नैतिक कहानियां-विभीषण का प्रभु श्रीराम की शरण में आना
लंका में जब रावण ने हनुमानजी की पूँछ में आग लगाई, तो वह आग इतनी भयानक हो गई कि पूरी लंका जलकर भस्म हो गई। इस विनाशकारी अग्नि से केवल रावण के भाई विभीषण का भवन बचा, क्योंकि वे धर्मनिष्ठ, सदाचारी और सत्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति थे, भले ही वे राक्षस कुल में जन्मे थे।
विभीषण हमेशा रावण को समझाते थे कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटा दे और धर्म के मार्ग पर चले, लेकिन रावण ने उनकी बात नहीं मानी और उनका अपमान किया। अपमान और अधर्म देखकर विभीषण अत्यंत दुखी हुए और अंततः उन्होंने रावण का साथ छोड़ने का निर्णय लिया।
वे अपने कुछ विश्वासपात्र साथियों के साथ आकाश मार्ग से उड़ते हुए प्रभु श्रीराम और वानर सेना के पास पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने विनम्रता से बताया कि वे रावण के भाई हैं, लेकिन उसके अधर्म और अन्याय से सहमत नहीं हैं। उन्होंने श्रीराम से शरण और सुरक्षा की प्रार्थना की।
जब सुग्रीव ने यह सुना तो उन्हें संदेह हुआ कि रावण का भाई विश्वास के योग्य है या नहीं। उन्होंने श्रीराम को सावधान किया कि शत्रु पक्ष से आने वाले व्यक्ति पर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए।
तब प्रभु श्रीराम ने शांत भाव से कहा कि शरणागत की रक्षा करना धर्म है। उन्होंने समझाया कि विभीषण रावण के अन्याय से दुखी होकर ही आया है और यदि वह लंका का राजा बनना चाहता है, तो रावण के अंत में वह हमारे लिए सहायक हो सकता है। इसलिए उसे स्वीकार करना उचित है।
श्रीराम की बात मानकर विभीषण को उनके पास लाया गया। विभीषण ने दोनों हाथ जोड़कर श्रीराम से कहा कि वे शरणागत हैं और उनका उद्धार करें। श्रीराम ने तुरंत उन्हें स्वीकार किया और अपने हृदय से लगाया।
इसके बाद विभीषण ने रावण की शक्ति, उसके योद्धाओं और उसकी सेना के बारे में विस्तार से बताया, ताकि श्रीराम युद्ध की रणनीति समझ सकें। उन्होंने बताया कि रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे योद्धा अत्यंत शक्तिशाली हैं।
यह सब सुनकर श्रीराम ने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि वे रावण और उसके पूरे साम्राज्य का अंत करेंगे और धर्म की स्थापना करेंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि विभीषण को लंका का राजा बनाया जाएगा।
अंत में श्रीराम ने लक्ष्मणजी के साथ मिलकर समुद्र के जल से विभीषण का राज्याभिषेक किया और उन्हें लंका का राजा घोषित किया। इस प्रकार विभीषण ने अधर्म छोड़कर धर्म का मार्ग अपनाया और श्रीराम की शरण में आकर अपना जीवन सफल किया।
लंकादहन की कथा-नैतिक कहानियां
सीता माता की खोज में हनुमानजी समुद्र पार करके लंका पहुँचे। वहाँ उन्होंने छोटा रूप धारण कर अशोकवाटिका में प्रवेश किया और माता सीता से भेंट की। माता के आदेश से उन्होंने अपनी भूख शांत करने के लिए वाटिका के फल तोड़कर खाए, जिससे वहाँ के राक्षसों में हड़कंप मच गया। जब राक्षसों ने हनुमानजी को पकड़ने का प्रयास किया, तो उन्होंने अपनी शक्ति से कई राक्षसों को पराजित कर दिया।
यह समाचार रावण तक पहुँचा, जिससे वह अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने अपने पुत्र इंद्रजीत को आदेश दिया कि वह हनुमानजी को बंदी बनाकर लाए। इंद्रजीत ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर हनुमानजी को पकड़ लिया और उन्हें रावण की सभा में प्रस्तुत किया।
रावण ने क्रोध में भरकर अपने मंत्रियों से हनुमानजी से प्रश्न पूछने को कहा कि वे कौन हैं और लंका में क्यों आए हैं। तब हनुमानजी ने शांत भाव से उत्तर दिया कि वे श्रीराम के दूत हैं और सुग्रीव के आदेश से सीता माता की खोज में लंका आए हैं। उन्होंने रावण को धर्म और नीति का पालन करने की सलाह दी और सीता माता को लौटा देने के लिए कहा, अन्यथा उसका विनाश निश्चित बताया।
यह सुनकर रावण और अधिक क्रोधित हो गया और उसने हनुमानजी का वध करने का आदेश दे दिया। तभी विभीषण ने समझाया कि दूत का वध करना धर्म और नीति के विरुद्ध है, इसलिए उन्हें दंड देना उचित है, लेकिन मारना नहीं चाहिए।
रावण ने विभीषण की बात मानते हुए कहा कि दूत का वध नहीं किया जाएगा, लेकिन उसे दंड दिया जाएगा। उसने आदेश दिया कि हनुमानजी की पूँछ में रुई, कपड़े और तेल लगाकर आग लगा दी जाए, ताकि उन्हें अपमानित किया जा सके।
जैसे ही राक्षसों ने हनुमानजी की पूँछ में आग लगाई, हनुमानजी ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी। उनकी पूँछ जलते-जलते और भी लंबी होती गई और वे बंधनों से मुक्त हो गए। इसके बाद वे आकाश में उछलकर पूरी लंका में घूमे और अपनी जलती हुई पूँछ से रावण की सोने की लंका को आग लगा दी।
कुछ ही समय में पूरी लंका जलकर राख हो गई, केवल विभीषण का भवन सुरक्षित बचा रहा क्योंकि वे धर्म के मार्ग पर थे। लंका दहन के बाद हनुमानजी ने समुद्र में अपनी पूँछ की आग बुझाई और फिर अशोकवाटिका में जाकर माता सीता को श्रीराम का संदेश दिया।
इसके बाद वे वापस समुद्र पार कर श्रीराम के पास लौट आए और पूरी घटना का वर्णन किया। यह सुनकर श्रीराम, लक्ष्मण और वानर सेना अत्यंत प्रसन्न हुई और सभी ने हनुमानजी की वीरता और भक्ति की जय-जयकार की।
राधाकुंड की निर्मिति की कथा
कार्तिक अष्टमी का पर्व प्राचीन समय से अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसी पावन तिथि से जुड़ी राधाकुंड की उत्पत्ति की एक प्रसिद्ध कथा है, जो भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के दिव्य प्रेम और लीला को दर्शाती है।
एक समय कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए अरिष्टासुर नामक एक भयंकर असुर को भेजा। वह असुर गाय के बछड़े का रूप धारण करके श्रीकृष्ण की गौशाला में घुस गया और गायों को नुकसान पहुँचाने लगा। श्रीकृष्ण ने तुरंत उसकी असलियत पहचान ली और उसे पकड़कर पृथ्वी पर पटक दिया, जिससे उसका अंत हो गया।
इस घटना को देखकर राधारानी ने श्रीकृष्ण से कहा कि भले ही असुर आया था, लेकिन गाय के रूप में उसका वध करने से गौहत्या का पाप लग सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस पाप से मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण को सभी तीर्थों का दर्शन और स्नान करना चाहिए।
श्रीकृष्ण ने देवर्षि नारद से इसका उपाय पूछा। नारदजी ने बताया कि सभी तीर्थों को एक स्थान पर बुलाकर उनके जल से स्नान करने पर सभी पापों से मुक्ति मिल सकती है। तब श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से एक कुंड की रचना की और सभी तीर्थों का आवाहन किया। सभी पवित्र तीर्थ उस स्थान पर जल रूप में आकर उस कुंड में समा गए।
उस दिव्य जल में स्नान करने से श्रीकृष्ण सभी पापों से मुक्त हो गए और वह स्थान “कृष्णकुंड” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। माना जाता है कि उसमें सभी तीर्थों का सार समाहित है और वह अत्यंत पवित्र स्थान है।
यह देखकर राधारानी ने भी अपने कंगन से उसी स्थान के पास एक और छोटा कुंड बनाया। जब श्रीकृष्ण ने उस कुंड को देखा तो उन्होंने कहा कि राधा द्वारा बनाया गया यह कुंड उनके कुंड से भी अधिक प्रसिद्ध होगा।
इसी प्रकार वह पवित्र स्थान “राधाकुंड” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज भी कार्तिक अष्टमी के दिन इस स्थान पर स्नान का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि यह दिन राधाकुंड और कृष्णकुंड की दिव्य उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है।
गोदावरी नदी की जन्मकथा

स्नान करते समय अक्सर एक पवित्र मंत्र बोला जाता है—“गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती…”। इस मंत्र में भारत की अनेक पवित्र नदियों का स्मरण किया जाता है, जिनमें गोदावरी नदी भी अत्यंत पूजनीय मानी जाती है। आज हम उसी गोदावरी नदी की जन्मकथा सुनते हैं, जो श्रद्धा और आस्था से जुड़ी हुई है।
प्राचीन समय में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग नासिक (महाराष्ट्र) के पास ब्रह्मगिरि पर्वत पर स्थित है, जिसे त्र्यम्बकेश्वर कहा जाता है। इसी पवित्र स्थान से गोदावरी नदी का उद्गम माना जाता है। शिवजी को उनके तीन नेत्रों के कारण त्र्यम्बकेश्वर कहा जाता है, और यह स्थान अत्यंत दिव्य माना जाता है।
