विक्रमादित्य और न्याय-सिंहासन
उज्जैन नगरी के राजा विक्रमादित्य का नाम इतिहास के पन्नों में एक ऐसे न्यायप्रिय, साहसी और परोपकारी शासक के रूप में दर्ज है, जिनकी कीर्ति युगों-युगों तक फीकी नहीं पड़ सकती। राजा विक्रमादित्य केवल अपनी प्रजा के रक्षक ही नहीं थे, बल्कि वे ज्ञान, विज्ञान, कला और धर्म के महान संरक्षक भी थे।
उनके शासनकाल में उज्जैन केवल राजनीति का केंद्र नहीं थी, बल्कि वह विद्या और अध्यात्म की भी मुख्य नगरी मानी जाती थी। राजा विक्रमादित्य के दरबार में नौ ऐसे विद्वान थे, जिन्हें ‘नवरत्न’ कहा जाता था, जिनमें कालिदास, वराहमिहिर और धनवंतरी जैसे प्रकांड पंडित शामिल थे। राजा का हर निर्णय प्रजा के हित में होता था और उनके राज्य में कभी कोई दुखी या भूखा नहीं सोता था।
उनका मानना था कि एक राजा का पहला और अंतिम कर्तव्य अपनी प्रजा को निष्पक्ष न्याय प्रदान करना है, चाहे इसके लिए राजा को अपने प्राणों की बाहुति ही क्यों न देनी पड़े। राजा विक्रमादित्य के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता उनका अदभुत न्याय था, जिसके लिए उन्होंने एक विशेष और चमत्कारी सिंहासन का आविष्कार किया था।
इस सिंहासन की कहानी और राजा विक्रमादित्य की पृष्ठभूमि इतनी अलौकिक और विस्मयकारी है कि आज भी लोग इसे सुनकर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। राजा विक्रमादित्य का संपूर्ण जीवन त्याग, तपस्या और जन-कल्याण की एक ऐसी अनूठी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी।
राजा विक्रमादित्य का जन्म एक अत्यंत प्रतापी राजवंश में हुआ था, और बचपन से ही उनमें एक महान शासक के सभी गुण दिखाई देने लगे थे। वे अस्त्र-शस्त्र के संचालन में जितने निपुण थे, उतने ही वे वेदों, शास्त्रों और राजनीति के ज्ञान में भी पारंगत थे।
उनके बड़े भाई भर्तृहरी उज्जैन के राजा थे, लेकिन जब भर्तृहरी ने वैराग्य धारण कर लिया और राजपाठ छोड़कर जंगलों में तपस्या करने चले गए, तब उज्जैन की प्रजा ने व्याकुल होकर विक्रमादित्य को अपना राजा चुना। राजा बनते ही विक्रमादित्य ने प्रतिज्ञा की कि वे अपनी प्रजा को कभी अन्याय का सामना नहीं करने देंगे। उनके राज्य में न्याय की व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते थे।
राजा स्वयं वेश बदलकर रात के अंधेरे में अपनी नगरी का भ्रमण करते थे ताकि वे प्रजा के वास्तविक दुखों और समस्याओं को सीधे जान सकें। वे किसी भी अपराधी को दंड देने से पहले सौ बार सोचते थे कि कहीं किसी निर्दोष को सजा न मिल जाए।
राजा विक्रमादित्य की इसी न्यायप्रियता और निष्पक्षता के कारण देवताओं के राजा इंद्र भी उनका बहुत सम्मान करते थे और कठिन परिस्थितियों में उनसे न्याय की भीख मांगते थे। राजा का पूरा जीवन एक खुली किताब की तरह था, जिसमें केवल धर्म, सत्य और प्रजा की भलाई के अध्याय लिखे हुए थे।
उज्जैन नगरी की समृद्धि और वैभव की चर्चा चारों दिशाओं में फैली हुई थी, और इसका मुख्य कारण राजा विक्रमादित्य की कुशल शासन प्रणाली और उनका अद्वितीय न्याय था। राजा विक्रमादित्य के समय में व्यापार, कृषि और कला अपने चरम पर थीं।
