रात की चीख

रात की चीख – रहस्य और हत्या

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रात की चीख part-1

शिमला की वादियों में उस रात बर्फबारी उम्मीद से कहीं ज्यादा तेज थी। चारों तरफ सफेद चादर बिछी हुई थी और सर्द हवाएं पेड़ों से टकराकर एक डरावनी गूंज पैदा कर रही थीं। शहर के सबसे आलीशान और पुराने बंगले ‘सनसेट विला’ में एक भव्य पार्टी का आयोजन किया गया था। इस बंगले के मालिक थे मशहूर हीरा व्यापारी देवराज मल्होत्रा, जो अपनी अकूत संपत्ति और रहस्यमयी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। पार्टी में शहर के कई बड़े लोग शामिल थे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी खामोशी और तनाव घुला हुआ था।

ऋषभ, जो शहर का सबसे काबिल और तेजतर्रार प्राइवेट डिटेक्टिव था, भी उस पार्टी में एक मेहमान के रूप में मौजूद था। उसकी गहरी आंखें हर एक चेहरे को बारीकी से पढ़ रही थीं, क्योंकि उसे अपनी छठी इंद्री से कुछ अनहोनी का अहसास हो रहा था। देवराज मल्होत्रा ने हाल ही में नीलामी में एक बेशकीमती और ऐतिहासिक हीरा ‘कोह-ए-नूर का अक्स’ खरीदा था। इसी हीरे को दिखाने के लिए उन्होंने इस खास महफिल को बुलाया था, जहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे।

तभी अचानक रात के ठीक बारह बजे पूरे विला की बिजली गुल हो गई और हर तरफ गहरा अंधेरा छा गया। अगले ही पल सन्नाटे को चीरती हुई एक खौफनाक और दर्दनाक चीख गूंजी, जिसने सबके रोंगटे खड़े कर दिए। वह चीख किसी पुरुष की थी जो दर्द और बेबसी से भरी हुई थी। कुछ ही सेकंड में जब विला का इमरजेंसी जनरेटर चालू हुआ और रोशनी वापस आई, तो वहां का नजारा देखकर सबके होश उड़ गए।

हॉल के बीचों-बीच देवराज मल्होत्रा जमीन पर खून से लथपथ पड़े हुए थे और उनकी सांसें थम चुकी थीं। उनके ठीक बगल में वह कांच का शोकेस टूटा हुआ था, जिसमें वह बेशकीमती हीरा रखा गया था। हीरा गायब हो चुका था और फर्श पर कांच के टुकड़ों के साथ खून की कुछ बूंदें बिखरी हुई थीं। देवराज के सीने पर किसी नुकीले और अजीब हथियार से वार किया गया था, जिससे लगातार खून बह रहा था।

ऋषभ ने तुरंत स्थिति को अपने नियंत्रण में लिया और विला के मुख्य द्वार को बंद करने का आदेश दिया। उसने चिल्लाकर कहा कि जब तक पुलिस नहीं आती, कोई भी अपनी जगह से हिलेगा नहीं क्योंकि कातिल इसी कमरे में मौजूद है। उसने लाश के पास जाकर मुआयना शुरू किया तो उसे देवराज के दाहिने हाथ की मुट्ठी कसकर बंद मिली। जब ऋषभ ने बेहद सावधानी से उनकी उंगलियों को खोला, तो उसके अंदर से एक फटी हुई पुरानी तस्वीर का टुकड़ा मिला।

उस तस्वीर के टुकड़े पर किसी महिला की धुंधली सी आंखें दिखाई दे रही थीं, जो बेहद रहस्यमयी लग रही थीं। इसके अलावा देवराज की जेब से एक छोटी सी सोने की चाबी मिली, जिस पर ‘लॉकर नंबर ९’ खुदा हुआ था। ऋषभ ने कमरे के फर्श पर ध्यान से देखा तो उसे लाश से कुछ दूर एक अजीब सा कीचड़ का निशान दिखाई दिया। शिमला की सूखी बर्फ के बीच वह गीली मिट्टी का निशान बेहद संदेहास्पद था, जो किसी खास जूते का लग रहा था।

जांच को आगे बढ़ाते हुए ऋषभ ने वहां मौजूद मुख्य संदिग्धों को एक अलग कमरे में इकट्ठा किया और उनसे पूछताछ शुरू की। पहला संदिग्ध था देवराज का इकलौता भतीजा विकास मल्होत्रा, जो कर्ज में डूबा हुआ था और हमेशा अपने चाचा से पैसों के लिए लड़ता रहता था। विकास के हाथों पर ताजा खरोंच के निशान थे, जिसे देखकर ऋषभ का शक उस पर गहरा हो गया। विकास ने घबराते हुए कहा कि वह बिल्ली के कारण आई खरोंच थी।

दूसरी संदिग्ध थीं देवराज की युवा और खूबसूरत पत्नी कामिनी मल्होत्रा, जिनका स्वभाव हमेशा से ही रहस्यमयी रहा था। कामिनी के चेहरे पर अपने पति की मौत का कोई खास गम नहीं दिख रहा था, बल्कि उनकी आंखें कमरे के कोनों को तलाश रही थीं। ऋषभ ने गौर किया कि कामिनी के महंगे सैंडल के तलवों पर वही गीली मिट्टी लगी हुई थी, जो कत्लगाह के फर्श पर पाई गई थी। पूछने पर उन्होंने कहा कि वह पार्टी से पहले बगीचे में टहलने गई थीं।

तीसरा संदिग्ध था विला का पुराना और वफादार मैनेजर रामदीन, जो पिछले तीस सालों से मल्होत्रा परिवार की सेवा कर रहा था। रामदीन के व्यवहार में एक अजीब सी घबराहट थी और उसके हाथ लगातार कांप रहे थे। जब ऋषभ ने उससे सवाल किया, तो उसने बताया कि देवराज जी पिछले कुछ दिनों से किसी अज्ञात ब्लैकमेलर से परेशान थे। कोई उन्हें पुराने राज उजागर करने की धमकी देकर करोड़ों रुपये मांग रहा था और वह डरे हुए थे।

चौथा और सबसे दिलचस्प संदिग्ध था एक अनजान मेहमान विक्रम थापा, जो खुद को एक आर्ट डीलर बता रहा था। विक्रम की जेब से ऋषभ को एक कीमती कागज मिला, जो देवराज के उस हीरे की असली बनावट और सुरक्षा प्रणाली का नक्शा था। विक्रम ने सफाई दी कि वह सिर्फ हीरे को खरीदने का प्रस्ताव लेकर आया था और नक्शा उसने इंटरनेट से निकाला था। लेकिन ऋषभ को उसकी आंखों में छुपा हुआ शातिर अपराधी साफ दिखाई दे रहा था।

ऋषभ ने विला के सुरक्षा कक्ष में जाकर सीसीटीवी फुटेज की जांच करने का फैसला किया, ताकि अंधेरा होने के वक्त की हलचल का पता चल सके। लेकिन वहां पहुंचकर उसे निराशा हाथ लगी क्योंकि कातिल बेहद चालाक था और उसने कत्ल से ठीक पहले मेन स्विच रूम से पूरी बिजली काटने के साथ ही कैमरे का बैकअप सिस्टम भी तबाह कर दिया था। इसका मतलब साफ था कि यह काम किसी ऐसे इंसान का था जो विला के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था।

तभी ऋषभ का ध्यान उस फटी हुई तस्वीर के टुकड़े पर गया जो देवराज के हाथ से मिला था। उसने विला की पुरानी एलबमों और फाइलों को खंगालना शुरू किया ताकि उस अधूरी तस्वीर का दूसरा हिस्सा मिल सके। घंटों की मशक्कत के बाद उसे देवराज के निजी स्टडी रूम की अलमारी के पीछे छुपा हुआ एक गुप्त दराज मिला। जब उसने उस दराज को खोला, तो उसके अंदर एक पुरानी डायरी और उस तस्वीर का दूसरा हिस्सा सुरक्षित रखा हुआ था।

जब ऋषभ ने तस्वीर के दोनों टुकड़ों को आपस में जोड़ा, तो पूरा चेहरा सामने आ गया, जिसे देखकर उसके पैर तले जमीन खिसक गई। वह चेहरा किसी और का नहीं बल्कि देवराज की पहली पत्नी सुचित्रा का था, जिनकी मौत बीस साल पहले एक संदिग्ध कार हादसे में हुई थी। डायरी के पन्नों को पलटते ही देवराज का एक खौफनाक अतीत सामने आने लगा, जिसने इस पूरे मामले को एक बिल्कुल नया और खतरनाक मोड़ दे दिया था।

