सिंहासन बत्तीसी

सिंहासन बत्तीसी कहानियां

15
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

सिंहासन बत्तीसी: तीसवीं पुतली – जयलक्ष्मी

सिंहासन बत्तीसी: तीसवीं पुतली जयलक्ष्मी ने राजा भोज से कहा— “हे राजन्! यदि तुममें भी राजा विक्रमादित्य जैसी तपस्या, त्याग, दानशीलता और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा है, तभी इस सिंहासन पर बैठने का साहस करना।” इसके बाद उसने यह कथा सुनाई—

राजा विक्रमादित्य जितने महान सम्राट थे, उतने ही बड़े तपस्वी भी थे। अपनी तपस्या के प्रभाव से उन्होंने जान लिया था कि उनकी आयु अब केवल छह महीने शेष बची है। मृत्यु को निकट जानकर उन्होंने वन में एक कुटिया बनवा ली थी और राजकाज से जो बचा समय साधना में ही बिताने लगे।

एक दिन की बात है जब वे राजमहल से अपनी कुटिया की ओर जा रहे थे, तभी उनकी दृष्टि एक अत्यंत सुंदर और विचित्र मृग पर पड़ी। उन्होंने धनुष उठाया ही था कि वह मृग मनुष्य की भाषा में बोला— “हे राजन्! मुझे जीवनदान दीजिए।” यह देखकर विक्रम आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने पूछा कि वह मनुष्य की तरह कैसे बोल सकता है।

मृग ने बताया कि वह वास्तव में एक राजकुमार है। शिकार खेलते समय उसने अनजाने में एक साधनारत योगी पर बाण चला दिया था। बाण योगी को तो नहीं लगा, लेकिन उसकी साधना भंग हो गई। क्रोधित योगी ने उसे श्राप देकर मृग बना दिया। बाद में दया आने पर योगी ने कहा कि जब उसे महान राजा विक्रमादित्य के दर्शन होंगे, तभी वह मनुष्य की तरह बोल सकेगा, और यदि वह विक्रम को योगी के पास ले जाएगा तो पुनः मनुष्य बन जाएगा।

विक्रम उस मृगरूपी राजकुमार के साथ जंगल में गए। वहाँ उन्होंने एक योगी को वृक्ष पर उल्टा लटककर तपस्या करते देखा। योगी ने उन्हें देखते ही प्रणाम किया और बताया कि वह केवल उनके दर्शन पाने के लिए वर्षों से तप कर रहा था। उसने कहा कि इन्द्रदेव ने स्वप्न में बताया था कि विक्रमादित्य के दर्शन देवताओं के दर्शन के समान फल देते हैं।

योगी ने विक्रम से उनके गले की इन्द्रदेव द्वारा दी गई मूंगे की माला माँगी। विक्रम ने बिना संकोच वह माला दान कर दी। उसी क्षण मृगरूपी राजकुमार अपने वास्तविक मानव रूप में लौट आया। उसने विक्रम और योगी दोनों के चरण स्पर्श किए।

राजकुमार को साथ लेकर विक्रम उसके राज्य पहुँच गए, लेकिन वहाँ जाकर उन्हें पता चला कि उसके माता-पिता को बंदी बनाकर किसी दूसरे शासक ने राज्य पर अपना अधिकार कर लिया है। विक्रम ने नए शासक को संदेश भेजा और उसमें कहा कि वह तुरंत राज्य लौटाए या युद्ध के लिए तैयार रहे। तभी जब सेनानायक ने उनका उपहास किया तो विक्रमादित्य ने क्रोध में आकर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

कुछ ही देर में शत्रु सेना वह आ पहुँची। विक्रम ने बेतालों का स्मरण किया और अदृश्य होने वाला तिलक लगाकर युद्धभूमि में उतर पड़े। अदृश्य रहकर उन्होंने शत्रुओं का संहार शुरू कर दिया। सैनिक भयभीत होकर भागने लगे। अंत में नया शासक अकेला रह गया। और तब विक्रम उसके सामने प्रकट हुए और उसे राज्य छोड़ने या मृत्यु के लिए तैयार रहने को कहा। विक्रम की वीरता देखकर वह डर गया और तुरंत वह राज्य छोड़कर वहां से भाग गया।

राजकुमार को उसका राज्य वापस दिलाकर विक्रम लौटने लगे। रास्ते में एक जंगल में एक मृग उनके पास आया और एक सिंह से बचाने की विनती करने लगा। लेकिन इस बार विक्रम ने उसकी सहायता नहीं की। उन्होंने सोचा कि सिंह भूखा है और उसका भोजन मृग ही है। प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाना उचित नहीं होगा। इसलिए उन्होंने सिंह को मृग का शिकार करने दिया और आगे बढ़ गए।

सिंहासन बत्तीसी: इकत्तीसवीं पुतली – कौशल्या

इकत्तीसवीं पुतली कौशल्या ने राजा भोज से कहा— “हे राजन्! यदि तुममें भी राजा विक्रमादित्य जैसी दानशीलता, त्याग, तपस्या और महान आत्मबल है, तभी इस सिंहासन पर बैठने का प्रयास करना।” इतना कहकर उसने यह कथा सुनाई—
राजा विक्रमादित्य अब वृद्ध हो चुके थे। अपने योगबल से वे यह जान गए थे कि उनका अन्त समय निकट आ गया है। फिर भी वे पूरे मन से राजकाज और धर्मकार्य करते रहे। उन्होंने वन में साधना के लिए एक अलग आवास भी बनवा रखा था।

एक रात जब वे उसी वन स्थित आवास में थे, तभी उन्होंने दूर पहाड़ियों की दिशा से एक अद्भुत प्रकाश फैलता हुआ देखा। ध्यान से देखने पर उन्हें वहाँ एक दिव्य और चमकता हुआ महल दिखाई दिया। उसकी आभा इतनी अलौकिक थी कि विक्रम के मन में उसे देखने की तीव्र इच्छा जाग उठी। उन्होंने तुरंत माँ काली द्वारा प्राप्त दोनों बेतालों का स्मरण किया। और फिर विक्रमादित्य को बेताल उस पहाड़ी तक ले आए, लेकिन आगे जाने से मना कर दिया। उन्होंने बताया कि उस महल के चारों ओर एक शक्तिशाली योगी ने तांत्रिक सुरक्षा चक्र बना रखा है और उसके भीतर वही प्रवेश कर सकता है जिसका पुण्य उस योगी से अधिक हो।

राजा विक्रमादित्य निडर होकर आगे बढ़े। वे जानना चाहते थे कि उनका पुण्य कितना महान है। जैसे ही वे महल के द्वार तक पहुँचे, एक अग्निपिंड उनके सामने प्रकट हुआ। उसी समय भीतर से आदेश भरी आवाज आई और अग्निपिंड हट गया। विक्रम भीतर पहुँचे तो वहाँ एक तेजस्वी योगी दिखाई दिया।

योगी ने उनका राजा से उनका परिचय पूछा। जब विक्रम ने अपना नाम बताया तो योगी अत्यंत प्रसन्न हुआ और राजा से बोला कि वह स्वयं को भाग्यशाली मानता है कि उसे महान राजा विक्रमादित्य के दर्शन प्राप्त हो गए। उस योगी ने उनका आदर-सत्कार किया और प्रसन्न होकर राजा से कुछ माँगने को कहा।

राजा विक्रमादित्य ने मुस्कुराकर वही दिव्य महल माँग लिया। योगी ने बिना किसी हिचकिचाहट के वह महल उन्हें दान कर दिया और स्वयं वहाँ से चला गया। कुछ दूर जाने पर उसकी भेंट अपने गुरु से हुई। गुरु ने जब उसके भटकने का कारण पूछा तो उसने बताया कि उसने अपना महल राजा विक्रमादित्य को दान कर दिया है। यह सुनकर गुरु हँस पड़े और बोले— “संसार के सबसे बड़े दानी को तुम क्या दान दोगे? जाओ, ब्राह्मण का वेश धारण करके उनसे अपना महल वापस माँगो।”


योगी ब्राह्मण बनकर विक्रम की कुटिया में पहुँचा और रहने के लिए स्थान माँगने लगा। राजा ने कहा कि वह अपनी इच्छानुसार कुछ भी माँग सकता है। तब ब्राह्मण बने योगी ने वही महल माँग लिया। विक्रम मुस्कुराए और बोले— “मैं तो उस महल को वैसे ही छोड़कर आ गया था। मैंने केवल तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए उसे माँगा था।”

इसके बाद कौशल्या ने आगे कहा— “राजा विक्रमादित्य यद्यपि देवताओं के समान गुणों वाले थे, फिर भी वे मनुष्य थे और एक दिन उन्होंने भी इस संसार को छोड़ दिया।”

उनकी मृत्यु के बाद पूरे राज्य में शोक छा गया। प्रजा विलाप करने लगी। जब उनकी चिता सजाई गई तो उनकी रानियाँ भी सती हो गईं। देवताओं ने आकाश से फूलों की वर्षा की।

राजा विक्रमादित्य की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र का राज्याभिषेक किया गया, लेकिन वह अपने पिता के सिंहासन पर बैठ नहीं सका। एक रात उसे स्वप्न में स्वयं विक्रमादित्य दिखाई दिए। उन्होंने कहा— “इस सिंहासन पर वही बैठ सकता है जो अपने पुण्य, यश और गुणों से देवतुल्य बन जाए।”

जब पुत्र को कोई उपाय नहीं सूझा तो उसने विद्वानों की सलाह पर पुनः पिता का स्मरण किया। स्वप्न में फिर विक्रम ने उसे आदेश दिया कि वह उस दिव्य सिंहासन को भूमि में गड़वा दे और उज्जैन छोड़कर अम्बावती में नई राजधानी बसाए। उन्होंने कहा— “भविष्य में जब कोई सर्वगुण सम्पन्न राजा पृथ्वी पर जन्म लेगा, तब यह सिंहासन स्वयं उसके अधिकार में आ जाएगा।”

सिंहासन बत्तीसी: बत्तीसवीं पुतली – रानी रूपवती

बत्तीसवीं पुतली रानी रूपवती ने देखा कि अब राजा भोज के मन में उस दिव्य सिंहासन पर बैठने की कोई लालसा नहीं बची है। उसने आश्चर्य से पूछा कि जो राजा अब तक सिंहासन पाने के लिए इतने उत्सुक थे, वे अचानक इतने शांत और उदासीन क्यों हो गए हैं। तब राजा भोज ने विनम्र स्वर में कहा कि उन्होंने राजा विक्रमादित्य के गुणों, त्याग, न्याय, दान और पराक्रम की जितनी कथाएँ सुनी हैं, उनसे उन्हें यह अनुभव हुआ कि ऐसा महान और दिव्य व्यक्तित्व साधारण मनुष्य में होना लगभग असम्भव है।

उन्होंने स्वीकार किया कि उनमें स्वयं अनेक कमियाँ हैं और वे उस सिंहासन के योग्य नहीं हैं। इसलिए उन्होंने निश्चय किया है कि उस सिंहासन को उसी स्थान पर पुनः गाड़ दिया जाए जहाँ से उसे निकाला गया था।

राजा भोज का यह निर्णय सुनते ही सिंहासन की सभी पुतलियाँ प्रसन्न होकर अपनी रानी के पास आ गईं। और उन्होंने राजा भोज को धन्यवाद देते हुए कहा कि उनके इस विनम्र और धर्मयुक्त निर्णय से वे सब भी आज मुक्त हो गई हैं। पुतलियों ने बताया कि राजा भोज में भी विक्रमादित्य के कुछ गुण अवश्य हैं, तभी उन्हें इस दिव्य सिंहासन के दर्शन और उसकी कथाएँ सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। फिर उन्होंने कहा कि अब यह सिंहासन अपनी अलौकिक शक्ति खो देगा और संसार की अन्य वस्तुओं की तरह समय के साथ पुराना होकर नष्ट होने की प्रक्रिया में चला जाएगा।

इतना कहकर वे सभी पुतलियाँ राजा भोज को प्रणाम करके आकाश की ओर उड़ गईं और कुछ ही क्षणों में अदृश्य हो गईं। उनके जाने के बाद राजा भोज ने मजदूरों को बुलवाया और एक विशाल गड्ढा खुदवाया। जिसके बाद वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ और समस्त प्रजा की उपस्थिति में उस अद्भुत सिंहासन को पुनः भूमि में दबवा दिया गया। फिर उसी स्थान पर वैसा ही टीला बनवा दिया गया जैसा पहले वहां पर हुआ करता था, जहाँ कभी उस जगह पर चरवाहा बैठकर न्याय किया करता था। किंतु अब उस टीले में कोई चमत्कार नहीं रह गया।

समय बीतता गया और वह टीला दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया। लोग जानते थे कि उसके नीचे राजा विक्रमादित्य का चमत्कारी सिंहासन दबा हुआ है। एक दिन कुछ चोरों ने योजना बनाई कि वे उस सिंहासन को निकालकर उसके बहुमूल्य सोने और रत्नों को बेच हम देंगे। उन्होंने टीले से दूर एक सुरंग खोदनी शुरू कर दी और कई महीनों की कठिन मेहनत के बाद अंततः सिंहासन तक पहुँच ही गए। वे उसे चुपचाप निकालकर एक निर्जन स्थान पर ले आए और हथौड़ों से तोड़ने लगे। लेकिन जैसे ही हथौड़े सिंहासन पर पड़ते, उसमें से भयानक चिंगारियाँ निकलतीं और उनके हाथ जल जाते। दिनभर प्रयास करने के बाद भी वह सिंहासन को तनिक क्षति नहीं पहुँचा सके।

थककर वे सोचने लगे कि यह अवश्य कोई भूतिया या कोई दिव्य वस्तु है। तभी उनके सरदार ने सलाह दी कि इसे तोड़ा नहीं जा सकता है, लेकिन किसी दूसरे राज्य में ज्यों का त्यों बेच दिया जाए। वे सिंहासन को कपड़ों में लपेटकर कई महीनों की यात्रा के बाद दक्षिण के एक राज्य में पहुँच गए। वहाँ उन्होंने स्वयं को जौहरी बताकर उस राज्य के राजा को वह रत्नजड़ित सिंहासन दिखाया। उसके बाद वहां के राजा ने अपने श्रेष्ठ सुनारों और जौहरियों से उस सिंहासन की जाँच करवाई। सभी ने उसकी प्रशंसा की और उसे खरीद लेने की सलाह दी। राजा ने चोरों को मुँहमाँगा मूल्य देकर सिंहासन खरीद लिया।

जब वह सिंहासन राजदरबार में स्थापित किया गया तो पूरा दरबार उसकी चमक और रत्नों की रोशनी से जगमगा उठा। दूर-दूर तक उसकी ख्याति फैल गई। यह समाचार अंततः राजा भोज तक भी पहुँचा। उन्हें संदेह हुआ कि कहीं वही विक्रमादित्य का सिंहासन तो नहीं। उन्होंने तुरंत टीले की खुदाई करवाई और वहाँ सुरंग देखकर समझ गए कि सिंहासन चोरी हो चुका है।

राजा भोज स्वयं उस दक्षिणी राज्य में पहुँचे और वहाँ के राजा को पूरी सच्चाई बताई। उस राजा ने आश्चर्य से कहा कि उसे उस सिंहासन पर बैठने में कभी कोई बाधा या परेशानी नहीं हुई। तब राजा भोज ने विद्वानों और ज्योतिषियों से विचार-विमर्श किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि संभव है सिंहासन अपनी दिव्य शक्ति खो चुका हो। जब दोबारा उसकी जाँच की गई तो सभी स्तब्ध रह गए। सिंहासन अब सोने का नहीं बल्कि साधारण पीतल का प्रतीत हो रहा था और बहुमूल्य रत्नों की जगह रंगीन काँच के टुकड़े दिखाई दे रहे थे।


ज्योतिषियों ने गहन विचार के बाद कहा कि यह दिव्य सिंहासन अब मृत हो चुका है। उसकी पवित्रता नष्ट हो गई है और उसका चमत्कार अब समाप्त हो चुका है।

इसलिए अब शास्त्रों के अनुसार उसका अंतिम संस्कार कर देना चाहिए। अंततः निर्णय लिया गया कि उस सिंहासन को विधिपूर्वक जल में प्रवाहित कर दिया जाए।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

सिंहासन बत्तीसी भारतीय संस्कृति और लोककथाओं का अद्भुत संग्रह है, जिसमें राजा विक्रमादित्य की वीरता, न्यायप्रियता और बुद्धिमानी की 32 प्रेरणादायक कहानियाँ वर्णित हैं। हर कहानी एक नई सीख देती है और सत्य, धर्म, दया तथा न्याय के महत्व को दर्शाती है। ये कथाएँ मनोरंजन के साथ जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा भी प्रदान करती हैं।

 लेखक / मूल रचनाकार: सिंहासन बत्तीसी
 प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES