कारागार

कारागार: एक झूठी दुनिया का सच

65
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

कारागार part-1

समीर ने सुबह सात बजे का अलार्म बजने से पहले ही अपनी आँखें खोल दी थीं। उसके सिर में एक हल्का सा दर्द था, जो पिछले कुछ दिनों से उसका लगातार पीछा कर रहा था। उसने खिड़की का परदा हटाया तो बाहर हल्की धुंध और गुनगुनी धूप का एक खूबसूरत मिश्रण दिखाई दिया। उसकी पत्नी, काव्या, हमेशा की तरह रसोई में चाय बना रही थी, जिसकी भीनी-भीनी खुशबू पूरे घर में महक रही थी।

समीर ने अपने बिस्तर से उठकर हाथ-पैर फैलाए और शीशे के सामने जाकर खड़ा हो गया। शीशे में उसे अपना थका हुआ चेहरा दिखाई दिया, लेकिन आँखों में एक अजीब सा खालीपन था, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था। काव्या रसोई से मुस्कुराते हुए आई और उसके हाथ में अदरक वाली चाय का गरमा-गरम कप थमा दिया। उसने कहा कि आज तुम्हें दफ्तर के लिए देर हो रही है, जल्दी तैयार हो जाओ।

समीर ने चाय की चुस्की लेते हुए अखबार उठाया, लेकिन अखबार की तारीखों पर उसका ध्यान कभी नहीं जाता था। उसे बस अपने काम से मतलब था, जो शहर की एक प्रतिष्ठित आर्किटेक्चर फर्म में मुख्य डिजाइनर का था। वह अपनी कार की चाबी उठाकर बाहर निकला, तो कॉलोनी के वॉचमैन, रामू काका ने उसे हमेशा की तरह सलाम किया। समीर ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और अपनी नीली सेडान कार को स्टार्ट कर दिया।

समीर के दफ्तर का रास्ता शहर के सबसे व्यस्त चौराहे से होकर गुजरता था, जहाँ हमेशा भारी ट्रैफिक रहता था। लेकिन आज ट्रैफिक कुछ अलग था, गाड़ियाँ बहुत सलीके से, बिना किसी हॉर्न के, एक कतार में चल रही थीं। समीर को यह थोड़ा अजीब लगा क्योंकि इस शहर के लोग कभी इतने अनुशासित नहीं रहे थे। उसने रेडियो ऑन किया, तो उस पर एक पुराना क्लासिकल संगीत बज रहा था, जो उसके मन को थोड़ा शांत कर रहा था।

जब वह अपने दफ्तर की चौदहवीं मंजिल पर पहुँचा, तो उसके केबिन में पहले से ही कुछ फाइलें रखी हुई थीं। उसके बॉस, मिस्टर शर्मा, ने अंदर आते ही उसकी पीठ थपथपाई और कहा कि तुम्हारा नया प्रोजेक्ट अद्भुत है, समीर। समीर ने मुस्कुराकर शुक्रिया कहा, लेकिन अंदर ही अंदर उसे याद नहीं आ रहा था कि उसने वह प्रोजेक्ट कब पूरा किया था। उसने फाइलों को खोलकर देखा, तो उन पर उसके ही हस्ताक्षर थे, जो बिल्कुल असली लग रहे थे।

लंच के समय, समीर अपनी सहकर्मी नेहा के साथ कैफेटेरिया में बैठा था और उसने अपनी इस उलझन का जिक्र किया। नेहा ने हंसते हुए कहा कि तुम काम के तनाव में चीजें भूलने लगे हो, समीर, तुम्हें थोड़ा आराम करना चाहिए। समीर ने उसकी बात मान ली, क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों से उसे सचमुच ऐसा लग रहा था जैसे उसका समय बहुत तेजी से भाग रहा है। दोपहर के बाद का समय कैसे बीता, समीर को इसका बिल्कुल अंदाजा नहीं लगा।

शाम को जब वह घर लौटा, तो काव्या ने उसके पसंदीदा मटर-पनीर की सब्जी और गरमा-गरम रोटियां बनाई थीं। डिनर टेबल पर दोनों ने आने वाले वीकेंड पर कहीं बाहर घूमने जाने की योजना बनाई, जो बहुत दिनों से टल रही थी। समीर को लगा कि उसकी जिंदगी कितनी मुकम्मल और खूबसूरत है, जहाँ कोई बड़ी परेशानी नहीं थी। सोने से पहले, उसने काव्या का हाथ पकड़ा और कहा कि मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि तुम मेरी जिंदगी में हो।

