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पंचतंत्र की प्रमुख कहानी: बगुला भगत और केकड़ा

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पंचतंत्र की कहानी : बगुला भगत और केकड़ा

एक घने वन प्रदेश के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा और सुंदर तालाब था। उस तालाब में हर प्रकार के जीवों के लिए पर्याप्त भोजन और रहने की सुविधा थी। इसलिए वहाँ अनेक प्रकार की मछलियाँ, कछुए, केकड़े, बत्तख, सारस और दूसरे जलचर जीव सुखपूर्वक रहते थे।

उसी तालाब के पास एक बगुला भी रहता था। वह स्वभाव से बहुत आलसी था। उसे मेहनत करना बिल्कुल पसंद नहीं था। ऊपर से उसकी आँखें भी कमजोर हो गई थीं। मछलियों का शिकार करने के लिए धैर्य और परिश्रम की आवश्यकता होती है, लेकिन बगुले को यह सब कठिन लगता था। इसलिए कई बार वह भूखा ही रह जाता।

वह अक्सर तालाब के किनारे एक टांग पर खड़ा होकर यही सोचता रहता कि ऐसा कौन-सा उपाय किया जाए जिससे बिना मेहनत किए रोज़ भोजन मिलता रहे।

एक दिन उसके मन में एक चालाक योजना आई।

वह तालाब के किनारे जाकर उदास मुद्रा में खड़ा हो गया और आँखों से आँसू बहाने लगा।

एक केकड़े ने उसे इस तरह रोते देखा तो वह उसके पास आया और बोला, “मामा, आज क्या बात है? आप मछलियों का शिकार करने के बजाय यहाँ खड़े आँसू क्यों बहा रहे हैं?”

बगुले ने गहरी साँस ली, फिर दुखी स्वर में बोला, “बेटे, बहुत कर लिया जीवों का शिकार। अब मेरी आत्मा जाग चुकी है। मैं यह पाप का काम और नहीं करना चाहता। इसलिए अब मैं पास आने वाली मछलियों को भी नहीं पकड़ता।”

केकड़े ने आश्चर्य से पूछा, “मामा, यदि आप भोजन ही नहीं करेंगे तो जीवित कैसे रहेंगे?”

बगुला फिर से नकली हिचकियाँ लेते हुए बोला, “ऐसे जीवन से मृत्यु ही अच्छी है। वैसे भी अब हम सबकी मृत्यु निकट है। मुझे एक त्रिकालदर्शी महात्मा ने बताया है कि जल्द ही इस प्रदेश में बारह वर्षों तक भयंकर सूखा पड़ेगा। तब यह तालाब सूख जाएगा और यहाँ रहने वाले सभी जीव मर जाएँगे।”

केकड़ा यह बात सुनकर घबरा गया। वह तुरंत तालाब के अन्य जीवों के पास पहुँचा और सबको बगुले की बातें बता दीं।

कुछ ही समय में तालाब के सारे जीव — मछलियाँ, कछुए, केकड़े, बत्तख और सारस — घबराकर बगुले के पास पहुँचे।

सबने विनती करते हुए कहा, “भगत मामा, अब आप ही हमें बचाने का उपाय बताइए। आप तो बड़े ज्ञानी और त्यागी बन गए हैं।”

बगुले ने थोड़ी देर सोचने का नाटक किया, फिर बोला, “यहाँ से कुछ कोस दूर एक बड़ा जलाशय है। उसमें पहाड़ी झरने का पानी आता है, इसलिए वह कभी नहीं सूखता। यदि तुम सब वहाँ पहुँच जाओ तो बच सकते हो।”

सभी जीवों ने राहत की साँस ली। लेकिन फिर समस्या सामने आई कि वहाँ तक पहुँचा कैसे जाए।

तब बगुले ने बड़ी गंभीरता से कहा, “चिंता मत करो। अब मेरा जीवन दूसरों की सेवा के लिए ही है। मैं तुम सबको एक-एक करके अपनी पीठ पर बैठाकर उस जलाशय तक पहुँचा दूँगा।”