दूर-दराज के देशों से व्यापारी उज्जैन में व्यापार करने आते थे क्योंकि उन्हें पता था कि यहाँ उनके साथ कोई अन्याय या धोखाधड़ी नहीं होगी। राजा ने नगर के कोने-कोने में न्याय चौपालें स्थापित की थीं, जहाँ कोई भी व्यक्ति बिना किसी डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकता था। राजा विक्रमादित्य खुद रोज सुबह दरबार लगाते थे और हर छोटे-बड़े मामले की गहराई से जांच करते थे।
उनके दरबार में धनी और निर्धन के बीच कोई भेद नहीं किया जाता था। राजा का मानना था कि कानून की नजर में सब बराबर हैं, चाहे वह कोई बड़ा सामंत हो या एक साधारण मजदूर। उनकी इस अद्भुत न्याय प्रणाली के कारण राज्य में अपराध की दर लगभग शून्य हो गई थी।
लोग अपने घरों के दरवाजे खुले छोड़कर सो जाते थे क्योंकि उन्हें राजा की सुरक्षा व्यवस्था और न्याय पर पूरा भरोसा था। राजा विक्रमादित्य ने अपने जीवन को पूरी तरह से प्रजा की सेवा में समर्पित कर दिया था, जिससे वे केवल एक राजा नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के लिए साक्षात भगवान का रूप बन गए थे।
दैवीय न्याय की खोज और साधना
एक समय की बात है, राजा विक्रमादित्य के मन में यह विचार आया कि मानवीय बुद्धि कभी-कभी पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं हो पाती, क्योंकि मनुष्य के भीतर मोह, क्रोध और भ्रम की भावनाएं छिपी रहती हैं। वे एक ऐसी न्याय व्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे जो पूरी तरह से परम सत्य पर आधारित हो, जहाँ कोई भी अपराधी अपनी चालाकी से बच न सके और किसी निर्दोष को भूलवश भी सजा न मिले।
इस दैवीय न्याय की खोज में राजा विक्रमादित्य ने कठिन साधना करने का निर्णय लिया। उन्होंने राजपाठ मंत्रियों को सौंपा और स्वयं घने जंगलों की ओर प्रस्थान कर गए। वहां उन्होंने भगवान शिव और माता आदिशक्ति की घोर तपस्या शुरू की। राजा की तपस्या इतनी कठिन थी कि उनके शरीर का मांस सूख गया, लेकिन उनका संकल्प हिमालय की तरह अडिग रहा।
वे दिन-रात केवल एक ही प्रार्थना करते थे कि उन्हें एक ऐसी शक्ति या माध्यम प्राप्त हो, जिससे वे संसार का सबसे शुद्ध और निष्पक्ष न्याय कर सकें। राजा की इस घोर साधना और निस्वार्थ भावना को देखकर देवलोक के देवता भी अचंभित रह गए।
राजा विक्रमादित्य की भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। राजा ने अपने लिए धन, संपत्ति या अमरता नहीं मांगी, बल्कि उन्होंने एक ऐसा साधन मांगा जिससे वे पृथ्वी पर पूर्ण न्याय की स्थापना कर सकें।
भगवान शिव राजा विक्रमादित्य की इस निस्वार्थ और लोक-कल्याणकारी भावना को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा से कहा कि तुम्हारी न्यायप्रियता से केवल मृत्युलोक ही नहीं, बल्कि देवलोक भी गौरवान्वित है।
भगवान शिव ने राजा को आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम्हें एक ऐसा दिव्य सिंहासन प्राप्त होगा, जो साक्षात देवराज इंद्र के सिंहासन के समान चमत्कारी होगा। इस सिंहासन पर बैठकर जब भी तुम कोई निर्णय लोगे, तो तुम्हारी बुद्धि में साक्षात सरस्वती का वास होगा और तुम्हारे मुख से निकला हर शब्द परम सत्य बन जाएगा।
भगवान शिव के अंतर्धान होने के बाद, राजा विक्रमादित्य को वह अलौकिक सिंहासन प्राप्त हुआ, जिसे ‘न्याय-सिंहासन’ कहा गया। यह सिंहासन सामान्य सोने या चांदी का नहीं था, बल्कि यह अत्यंत दुर्लभ और दिव्य मणियों, रत्नों तथा अलौकिक धातुओं से निर्मित था। इस सिंहासन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसके चारों ओर बत्तीस अत्यंत सुंदर पुतलियाँ बनी हुई थीं, जो साक्षात देवियों का रूप थीं और जिनमें प्राणों का स्पंदन महसूस होता था।
ये बत्तीस पुतलियाँ राजा के गुणों की रक्षक थीं और सिंहासन की पवित्रता को बनाए रखती थीं। राजा विक्रमादित्य इस दिव्य सिंहासन को लेकर वापस अपनी नगरी उज्जैन लौटे, जहाँ प्रजा ने अपने प्रिय राजा और उस चमत्कारी सिंहासन का अभूतपूर्व स्वागत किया।
राजा विक्रमादित्य ने उस दिव्य सिंहासन को अपने मुख्य दरबार में स्थापित करवाया और शुभ मुहूर्त में उस पर विराजमान हुए। जैसे ही राजा ने उस सिंहासन पर पैर रखा, उनके पूरे शरीर में एक असीम ऊर्जा का संचार हुआ और उनका मुखमंडल सूर्य के समान देदीप्यमान हो गया।
उस सिंहासन पर बैठते ही राजा के भीतर का सारा व्यक्तिगत राग-द्वेष, मोह और अज्ञान पूरी तरह से नष्ट हो गया। अब वे केवल एक साधारण मनुष्य नहीं रहे, बल्कि वे न्याय के साक्षात प्रतीक बन गए। सिंहासन के प्रभाव से राजा को भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान होने लगा। जब भी कोई जटिल मामला दरबार में आता, तो राजा सिंहासन पर बैठकर अपराधी की आँखों में देखते ही उसके मन के सारे झूठ को पकड़ लेते थे।
कोई भी गवाह राजा के सामने झूठ बोलने का साहस नहीं कर पाता था क्योंकि सिंहासन की दिव्य तरंगें झूठ बोलने वाले व्यक्ति के मन में भय पैदा कर देती थीं। इस प्रकार, राजा विक्रमादित्य ने न्याय-सिंहासन के माध्यम से एक ऐसी अभूतपूर्व न्याय व्यवस्था का आविष्कार किया, जिसकी कल्पना संसार के किसी भी अन्य देश या काल में नहीं की जा सकती थी।
इस सिंहासन पर बैठकर राजा ने हजारों ऐसे फैसले किए, जो इतिहास में न्याय के अमर उदाहरण बन गए और जिनकी गाथाएं आज भी सुनी जाती हैं।
चमत्कारी सिंहासन की अद्भुत विशेषताएं
राजा विक्रमादित्य का यह न्याय-सिंहासन केवल एक बैठने का आसन नहीं था, बल्कि वह विज्ञान, आध्यात्म और दैवीय शक्तियों का एक अनूठा संगम था, जिसका आविष्कार राजा की तपस्या से हुआ था। इस सिंहासन को सहारा देने वाली जो बत्तीस पुतलियाँ थीं, वे केवल मूर्तियाँ नहीं थीं, बल्कि वे जीवित चेतना से युक्त थीं।
प्रत्येक पुतली का अपना एक नाम था और वे सभी राजा विक्रमादित्य के एक-एक विशिष्ट गुण, जैसे कि साहस, धैर्य, दानशीलता, न्यायप्रियता, वैराग्य और बुद्धि का प्रतिनिधित्व करती थीं। इन पुतलियों के पास यह शक्ति थी कि वे किसी भी व्यक्ति के मन की शुद्धता को माप सकती थीं।
यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसके मन में थोड़ा सा भी पाप, लालच या अहंकार हो, उस सिंहासन को छूने का प्रयास करता, तो वे पुतलियाँ तुरंत जीवित हो उठती थीं और उसे पीछे हटने की चेतावनी देती थीं। सिंहासन के चारों ओर से एक अदृश्य, पवित्र प्रकाश पुंज निकलता रहता था, जो पूरे दरबार के वातावरण को सकारात्मक और शांत बनाए रखता था।
इस सिंहासन की उपस्थिति मात्र से ही दरबार में आने वाले क्रोधी और हिंसक अपराधियों का हृदय परिवर्तन हो जाता था और वे रोते हुए अपने अपराध स्वीकार कर लेते थे। यह सिंहासन राजा विक्रमादित्य की न्याय के प्रति अटूट निष्ठा का भौतिक स्वरूप था।
इस अद्भुत सिंहासन की एक और बड़ी विशेषता यह थी कि यह केवल राजा विक्रमादित्य के बैठने पर ही शांत रहता था। जब राजा विक्रमादित्य इस पर विराजमान होते थे, तो बत्तीस की बत्तीस पुतलियाँ मुस्कुराती थीं और राजा के सम्मान में अदृश्य फूलों की वर्षा होती थी।
सिंहासन की दिव्य धातुएं राजा की शारीरिक ऊर्जा के साथ एक ऐसा संतुलन बनाती थीं कि राजा को कभी थकान या मानसिक तनाव का अनुभव नहीं होता था। राजा चाहे कितनी भी देर तक जटिल मामलों की सुनवाई करते रहें, उनकी बुद्धि हमेशा तीक्ष्ण और ठंडी बनी रहती थी। इस सिंहासन के आविष्कार ने उज्जैन को पूरी दुनिया का सबसे सुरक्षित और न्यायप्रिय राज्य बना दिया था।
पड़ोसी राज्यों के राजा भी अपने आंतरिक विवादों और पारिवारिक झगड़ों का निपटारा करवाने के लिए राजा विक्रमादित्य के दरबार में आते थे। वे जानते थे कि विक्रमादित्य का न्याय कभी पक्षपातपूर्ण नहीं हो सकता। राजा विक्रमादित्य ने इस सिंहासन के नियमों को बहुत कड़ा रखा था।
वे बिना स्नान किए, बिना ध्यान लगाए और बिना मन को शुद्ध किए कभी इस सिंहासन के पास नहीं जाते थे। यह सिंहासन राजा के लिए एक मंदिर के समान पवित्र था, जहाँ बैठकर वे साक्षात धर्मराज की भूमिका निभाते थे और पृथ्वी पर स्वर्ग के समान न्याय व्यवस्था का संचालन करते थे।
न्याय-सिंहासन की प्रसिद्धि सुनकर दूर-दराज के विद्वान और दार्शनिक भी उज्जैन आने लगे ताकि वे इस चमत्कारिक आविष्कार को अपनी आँखों से देख सकें और इसके पीछे के आध्यात्मिक विज्ञान को समझ सकें। राजा विक्रमादित्य ने उन सभी विद्वानों का हमेशा स्वागत किया और उन्हें समझाया कि न्याय कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शुद्धता का परिणाम है।
यह सिंहासन केवल उसी व्यक्ति को स्वीकार करता है जिसका हृदय पूरी तरह से निष्पाप हो और जिसके मन में लोक-कल्याण के अतिरिक्त कोई दूसरी इच्छा न हो। सिंहासन की पुतलियाँ समय-समय पर राजा से संवाद भी करती थीं और उन्हें ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों तथा नीतिशास्त्र के कठिन सिद्धांतों से अवगत कराती रहती थीं।
इस प्रकार, राजा विक्रमादित्य और उनके न्याय-सिंहासन की जोड़ी ने पृथ्वी पर एक स्वर्ण युग की शुरुआत की। राज्य का प्रत्येक नागरिक अपने राजा पर अटूट विश्वास करता था और राजा भी अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान मानते थे। इस सिंहासन की छत्रछाया में उज्जैन नगरी ने कई दशकों तक सुख, शांति और समृद्धि का आनंद लिया, और राजा विक्रमादित्य का नाम न्याय के इतिहास में हमेशा-अमर हो गया।
बेताल की चुनौतियाँ और न्याय की परीक्षा

राजा विक्रमादित्य के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रोमांचक हिस्सा बेताल के साथ उनका सामना था, जिसने राजा की न्यायप्रियता, बुद्धि और धैर्य की सबसे कठिन परीक्षा ली। एक तांत्रिक के कहने पर राजा विक्रमादित्य हर रात श्मशान भूमि में जाते थे और एक पेड़ से लटके हुए बेताल नाम के एक शव को अपने कंधे पर उठाकर ले जाने का प्रयास करते थे।
बेताल एक मायावी और अत्यंत बुद्धिमान प्रेत था, जो राजा को रास्ते में रोकने के लिए हर बार एक नई और अत्यंत जटिल कहानी सुनाता था। बेताल की शर्त यह थी कि कहानी समाप्त होने पर यदि राजा को उस कहानी का सही न्याय पता हो और राजा ने अपना मुँह न खोला, तो उसका सिर फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा, और यदि राजा ने मुँह खोला, तो बेताल उड़कर वापस पेड़ पर जा लटकेगा।
बेताल द्वारा सुनाई जाने वाली प्रत्येक कहानी मानवीय संबंधों, नैतिकता, धर्म और न्याय के गहरे संकटों पर आधारित होती थी, जिनका उत्तर देना किसी भी सामान्य मनुष्य के लिए असंभव था। लेकिन राजा विक्रमादित्य, जो न्याय-सिंहासन के आविष्कारक थे और जिनका जीवन ही न्याय के लिए समर्पित था, हर बार अपनी कुशाग्र बुद्धि से उस कहानी का सबसे सटीक और न्यायसंगत उत्तर दे देते थे।
बेताल की कहानियों में ऐसे-ऐसे उलझे हुए प्रसंग होते थे, जहाँ धर्म और अधर्म की सीमाएं आपस में मिल जाती थीं। जैसे, एक कहानी में उसने पूछा कि यदि कोई स्त्री अपने पति, पिता और भाई तीनों को संकट में देखे और उसे किसी एक के प्राण बचाने का अवसर मिले, तो न्याय के अनुसार उसे किसे चुनना चाहिए? राजा विक्रमादित्य ने बिना किसी हिचकिचाहट के शास्त्रों और मानवीय मूल्यों के आधार पर इसका ऐसा सटीक उत्तर दिया कि बेताल भी चकित रह गया।
राजा का उत्तर हमेशा निष्पक्ष होता था, जिसमें किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं होता था। जैसे ही राजा उत्तर देते, बेताल अपनी शर्त के अनुसार हंसता हुआ उनके कंधे से उड़ जाता और वापस पेड़ पर लटक जाता। राजा विक्रमादित्य बिना थके, बिना क्रोधित हुए, पूरी रात बार-बार उस पेड़ के पास जाते और बेताल को फिर से अपने कंधे पर उठाते।
यह सिलसिला पच्चीस बार चला, और हर बार राजा ने अपने अपूर्व धैर्य और न्यायबोध का परिचय दिया। बेताल के साथ यह संघर्ष वास्तव में राजा विक्रमादित्य के न्याय-सिंहासन की पृष्ठभूमि को और अधिक सुदृढ़ बनाता है, क्योंकि इससे यह सिद्ध होता है कि राजा का न्याय केवल सिंहासन पर बैठने से नहीं, बल्कि उनके अपने आंतरिक ज्ञान और विवेक से उपजा था।
पच्चीसवीं बार, बेताल ने राजा को एक ऐसी कहानी सुनाई जिसका कोई सीधा उत्तर नहीं था, क्योंकि वह कहानी पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों के एक अत्यंत जटिल ताने-बाने पर आधारित थी। राजा विक्रमादित्य ने उस कहानी को ध्यान से सुना, लेकिन जब उन्हें लगा कि इस स्थिति में कोई भी निर्णय पूरी तरह से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता, तो वे मौन रह गए।
