एक परछाईं जो कभी थी ही नहीं Part 1
कोलकाता की बरसाती रातों में कुछ घर ऐसे होते हैं जिनकी खामोशी बाहर गिरती बारिश से भी ज्यादा शोर करती है। पार्क सर्कस इलाके की एक पुरानी लेकिन आधुनिक इमारत की सातवीं मंजिल पर रहने वाला सलीम अंसारी पिछले तीन महीनों से उसी तरह की खामोशी के बीच जी रहा था।
वह एक प्रतिष्ठित अकाउंटेंट था, शांत स्वभाव का आदमी, जिसकी जिंदगी में उसकी पत्नी सना, छोटा भाई फैज़ और बूढ़ी मां नसीमा के अलावा कोई खास नहीं था। बाहर से उनका परिवार सामान्य दिखाई देता था, लेकिन भीतर कुछ ऐसा था जिसे कोई समझ नहीं पा रहा था।
सलीम को कुछ समय से अजीब चीजें महसूस होने लगी थीं। कभी उसे लगता कि कोई उसके कमरे में घुसा था, जबकि दरवाजे बंद होते। कभी उसकी अलमारी में रखी फाइलें अपनी जगह से बदली हुई मिलतीं। कभी उसके मोबाइल में ऐसे कॉल लॉग दिखाई देते जो उसने किए ही नहीं थे। शुरुआत में उसने इसे भूलने की आदत समझा, लेकिन धीरे-धीरे घटनाएं बढ़ती गईं। सबसे डरावनी बात यह थी कि हर बार कोई सबूत मौजूद होता था, लेकिन कोई गवाह नहीं।
एक सुबह वह अपने ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था जब उसे अपने लैपटॉप में एक फोल्डर मिला। फोल्डर का नाम था—“सच”। उसने पहले कभी ऐसा कोई फोल्डर नहीं बनाया था। कांपते हाथों से उसने उसे खोला। अंदर दर्जनों तस्वीरें थीं। तस्वीरों में वही था। अलग-अलग जगहों पर। लेकिन कुछ तस्वीरों में वह ऐसे लोगों से मिल रहा था जिन्हें उसने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा था। कुछ तस्वीरें रात के समय की थीं और उनमें उसका चेहरा असामान्य रूप से ठंडा और भावहीन लग रहा था।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने तस्वीरें सना को दिखाईं। सना ने लंबे समय तक स्क्रीन को देखा और फिर धीरे से कहा कि शायद उसे किसी डॉक्टर से मिलना चाहिए। यह सुनकर सलीम को गुस्सा आ गया। उसे लगा कि सना उसकी बात को गंभीरता से नहीं ले रही। लेकिन सना की आंखों में डर था। ऐसा डर जो सिर्फ चिंता से पैदा नहीं होता।
कुछ दिनों बाद सलीम एक मनोचिकित्सक के पास गया। डॉक्टर ने कई टेस्ट किए और उससे लंबे सत्रों में बातचीत की। डॉक्टर ने कहा कि वह अत्यधिक तनाव और स्मृति संबंधी समस्याओं का शिकार हो सकता है। लेकिन सलीम इस जवाब से संतुष्ट नहीं था। उसे यकीन था कि कोई उसके साथ खेल खेल रहा है। कोई ऐसा व्यक्ति जो उसकी हर गतिविधि जानता था।
एक रात वह अचानक नींद से जाग गया। घड़ी में तीन बज रहे थे। कमरे में अंधेरा था, लेकिन उसे महसूस हुआ कि कोई उसे देख रहा है। उसने तुरंत लाइट जलाई। कोई नहीं था। मगर जब उसकी नजर कमरे के कोने में रखे दर्पण पर पड़ी, तो उसका खून जम गया। दर्पण पर उंगली से लिखा था—“तुम्हें याद क्यों नहीं?”
सलीम ने चीख मार दी।
पूरा परिवार उसके कमरे में आ गया। लेकिन जब सबने दर्पण देखा, उस पर कुछ भी नहीं लिखा था। एकदम साफ था। सलीम को लगा कि शायद वह पागल हो रहा है। मगर उसके भीतर कहीं यह विश्वास और मजबूत होता जा रहा था कि कोई उसे मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश कर रहा है।
अगले सप्ताह उसे एक अनजान नंबर से संदेश मिला। संदेश में सिर्फ एक पता लिखा था। पता कोलकाता के बाहरी इलाके में स्थित एक परित्यक्त गोदाम का था। जिज्ञासा और भय के मिश्रण में वह वहां पहुंच गया। गोदाम खाली था। लेकिन अंदर एक पुरानी मेज पर एक रिकॉर्डर रखा था। रिकॉर्डर चालू करते ही एक आवाज सुनाई दी।
“अगर तुम यह सुन रहे हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें अभी भी कुछ याद नहीं है।”
आवाज उसकी अपनी थी।
रिकॉर्डर उसके हाथ से लगभग गिर गया। उसकी सांसें तेज हो गईं।
रिकॉर्डिंग में वही बोल रहा था। वह कह रहा था कि अगर यह संदेश कभी उसके हाथ लगे, तो उसे अपने परिवार पर भरोसा नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से सना पर नहीं। रिकॉर्डिंग अचानक खत्म हो गई। कोई स्पष्टीकरण नहीं था। कोई कारण नहीं था। बस चेतावनी थी।
उस रात वह घर लौटा तो उसका व्यवहार बदल चुका था। वह हर किसी को शक की नजर से देखने लगा। खासकर सना को। वह उसके फोन चेक करता, उसकी गतिविधियों पर नजर रखता, उसकी बातों में झूठ खोजने की कोशिश करता। धीरे-धीरे घर का माहौल जहरीला होने लगा। सना परेशान थी, लेकिन उससे भी ज्यादा परेशान फैज़ था। उसे लग रहा था कि सलीम किसी गहरे मानसिक संकट में फंस चुका है।
फिर एक दिन सलीम को अपनी मां की अलमारी में एक पुरानी फाइल मिली। फाइल के अंदर कुछ अस्पताल के दस्तावेज थे। दस्तावेजों पर उसका नाम लिखा था। तारीख लगभग पंद्रह साल पुरानी थी। दस्तावेजों के अनुसार वह एक मानसिक उपचार केंद्र में भर्ती था। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि परिवार ने कभी इसका जिक्र नहीं किया था।
जब उसने मां से पूछा तो नसीमा का चेहरा सफेद पड़ गया। उन्होंने जवाब देने से इनकार कर दिया। उस रात पहली बार सलीम को लगा कि उसके परिवार के हर सदस्य के पास कोई ऐसा रहस्य है जो उससे छुपाया गया है।
उसकी बेचैनी अब जुनून बन चुकी थी।
एक शाम उसने फैज़ का पीछा किया। फैज़ किसी गुप्त मुलाकात के लिए जा रहा था। सलीम दूर से उसका पीछा करते हुए एक पुराने कैफे तक पहुंचा। वहां फैज़ किसी महिला से मिल रहा था। बातचीत सुनना मुश्किल था, लेकिन एक वाक्य उसके कानों तक साफ पहुंचा।
“अगर उसे सब कुछ याद आ गया, तो हम सब खत्म हो जाएंगे।”
सलीम का शरीर सुन्न पड़ गया।
उसी क्षण उसे एहसास हुआ कि यह सिर्फ उसकी कल्पना नहीं थी। कुछ बहुत बड़ा उससे छुपाया जा रहा था।
लेकिन वह नहीं जानता था कि असली सच्चाई अभी उससे बहुत दूर थी।
एक परछाईं जो कभी थी ही नहीं Part 2

अगले कुछ दिनों में सलीम का जीवन एक जुनूनी जांच में बदल गया। वह हर दस्तावेज, हर फोटो, हर पुराने रिकॉर्ड को खंगालने लगा। उसकी नींद गायब हो चुकी थी। उसके चेहरे पर थकान और आंखों में डर स्थायी रूप से बस चुका था। जितना ज्यादा वह खोजता, उतने ज्यादा विरोधाभास सामने आते।
एक रात उसने पुराने अस्पताल का पता ढूंढ निकाला जहां वह कथित रूप से भर्ती था। अस्पताल अब बंद हो चुका था, लेकिन उसका रिकॉर्ड सेक्शन किसी सरकारी इमारत में स्थानांतरित कर दिया गया था। कई प्रयासों के बाद वह अपनी फाइल तक पहुंच गया।
फाइल पढ़ते हुए उसके हाथ कांपने लगे।
फाइल के अनुसार पंद्रह साल पहले उसके पिता की मृत्यु किसी दुर्घटना में नहीं हुई थी, जैसा उसे बताया गया था। रिपोर्ट में लिखा था कि मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी। जांच अधूरी रह गई थी। और सबसे भयावह तथ्य यह था कि उस घटना के समय सलीम भी वहां मौजूद था।
उसके दिमाग में दर्द की एक लहर दौड़ गई।
टूटी हुई यादों के छोटे-छोटे टुकड़े उभरने लगे। खून। चीखें। अंधेरा। और किसी का लगातार कहना—“तुमने यह नहीं देखा। तुम कुछ नहीं जानते।”
वह घर लौटा और सीधे अपनी मां के कमरे में पहुंचा। इस बार उसने जवाब मांगा। लंबे मौन के बाद नसीमा रो पड़ीं। उन्होंने स्वीकार किया कि उसके पिता की मौत के बाद सलीम गंभीर मानसिक आघात में चला गया था। कुछ घटनाएं इतनी भयावह थीं कि डॉक्टरों ने उसकी स्मृति को दबाने वाली चिकित्सा पद्धतियों का सहारा लिया था।
लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि वास्तव में हुआ क्या था।
सलीम अब नियंत्रण खो रहा था। उसे लगने लगा कि हर कोई उससे झूठ बोल रहा है। उसे घर की दीवारें भी दुश्मन जैसी महसूस होने लगीं। वह हर रात जागकर सीसीटीवी रिकॉर्डिंग देखने लगा। एक रात उसने कुछ ऐसा देखा जिसने उसकी आत्मा तक हिला दी।
रात के तीन बजे वह खुद अपने कमरे से बाहर निकल रहा था।
वीडियो में वह धीरे-धीरे गलियारे से गुजर रहा था। उसका चेहरा अजीब तरह से शांत था। वह सीधे स्टोर रूम में गया और लगभग चालीस मिनट बाद वापस लौटा।
लेकिन सलीम को उस रात की कोई याद नहीं थी।
अगले दिन उसने स्टोर रूम की तलाशी ली।
एक ढीली लकड़ी के नीचे उसे एक धातु का डिब्बा मिला।
डिब्बे के अंदर दर्जनों पत्र, तस्वीरें और रिकॉर्डिंग्स थीं।
सब कुछ उसी ने छुपाया था।
एक रिकॉर्डिंग में उसकी आवाज थी।
“अगर तुम यह सुन रहे हो, तो शायद दूसरी पहचान कमजोर पड़ रही है।”
सलीम के कानों में सनसनाहट भर गई।
रिकॉर्डिंग आगे बढ़ी।
“तुम्हें सच नहीं बताया गया। लेकिन सच उतना सरल भी नहीं है जितना तुम सोचते हो। तुम सिर्फ सलीम नहीं हो।”
रिकॉर्डिंग खत्म हो गई।
उस रात पहली बार उसने अपने मन के भीतर कुछ महसूस किया। जैसे कोई दूसरा व्यक्ति वहां मौजूद हो। कोई जो वर्षों से उसके साथ रह रहा था।
अगले कई दिनों तक उसे ब्लैकआउट होने लगे। कभी घंटों गायब हो जाता, कभी याद नहीं रहता कि वह कहां था। उसकी मानसिक स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी। इसी दौरान उसे एक और झटका लगा।
उसने सना के लैपटॉप में एक गोपनीय फोल्डर देखा।
फोल्डर में उसके इलाज से जुड़े दस्तावेज थे।
सना वर्षों से उसके डॉक्टरों के संपर्क में थी।
गुस्से में वह सना के सामने पहुंच गया।
लेकिन सना रो पड़ी।
उसने बताया कि शादी के समय ही उसे सलीम की बीमारी के बारे में बताया गया था। डॉक्टरों का मानना था कि सलीम में विभाजित व्यक्तित्व विकार विकसित हो गया था। एक व्यक्तित्व शांत और सामान्य था। दूसरा अत्यंत बुद्धिमान, चालाक और खतरनाक।
सलीम को लगा जैसे जमीन खिसक गई हो।
लेकिन असली झटका अभी बाकी था।
सना ने बताया कि दूसरा व्यक्तित्व सिर्फ काल्पनिक नहीं था।
वह वर्षों से सक्रिय था।
और उसने कई घटनाओं को नियंत्रित किया था।
सलीम के दिमाग में अचानक एक स्मृति चमकी।
पिता की मौत।
वह दुर्घटना नहीं थी।
उस रात पिता ने किसी भयानक रहस्य का पता लगा लिया था।
लेकिन रहस्य पिता का नहीं था।
रहस्य सलीम का था।
उसका दूसरा व्यक्तित्व बचपन से मौजूद था।
पिता ने उसे खतरनाक समझकर इलाज करवाने की कोशिश की थी।
लेकिन एक रात दोनों के बीच संघर्ष हुआ।
और उसी रात पिता की मृत्यु हुई।
सलीम का शरीर कांपने लगा।
वर्षों से दबाई गई यादें लौट रही थीं।
लेकिन तभी एक और विस्फोटक सच सामने आया।
फैज़ ने स्वीकार किया कि पिता की मौत के बाद परिवार ने पूरी कहानी छुपा दी थी।
मगर सिर्फ इसलिए नहीं कि सलीम बच जाए।
बल्कि इसलिए कि असली अपराधी सलीम नहीं था।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फैज़ ने कांपती आवाज में कहा कि उस रात पिता की हत्या उसने की थी।
सलीम स्तब्ध रह गया।
फैज़ ने बताया कि पिता बाहर से सम्मानित व्यक्ति थे, लेकिन घर के भीतर वे बेहद क्रूर और नियंत्रणप्रिय थे। वर्षों तक उन्होंने परिवार को मानसिक प्रताड़ना दी थी। उस रात बहस बढ़ गई और गुस्से में फैज़ ने उन्हें धक्का दिया। सिर पर चोट लगी और उनकी मौत हो गई।
लेकिन उसी समय सलीम वहां पहुंच गया था।
घटना का सदमा इतना गहरा था कि उसकी मानसिक स्थिति टूट गई।
परिवार ने सच छुपा लिया।
डॉक्टरों ने उसकी स्मृतियां दबा दीं।
और वर्षों तक सभी लोग इस झूठ के साथ जीते रहे।
सलीम को लगा कि आखिरकार पहेली सुलझ गई।
लेकिन वह गलत था।
क्योंकि उसी रात उसे अंतिम रिकॉर्डिंग मिली।
वह रिकॉर्डिंग स्टोर रूम के डिब्बे में छिपी हुई थी।
इस बार आवाज फिर उसकी थी।
लेकिन लहजा अलग था।
ठंडा। निर्मम। आत्मविश्वासी।
“अगर तुम यहां तक पहुंच गए हो, तो इसका मतलब है कि उन्होंने तुम्हें वही कहानी बता दी है जो मैं चाहता था।”
सलीम का दिल रुकने जैसा हो गया।
रिकॉर्डिंग आगे बढ़ी।
“फैज़ ने पिता को नहीं मारा था। मैंने मारा था। और मैंने इतने सालों में हर किसी को यकीन दिला दिया कि वे किसी और सच्चाई पर विश्वास करें।”
कमरे की हवा भारी हो गई।
“तुम सोचते हो कि दूसरा व्यक्तित्व बीमारी है। नहीं। मैं बीमारी नहीं हूं। मैं वह हिस्सा हूं जो हमेशा जागता रहा। मैंने रिकॉर्डिंग्स बनाईं। सबूत छुपाए। यादों को दिशा दी। लोगों को प्रभावित किया। यहां तक कि डॉक्टरों को भी।”
सलीम की आंखें फैल गईं।
“और सबसे मजेदार बात जानते हो? अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं रही।”
रिकॉर्डिंग समाप्त हो गई।
उस क्षण सलीम को महसूस हुआ कि उसके भीतर कुछ टूट गया है।
या शायद कुछ जाग गया है।
अगली सुबह सना, फैज़ और नसीमा ने देखा कि सलीम असामान्य रूप से शांत था। वह मुस्कुरा रहा था। वर्षों बाद पहली बार उसके चेहरे पर तनाव नहीं था।
उसने सबको गले लगाया।
सबसे सामान्य तरीके से नाश्ता किया।
और फिर काम पर जाने के लिए घर से निकल गया।
लेकिन वह कभी वापस नहीं लौटा।
तीन महीने बाद बांग्लादेश सीमा के पास एक छोटे शहर में एक नया व्यक्ति दिखाई दिया। उसका नाम कुछ और था। उसका अतीत कोई नहीं जानता था। वह लोगों से कम बात करता था। उसकी आंखों में अजीब ठंडापन था।
एक रात वह अपने किराए के कमरे में बैठा पुरानी रिकॉर्डिंग सुन रहा था।
रिकॉर्डिंग में एक आवाज हंस रही थी।
वही आवाज।
उसकी अपनी।
उसने रिकॉर्डिंग बंद की और दर्पण में देखा।
फिर मुस्कुराया।
इस बार दर्पण में सिर्फ एक चेहरा था।
और शायद यही सबसे डरावनी बात थी।
क्योंकि अब यह तय करना असंभव था कि असली सलीम कौन था।
और कौन सिर्फ एक परछाईं।
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प्रस्तुति: Saying Central Team