एक समय की बात है, महर्षि गौतम पर गौहत्या का झूठा आरोप लग गया था। इस कलंक से दुखी होकर वे ब्रह्मगिरि पर्वत के पास जंगल में चले गए और वहीं कठोर तपस्या करने लगे। उन्होंने धूप, वर्षा, ठंड और अनेक कठिनाइयों को सहते हुए भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या इतनी गहन थी कि पूरा वन दिव्य ऊर्जा से भर गया।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। महर्षि गौतम ने प्रार्थना की कि उनके ऊपर लगा झूठा पाप समाप्त हो जाए और उन्हें पवित्रता प्राप्त हो। उन्होंने यह भी इच्छा व्यक्त की कि देवी गंगा स्वयं वहां प्रकट होकर उन्हें शुद्ध करें।
भगवान शिव ने कहा कि गंगा पहले से ही पृथ्वी पर प्रवाहित हो रही हैं, इसलिए उन्हें वहाँ लाना संभव नहीं है। लेकिन उन्होंने यह आश्वासन दिया कि उसी स्थान पर एक नई पवित्र नदी प्रकट होगी, जो गंगा के समान ही पवित्र होगी। इसके बाद ब्रह्मगिरि पर्वत से एक दिव्य जलधारा निकली और वह नदी गोदावरी के रूप में प्रवाहित होने लगी।
इस प्रकार गोदावरी नदी का जन्म हुआ। हालांकि महर्षि गौतम की मनोकामना गंगा के लिए थी, लेकिन देवी गोदावरी ने स्वयं उनकी भावना को समझा और उनके कल्याण के लिए वहीं स्थायी रूप से प्रवाहित होने का निर्णय लिया। बाद में उसी स्थान पर त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना मानी जाती है।
गोदावरी नदी को गौतमी भी कहा जाता है और इसे “वृद्ध गंगा” के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि इस नदी में स्नान करने से पापों का नाश होता है। यह पवित्र नदी महाराष्ट्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से होकर बहती है और भारतीय संस्कृति में इसका विशेष धार्मिक महत्व है।
नामस्मरण का महत्त्व – भक्त प्रह्लाद की कथा
देवता के नामजप का बहुत बड़ा महत्त्व होता है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति निरंतर भगवान का नामस्मरण करता है, वह उनका सच्चा भक्त बन जाता है और भगवान सदैव उसकी रक्षा करते हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है—“न मे भक्तः प्रणश्यति”, अर्थात भगवान के भक्त का कभी नाश नहीं होता।
इसी दिव्य सत्य को समझाने के लिए भक्त प्रह्लाद की कथा प्रसिद्ध है। भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु बहुत अहंकारी थे और स्वयं को भगवान से भी श्रेष्ठ मानते थे। वे चाहते थे कि पूरा राज्य उनकी ही पूजा करे, लेकिन प्रह्लाद हमेशा “नारायण, नारायण” का जाप करते रहते थे।
हिरण्यकशिपु को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। वह बार-बार प्रह्लाद को धमकाता था कि वह भगवान का नाम लेना छोड़ दे, लेकिन प्रह्लाद ने कभी भी अपना नामस्मरण नहीं छोड़ा। वे दृढ़ विश्वास के साथ कहते रहे कि भगवान नारायण ही उनके सब कुछ हैं।
क्रोध में आकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए। उन्हें उबलते तेल में डाला गया, आग में जलाने की कोशिश की गई और ऊँचाई से फेंका गया, लेकिन हर बार प्रह्लाद सुरक्षित रहे क्योंकि भगवान स्वयं उनकी रक्षा कर रहे थे।
जब किसी भी उपाय से प्रह्लाद को नुकसान नहीं हुआ, तो हिरण्यकशिपु ने गुस्से में आकर पूछा कि तुम्हारा भगवान कहाँ है। उसने खंभे की ओर इशारा करके कहा कि क्या तुम्हारा भगवान इस खंभे में भी है? और क्रोध में उसने खंभे पर प्रहार कर दिया।
तभी वह खंभा टूट गया और उसमें से भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में प्रकट हुए। उन्होंने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और हिरण्यकशिपु का अंत किया। इस प्रकार भगवान ने यह सिद्ध किया कि सच्चे भक्त की हमेशा रक्षा होती है।
इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान का नामस्मरण अत्यंत शक्तिशाली होता है। जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान का नाम लेता है, भगवान हर परिस्थिति में उसकी रक्षा करते हैं। इसलिए हमें भी अपने जीवन में निरंतर नामस्मरण करना चाहिए और श्रद्धा बनाए रखनी चाहिए।
अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।
नैतिक कहानियाँ मनोरंजन के साथ जीवन की अनमोल सीख देती हैं। ये कहानियाँ ईमानदारी, मेहनत, दया, सत्य, अनुशासन और अच्छे संस्कारों का महत्व समझाकर बच्चों और बड़ों को बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करती हैं।
रचनाकार: नैतिक कहानियाँ
प्रस्तुति: Saying Central Team