राजा के इस मौन को देखकर बेताल अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने कहा कि हे राजन, तुम वास्तव में पृथ्वी के सबसे महान और न्यायप्रिय पुरुष हो। तुमने अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए कोई गलत उत्तर नहीं दिया, बल्कि सत्य की मर्यादा रखने के लिए मौन रहना स्वीकार किया। बेताल ने राजा विक्रमादित्य की इस महानता को स्वीकार करते हुए उन्हें उस दुष्ट तांत्रिक की साजिश के बारे में सचेत किया, जो राजा की बलि देकर सिद्धियां प्राप्त करना चाहता था।
बेताल की मदद से राजा ने उस तांत्रिक का वध किया और संसार को एक बड़े संकट से बचाया। बेताल के साथ हुए इस संवाद और परीक्षा ने राजा विक्रमादित्य के न्याय की कीर्ति को तीनों लोकों में फैला दिया, और यह सिद्ध कर दिया कि राजा विक्रमादित्य का न्याय-सिंहासन पर बैठना पूरी तरह से उचित और दैवीय विधान के अनुकूल था।
राजा का अंत और सिंहासन का अंतर्धान
समय का चक्र निरंतर चलता रहता है, और जो इस पृथ्वी पर आया है, उसे एक न एक दिन जाना ही पड़ता है। राजा विक्रमादित्य ने कई सौ वर्षों तक उज्जैन पर अत्यंत सफलतापूर्वक शासन किया और अपनी प्रजा को सुख-समृद्धि के उच्चतम शिखर पर पहुँचाया।
जब राजा विक्रमादित्य का अंतिम समय निकट आया, तो उन्होंने महसूस किया कि अब उनका इस सांसारिक शरीर को छोड़ने का समय हो गया है। उन्होंने अपने उत्तराधिकारियों को बुलाया और उन्हें सीख दी कि हमेशा धर्म के मार्ग पर चलना और कभी किसी के साथ अन्याय मत करना। राजा विक्रमादित्य के महाप्रयाण के बाद पूरी उज्जैन नगरी शोक के गहरे सागर में डूब गई।
प्रजा को ऐसा लगा जैसे उनके सिर से पिता का साया उठ गया हो। राजा के जाने के बाद, उस चमत्कारी न्याय-सिंहासन को छूने का साहस किसी भी साधारण मनुष्य या नए राजा में नहीं था। बत्तीस पुतलियों ने घोषणा की कि राजा विक्रमादित्य जैसा निष्पाप, त्यागी और न्यायप्रिय राजा इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं हुआ है, इसलिए अब यह सिंहासन किसी अन्य व्यक्ति की सेवा नहीं करेगा।
पुतलियों ने अपनी माया से उस सिंहासन को जमीन के भीतर गहरे छुपा दिया, ताकि कोई भी अयोग्य व्यक्ति इसका दुरुपयोग न कर सके और इसकी पवित्रता बची रहे।
शताब्दियों बीत गईं, उज्जैन नगरी खंडहरों में बदल गई और राजा विक्रमादित्य का वह महल जहाँ कभी न्याय की गंगा बहती थी, मिट्टी के एक बहुत बड़े टीले के रूप में तब्दील हो गया। लोग भूल गए कि यहाँ कभी एक महान राजा का शासन था और यहाँ एक चमत्कारी सिंहासन दबा हुआ है।
उस टीले पर हरी-भरी घास उग आई थी और आस-पास के गाँवों के चरवाहे अपने पशुओं को चराने के लिए वहाँ आने लगे थे। एक दिन एक अत्यंत विचित्र घटना घटी, जिसने राजा विक्रमादित्य के न्याय-सिंहासन की याद को फिर से ताजा कर दिया। उस गाँव का एक साधारण सा चरवाहा लड़का, जो बहुत सीधा-साधा था, उस टीले के एक ऊँचे हिस्से पर बैठ गया, जो एक छोटे से आसन जैसा दिखता था।
जैसे ही वह लड़का उस टीले के शीर्ष पर बैठा, उसके हाव-भाव और उसकी आवाज़ में एक अद्भुत बदलाव आ गया। वह किसी अनुभवी राजा की तरह गंभीर हो गया। उसी समय दो किसान आपस में लड़ते हुए वहाँ पहुँचे, जिनका जमीन को लेकर पुराना विवाद था।
टीले पर बैठे उस छोटे लड़के ने दोनों पक्षों की बातों को इतने ध्यान से सुना और ऐसा बुद्धिमानी भरा फैसला सुनाया कि दोनों किसान दंग रह गए। वे खुशी-खुशी उस फैसले को मानकर चले गए, क्योंकि उन्हें लगा कि उस लड़के के मुख से साक्षात ईश्वर बोल रहे थे।
यह बात धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल गई कि जब भी कोई लड़का उस विशेष टीले पर बैठता है, तो वह सबसे जटिल विवादों का भी चुटकियों में निपटारा कर देता है। राजा धारा, जो उस समय उस क्षेत्र के राजा थे, जब उन्होंने इस चमत्कार के बारे में सुना, तो वे बहुत उत्सुक हुए।
राजा धारा एक बुद्धिमान राजा थे, और उन्होंने तुरंत भांप लिया कि इस मिट्टी के टीले के नीचे अवश्य ही राजा विक्रमादित्य का वह प्रसिद्ध न्याय-सिंहासन दबा हुआ है, जिसके बारे में उन्होंने पुरानी कहानियों में सुना था। राजा धारा ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि उस टीले की खुदाई की जाए।
गहरी खुदाई के बाद, सैनिकों को सचमुच मिट्टी के नीचे दबा हुआ वह अलौकिक सिंहासन मिल गया, जिसे देखकर सबकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह सिंहासन आज भी उतना ही चमकदार और भव्य था, जितना राजा विक्रमादित्य के समय में था।
बत्तीस सुंदर पुतलियाँ अभी भी उस सिंहासन को संभाले हुए थीं। राजा धारा ने बड़े सम्मान के साथ उस सिंहासन को अपने महल में लाने का आदेश दिया, क्योंकि वे भी उस सिंहासन पर बैठकर दुनिया के सबसे महान न्यायप्रिय राजा बनने की इच्छा रखते थे।
सिंहासन की पुतलियों का दिव्य उपदेश
राजा धारा ने अपने महल में एक बहुत बड़ा उत्सव आयोजित किया और शुभ दिन तय किया ताकि वे उस न्याय-सिंहासन पर बैठकर शासन कर सकें। जैसे ही राजा धारा पूरे ठाट-बाठ के साथ सिंहासन की ओर बढ़े और उस पर बैठने के लिए अपना पैर आगे बढ़ाया, अचानक एक ज़ोरदार गड़गड़ाहट हुई।
सिंहासन की पहली पुतली, जिसका नाम अनंगमंजरी था, जीवित हो उठी। वह खिलखिलाकर हंसी और उसने राजा धारा को रोकते हुए कहा, “ठहरो, राजन! क्या तुममें इस सिंहासन पर बैठने की योग्यता है? क्या तुम्हारा हृदय राजा विक्रमादित्य की तरह पूरी तरह से निष्पाप है? क्या तुमने कभी किसी दूसरे के राज्य को हड़पने की इच्छा नहीं की? क्या तुम्हारे मन में कभी लालच या घमंड नहीं आया? यदि ऐसा है, तभी तुम इस सिंहासन पर पैर रखने का साहस कर सकते हो।”
राजा धारा पुतली की बात सुनकर स्तब्ध रह गए। वे अपनी कमियों को जानते थे, इसलिए उन्होंने अपना पैर पीछे खींच लिया। पुतली ने राजा धारा को राजा विक्रमादित्य के त्याग और दानशीलता की एक बहुत ही सुंदर कहानी सुनाई और अंत में कहा कि पहले अपने मन को शुद्ध करो, फिर यहाँ आना। इसके बाद वह पुतली आकाश में उड़ गई।
राजा धारा ने खुद को योग्य बनाने के लिए तीन दिनों का उपवास और पूजा-पाठ किया। चौथे दिन जब वे दोबारा सिंहासन पर बैठने आए, तो दूसरी पुतली जीवित हो गई, जिसका नाम चंद्रकला था। उसने राजा धारा से पूछा, “हे राजन! क्या तुममें राजा विक्रमादित्य जैसा धैर्य और न्यायबोध है? क्या तुम किसी गरीब की पुकार सुनकर अपना सर्वस्व दान कर सकते हो?” राजा धारा के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।
चंद्रकला ने भी राजा विक्रमादित्य के जीवन की एक अदभुत न्याय की कहानी सुनाई और वह भी उड़ गई। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। हर बार जब भी राजा धारा सिंहासन पर बैठने का प्रयास करते, एक नई पुतली जीवित होती, राजा धारा की पात्रता पर प्रश्न उठाती, उन्हें राजा विक्रमादित्य के महान चरित्र, उनके अद्भुत आविष्कारों और उनकी प्रजा-पालक कहानियों से अवगत कराती और फिर आकाश में विलीन हो जाती।
राजा धारा को धीरे-धीरे यह अहसास होने लगा कि राजा विक्रमादित्य का स्तर कितना ऊँचा था और एक सच्चा न्यायप्रिय राजा बनने के लिए व्यक्ति को अपने अहंकार और इच्छाओं की कितनी बड़ी आहुति देनी पड़ती है। राजा धारा का मन पुतलियों के उपदेशों को सुनकर पूरी तरह से बदल गया और उनके भीतर का राजसी घमंड पूरी तरह से चूर-चूर हो गया।
इस प्रकार, एक-एक करके इकतीस पुतलियाँ राजा विक्रमादित्य की कहानियाँ सुनाकर आकाश में उड़ गईं। अब केवल बत्तीसवीं पुतली, जिसका नाम रूपमंजरी था, सिंहासन के साथ बची थी। राजा धारा ने आखिरी बार प्रयास किया और बहुत ही विनम्रता के साथ सिंहासन के पास पहुँचे। उन्होंने रूपमंजरी से कहा, “हे देवी! मैंने इन बत्तीस दिनों में अपनी सभी कमियों को पहचान लिया है। मेरे मन का सारा अहंकार नष्ट हो चुका है।
अब मैं इस सिंहासन पर बैठने की इच्छा से नहीं, बल्कि केवल इसके दर्शन करने और राजा विक्रमादित्य के चरणों की धूल को नमन करने आया हूँ।” रूपमंजरी राजा धारा के इस हृदय परिवर्तन और विनम्रता को देखकर बहुत प्रसन्न हुई। उसने कहा, “हे राजा धारा! तुम्हारी यह विनम्रता ही तुम्हारी सबसे बड़ी जीत है।
राजा विक्रमादित्य ने जिस न्याय-सिंहासन का आविष्कार किया था, वह कोई भौतिक वस्तु नहीं है जिसे बल या सत्ता से हासिल किया जा सके। वह तो न्याय, सत्य और करुणा का एक विचार है, जो हर उस राजा के दिल में होना चाहिए जो अपनी प्रजा की सेवा करता है।” यह कहते ही बत्तीसवीं पुतली उस अंतिम सिंहासन को अपने साथ लेकर स्वर्ग लोक की ओर उड़ गई, और वह दिव्य सिंहासन हमेशा के लिए मानव आँखों से ओझल हो गया।
राजा धारा ने उस स्थान पर राजा विक्रमादित्य की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की और उनके दिखाए गए न्याय के मार्ग पर चलकर एक आदर्श शासन की स्थापना की। राजा विक्रमादित्य और उनके न्याय-सिंहासन का यह आविष्कार आज भी हमें यह सिखाता है कि न्याय ही संसार का सबसे बड़ा धर्म है और सत्य की हमेशा विजय होती है।
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प्रस्तुति: Saying Central Team