अगली सुबह फिर वही अलार्म बजा, फिर वही खिड़की की धुंध, और फिर वही चाय की खुशबू जो काव्या लेकर आई थी। समीर को एक पल के लिए लगा कि यह कल की ही सुबह है, क्योंकि हर एक घटना बिल्कुल उसी क्रम में घट रही थी। यहाँ तक कि अखबार की सुर्खियाँ भी वैसी ही थीं और वॉचमैन रामू काका का सलाम करने का अंदाज भी बिल्कुल वैसा ही था। उसने अपनी कार स्टार्ट की और फिर से उसी अनुशासित ट्रैफिक का हिस्सा बन गया।

दफ्तर पहुँचकर उसने देखा कि मिस्टर शर्मा फिर से उसी अंदाज में आए, पीठ थपथपाई और वही शब्द कहे जो उन्होंने कल कहे थे। समीर का माथा ठनका, उसने मिस्टर शर्मा से पूछा कि सर, क्या आपने यह बात कल भी नहीं कही थी? मिस्टर शर्मा जोर से हँसे और बोले कि समीर, तुम कल छुट्टी पर थे, शायद तुम कोई सपना देख रहे हो। समीर हैरान रह गया क्योंकि उसे साफ याद था कि वह कल दफ्तर आया था।

उसने अपनी कुर्सी पर बैठकर अपने फोन का कैलेंडर देखा, तो उस पर आज की तारीख वही थी जो उसे कल लग रही थी। उसने नेहा से पूछा कि क्या कल हम दोनों ने कैफेटेरिया में लंच नहीं किया था? नेहा ने अचरज से उसकी तरफ देखा और कहा कि समीर, कल तो संडे था और ऑफिस बंद था, तुम क्या बातें कर रहे हो? समीर के माथे पर पसीने की बूंदें आ गईं, उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी याददाश्त उसके साथ क्या खेल खेल रही थी।

वह उस दिन काम पर ध्यान नहीं लगा पाया और शाम को बिना किसी को बताए ऑफिस से जल्दी निकल गया। रास्ते में चलते हुए उसने ध्यान दिया कि फुटपाथ पर चल रहे लोग, दुकानों के होर्डिंग्स, और यहाँ तक कि आवारा कुत्ते भी बिल्कुल उसी जगह थे जहाँ वे कल थे। ऐसा लग रहा था जैसे कोई पूरी दुनिया की स्क्रिप्ट को दोबारा प्ले कर रहा हो। समीर ने अपनी कार की रफ्तार बढ़ाई और पागलों की तरह घर की तरफ भागा।

घर पहुँचकर उसने देखा कि काव्या रसोई में वही मटर-पनीर की सब्जी बना रही थी, जिसकी खुशबू हवा में तैर रही थी। समीर ने उसके कंधे को पकड़कर अपनी तरफ घुमाया और चिल्लाकर पूछा कि काव्या, आज क्या तारीख है? काव्या ने डरते हुए कहा कि समीर, आज वही तारीख है जो हमेशा होती है, तुम इतने परेशान क्यों हो? समीर ने उसके हाथ से कड़छी छीन ली और कहा कि मुझे सच बताओ, यहाँ क्या हो रहा है?

काव्या की आँखों में आंसू आ गए और उसने समीर को गले लगा लिया, जिससे समीर का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ। काव्या ने उसे समझाया कि वह बहुत ज्यादा काम कर रहा है, इसलिए उसे मतिभ्रम या ‘डेजा वू’ जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। समीर ने गहरी साँस ली और खुद को समझाया कि शायद काव्या सही कह रही है, वह मानसिक रूप से थक चुका है। उस रात वह जल्दी सो गया, इस उम्मीद में कि कल सब कुछ ठीक हो जाएगा।

लेकिन अगली सुबह जब उसकी आँख खुली, तो नजारा नहीं बदला था; अलार्म की वही टोन, काव्या के हाथ में वही चाय का कप। समीर ने चाय का कप नहीं लिया, बल्कि वह उठकर सीधे घर के बाहर भागा और अपनी कार में बैठ गया। उसने कार को शहर की सीमा की तरफ दौड़ाना शुरू कर दिया, वह इस अतरंगी चक्रव्यूह से बाहर निकलना चाहता था। वह हाईवे पर बढ़ता गया, लेकिन बीस किलोमीटर बाद ही उसने कुछ ऐसा देखा जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए।