यह सुनकर सारे जीव बहुत प्रसन्न हुए। सभी ने मिलकर “बगुला भगत की जय!” के नारे लगाए।

अब बगुले की चाल सफल हो गई।

वह प्रतिदिन एक जीव को अपनी पीठ पर बैठाकर उड़ता और थोड़ी दूर एक बड़ी चट्टान के पास ले जाकर उसे पटककर मार डालता। फिर आराम से उसे खा जाता।

कभी-कभी उसका मन अधिक खाने का होता तो वह दो-दो चक्कर लगाकर दो जीवों को भी खा जाता।

धीरे-धीरे तालाब में रहने वाले जीवों की संख्या कम होने लगी। दूसरी ओर उस चट्टान के पास हड्डियों का बड़ा ढेर जमा होने लगा।

लगातार अच्छा भोजन मिलने के कारण बगुला मोटा और स्वस्थ हो गया। उसके पंख चमकने लगे और चेहरे पर लालिमा आ गई।

तालाब के दूसरे जीव उसे देखकर कहते, “देखो, दूसरों की सेवा करने का कितना पुण्य मिलता है। भगत मामा का शरीर कितना तेजस्वी हो गया है!”

यह सुनकर बगुला मन ही मन खूब हँसता। वह सोचता, “दुनिया में कितने मूर्ख जीव हैं, जो बिना सोचे-समझे किसी पर भी विश्वास कर लेते हैं। थोड़ी-सी चालाकी से बिना मेहनत किए कितना अच्छा भोजन मिल रहा है।”

बहुत दिनों तक यही चलता रहा।

एक दिन केकड़े ने बगुले से कहा, “मामा, आपने इतने सारे जीवों को वहाँ पहुँचा दिया, लेकिन मेरी बारी अभी तक नहीं आई।”

बगुला बोला, “बेटा, आज तुझे ही ले चलता हूँ। आ जा मेरी पीठ पर बैठ जा।”

केकड़ा खुशी-खुशी उसकी पीठ पर बैठ गया।

जब बगुला उड़ते-उड़ते उस चट्टान के पास पहुँचा, तो केकड़े की नज़र नीचे पड़ी हड्डियों के विशाल ढेर पर गई।

अब उसे कुछ संदेह हुआ। उसने डरते हुए पूछा, “मामा, यह हड्डियों का ढेर कैसा है? और वह जलाशय अभी कितनी दूर है?”

यह सुनकर बगुला जोर-जोर से हँस पड़ा और बोला, “मूर्ख! कोई जलाशय नहीं है। मैं तुम सबको धोखा देकर यहाँ लाता रहा हूँ और खाकर अपना पेट भरता रहा हूँ। आज तेरी भी मृत्यु निश्चित है।”

अब केकड़े को सारी सच्चाई समझ आ गई।

वह भीतर से भयभीत जरूर हुआ, लेकिन उसने धैर्य नहीं खोया। तुरंत उसने अपने मजबूत पंजों से बगुले की गर्दन पकड़ ली और पूरी ताकत से दबाने लगा।

केकड़े ने तब तक उसकी गर्दन नहीं छोड़ी जब तक बगुले के प्राण नहीं निकल गए।

बगुले की मृत्यु के बाद केकड़ा उसका कटा हुआ सिर लेकर तालाब में वापस पहुँचा।

सभी जीव उसे देखकर हैरान रह गए। तब केकड़े ने सबको बगुले की पूरी चाल और उसके धोखे के बारे में बताया।

सभी जीवों को अपनी भूल का एहसास हुआ कि उन्होंने बिना सोचे-समझे बगुले पर आँख बंद करके विश्वास कर लिया था।

नैतिक शिक्षा — किसी की मीठी बातों पर बिना सोचे-समझे विश्वास नहीं करना चाहिए और कठिन समय में धैर्य व बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए।

