शून्य डिग्री का चक्रव्यूह भाग 1
रात के ठीक ढाई बजे थे जब समर की कार का टायर पिथौरागढ़ के सुनसान पहाड़ी रास्ते पर अचानक फट गया। वह दिल्ली की भागदौड़ से दूर, उत्तराखंड के सुदूर इलाकों में अपनी कंपनी के एक नए बड़े प्रोजेक्ट के लिए जमीन का मुआयना करके लौट रहा था। आसमान में काले घने बादलों ने पूरे चांद को अपनी आगोश में ले लिया था और ठंडी हवाएं हड्डियों को कंपा देने वाली रफ्तार से चल रही थीं।
समर ने गाड़ी से उतरकर जैकेट की ज़िप को ऊपर खींचा और डिक्की से स्टेपनी निकालने के लिए आगे बढ़ा। तभी अचानक ज़मीन के नीचे से एक अजीब सी गड़गड़ाहट सुनाई दी, जैसे कोई सोता हुआ दानव जाग गया हो। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, पहाड़ी का एक बड़ा हिस्सा भरभराकर नीचे गिरने लगा और समर की कार के साथ-साथ वह खुद भी गहरी खाई की तरफ फिसलता चला गया।
जब समर की आंखें खुलीं, तो चारों तरफ सिर्फ घाव कर देने वाला सन्नाटा और हाड़ कंपाने वाला अंधेरा था। उसका दाहिना पैर कार के मुड़े हुए डैशबोर्ड और सीट के बीच बुरी तरह फंसा हुआ था और सिर से बहता हुआ खून अब जम चुका था। उसने जेब से अपना फोन निकालने की कोशिश की, लेकिन स्क्रीन चकनाचूर हो चुकी थी और नेटवर्क का एक भी सिगनल वहां मौजूद नहीं था।
गाड़ी पूरी तरह से पलट चुकी थी और एक संकरी, अनजान चट्टानी गुफा के मुहाने पर अटकी हुई थी, जिसके नीचे हजारों फीट गहरी और डरावनी खाई थी। चारों तरफ बर्फ की ठंडी चादर फैलने लगी थी और तापमान लगातार गिरकर शून्य से कई डिग्री नीचे जा रहा था। समर को समझ आ गया था कि वह एक ऐसी जगह फंस चुका है, जहां इंसानों की आमद महीनों तक नहीं होती।
भूख और प्यास से तड़पते हुए समर को वहां फंसे पूरे चौबीस घंटे बीत चुके थे, और उसकी मानसिक हालत अब बिगड़ने लगी थी। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर पैर को बाहर निकालने की कोशिश की, जिससे उसकी चमड़ी छिल गई और असहनीय दर्द की एक लहर उसके पूरे बदन में दौड़ गई।
दर्द की उस चीख को सुनने वाला वहां कोई नहीं था, सिवाय उस ठंडी हवा के जो कार के टूटे हुए शीशों से टकराकर साय-साय कर रही थी। गाड़ी के ग्लोव बॉक्स में उसे सिर्फ एक आधा लीटर पानी की बोतल और दो चॉकलेट बार मिले, जो इस जानलेवा माहौल में उसकी जिंदगी की आखिरी उम्मीद थे। उसने पानी की एक छोटी सी घूंट ली और अपनी आंखें बंद करके अपने परिवार के बारे में सोचने लगा, जिससे उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
जैसे-जैसे दूसरी रात ढलने लगी, गुफा के बाहर का मौसम और अधिक हिंसक हो गया, और एक भयंकर बर्फीला तूफान शुरू हो गया। समर की कार अब हवा के हर झोंके के साथ हिल रही थी, जिससे उसे लग रहा था कि वह किसी भी पल नीचे खाई में समा जाएगा। ठंड इतनी बढ़ चुकी थी कि उसके हाथ-पैर सुन्न हो गए थे और हाइपोथर्मिया के कारण उसे अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देने लगी थीं।
उसे लगा जैसे कोई उसका नाम पुकार रहा हो, लेकिन जब उसने आंखें खोलीं तो वहां सिर्फ खौफनाक सन्नाटा था। अपनी मानसिक स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए वह खुद से जोर-जोर्स से बातें करने लगा, अपनी गलतियों को याद करने लगा और जिंदगी की कीमत को समझने लगा।
तीसरे दिन की सुबह समर के लिए एक नया और भयानक इम्तिहान लेकर आई, जब उसने कार के ठीक बाहर एक जंगली भेड़िये की परछाईं देखी। वह जानवर भूखा था और कांच के टूटे हुए रास्ते से समर को अपनी चमकीली, हिंसक आंखों से लगातार घूर रहा था।
समर के पास खुद को बचाने के लिए कोई हथियार नहीं था, सिर्फ एक टूटा हुआ लोहे का पाना था जिसे उसने कसकर अपने हाथ में पकड़ लिया। भेड़िये ने कार के भीतर घुसने की कोशिश की, जिससे गाड़ी का संतुलन बिगड़ गया और वह खाई की तरफ थोड़ी और खिसक गई। समर ने अपने डर को गुस्से में बदला और पूरी ताकत से पाना भेड़िये के मुंह पर दे मारा, जिससे वह कराहते हुए पीछे हट गया।
शून्य डिग्री का चक्रव्यूह भाग 2

भेड़िये के हमले के बाद समर को एहसास हुआ कि अगर वह इस कार में ही फंसा रहा, तो या तो ठंड से मर जाएगा या कोई जानवर उसे खा जाएगा। उसने एक बेहद दर्दनाक और आत्मघाती फैसला लिया—अपने फंसे हुए पैर को जबरन खींचकर बाहर निकालने का, चाहे उसकी हड्डियां ही क्यों न टूट जाएं। उसने अपनी जैकेट का एक हिस्सा मुंह में दबाया और पूरी ताकत से अपने बदन को पीछे की तरफ झटका दिया, जिससे उसका टखना बुरी तरह टूट गया।
उस असहनीय, तीखे दर्द से समर कुछ पलों के लिए बेहोश हो गया, लेकिन जब होश आया तो उसका पैर आजाद हो चुका था। वह रेंगते हुए कार से बाहर निकला और उस संकरी चट्टानी गुफा के भीतर एक सुरक्षित कोने की तलाश करने लगा।
गुफा के अंदर रेंगते हुए समर को एक पुरानी इंसानी खोपड़ी और कुछ फटे हुए कपड़े मिले, जिन्हें देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसे समझ आ गया कि सालों पहले यहां कोई और भी फंसा था, जो कभी वापस नहीं लौट सका और भूख-प्यास से तड़पकर यहीं दम तोड़ दिया। उस खोपड़ी के पास एक छोटी सी लोहे की डिबिया थी, जिसे खोलने पर समर को कुछ माचिस की तीलियां और एक पुरानी डायरी मिली।
डायरी के पन्ने सड़ चुके थे, लेकिन माचिस की तीलियां सूखी थीं, जो उसके लिए इस बर्फीले नरक में किसी भगवान के वरदान से कम नहीं थीं। उसने सूखी हुई डायरी के पन्नों और गुफा में मौजूद सूखी काई को इकट्ठा किया और एक छोटी सी आग जलाने में कामयाब रहा।
आग की गर्मी ने समर के सुन्न पड़ चुके जिस्म में थोड़ी जान फूंकी, लेकिन उसकी मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई थीं क्योंकि चॉकलेट का आखिरी टुकड़ा भी खत्म हो चुका था। अगले दो दिनों तक उसने गुफा की दीवारों से टपकते हुए गंदे पानी को पीकर और बर्फ को चबाकर अपनी जान बचाई।
उसका शरीर पूरी तरह से टूट चुका था, वजन कई किलो कम हो गया था और चेहरे पर दाढ़ी बढ़ आई थी, लेकिन उसकी आंखों में जिंदा रहने की जिद अब भी बाकी थी। उसने महसूस किया कि इंसान असल में कितना कमजोर है, जो करोड़ों की संपत्ति होने के बाद भी एक निवाले और दो बूंद पानी के लिए तरस सकता है। अपनी इस बेबसी में उसने जीवन के उन तमाम रिश्तों को याद किया जिन्हें उसने पैसे की अंधी दौड़ में पीछे छोड़ दिया था।
छठे दिन की शाम को गुफा के बाहर अचानक कुछ हलचल हुई, और समर को लगा कि शायद कोई उसे बचाने आया है। लेकिन उसकी उम्मीदों पर पानी तब फिर गया जब उसने देखा कि वह घायल भेड़िया अपने दो और साथियों के साथ गुफा के मुहाने पर खड़ा था। आग अब धीरे-धीरे बुझ रही थी और समर के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था क्योंकि उसका पैर पूरी तरह से काम नहीं कर रहा था।
उसने बुझती हुई आग से एक जलती हुई लकड़ी उठाई और चीखते हुए उन भेड़ियों के सामने खड़ा हो गया, अपनी कमजोरी को छिपाकर अपनी आखिरी ताकत झोंक दी। भेड़िये आग से डरकर थोड़े पीछे हटे, लेकिन वे जानते थे कि यह आग ज्यादा देर तक नहीं टिकेगी और वे सही मौके का इंतजार करने लगे।
तभी, जब समर की हिम्मत पूरी तरह टूटने वाली थी और लकड़ी की आग शांत हो चुकी थी, दूर से किसी हेलीकॉप्टर के पंखों की आवाज गूंजी। पिथौरावगढ़ के प्रशासन ने उसकी गुमशुदगी के बाद एक बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया था, जो आखिरकार उस दुर्गम पहाड़ी तक पहुंच चुका था। समर ने अपनी बची-कुची पूरी ताकत समेटकर गुफा से बाहर रेंगने की कोशिश की और बर्फ पर अपने लाल रंग के जैकेट को लहराने लगा।
हेलीकॉप्टर के पायलट ने उस लाल रंग को देख लिया और तुरंत रेस्क्यू टीम को नीचे उतारा, जिसने भेड़ियों को खदेड़कर समर को सुरक्षित स्ट्रेचर पर ले लिया। जब समर को अस्पताल ले जाया जा रहा था, उसने आसमान की तरफ देखा और मुस्कुराया—वह अब एक नया इंसान बन चुका था, जिसने मौत को बेहद करीब से हराकर जिंदगी का असली मतलब सीख लिया था।
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प्रस्तुति: Saying Central Team