सिंहासन बत्तीसी

सिंहासन बत्तीसी: सताइसवीं पुतली – मलयवती

11
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

सिंहासन बत्तीसी: सताइसवीं पुतली – मलयवती नाम की सताइसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है:
राजा विक्रमादित्य बड़े यशस्वी और प्रतापी राजा थे। राजकाज चलाने में उनका कोई सानी नहीं था। वे वीरता और विद्वता का अद्भुत संगम थे। उनके शस्त्र ज्ञान और शास्त्र ज्ञान की कोई सीमा नहीं थी। राजकार्य से समय निकालकर वे अकसर शास्त्रों का अध्ययन किया करते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने राजमहल के एक भाग में विशाल पुस्तकालय बनवा रखा था।

एक दिन की बात है वे एक धार्मिक ग्रन्थ पढ़ रहे थे। उसमें उन्हें राजा बलि का प्रसंग मिला। उन्होंने जब पूरी कथा पढ़ी तो ज्ञात हुआ कि राजा बलि अत्यंत दानवीर, पराक्रमी और वचन के पक्के थे। उनकी शक्ति से स्वयं इन्द्र भी भयभीत हो उठे थे। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की तो उन्होंने वामन अवतार धारण करके राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी और फिर समस्त लोक दान में लेकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया।

यह कथा पढ़कर विक्रमादित्य के मन में राजा बलि के दर्शन की तीव्र इच्छा जाग उठी। उन्होंने निश्चय किया कि भगवान विष्णु की कठोर आराधना करके उनसे राजा बलि तक पहुँचने का मार्ग पूछा जाए। यह विचार आते ही उन्होंने राज-पाट का भार महामंत्री को सौंप दिया और स्वयं जंगल की ओर प्रस्थान कर गए।

जंगल में पहुँचकर उन्होंने घोर तपस्या आरम्भ कर दी। पहले वे दिन में केवल एक बार भोजन करते थे। कुछ समय बाद उन्होंने अन्न त्याग दिया और फल-कन्द पर रहने लगे। फिर धीरे-धीरे जल के अतिरिक्त सब कुछ त्याग दिया। अन्त में उन्होंने जल भी छोड़ दिया और पूर्ण निराहार होकर भगवान विष्णु की आराधना में लीन हो गए।

कठोर तपस्या के कारण उनका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। हड्डियाँ स्पष्ट दिखाई देने लगीं। साधारण रूप से उठना-बैठना भी कठिन हो गया। उनके तपस्थान के आसपास अन्य तपस्वी भी आकर साधना करने लगे। कोई एक पैर पर खड़ा था, कोई काँटों पर लेटा था, तो कोई बालू में धँसकर तप कर रहा था। चारों ओर ईश्वर भक्ति का वातावरण बन गया।

एक दिन समीप तपस्या कर रहे एक योगी ने उनसे पूछा कि वे इतनी घोर तपस्या क्यों कर रहे हैं। विक्रम ने उत्तर दिया कि वे इहलोक से मुक्ति और परलोक सुधार के लिए तप कर रहे हैं। योगी ने कहा कि तपस्या राजाओं का कार्य नहीं है। राजा का धर्म राजकाज चलाना और प्रजा की रक्षा करना है। यदि राजा अपने कर्म से विमुख हो जाए तो यह अधर्म होगा।

विक्रम ने शांत स्वर में उत्तर दिया कि कर्म करते हुए भी धर्म से विमुख नहीं होना चाहिए। उन्होंने पूछा कि क्या शास्त्र कहीं भी धर्म त्यागने की शिक्षा देते हैं? उनके तर्कपूर्ण उत्तर से योगी निरुत्तर हो गया।

राजा पुनः तपस्या में लीन हो गए। अत्यधिक दुर्बलता के कारण एक दिन वे मूर्छित होकर गिर पड़े। काफी देर बाद जब उन्हें होश आया तो उन्होंने देखा कि उनका सिर भगवान विष्णु की गोद में रखा हुआ है। तब उन्हें समझ में आया कि वही योगी वास्तव में भगवान विष्णु थे।

राजा उठे और भगवान को साष्टांग प्रणाम किया। भगवान विष्णु ने उनसे पूछा कि वे इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रहे हैं। विक्रम ने विनम्रता से उत्तर दिया कि वे दैत्यराज बलि के दर्शन करना चाहते हैं। भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्हें एक दिव्य शंख देकर बोले कि समुद्र के मध्य पाताल लोक जाने का मार्ग है। इस शंख को समुद्र तट पर फूँकने से समुद्र देव प्रकट होंगे और वही उन्हें मार्ग बताएँगे। इतना कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

भगवान के दर्शन के बाद विक्रम का शरीर पुनः स्वस्थ और शक्तिशाली हो गया। वे शंख लेकर समुद्र तट पहुँचे और पूरी शक्ति से शंख फूँका। शंखध्वनि होते ही समुद्र देव प्रकट हुए। समुद्र का जल दो भागों में बँट गया और बीच में भूमि का मार्ग दिखाई देने लगा।

राजा उस मार्ग पर चलते हुए पाताल लोक पहुँचे। वहाँ उन्होंने राजा बलि के महल के द्वार पर पहुँचकर पहरेदारों से मिलने की इच्छा प्रकट की। पहरेदारों ने संदेश भीतर पहुँचाया, किन्तु लौटकर कहा कि राजा बलि अभी उनसे नहीं मिल सकते।

यह सुनकर विक्रम अत्यंत निराश हुए। उन्होंने बिना देर किए अपनी तलवार से अपना सिर काट लिया। जब यह समाचार राजा बलि तक पहुँचा तो उन्होंने अमृत छिड़ककर उन्हें पुनर्जीवित करने का आदेश दिया। जीवित होते ही विक्रम ने फिर राजा बलि के दर्शन की इच्छा प्रकट की।

इस बार भीतर से संदेश आया कि राजा बलि उनसे महाशिवरात्रि के दिन मिलेंगे। विक्रम को लगा कि यह केवल उन्हें टालने का उपाय है। उन्होंने पुनः अपनी गर्दन काट ली। अब राजा बलि समझ गए कि यह व्यक्ति अत्यंत दृढ़ निश्चयी है और बिना मिले लौटने वाला नहीं। उन्होंने तुरन्त उन्हें सम्मान सहित भीतर बुलाने का आदेश दिया।

अमृत डालकर विक्रम को पुनर्जीवित किया गया और वे राजा बलि के सामने प्रस्तुत हुए। राजा बलि ने उनसे पूछा कि वे इतना कष्ट उठाकर क्यों आए हैं। विक्रम ने कहा कि उन्होंने ग्रन्थों में उनकी दानवीरता और त्याग की महिमा पढ़ी थी, इसलिए वे उनके दर्शन करना चाहते थे।

राजा बलि उनकी निष्ठा और साहस से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें एक लाल मूंगा भेंट में दिया और कहा कि यह चमत्कारी मूंगा माँगी हुई वस्तु प्रदान कर सकता है तथा असंभव कार्य भी संभव बना सकता है।
विक्रम राजा बलि को प्रणाम करके पाताल लोक से लौटने लगे। समुद्र तट पर पहुँचकर उन्होंने फिर शंख फूँका। समुद्र पुनः दो भागों में विभक्त हो गया और वे सुरक्षित भूमि मार्ग से वापस मृत्युलोक पहुँच गए।


अपने राज्य लौटते समय उन्हें मार्ग में एक स्त्री विलाप करती हुई मिली। उसके बाल बिखरे हुए थे और वह अत्यंत दुखी दिखाई दे रही थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है और अब वह बिल्कुल असहाय हो गई है।

राजा का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने राजा बलि द्वारा दिए गए चमत्कारी मूंगे से उस स्त्री के पति को जीवनदान देने की प्रार्थना की। जैसे ही उन्होंने प्रार्थना की, वह मृत व्यक्ति गहरी नींद से जागे हुए मनुष्य की भाँति उठकर बैठ गया।

अपने पति को जीवित देखकर उस स्त्री के आनन्द का ठिकाना नहीं रहा। उसने राजा विक्रमादित्य को बार-बार प्रणाम किया और उनकी दया, त्याग तथा परोपकार की प्रशंसा करने लगी।

सिंहासन बत्तीसी: अट्ठाईसवीं पुतली – वैदेही

एक रात राजा विक्रमादित्य ने स्वप्न में एक अद्भुत स्वर्ण महल देखा, जो रत्नों से सजा था और जिसके चारों ओर सुंदर उद्यान फैले थे। वहाँ एक योगी तपस्या कर रहा था जिसका चेहरा बिल्कुल विक्रम जैसा था। जागने के बाद भी वह सपना उनके मन से नहीं निकला।

विद्वानों और ज्योतिषियों ने बताया कि वह स्थान स्वर्गलोक है और इन्द्र स्वयं उन्हें सशरीर स्वर्ग आने का निमंत्रण दे चुके हैं। यह सुनकर विक्रम आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन पंडितों के कहने पर उन्होंने राजपुरोहित के साथ स्वर्ग यात्रा आरम्भ कर दी। रास्ते में उन्होंने अपना राजसी रूप त्याग दिया और साधारण यात्री बनकर निकल पड़े। यात्रा के दौरान उन्हें एक बूढ़ी औरत मिली जिसका बेटा जंगल में लकड़ियाँ लेने गया था और वापस नहीं लौटा था। विक्रम तुरंत उसकी सहायता के लिए घने जंगल में पहुँचे, जहाँ उन्होंने युवक को पेड़ पर डरा हुआ पाया और नीचे एक शेर घात लगाए बैठा था।

उन्होंने साहस दिखाकर शेर को भगा दिया और युवक को उसकी माँ के पास सकुशल पहुँचा दिया। इस तरह उन्होंने पहला पुण्य कार्य किया। आगे समुद्र तट पर उन्हें एक गर्भवती स्त्री मिली जो अपने पति के समुद्री सफर को लेकर भयभीत थी। उसने सपना देखा था कि जहाज भयंकर तूफान में डूब जाएगा। उसकी पीड़ा देखकर विक्रम ने समुद्र देवता से प्राप्त चमत्कारी शंख उसे दे दिया और उसकी शक्ति दिखाने के लिए शंख बजाया, जिससे समुद्र का पानी दूर हट गया और फिर वापस आ गया। स्त्री को विश्वास हो गया और उसने कृतज्ञ होकर शंख स्वीकार कर लिया।

तभी आकाशवाणी हुई कि विक्रम ने दो महान पुण्य किए हैं, इसलिए इन्द्र ने उन्हें स्वर्ग बुलाने के लिए दिव्य घोड़ा भेजा है। राजपुरोहित ने सशरीर स्वर्ग जाने से मना कर दिया, लेकिन विक्रम उस दिव्य घोड़े पर सवार होकर आकाश मार्ग से इन्द्रपुरी पहुँच गए। वहाँ उन्होंने वही स्वर्ण महल देखा जो सपने में दिखाई दिया था। इन्द्रसभा में सभी देवता उन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह गए। स्वयं इन्द्र ने उनका स्वागत किया और अपना सिंहासन देने की इच्छा जताई, लेकिन विक्रम ने विनम्रता से मना कर दिया।

तब इन्द्र ने बताया कि स्वप्न में दिखाई देने वाला योगी स्वयं विक्रम ही थे और उनके पुण्य इतने महान हैं कि स्वर्ग में उनके लिए स्थायी स्थान सुरक्षित हो चुका है। अंत में इन्द्र ने प्रसन्न होकर उन्हें एक दिव्य मुकुट भेंट किया।

सिंहासन बत्तीसी: उन्तीसवीं पुतली – मानवती

उन्तीसवीं पुतली मानवती ने राजा भोज से कहा— “हे राजन्! यदि तुममें भी राजा विक्रमादित्य जैसी उदारता, त्याग, वीरता और चरित्र की महानता है, तभी इस सिंहासन पर बैठने का अधिकार रखते हो।” इतना कहकर उसने यह कथा सुनाई—
राजा विक्रमादित्य प्रजा का हाल जानने के लिए अक्सर रात में भेष बदलकर नगर और राज्य में घूमते थे। एक रात घूमते-घूमते वे नदी के किनारे पहुँचे। चाँदनी रात में नदी का जल अत्यन्त सुन्दर दिखाई दे रहा था। तभी अचानक उन्हें “बचाओ-बचाओ” की आवाज सुनाई दी।

वे तुरंत आवाज की दिशा में दौड़े और देखा कि एक युवक और एक युवती तेज बहाव में डूबने से बचने का प्रयास कर रहे हैं। बिना एक क्षण गंवाए विक्रम नदी में कूद पड़े और दोनों को सुरक्षित किनारे ले आए।
युवक ने बताया कि वे दोनों भाई-बहन हैं और सारंग देश के निवासी हैं। वे अपने परिवार के साथ नाव से यात्रा कर रहे थे, लेकिन नाव भँवर में फँस गई। उनका पूरा परिवार डूब गया, केवल वे दोनों किसी प्रकार बच सके। राजा उन्हें अपने साथ महल ले आए और उनके रहने-खाने की उत्तम व्यवस्था करवाई।

कुछ दिनों बाद युवक ने सोचा कि उसकी बहन अत्यन्त सुन्दर है और यदि उसका विवाह किसी योग्य राजा से हो जाए तो उसका जीवन सँवर जाएगा। उसे लगा कि महाराज विक्रमादित्य स्वयं उसकी बहन से विवाह करने को तैयार हो सकते हैं। वह अपनी बहन को सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सजाकर राजमहल पहुँचा। उसने राजा से कहा कि वह अपनी बहन को उन्हें उपहार स्वरूप अर्पित करना चाहता है।

राजा विक्रमादित्य उसकी बात सुनकर मुस्कुराए और बोले— “आज से तुम्हारी बहन मेरी बहन है। उसका विवाह किसी योग्य राजकुमार से पूरे सम्मान और धूमधाम के साथ कराया जाएगा।” युवक यह सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि इतना शक्तिशाली और ऐश्वर्यवान राजा भी विषय-वासनाओं से इतना ऊपर हो सकता है।

फिर युवक ने बताया कि उदयगिरि के राजकुमार उदयन उसकी बहन से विवाह करना चाहते हैं। राजा ने तुरंत एक पंडित को विवाह प्रस्ताव और बहुत सा धन देकर उदयगिरि भेजा। लेकिन रास्ते में डाकुओं ने पंडित को लूट लिया। यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनके राज्य में डाकू इतने साहसी कैसे हो गए।

उस रात विक्रम स्वयं भेष बदलकर उन डाकुओं की खोज में निकले। उन्होंने चार संदिग्ध व्यक्तियों को देखा और स्वयं को भी चोर बताकर उनके बीच जा बैठे। बातचीत में पता चला कि चारों में अद्भुत गुण थे— एक शुभ मुहूर्त निकालता था, दूसरा पशु-पक्षियों की भाषा समझता था, तीसरा अदृश्य हो सकता था और चौथा कितनी भी यातना सहकर रहस्य नहीं बताता था। विक्रम ने कहा कि वे छिपा हुआ धन पहचान सकते हैं। यह सुनकर डाकुओं ने उन्हें अपने दल में शामिल कर लिया।

राजा उन्हें महल के उस भाग में ले गए जहाँ खजाने का धन रखा था। जैसे ही डाकुओं ने चोरी की, सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। अगले दिन जब वे दरबार में लाए गए तो उन्होंने देखा कि उनका पाँचवाँ साथी ही राजा विक्रमादित्य हैं।

भय से वे काँपने लगे, लेकिन विक्रम ने उन्हें दण्ड देने के बजाय क्षमा कर दिया। उन्होंने उनसे वचन लिया कि वे भविष्य में अपराध नहीं करेंगे और अपनी विशेष योग्यताओं का उपयोग जनता की भलाई में करेंगे। बाद में उन्हें सेना में स्थान भी दे दिया गया।
इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने अपनी मुँहबोली बहन का विवाह उदयगिरि के राजकुमार उदयन के साथ बड़े धूमधाम और सम्मान से कराया, जैसे किसी सगी राजकुमारी का विवाह होता है।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

सिंहासन बत्तीसी भारतीय संस्कृति और लोककथाओं का अद्भुत संग्रह है, जिसमें राजा विक्रमादित्य की वीरता, न्यायप्रियता और बुद्धिमानी की 32 प्रेरणादायक कहानियाँ वर्णित हैं। हर कहानी एक नई सीख देती है और सत्य, धर्म, दया तथा न्याय के महत्व को दर्शाती है। ये कथाएँ मनोरंजन के साथ जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा भी प्रदान करती हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: सिंहासन बत्तीसी
 प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES