स और डेवलपर्स को इसे मुफ्त में डाउनलोड करने और इस्तेमाल करने के लिए आमंत्रित किया।

सबसे बड़ी बात यह थी कि टिम बर्नर्स-ली और रॉबर्ट कैलियाउ ने सर्न के प्रबंधन को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे वर्ल्ड वाइड वेब की इस पूरी तकनीक को पूरी तरह से पेटेंट-मुक्त और रॉयलटी-मुक्त घोषित कर दें।

टिम अच्छी तरह जानते थे कि अगर वे इस तकनीक का पेटेंट करा लेते, तो वे दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में शामिल हो सकते थे, लेकिन ऐसा करने से वेब व्यावसायिक कंपनियों के नियंत्रण में आ जाता और इसका विकास रुक जाता।

उनका मानना था कि वेब तभी सफल और शक्तिशाली हो सकता है जब यह पूरी मानवता की साझी संपत्ति हो, जिस पर किसी एक व्यक्ति, कंपनी या देश का एकाधिकार न हो, और उनका यह निस्वार्थ निर्णय इतिहास का सबसे महान दान साबित हुआ।

टिम के इस खुले निमंत्रण के बाद दुनिया भर के सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने वेब के कोड को डाउनलोड करना और उसमें सुधार करना शुरू कर दिया, जिससे वेब की लोकप्रियता में जबरदस्त विस्फोट हुआ।

साल 1993 में इलिनोइस विश्वविद्यालय के ‘एनसीएसए’ में मार्क एंड्रीसन और उनकी टीम ने ‘मोज़ेक’ (Mosaic) नामक पहला ग्राफिकल वेब ब्राउज़र विकसित किया, जिसने वेब पेजों में टेक्स्ट के साथ-साथ रंगीन तस्वीरें और ग्राफिक्स दिखाने की सुविधा दी।

मोज़ेक ब्राउज़र ने आम जनता के लिए इंटरनेट का उपयोग इतना सरल और आकर्षक बना दिया कि देखते ही देखते लाखों लोग इस डिजिटल दुनिया से जुड़ने लगे। इसके बाद टिम ने साल 1994 में ‘मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (MIT) में ‘वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम’ (W3C) की स्थापना की, ताकि वेब के मानकों और तकनीकों को हमेशा खुला, सुरक्षित और सभी के लिए सुलभ बनाए रखा जा सके।

आज टिम बर्नर्स-ली को उनकी इस महान खोज के लिए ‘नाइटहुड’ की उपाधि और कंप्यूटर विज्ञान का नोबेल माने जाने वाले ‘ट्यूरिंग अवार्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है, और दुनिया हमेशा उनकी ऋणी रहेगी क्योंकि उन्होंने हमें एक ऐसी खिड़की दी जिससे हम पूरी दुनिया को एक नए नजरिए से देख सकते हैं।

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प्रस्तुति: Saying Central Team

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