रात की चीख part-2

रात की चीख

डायरी में लिखे शब्द चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे कि बीस साल पहले हुआ वह कार हादसा कोई दुर्घटना नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी। देवराज ने अपनी पहली पत्नी सुचित्रा की संपत्ति हड़पने के लिए अपने ही वफादार मैनेजर रामदीन के साथ मिलकर उनकी कार के ब्रेक फेल करवा दिए थे। सुचित्रा की मौत के बाद देवराज पूरी संपत्ति के मालिक बन गए थे, लेकिन उनका यह गुनाह आज भी एक काले साये की तरह उनका पीछा कर रहा था।

ऋषभ को समझ आ गया कि यह कत्ल सिर्फ हीरे की चोरी के लिए नहीं, बल्कि एक पुराने और गहरे प्रतिशोध का नतीजा था। उसने डायरी को संभालकर अपनी जेब में रखा और वापस उसी कमरे में आया जहां सभी संदिग्धों को बैठाया गया था। बाहर बर्फबारी और तेज हो चुकी थी, जिससे विला का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट चुका था। पुलिस के आने की कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिए ऋषभ को खुद ही इस खेल का अंत करना था।

उसने सभी संदिग्धों के चेहरों को एक बार फिर ध्यान से देखा और कत्ल की रात की कड़ियों को आपस में जोड़ना शुरू किया। उसने विकास से उसके जूतों के बारे में पूछा, तो विकास ने बताया कि उसके जूते बिल्कुल साफ हैं और वह कत्ल के वक्त बार काउंटर के पास खड़ा था। ऋषभ ने कामिनी की तरफ रुख किया और कहा कि आपके सैंडल पर लगी मिट्टी बगीचे की नहीं है, क्योंकि बगीचे में लाल मिट्टी है जबकि यह काली गाद है जो केवल विला के पुराने तहखाने में पाई जाती है।

कामिनी का चेहरा यह सुनकर सफेद पड़ गया और वह लड़खड़ाते हुए पीछे हट गई। ऋषभ ने आगे बढ़ते हुए कहा कि देवराज के पास से जो सोने की चाबी मिली है, वह उसी तहखाने के लॉकर नंबर ९ की है। कातिल को लगा था कि हीरा शोकेस में है, लेकिन देवराज ने पार्टी से ठीक पहले असली हीरा तहखाने के लॉकर में छुपा दिया था और शोकेस में केवल उसका नकली रूप (रेप्लिका) रखा हुआ था। कातिल ने जो चुराया है, वह सिर्फ एक कांच का टुकड़ा है।

यह सुनते ही विक्रम थापा के चेहरे पर झल्लाहट साफ देखी जा सकती थी, उसने अनजाने में अपनी जेब को टटोला जहां उसने वह नकली हीरा छुपा रखा था। ऋषभ ने विक्रम की तरफ इशारा करते हुए कहा कि तुम केवल एक मोहरे हो विक्रम, जिसे असली कातिल ने हीरे की चोरी के लिए इस्तेमाल किया था ताकि पुलिस का ध्यान भटक सके। लेकिन असली कातिल का मकसद हीरा नहीं, बल्कि देवराज मल्होत्रा की जान लेना और अपना पुराना बदला पूरा करना था।

ऋषभ ने अचानक मुड़कर मैनेजर रामदीन की तरफ देखा और उसकी आंखों में देखते हुए कहा कि रामदीन, तुमने बीस साल तक देवराज का हर काला सच अपने सीने में दबाकर रखा। लेकिन तुमने यह कभी नहीं सोचा था कि अतीत का वह भूत एक दिन लौटकर आएगा। रामदीन थर-थर कांपने लगा और उसने हाथ जोड़कर कहा कि साहब, मैंने कुछ नहीं किया, मैं तो बस हुक्म का गुलाम था। ऋषभ ने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं जानता हूं तुमने कत्ल नहीं किया, लेकिन तुम कातिल के मददगार जरूर हो।

कमरे में सन्नाटा छा गया और सबकी सांसें अटक गईं कि आखिर असली कातिल कौन है। ऋषभ ने जेब से वह पुरानी तस्वीर निकाली और उसे सबके सामने लहराते हुए कहा कि बीस साल पहले सुचित्रा जी की मौत के वक्त उनका एक छोटा बच्चा भी था, जिसे दुनिया ने मरा हुआ मान लिया था। लेकिन वह बच्चा जिंदा था और अनाथालय में पलकर बड़ा हुआ, जिसका केवल एक ही मकसद था – अपनी मां की मौत का बदला लेना और अपराधियों को सजा देना।

ऋषभ ने धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ाए और वह विकास मल्होत्रा के सामने जाकर रुक गया। विकास ने हंसते हुए कहा कि डिटेक्टिव साहब, क्या आप मुझ पर शक कर रहे हैं? मैं तो उनका सगा भतीजा हूं। ऋषभ ने तीखी आवाज में कहा कि तुम देवराज के भतीजे नहीं हो विकास, बल्कि तुम सुचित्रा जी के वही खोए हुए बेटे हो। तुमने गोद लिए जाने का नाटक किया और मल्होत्रा खानदान में दाखिल हुए ताकि तुम देवराज के करीब आ सको और अपना जाल बुन सको।

विकास का हंसता हुआ चेहरा पल भर में क्रूरता और नफरत के भाव में बदल गया। ऋषभ ने सबूत पेश करते हुए कहा कि देवराज के सीने पर जिस हथियार से वार किया गया था, वह कोई आम चाकू नहीं बल्कि एक खास सर्जिकल स्कैल्पल था। विकास, तुम एक मेडिकल ड्रॉपआउट हो और तुम्हारे कोट की अंदरूनी जेब में अभी भी उस स्कैल्पल का कवर मौजूद है। जब तुमने देवराज पर वार किया, तो उन्होंने अपनी आखिरी सांसों में तुम्हें पहचान लिया था और तुम्हारा मुखौटा खींचने की कोशिश की थी।

इसी छीना-झपटी में देवराज के हाथ में वह तस्वीर आ गई जो तुमने लॉकेट में छुपा रखी थी, और तुम्हारे हाथ पर खरोंच के निशान आ गए। विकास ने जब देखा कि उसका राज खुल चुका है, तो उसने पागलों की तरह हंसना शुरू कर दिया। उसने चिल्लाकर कहा कि हां, मैंने मारा उसे! उस दरिंदे ने मेरी मां की जान ली थी सिर्फ दौलत के लिए। उसने बीस साल तक ऐश की जिंदगी जी, जबकि मैंने हर एक दिन नरक में काटा। उसे मरने का पूरा हक था और मैंने कोई गुनाह नहीं किया।

विकास ने अपनी जेब से एक छोटी बंदूक निकाली और ऋषभ पर तान दी, उसने कहा कि तुम बहुत चालाक हो ऋषभ, लेकिन आज तुममें से कोई भी यहां से जिंदा नहीं बचेगा। मैं इस पूरे विला को आग लगा दूंगा और सब कुछ राख में बदल जाएगा। लेकिन इससे पहले कि विकास ट्रिगर दबा पाता, कमरे का पिछला दरवाजा जोर से खुला और पुलिस की एक पूरी टीम हथियारों के साथ अंदर दाखिल हो गई। इंस्पेक्टर ने विकास को चारों तरफ से घेर लिया और उसकी बंदूक छीन ली।

ऋषभ ने राहत की सांस ली और इंस्पेक्टर की तरफ देखकर मुस्कुराया। दरअसल, ऋषभ ने पार्टी शुरू होने से पहले ही विला के बाहर अपने एक साथी को तैनात कर रखा था, जिसने बिजली कटते ही वायरलेस के जरिए पुलिस को बैकअप के लिए सूचित कर दिया था। पुलिस बर्फीले रास्ते को साफ करते हुए सही वक्त पर पहुंच गई थी। विकास को हथकड़ियों में जकड़ लिया गया और वह नफरत भरी निगाहों से ऋषभ को देखता हुआ बाहर ले जाया गया।

कामिनी और विक्रम थापा को भी चोरी और साजिश में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि रामदीन को पुलिस ने सरकारी गवाह बना लिया। विला के बाहर सुबह का सूरज अपनी पहली किरणें बिखेर रहा था और बर्फ की सफेदी पर फैली धूप इस बात का प्रतीक थी कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, न्याय की रोशनी उसे मिटा ही देती है। ऋषभ ने अपनी ओवरकोट की कॉलर को ऊपर उठाया और एक और उलझे हुए केस को सुलझाने के सुकून के साथ सनसेट विला की सीढ़ियों से नीचे उतर गया।

मृगतृष्णा – रहस्य और भ्रम

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