2. शेर, ऊँट और गीदड़

किसी घने वन में गब्बर नाम का एक शक्तिशाली सिंह रहता था। पूरे जंगल में उसका भय था। उसके साथ तीन सेवक रहते थे — एक चीता, एक कौआ और एक गीदड़। ये तीनों अपने स्वामी की सेवा करते और सिंह द्वारा किए गए शिकार में से बचा हुआ मांस खाकर अपना पेट भरते थे।

एक दिन वे तीनों जंगल में घूम रहे थे कि अचानक उनकी नज़र एक ऊँट पर पड़ी। ऊँट जंगल की ओर भटकता हुआ चला आ रहा था। उसे देखकर तीनों बहुत प्रसन्न हुए। वे तुरंत उसके पास पहुँचे और बड़े प्रेम से बोले, “अरे परदेसी भाई, तुम इस जंगल में कैसे आ गए?”

ऊँट उदास स्वर में बोला, “मैं अपने साथियों से बिछुड़ गया हूँ। रास्ता भूलकर इस जंगल में भटक रहा हूँ।”

तीनों ने उसे भरोसा दिलाते हुए कहा, “भाई, चिंता मत करो। हमारे स्वामी सिंह बहुत दयालु हैं। वे हर संकट में सहायता करते हैं। तुम हमारे साथ चलो, वे अवश्य तुम्हारी मदद करेंगे।”

बेचारा ऊँट पहले ही अपने साथियों से बिछुड़कर दुखी था। इसलिए उसने उनकी बातों पर विश्वास कर लिया और उनके साथ सिंह के पास चल पड़ा।

जब वे ऊँट को सिंह के सामने लेकर पहुँचे, तो सिंह ने आश्चर्य से पूछा, “यह विचित्र जीव कौन है? यह जंगली जानवर है या गाँव में रहने वाला प्राणी?”

कौए ने उत्तर दिया, “स्वामी, यह एक ग्रामीण पशु है। यदि आप चाहें तो इसे मारकर अपनी भूख शांत कर सकते हैं।”

लेकिन सिंह ने तुरंत मना करते हुए कहा, “नहीं। जो भय छोड़कर विश्वास के साथ हमारे पास आया है, उसे मारना अधर्म है। अतिथि की हत्या करने वाला पाप का भागी होता है। इसे अभयदान देकर मेरे पास लाओ।”

ऊँट को दरबार में लाया गया। उसने विनम्रता से अपनी गर्दन झुकाकर सिंह को प्रणाम किया और अपनी पूरी कहानी सुनाई कि कैसे वह अपने साथियों से बिछुड़कर अकेला भटक गया।

सिंह उसकी बात सुनकर बोला, “अब तुम्हें गाँव जाकर बोझा ढोने की आवश्यकता नहीं है। तुम निश्चिंत होकर इसी वन में रहो। यहाँ कोई तुम्हें कष्ट नहीं पहुँचाएगा।”

सिंह का संरक्षण पाकर ऊँट खुशी-खुशी जंगल में रहने लगा।

कुछ समय बाद संयोग से उस जंगल में एक मतवाला हाथी आ गया। वह इतना उग्र था कि जंगल के दूसरे जानवर भयभीत रहने लगे। अपने सेवकों और जंगल की रक्षा के लिए सिंह को उससे युद्ध करना पड़ा।

भयंकर युद्ध हुआ। अंततः सिंह ने हाथी को हरा दिया, लेकिन लड़ाई में वह स्वयं भी गंभीर रूप से घायल हो गया। हाथी ने अपनी सूँड़ में लपेटकर उसे इतनी जोर से पटका कि उसके शरीर की सारी शक्ति समाप्त हो गई।

अब सिंह शिकार करने में असमर्थ हो गया। कई दिनों तक उसे भोजन नहीं मिला। उसके सेवक — चीता, कौआ और गीदड़ — भी भूख से परेशान रहने लगे, क्योंकि वे भी सिंह के शिकार पर ही निर्भर थे।

एक दिन सिंह ने अपने सेवकों को बुलाकर कहा, “मित्रों, अब मुझमें शिकार करने की शक्ति नहीं बची। तुम लोग किसी जानवर को यहाँ ले आओ, ताकि मैं उसका शिकार करके अपनी और तुम सबकी भूख मिटा सकूँ।”

तीनों सेवक शिकार की खोज में जंगल में निकल पड़े। उन्होंने बहुत प्रयास किया, लेकिन कोई शिकार हाथ नहीं लगा।

तब गीदड़ ने कौए से धीरे से कहा, “जब कोई और जानवर नहीं मिल रहा, तो क्यों न इसी ऊँट को मारकर अपनी भूख मिटाई जाए?”

कौआ बोला, “लेकिन स्वामी ने उसे अभयदान दिया है।”

गीदड़ चालाकी से बोला, “तुम चिंता मत करो। मैं ऐसा उपाय सोचता हूँ कि स्वामी स्वयं उसे मारने के लिए तैयार हो जाएँ।”

यह कहकर वह सिंह के पास पहुँचा और बोला, “स्वामी, हमने पूरा जंगल खोज लिया, लेकिन कोई शिकार नहीं मिला। हम सब भूख से कमजोर हो चुके हैं। यदि अनुमति दें तो उस ऊँट को मारकर भोजन किया जा सकता है।”

यह सुनते ही सिंह क्रोधित हो उठा। वह गरजकर बोला, “दुष्ट! मैंने उसे अभयदान दिया है। यदि दोबारा ऐसी बात कही तो तुम्हारे प्राण ले लूँगा।”

गीदड़ तुरंत विनम्र बन गया और बोला, “स्वामी, मैं आपको वचन तोड़ने के लिए नहीं कह रहा। यदि वह स्वयं आपकी सेवा में अपने प्राण अर्पित कर दे, तब तो कोई दोष नहीं होगा।”

सिंह कुछ सोच में पड़ गया। तब गीदड़ ने अपनी पूरी योजना उसे बता दी। अंत में सिंह ने कहा, “यदि ऐसा संभव हो सके तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”

अब गीदड़ वापस अपने साथियों के पास गया और उन्हें पूरी योजना समझाई।

सभी ऊँट को लेकर सिंह के पास पहुँचे।

सबसे पहले कौआ आगे बढ़ा और बोला, “स्वामी, आपकी यह दशा मुझसे देखी नहीं जाती। कृपया मुझे खाकर अपनी भूख शांत करें।”

तभी गीदड़ बीच में बोल पड़ा, “मित्र, तुम बहुत छोटे हो। तुम्हारे शरीर से स्वामी की भूख नहीं मिटेगी।”

फिर वह स्वयं आगे बढ़ा और बोला, “स्वामी, मेरा शरीर स्वीकार कीजिए। सेवक का शरीर तो स्वामी के ही काम आता है।”

लेकिन तभी चीता बोला, “नहीं, तुम्हारा शरीर खाने योग्य नहीं है। मैं स्वयं को स्वामी को अर्पित करता हूँ।”

सिंह ने तुरंत कहा, “तुम मेरे सजातीय हो। मैं अपने समान जाति वाले का वध नहीं कर सकता।”

यह सब देखकर ऊँट भावुक हो गया। उसने सोचा, “स्वामी अपने सेवकों को कितना प्रेम करते हैं। उन्होंने किसी का बलिदान स्वीकार नहीं किया। यदि मैं भी अपने प्राण अर्पित कर दूँ तो वे अवश्य मुझे भी क्षमा कर देंगे। यदि मैंने ऐसा नहीं किया तो मैं कृतघ्न कहलाऊँगा।”

यह सोचकर ऊँट आगे बढ़ा और विनम्रता से बोला, “स्वामी, मेरा शरीर बड़ा है। कृपया मुझे खाकर अपनी और सबकी भूख शांत कीजिए।”

बस, ऊँट के इतना कहते ही गीदड़, चीता और कौआ उस पर टूट पड़े। घायल और भूखा सिंह भी स्वयं को रोक नहीं पाया और उन्होंने मिलकर ऊँट को मार डाला।

इस प्रकार सरल और विश्वास करने वाला ऊँट छल और कपट का शिकार बन गया।

नैतिक शिक्षा — चालाक और स्वार्थी लोगों की मीठी बातों पर आँख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए।

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3. धूर्त बिल्ली का न्याय

एक घने जंगल में एक विशाल और पुराना वृक्ष था। उसके तने में एक गहरा खोखल बना हुआ था। उसी खोखल में कपिंजल नाम का एक तीतर रहता था। वह वहीं अपना बसेरा बनाकर सुखपूर्वक जीवन बिताता था।

एक दिन तीतर अपने साथियों के साथ जंगल से बहुत दूर खेतों की ओर चला गया। वहाँ धान की नई-नई कोमल कोंपलें निकली थीं। स्वादिष्ट भोजन पाकर तीतर वहीं कई दिनों तक रुका रहा। अच्छा भोजन मिलने के कारण वह मोटा-ताजा और प्रसन्न हो गया।

इधर कई दिन बीत जाने पर वह वृक्ष का खोखल खाली पड़ा रहा।

उसी समय शीघ्रगो नाम का एक खरगोश वहाँ आया। उसने जब खोखल को खाली देखा तो वहीं रहने लगा। धीरे-धीरे उसने उसी स्थान को अपना घर मान लिया।

कुछ दिनों बाद कपिंजल तीतर वापस लौटा। जैसे ही वह अपने पुराने बसेरे में पहुँचा, उसने देखा कि उसके स्थान पर एक खरगोश आराम से बैठा हुआ है।

यह देखकर तीतर क्रोधित हो गया। उसने खरगोश से कहा, “यह मेरा घर है। तुरंत यहाँ से निकल जाओ।”

लेकिन खरगोश भी तेज स्वभाव का था। वह बोला, “अब यह स्थान तुम्हारा नहीं रहा। जंगल के कुएँ, तालाब, वृक्ष और उनके खोखलों का नियम यही है कि जो उनमें निवास करने लगे, वही उनका स्वामी बन जाता है। यह कोई मनुष्यों का घर नहीं कि स्थायी अधिकार माना जाए।”

तीतर ने विरोध किया, “मैं वर्षों से यहाँ रहता आया हूँ। केवल कुछ दिनों के लिए बाहर जाने से मेरा अधिकार समाप्त नहीं हो सकता।”

दोनों के बीच बहस बढ़ती गई। कोई भी अपनी बात छोड़ने को तैयार नहीं था।

अंत में तीतर बोला, “क्यों न हम किसी तीसरे व्यक्ति को पंच बनाकर उससे न्याय करवा लें?”

खरगोश भी इस बात के लिए तैयार हो गया।

उनकी पूरी बातचीत पास ही बैठी एक जंगली बिल्ली सुन रही थी। बिल्ली बहुत धूर्त और चालाक थी। उसने मन ही मन सोचा, “यदि मैं न्यायाधीश बन जाऊँ, तो दोनों को आसानी से अपना शिकार बना सकती हूँ।”

यह सोचकर उसने तुरंत एक नई चाल चली।

वह नदी के किनारे जाकर बैठ गई। उसने अपने हाथ में माला ले ली, सामने कुश का आसन बिछाया और आँखें बंद करके ऐसे बैठ गई जैसे कोई महान तपस्वी हो। फिर वह ऊँचे स्वर में धर्म और अहिंसा की बातें करने लगी।

खरगोश ने उसे देखा और बोला, “देखो, वहाँ कोई महान साधु बैठा है। क्यों न उसी से अपना विवाद तय करवाया जाए?”

तीतर बिल्ली को देखकर पहले तो डर गया। वह दूर से ही बोला, “मुनिवर! कृपया हमारे झगड़े का न्याय कीजिए। जो भी धर्म के विरुद्ध होगा, आप उसे दंड दे सकते हैं।”

यह सुनकर बिल्ली ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और मीठे स्वर में बोली, “राम-राम! ऐसा पापपूर्ण वचन मत कहो। मैंने हिंसा का मार्ग बहुत पहले छोड़ दिया है। अब मैं किसी जीव को हानि नहीं पहुँचाती। यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हारा न्याय अवश्य कर सकती हूँ।”

फिर वह बोली, “लेकिन मैं बहुत बूढ़ी हो चुकी हूँ। दूर की बातें ठीक से सुन नहीं पाती। तुम दोनों पास आकर अपनी-अपनी बात कहो।”

बिल्ली की मीठी और धार्मिक बातें सुनकर तीतर और खरगोश दोनों उसके छल में फँस गए। उन्हें लगा कि सचमुच वह कोई तपस्विनी और न्यायप्रिय जीव है।

दोनों धीरे-धीरे उसके पास पहुँच गए।

बस, जैसे ही वे उसके निकट आए, बिल्ली ने अवसर पाते ही उन पर झपट्टा मारा और एक ही क्षण में दोनों को अपने पंजों में दबोच लिया।

इस प्रकार अपनी मूर्खता और बिना सोचे-समझे विश्वास करने के कारण तीतर और खरगोश दोनों अपनी जान गंवा बैठे।

नैतिक शिक्षा — मीठी बातों और दिखावटी धर्म का भरोसा करने से पहले व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव को पहचान लेना चाहिए।

4. टिटिहरी का जोड़ा और समुद्र का अभिमान

समुद्र के किनारे एक टिटिहरी और टिटिहरा का जोड़ा रहता था। दोनों समुद्रतट पर बहुत सुख से अपना जीवन बिता रहे थे। समय आने पर टिटिहरी ने अंडे देने की तैयारी की और अपने पति से बोली, “हमें अंडे देने के लिए कोई सुरक्षित स्थान ढूँढ लेना चाहिए। समुद्र की लहरें बहुत प्रबल होती हैं। जब ज्वार आता है तो उसकी लहरें बड़े-बड़े जीवों को भी बहा ले जाती हैं। कहीं ऐसा न हो कि हमारे अंडे भी बह जाएँ।”

लेकिन टिटिहरा अभिमान से बोला, “तुम व्यर्थ चिंता करती हो। समुद्र इतना साहसी नहीं कि मेरी संतान को हानि पहुँचा सके। वह मुझसे डरता है। तुम निश्चिंत होकर यहीं अंडे दे दो।”

टिटिहरी ने फिर समझाया, “समुद्र की शक्ति को कम मत समझो। बुद्धिमान वही होता है जो आने वाली विपत्ति का पहले ही उपाय सोच लेता है।”

लेकिन टिटिहरा अपने घमंड में उसकी बात सुनने को तैयार नहीं हुआ।

उसी समय समुद्र ने उनकी सारी बातचीत सुन ली। उसे टिटिहरे का अभिमान बहुत बुरा लगा। उसने मन ही मन सोचा, “यह छोटा-सा पक्षी कितना घमंडी है! इसका अभिमान तोड़ना ही चाहिए।”

कुछ दिनों बाद टिटिहरी ने वहीं समुद्रतट पर अंडे दे दिए।

एक दिन ज्वार आया। समुद्र की ऊँची लहरें उठीं और वे अंडों को बहाकर अपने साथ ले गईं।

जब अगले दिन टिटिहरी वहाँ पहुँची और अपने अंडों को गायब पाया, तो वह रोने लगी। उसने दुखी होकर टिटिहरे से कहा, “मैंने पहले ही तुम्हें सावधान किया था, लेकिन तुमने अभिमान में मेरी बात नहीं मानी। जो अपने हितैषियों की सलाह नहीं सुनता, उसकी यही दशा होती है।”

टिटिहरा क्रोध से भर उठा। वह बोला, “मैं समुद्र को उसकी करनी का दंड दूँगा। अपनी चोंच से उसका सारा पानी निकालकर उसे सुखा दूँगा।”

टिटिहरी ने उसे समझाते हुए कहा, “समुद्र जैसा विशाल और शक्तिशाली शत्रु तुम्हारे अकेले के बस की बात नहीं है। अपनी शक्ति को पहचानकर ही किसी से वैर करना चाहिए।”

लेकिन टिटिहरा अपनी जिद पर अड़ा रहा। तब टिटिहरी ने कहा, “यदि तुमने निश्चय कर ही लिया है, तो दूसरे पक्षियों की सहायता लो। कई बार छोटे-छोटे जीव मिलकर भी बड़े बलवान को पराजित कर देते हैं।”

यह बात टिटिहरे को उचित लगी।

वह तुरंत दूसरे पक्षियों — बगुले, सारस, मोर और अनेक पक्षियों — के पास गया और उन्हें अपनी दुःखभरी कथा सुनाई। सभी पक्षियों को समुद्र का यह व्यवहार अनुचित लगा।

उन्होंने कहा, “हम स्वयं तो समुद्र का सामना नहीं कर सकते, लेकिन हमारे राजा गरुड़ अवश्य हमारी सहायता करेंगे।”

तब सभी पक्षी मिलकर गरुड़ के पास पहुँचे और रोते हुए बोले, “गरुड़ महाराज! समुद्र ने हमारे पक्षीकुल का अपमान किया है। आज उसने टिटिहरी के अंडे बहाए हैं, कल वह किसी और के अंडे नष्ट कर देगा। इस अन्याय को रोका जाना चाहिए।”

गरुड़ को यह सुनकर बहुत क्रोध आया। उसने निश्चय किया कि वह समुद्र को दंड देगा।

उसी समय भगवान विष्णु का दूत वहाँ आया। वह गरुड़ को भगवान विष्णु की सवारी के लिए बुलाने आया था।

गरुड़ ने क्रोधित होकर कहा, “भगवान से कह दो कि वे दूसरी सवारी का प्रबंध कर लें। मैं अभी समुद्र के अत्याचार का बदला लेने जा रहा हूँ।”

दूत ने जब कारण पूछा तो गरुड़ ने सारी घटना उसे बता दी।

दूत ने जाकर भगवान विष्णु को पूरी बात बताई। यह सुनकर भगवान विष्णु स्वयं गरुड़ के पास पहुँचे।

गरुड़ ने विनम्रता से प्रणाम करके कहा, “प्रभु! समुद्र ने मेरे आश्रय में रहने वाले पक्षियों का अपमान किया है। उसने टिटिहरी के अंडों को बहाकर हम सबका अपमान किया है।”

भगवान विष्णु बोले, “गरुड़, तुम्हारा क्रोध उचित है। समुद्र ने अन्याय किया है।”

फिर भगवान विष्णु अपने धनुष पर अग्निबाण चढ़ाकर समुद्र के सामने पहुँचे और बोले, “हे समुद्र! तुरंत टिटिहरी के अंडे वापस कर दे, अन्यथा मैं अभी तुम्हें सुखा दूँगा।”

भगवान विष्णु का क्रोध देखकर समुद्र भयभीत हो गया। उसने तुरंत टिटिहरी के अंडे वापस लौटा दिए।

इस प्रकार टिटिहरी और टिटिहरे को अपने अंडे वापस मिल गए और समुद्र का अभिमान भी टूट गया।

नैतिक शिक्षा — एकता, धैर्य और सही सहायता से बड़े से बड़े शक्तिशाली शत्रु को भी पराजित किया जा सकता है।

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पंचतंत्र भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध नीति कथाओं का संग्रह है, जिन्हें आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित माना जाता है। इन कहानियों के माध्यम से बुद्धिमानी, मित्रता, नीति, व्यवहार और जीवन की महत्वपूर्ण सीख सरल और रोचक तरीके से दी जाती है। आज भी पंचतंत्र की कथाएँ बच्चों और बड़ों दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं क्योंकि हर कहानी अपने भीतर एक गहरी नैतिक शिक्षा छुपाए होती है।

✍️ लेखक / मूल रचनाकार: आचार्य विष्णु शर्मा
📖 प्रस्तुति: Saying Central Team

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