हाईवे के आगे एक बहुत बड़ा, काला बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था: “सीमा समाप्त – आगे का डेटा अभी लोड हो रहा है।” समीर ने कार रोकी और अपनी आँखों को मला, उसे विश्वास नहीं हुआ कि वह क्या देख रहा था। उस बोर्ड के पार सिर्फ एक अंतहीन, गहरा काला सन्नाटा था, जहाँ न तो ज़मीन थी और न ही आसमान। उसने कार से उतरकर एक पत्थर उस अँधेरे में फेंका, लेकिन कोई आवाज नहीं आई, जैसे वह पत्थर किसी अनंत खाई में गिर गया हो।

समीर घबराकर पीछे पलटा, तो उसने देखा कि उसकी कार के पीछे का रास्ता भी धीरे-धीरे धुंधला हो रहा था, जैसे कोई उसे मिटा रहा हो। उसने चिल्लाने की कोशिश की, लेकिन उसके गले से आवाज नहीं निकली, हवा में एक अजीब सी भारीपन थी। तभी उसके कानों में एक यांत्रिक, गूँजती हुई आवाज आई, जो किसी इंसान की नहीं लग रही थी। आवाज ने कहा: “सिस्टम एरर 404: सब्जेक्ट चेतना की सीमा को पार करने का प्रयास कर रहा है।”

कारागार part-2

कारागार

समीर की आँखें अचानक खुलीं, लेकिन इस बार वह अपने बिस्तर पर नहीं था, और न ही अलार्म बज रहा था। वह एक बहुत बड़े, चमकदार सफेद कमरे में एक धात्विक स्ट्रेचर पर लेटा हुआ था, और उसके पूरे शरीर पर अनगिनत तारें और ट्यूब्स जुड़ी हुई थीं। उसके सिर पर एक भारी, हेलमेट जैसी मशीन लगी थी, जिससे नीली रोशनी की किरणें उसकी आँखों में जा रही थीं। उसके सामने तीन लोग खड़े थे, जो सफेद लैब कोट पहने हुए थे और उनके हाथों में डिजिटल टैबलेट थे।

उनमें से एक मुख्य डॉक्टर, जिनका नाम डॉ. आर्य था, ने समीर की तरफ देखा और अपने सहायक से कहा कि इसका न्यूरल सिंक टूट रहा है, इसे तुरंत शांत करो। सहायक ने टैबलेट पर कुछ बटन दबाए, और समीर को अपने रीढ़ की हड्डी में एक ठंडा सा अहसास हुआ, जिससे उसका शरीर सुन्न होने लगा। समीर ने कँपकँपाती आवाज में पूछा कि मैं कहाँ हूँ? काव्या कहाँ है? मेरा घर कहाँ है?

डॉ. आर्य ने एक गहरी साँस ली, समीर के पास आए और उसके सिर से उस हेलमेट को धीरे से हटा दिया। उन्होंने कहा कि समीर, शांत हो जाओ, जो तुमने अभी देखा, वह कोई हकीकत नहीं थी, बल्कि एक कृत्रिम सिमुलेशन था। समीर ने चौंककर पूछा कि सिमुलेशन? इसका क्या मतलब है? डॉ. आर्य ने दीवार पर लगे एक विशाल स्क्रीन की तरफ इशारा किया, जहाँ समीर के पूरे जीवन का डेटा ग्राफिक्स के रूप में चल रहा था।

डॉ. आर्य ने खुलासा किया कि समीर, साल 2026 में पृथ्वी पर एक बहुत बड़ा वायरस फैला था, जिसने मानव जाति की नब्बे प्रतिशत आबादी को खत्म कर दिया था। तुम उस वायरस से संक्रमित होने वाले आखिरी कुछ बचे हुए लोगों में से एक हो, जिनका शरीर पूरी तरह से सड़ चुका है। समीर का दिल तेजी से धड़कने लगा, उसने अपने हाथों को देखा, जो अब इंसानी नहीं, बल्कि सिंथेटिक और प्लास्टिक जैसे लग रहे थे।

डॉ. आर्य ने आगे बताया कि तुम्हारी चेतना को बचाने के लिए, सरकार ने ‘प्रोजेक्ट अमरत्व’ की शुरुआत की थी, जिसके तहत इंसानी दिमाग को डिजिटल सर्वर में अपलोड किया जाता है। तुम्हारी पत्नी काव्या और तुम्हारा पूरा शहर वास्तव में दस साल पहले ही खत्म हो चुके हैं। तुम जिस दुनिया में जी रहे थे, वह सिर्फ एक कोड था, एक पुरानी यादों का लूप, जिसे तुम्हारा दिमाग सच मानकर जी रहा था ताकि तुम पागल न हो जाओ।

समीर को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था, उसकी आँखों से आंसू बहने लगे, जो वास्तव में एक पारदर्शी रासायनिक तरल थे। उसने कहा कि नहीं, यह झूठ है, मुझे मेरी काव्या के पास जाना है, मुझे वापस भेजो। डॉ. आर्य के सहायक ने कहा कि सर, इसका इमोशनल इंडेक्स बहुत बढ़ गया है, अगर हमने इसे वापस सिमुलेशन में नहीं भेजा, तो इसका कोर क्रैश हो जाएगा। डॉ. आर्य ने सिर हिलाया और समीर से कहा कि तुम्हें वापस जाना ही होगा, समीर, यही तुम्हारी नियति है।

समीर ने खुद को स्ट्रेचर से छुड़ाने की कोशिश की, उसने तारों को नोचना शुरू कर दिया, जिससे पूरी लैब में लाल बत्तियां जलने लगीं और अलार्म गूँज उठा। वह स्ट्रेचर से नीचे गिरा, लेकिन उसके पैरों में जान नहीं थी, वह फर्श पर रेंगने लगा। उसने देखा कि लैब के कांच के पार हजारों ऐसे ही स्ट्रेचर रखे थे, जिन पर इंसानों के केवल दिमाग कांच के जार में तैर रहे थे, और उनके शरीर मशीनरी के बने थे। यह नजारा किसी नरक से कम नहीं था।

डॉ. आर्य ने सुरक्षाकर्मियों को इशारा किया, जिन्होंने समीर को कसकर पकड़ लिया और वापस स्ट्रेचर पर लिटा दिया। डॉ. आर्य ने समीर की आँखों में देखते हुए कहा कि समीर, हकीकत बहुत क्रूर है, तुम इस मरे हुए संसार में जिंदा रहकर क्या करोगे? उस सिमुलेशन की आभासी दुनिया में तुम्हारी पत्नी जिंदा है, तुम्हारा काम है, तुम्हारी खुशियाँ हैं, वही तुम्हारे लिए सच है। समीर ने रोते हुए कहा कि लेकिन वह सब एक धोखा है, एक झूठ है!

डॉ. आर्य ने मुस्कुराते हुए कहा कि अगर कोई झूठ तुम्हें हमेशा के लिए खुशी दे सकता है, तो क्या वह सच से बेहतर नहीं है? उन्होंने सहायक को आदेश दिया कि सिमुलेशन को रीबूट करो और समीर की यादों से इस लैब के हिस्से को पूरी तरह से डिलीट कर दो। सहायक ने ‘एंटर’ बटन दबाया, और समीर को लगा जैसे उसके दिमाग में बिजली का एक बड़ा झटका लगा हो, उसकी सोच सुन्न होने लगी।

समीर की आँखों के सामने का सफेद कमरा धीरे-धीरे गायब होने लगा, और उसकी जगह फिर से वही धुंधली सुबह और गुनगुनी धूप लेने लगी। वह धीरे-धीरे अपनी चेतना खो रहा था, उसे डॉ. आर्य की आखिरी आवाज सुनाई दी कि “सफलतापूर्वक रीबूट किया गया, नया दिन शुरू करें।” समीर की आँखें बंद हो गईं, और उसका दिमाग फिर से उस डिजिटल मायाजाल के समंदर में डूब गया।

सुबह ठीक सात बजे का अलार्म बजा, और समीर ने अपनी आँखें खोल दीं। उसके सिर में एक हल्का सा दर्द था, जो पिछले कुछ दिनों से उसका लगातार पीछा कर रहा था। उसने खिड़की का परदा हटाया तो बाहर हल्की धुंध और गुनगुनी धूप का एक खूबसूरत मिश्रण दिखाई दिया। उसकी पत्नी, काव्या, हमेशा की तरह रसोई में चाय बना रही थी, जिसकी भीनी-भीनी खुशबू पूरे घर में महक रही थी।

समीर ने बिस्तर से उठकर हाथ-पैर फैलाए, शीशे के सामने खड़ा हुआ और मुस्कुराया, उसे अपनी जिंदगी बहुत खूबसूरत लग रही थी। काव्या ने आकर उसे चाय दी, उसने ऑफिस के लिए कार स्टार्ट की, और फिर से उसी अनुशासित ट्रैफिक का हिस्सा बन गया। सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट था, बिल्कुल वैसा ही जैसा एक आम इंसान की जिंदगी में होना चाहिए। वह पूरी तरह से भूल चुका था कि बाहर की असली दुनिया में वह सिर्फ एक कांच के जार में तैरता हुआ एक बेजान दिमाग था।

लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती; इस सिमुलेशन के सर्वर रूम में, जहाँ समीर का दिमाग रखा था, वहाँ एक बड़ा सा कंप्यूटर कंसोल था। उस मुख्य कंप्यूटर की स्क्रीन पर अचानक एक नया नोटिफिकेशन चमका, जिसने पूरे प्रोजेक्ट के वजूद को हिलाकर रख दिया। स्क्रीन पर लिखा था: “चेतावनी: बाहरी सिस्टम द्वारा हैकिंग का प्रयास – प्रोजेक्ट अमरत्व स्वयं एक सिमुलेशन है।”

उस सर्वर रूम के बाहर, एक और भी बड़ी और अनंत रूप से फैली हुई डिजिटल प्रयोगशाला थी, जहाँ डॉ. आर्य खुद एक स्ट्रेचर पर लेटे हुए थे। डॉ. आर्य के सिर पर भी वही हेलमेट लगा था और उनके शरीर से भी अनगिनत तारें जुड़ी हुई थीं। उनके सामने कुछ एलियन जैसी आकृतियाँ खड़ी थीं, जो उनके दिमाग के डेटा को मॉनिटर कर रही थीं। उनमें से एक आकृति ने कहा कि “सब्जेक्ट डॉ. आर्य का सिमुलेशन ठीक चल रहा है, उन्हें लगता है कि वे इंसानी दिमागों को बचा रहे हैं।”

दूसरी आकृति ने अपने अजीब से डिजिटल पैड पर कुछ कोड दर्ज किए और कहा कि इंसानों की प्रजाति को नष्ट हुए करोड़ों साल बीत चुके हैं। हम सिर्फ उनकी चेतना के अवशेषों को परतों के अंदर परतों (सिमुलेशन के भीतर सिमुलेशन) में रखकर यह अध्ययन कर रहे हैं कि वे भ्रम में कितनी देर तक खुश रह सकते हैं। डॉ. आर्य का दिमाग उस जार में थोड़ा सा कांपा, जैसे उन्हें उस गहरी परत के भीतर भी किसी सच का आभास हो रहा हो।

लेकिन वह आभास भी एक पल में मिटा दिया गया, और डॉ. आर्य के सिमुलेशन में भी एक नई सुबह की शुरुआत हो गई। समीर अपनी आभासी दुनिया में काव्या के साथ खुश था, डॉ. आर्य अपनी आभासी लैब में समीर को बचाकर खुश थे। सत्य क्या था, यह किसी को नहीं पता था, क्योंकि हर सच के पीछे एक और झूठ का पर्दा था, और उस पर्दे के पीछे एक और ऑपरेटर। चेतना का यह कारागार इतना गहरा था कि इससे बाहर निकलने का रास्ता खुद इसके रचयिता भी भूल चुके थे।

समीर ने अपनी कार का स्टीयरिंग घुमाया, रेडियो पर वही पुराना संगीत बज रहा था, और वह अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहा था, यह जानते हुए भी कि मंजिल कभी आने वाली नहीं थी। हर सुबह एक नई शुरुआत थी, और हर रात एक नया अंत, जो कभी खत्म न होने वाले इस डिजिटल नर्क का शाश्वत चक्र था।

रात की चीख – रहस्य और हत्या

अगर आपको ऐसी ही दिलचस्प कहानियाँ पढ़ना पसंद है, तो हमारे WhatsApp चैनल से जुड़िए — वहाँ रोज़ नई stories सबसे पहले मिलती हैं


दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES