द शैडो प्रोटोकॉल part 1
आकाश शर्मा दिल्ली के एक साधारण साइबर कैफे में सीनियर नेटवर्क टेक्नीशियन था, जिसकी जिंदगी सिर्फ पुरानी केबल्स को बदलने, राउटर फिक्स करने और अपनी बीमार मां के इलाज के बिल चुकाने के इर्द-गिर्द घूमती थी। छब्बीस साल की उम्र में उस पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी, और उसकी मामूली नौकरी से घर का खर्च चलाना हर दिन एक नया संघर्ष साबित हो रहा था।
उसके बॉस ने पिछले तीन महीने से उसकी सैलरी रोक रखी थी, जिसके कारण मकान मालिक ने उन्हें घर खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया था। हर रात जब आकाश सोने की कोशिश करता, तो उसके दिमाग में सिर्फ कर्जदारों के चेहरे और मां की खांसने की आवाजें गूंजती थीं, जिससे उसका दम घुटने लगता था। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी यह बेहद सामान्य और मजबूरियों से भरी जिंदगी अगले कुछ ही घंटों में एक ऐसे खौफनाक मोड़ पर पहुंचने वाली है, जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं होगा।
उस मंगलवार की शाम भी बाकी दिनों की तरह ही सुस्त और थका देने वाली थी, जब कनॉट प्लेस के एक बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस, ‘एपेक्स लॉजिस्टिक्स’ से अचानक एक अर्जेंट सर्वर क्रैश की शिकायत आई। कंपनी के मैनेजर ने आकाश के बॉस को फोन पर धमकी दी थी कि अगर अगले एक घंटे में उनका डेटाबेस ठीक नहीं हुआ, तो वे उनका कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर देंगे।
भारी बारिश और कड़कती बिजली के बीच, आकाश अपना पुराना टूलकिट उठाकर उस चमचमाती हुई चौबीस मंजिला इमारत की तरफ निकल पड़ा, यह सोचकर कि शायद इस काम के बाद उसे कुछ एक्स्ट्रा पैसे मिल जाएं। जब वह उस सुनसान कंपनी के चौदहवें फ्लोर पर स्थित सर्वर रूम में दाखिल हुआ, तो वहां का सन्नाटा अजीब और डरावना था। उसने जैसे ही मेन सर्वर के बैकअप ड्राइव को रीबूट करने के लिए अपना कस्टमाइज्ड पेनड्राइव लगाया, स्क्रीन पर लाल रंग के अजीब कोड्स तैरने लगे, जो किसी सामान्य खराबी के नहीं, बल्कि एक बेहद परिष्कृत डेटा चोरी के संकेत थे।
स्क्रीन पर सामने आ रहे डेटा को देखकर आकाश के पैरों तले जमीन खिसक गई, क्योंकि वह कोई मामूली कॉर्पोरेट फाइल नहीं थी, बल्कि देश के रक्षा मंत्रालय के गोपनीय हथियारों के शिपमेंट की लाइव ट्रैकिंग थी। एपेक्स लॉजिस्टिक्स वास्तव में एक वैध कंपनी की आड़ में अंतरराष्ट्रीय हथियारों के तस्करों का एक बहुत बड़ा और खतरनाक सिंडिकेट चला रही थी, जो देश की सीमा पर तैनात सैनिकों की सुरक्षा को दांव पर लगा रहा था।
आकाश ने घबराहट में जैसे ही अपने पेनड्राइव को निकालने की कोशिश की, सर्वर रूम का भारी ऑटोमैटिक दरवाजा अचानक एक झटके से बंद हो गया और स्क्रीन पर एक मैसेज फ्लैश हुआ—’डेटा ट्रांसफर 100% कम्प्लीट’। ठीक उसी पल, कॉरिडोर में भारी बूटों की आवाजें गूंज उठीं और दो नकाबपोश बंदूकधारी सीधे सर्वर रूम की तरफ बढ़ते हुए दिखाई दिए, जिनके हाथों में साइलेंसर लगी हुई पिस्तौलें चमक रही थीं।
अपनी जान पर बन आई देख आकाश के भीतर का डर अचानक एक ठंडे और तीखेSurvival Instinct में बदल गया, और उसने बिना सोचे-समझे सर्वर रैक के पीछे छिपे वेंटिलेशन शाफ्ट के स्क्रू अपने स्क्रूड्राइवर से खोलने शुरू कर दिए। जैसे ही बंदूकधारियों ने कांच का दरवाजा तोड़कर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, आकाश किसी तरह रेंगते हुए उस संकरे एल्युमिनियम के डक्ट के अंदर घुस गया, जबकि गोलियां उसके ठीक पैर के पास से दीवार में जा धंसीं।
वेंटिलेशन पाइप के भीतर का तापमान बहुत कम था और धूल के कारण उसका दम घुट रहा था, लेकिन वह बिना रुके घुटनों के बल आगे बढ़ता रहा, जबकि नीचे से आतंकियों की वॉकी-टॉकी पर उसे जिंदा या मुर्दा पकड़ने के आदेश गूंज रहे थे। लगभग बीस मिनट तक मौत के उस संकरे रास्ते में रेंगने के बाद, वह इमारत के पिछले हिस्से में मौजूद गंदे कचरे के डंपर में जा गिरा, जिससे उसके दाहिने कंधे की हड्डी खिसक गई, लेकिन दर्द को भुलाकर वह बारिश के अंधेरे में गायब हो गया।
द शैडो प्रोटोकॉल part 2

सुबह होने तक आकाश पूरी तरह से टूट चुका था, उसका शरीर दर्द से टूट रहा था और उसका फोन पूरी तरह से डेड हो चुका था, इसलिए उसने अपने सबसे पुराने दोस्त और दिल्ली पुलिस के सब-इंस्पेक्टर, विवेक से मदद मांगने का फैसला किया। विवेक ने उसे सिविल लाइंस के एक सुनसान और निर्माणाधीन मेट्रो स्टेशन के पास मिलने के लिए बुलाया, जहां पहुंचकर आकाश को थोड़ी राहत महसूस हुई कि अब वह सुरक्षित हाथों में है।
लेकिन जैसे ही आकाश ने विवेक के हाथ में अपनी वह पेनड्राइव सौंपी जिसमें सारा डेटा कॉपी हो चुका था, विवेक के चेहरे के भाव अचानक बदल गए और उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर सीधे आकाश के माथे पर तान दी। विवेक ने बेहद ठंडे लहजे में कहा कि इस सिस्टम में कोई किसी का दोस्त नहीं होता और एपेक्स सिंडिकेट ने उसकी पूरी जिंदगी बदलने की कीमत चुकाई है, जिसे वह एक मामूली टेक्नीशियन के लिए नहीं छोड़ सकता।
विवेक की इस गद्दारी ने आकाश के भीतर के सीधे-सादे लड़के को हमेशा के लिए मार दिया और उसकी जगह एक सतर्क और प्रतिशोधी इंसान को जन्म दिया, जिसने तुरंत अपनी जान बचाने के लिए एक चाल चली। आकाश ने पीछे हटते हुए विवेक को बताया कि जो पेनड्राइव उसने दी है, उसमें एक टाइम-बॉम्ब वायरस है, जो पांच मिनट के भीतर डेटा को डिलीट कर देगा और असली डिक्रिप्शन की केवल आकाश के दिमाग में महफूज है।
इसी कश्मकश के बीच, जब विवेक का ध्यान भटका, आकाश ने पास पड़े एक लोहे के रॉड से विवेक के हाथ पर जोरदार वार किया, जिससे पिस्तौल नीचे गिर गई और दोनों के बीच एक हिंसक और खूनी लड़ाई शुरू हो गई। विवेक अपनी ट्रेनिंग के कारण भारी पड़ रहा था, लेकिन आकाश अपनी मां की सुरक्षा और इस धोखे के गुस्से में अंधा होकर लड़ रहा था, और आखिरकार उसने विवेक को एक गहरे मलबे के गड्ढे में धकेल दिया।
अब आकाश के पास सिर्फ दो रास्ते बचे थे: या तो वह चुपचाप इस डेटा को लेकर कहीं दूर भाग जाए और अपनी मां के साथ एक नई पहचान बना ले, या फिर अपनी जान की बाजी लगाकर देश के दुश्मनों का खात्मा करे। उसने एपेक्स लॉजिस्टिक्स के मुख्य सर्वर को पूरी तरह से तबाह करने और उनके पूरे नेटवर्क को बेनकाब करने के लिए एक आत्मघाती प्लान तैयार किया, क्योंकि सिंडिकेट के गुंडे अब उसकी मां के अस्पताल तक पहुंच चुके थे।
उसने एक पीसीओ से सिंडिकेट के मुख्य सरगना को सीधे फोन किया और उसे गाजियाबाद के एक बंद पड़े केमिकल प्लांट में डेटा के बदले अपनी मां की सुरक्षित रिहाई के लिए बुलाया। प्लांट के अंदर का नजारा बेहद डरावना था, जहां चारों तरफ जहरीले रसायनों के बड़े-बड़े टैंक थे और सिंडिकेट के हेड, राजेश्वर के साथ दर्जनों हथियारबंद शूटर तैनात थे, जिन्होंने आकाश की मां को व्हीलचेयर पर बांध रखा था।
आकाश ने बिना डरे प्लांट के अंदर कदम रखा, लेकिन उसके हाथ में कोई पेनड्राइव नहीं थी, बल्कि उसने अपने शरीर पर एक हाई-फ्रीक्वेंसी ईएमपी (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स) डिवाइस बांध रखी थी, जिसे उसने कैफे के पुर्जों से बनाया था। जैसे ही राजेश्वर ने अपने आदमियों को आकाश पर गोली चलाने का आदेश दिया, आकाश ने उस ट्रिगर को दबा दिया, जिससे पूरे प्लांट की बिजली गुल हो गई और सिंडिकेट के सारे डिजिटल हथियार, कस्टमाइज्ड गन्स और कम्युनिकेशन्स जाम हो गए।
अंधेरे और अफरा-तफरी का फायदा उठाकर आकाश ने अपनी मां की व्हीलचेयर को एक सुरक्षित लोहे के केबिन के पीछे धकेला और खुद उन गुंडों पर टूट पड़ा, जिन्हें उसने अपनी तकनीकी समझ से केमिकल गैसेस रिलीज करके पस्त कर दिया था। भारी गोलीबारी और धमाकों के बीच, आकाश ने राजेश्वर को एक जलते हुए प्लेटफॉर्म पर घेर लिया और उसे कानून के हवाले करने के लिए नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के लाइव सर्वर से कनेक्ट कर दिया।
जब सुबह की पहली किरण उस तबाह हो चुके केमिकल प्लांट पर पड़ी, तो वहां केंद्रीय सुरक्षा बलों की दर्जनों गाड़ियां साइरन बजाती हुई पहुंच चुकी थीं, और राजेश्वर समेत पूरा सिंडिकेट सलाखों के पीछे जा रहा था। आकाश अपनी चोटों के कारण पूरी तरह लहूलुहान था, लेकिन उसकी आंखों में अब एक अलग ही चमक और आत्मविश्वास था, क्योंकि उसने न सिर्फ अपनी मां की जान बचाई थी, बल्कि देश पर आने वाले एक बहुत बड़े खतरे को भी टाल दिया था।
सरकार ने उसकी इस अदम्य बहादुरी और तकनीकी कौशल को देखते हुए उसे नेशनल साइबर डिफेंस सेल में एक चीफ इनवेस्टिगेटर के पद पर नियुक्त किया, जिससे उसकी करियर की सारी मुश्किलें हमेशा के लिए खत्म हो गईं। वह साधारण, डरा हुआ साइबर कैफे का लड़का अब इतिहास के पन्नों में एक अदृश्य रक्षक बन चुका था, जिसने साबित कर दिया कि जब एक आम इंसान को दीवारों के पीछे धकेला जाता है, तो वह सबसे खतरनाक हथियार बन सकता है।
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प्रस्तुति: Saying Central Team