आत्माराम — मुंशी प्रेमचंद (पुनर्लेखन)
वेदों नाम के गाँव में महादेव नाम का एक बूढ़ा सोनार रहता था। गाँव में उसका बड़ा नाम था, क्योंकि वह सुबह से शाम तक अपनी छोटी-सी दुकान में बैठकर गहनों पर हथौड़ी चलाता रहता था। उसकी अँगीठी से उठती आग और लगातार “खट-खट” की आवाज पूरे मोहल्ले में गूँजती रहती थी। लोग इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि यदि किसी दिन वह आवाज न सुनाई देती, तो गाँव सूना-सूना लगने लगता।
महादेव का शरीर अब कमजोर हो चला था, कमर झुक गयी थी और मुँह पोपला हो गया था, फिर भी वह रोज सुबह अपने तोते का पिंजरा लेकर तालाब की ओर जाता और गुनगुनाता—
“सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता।”
महादेव का परिवार बहुत बड़ा था। उसके तीन बेटे, बहुएँ और कई नाती-पोते थे, लेकिन कोई भी उसका सहारा नहीं था। सब अपने-अपने सुख में लगे रहते थे और बूढ़े महादेव की चिंता किसी को न थी। कई बार ऐसा होता कि घर में झगड़े-कलह के कारण उसे बिना भोजन किये ही सोना पड़ता। वह चुपचाप हुक्का पीता और अपने दुखों को सहता रहता। दुनिया से उसे अधिक लगाव नहीं रह गया था, लेकिन उसका तोता ही उसकी जिंदगी का सबसे प्रिय साथी था। उसी से वह बातें करता और उसी में उसे शांति मिलती थी।
एक दिन अचानक किसी शरारती लड़के ने तोते के पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया। मौका मिलते ही तोता उड़ गया और पास की एक खपरैल पर जाकर बैठ गया। जब महादेव की नजर खाली पिंजरे पर पड़ी, तो उसका दिल बैठ गया। वह घबराकर बाहर भागा और इधर-उधर देखने लगा। उसने पिंजरा उठाकर तोते को पुकारा—
“आ आ… सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता…”
लेकिन तभी गाँव के लड़के तालियाँ बजाने लगे और कौए काँव-काँव करने लगे। डरकर तोता उड़ता हुआ गाँव के बाहर एक पेड़ पर जा बैठा।
महादेव तोते के पीछे ऐसे भागा जैसे उसकी जान उसी में बसती हो। बूढ़ा शरीर होने के बावजूद वह खेतों, रास्तों और बागों में दौड़ता रहा। गाँव के लोग उसका तमाशा देखकर हँसते थे। कोई कंकड़ फेंकता, कोई चिल्लाकर उसे चिढ़ाता। लेकिन महादेव को किसी की परवाह नहीं थी। वह बस अपने तोते को वापस पाना चाहता था। दोपहर की तेज धूप में उसके पैरों के तलवे जल रहे थे, सिर चकरा रहा था, फिर भी वह हार नहीं मान रहा था।
तोता कभी एक डाल पर बैठता, कभी दूसरी डाल पर उड़ जाता कई बार वह पिंजरे के पास आ जाता, दाने और पानी को देखता, लेकिन फिर उड़ जाता। महादेव बार-बार उसे पकड़ने की कोशिश करता, पर हर बार असफल रह जाता। शाम होते-होते यह खेल चलता रहा।
ऐसा लग रहा था मानो एक ओर मोह था और दूसरी ओर माया। बूढ़ा महादेव अपने प्रेम में डूबा था और तोता उसकी पकड़ से बार-बार दूर जा रहा था।
रात हो गयी। चारों ओर घना अँधेरा फैल गया, लेकिन महादेव उसी बाग में बैठा रहा। उसने दिन भर कुछ नहीं खाया था, न पानी पिया था, फिर भी उसे भूख-प्यास का एहसास नहीं था। उसे लग रहा था कि यदि तोता खो गया, तो उसका जीवन भी समाप्त हो जाएगा। वह बार-बार नींद में झपकी लेता, फिर चौंककर उठ जाता और अँधेरे में उसकी आवाज गूँजती—
“सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता…”
आधी रात के समय उसे कुछ लोगों की आहट सुनाई दी। उसने देखा कि पास ही कुछ आदमी दीपक जलाकर बैठे चिलम पी रहे थे। तंबाकू की खुशबू पाकर वह उनके पास गया, लेकिन उसे देखते ही वे सब डरकर भाग गये। तब महादेव को समझ आया कि वे चोर थे। जब वह उनके पास पहुँचा, तो वहाँ एक कलसा रखा मिला। उसने हाथ डालकर देखा, तो उसमें सोने की मोहरें भरी थीं। यह देखकर उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने जल्दी से कलसा उठाया और छिपकर बैठ गया।
अब महादेव के मन में नयी-नयी कल्पनाएँ जन्म लेने लगीं। वह सोचने लगा कि इन मोहरों से वह पक्का मकान बनवाएगा, बड़ी दुकान खोलेगा और सम्मान से जीवन बिताएगा। वह तीर्थ यात्रा करेगा, यज्ञ करवाएगा और गाँव में तालाब तथा मंदिर बनवाएगा। वर्षों बाद उसके मन में सुख और सम्मान की आशा जागी थी। पूरी रात वह इन्हीं सपनों में खोया रहा।
सुबह का समय था। सूरज की हल्की लालिमा फैल रही थी और पक्षी
आदर्श विरोध — मुंशी प्रेमचंद (पुनर्लेखन)

महाशय दयाकृष्ण मेहता के जीवन का सबसे बड़ा सपना उस दिन पूरा हो गया, जब उन्हें वाइसराय की कार्यकारिणी सभा का सदस्य नियुक्त किया गया। यह पद उस समय भारतीयों के लिए अत्यंत सम्मान और गौरव की बात माना जाता था। चारों ओर खुशी की लहर दौड़ गयी। मित्र और शुभचिंतक उन्हें बधाइयाँ देने आने लगे। जगह-जगह दावतें और सभाएँ आयोजित की गयीं। लोग इसे केवल मेहता जी की व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का सम्मान समझ रहे थे।
अंग्रेज अधिकारी भी उन्हें विशेष आदर देने लगे थे। दयाकृष्ण मेहता लखनऊ के प्रसिद्ध बैरिस्टर थे। वे बुद्धिमान, उदार और प्रजाहितैषी व्यक्ति माने जाते थे। राजनीति में उनकी गहरी पकड़ थी और वे जनता के अधिकारों की खुलकर बात करते थे। समाचार-पत्रों में उनकी नियुक्ति पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ छप रही थीं। कुछ लोग इसे सरकार की उदारता बता रहे थे, तो कुछ का कहना था कि राष्ट्र का एक और नेता सत्ता के मोह में फँस गया। फिर भी जनता के एक बड़े वर्ग को उनसे बहुत आशाएँ थीं।
एक शाम कैसरपार्क में उनके सम्मान में एक भव्य पार्टी रखी गयी। प्रांत के बड़े-बड़े नेता और प्रतिष्ठित व्यक्ति वहाँ उपस्थित थे। सभा में वक्ताओं ने आशा व्यक्त की कि मेहता जी जनता के हित में काम करेंगे और शासन की कठोर नीतियों में सुधार लाएँगे। जब मेहता जी बोलने उठे, तो उन्होंने कहा कि कानून परिस्थितियों के अनुसार बनते हैं और केवल इच्छाओं से शासन नहीं बदला जा सकता। उनके इस उत्तर ने सभा में उपस्थित लोगों को सोच में डाल दिया। कुछ ने इसे व्यावहारिक राजनीति कहा, जबकि कुछ निराश हो गये।
दिल्ली आने के बाद धीरे-धीरे मेहता जी का जीवन बदलने लगा। अब वे अंग्रेज अधिकारियों के अधिक निकट रहने लगे थे। उनके परिवार पर भी इस नए वातावरण का प्रभाव साफ दिखाई देता था। उनकी पत्नी राजेश्वरी और बेटी मनोरमा अंग्रेजों के व्यवहार और शिष्टाचार की प्रशंसा करती थीं। मेहता जी भी अब अंग्रेजों को उदार, विनम्र और सभ्य बताने लगे थे।
उनका मानना था कि भारतीयों और अंग्रेजों के बीच दूरी का कारण केवल आपसी मेल-जोल की कमी है।
एक दिन मेहता जी ने अपने परिवार से कहा कि लोग यह समझते हैं कि भारतीय सदस्य परिषद में पहुँचते ही सब कुछ बदल सकते हैं, जबकि वास्तव में उनकी स्वतंत्रता बहुत सीमित होती है। उन्होंने स्वीकार किया कि परिषद के सदस्य सरकार की नीतियों का विरोध करने में संकोच करते हैं, क्योंकि उनका पद सरकार की कृपा पर निर्भर होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब व्यक्ति उच्च पद पर पहुँचता है, तो उसे अनेक प्रकार की जिम्मेदारियाँ और समझौते करने पड़ते हैं। उनके शब्दों में अब पहले जैसा जोश और विद्रोह नहीं रह गया था।
कुछ समय बाद व्यवसाय-मंडल की एक सभा में उद्योगों और व्यापार की उन्नति पर चर्चा हुई। सभा के सदस्यों ने सरकार से माँग की कि वह देशी उद्योगों की सहायता करे और नए कारखाने स्थापित करवाए। लेकिन मेहता जी ने उत्तर देते हुए कहा कि सरकार केवल मार्गदर्शन कर सकती है, उद्योगों को आगे बढ़ाना जनता का काम है। उन्होंने लोगों को आत्मनिर्भर बनने की सलाह दी और बार-बार सरकार पर निर्भर रहने को कमजोरी बताया। उनके इस भाषण ने देशभर में हलचल मचा दी।
समाचार-पत्रों ने उनकी तीखी आलोचना की। कुछ लोगों ने कहा कि सत्ता में पहुँचते ही मेहता जी बदल गये हैं। लोगों को लगा कि जो व्यक्ति पहले सरकार की नीतियों का विरोध करता था, वही अब उनका समर्थन कर रहा है। फिर भी मेहता जी अपने नए विचारों को सही ठहराने में लगे रहे। वे समझते थे कि शासन चलाने वालों की समस्याएँ बाहर से देखने वालों को दिखाई नहीं देतीं।
एक दिन बजट पर चर्चा करते हुए मेहता जी बहुत परेशान दिखाई दिये। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि सरकार उच्च अधिकारियों के वेतन और सेना पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, जबकि जनता गरीबी और बीमारी से जूझ रही है। वे इन खर्चों का विरोध करना चाहते थे, लेकिन उन्हें डर था कि ऐसा करने से उनका सम्मान और पद खतरे में पड़ सकता है। अब वे अपने आदर्शों और पद की मर्यादा के बीच फँस चुके थे।
इसी दौरान राजा भद्रबहादुर सिंह का उनके घर आना-जाना बढ़ गया। राजा साहब उनकी बेटी मनोरमा में विशेष रुचि लेने लगे थे। मेहता जी इस संबंध से बहुत प्रसन्न थे, क्योंकि इससे उनका सामाजिक प्रभाव और बढ़ सकता था। दूसरी ओर, उनका पुत्र बालकृष्ण इन सब बातों से अत्यंत दुखी था। वह विदेश में रहकर राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित हो चुका था और अपने पिता के बदलते स्वरूप को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।
जब मेहता जी ने परिषद में सेना और सुरक्षा पर भारी खर्च का समर्थन किया, तब देशभर में उनकी कड़ी आलोचना हुई। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि शासन का सबसे बड़ा कर्तव्य देश की सुरक्षा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की समस्याओं को उन्होंने गौण बताया। उनके अनुसार यदि पूरा धन भी देश की रक्षा पर खर्च हो जाए, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस भाषण ने जनता को स्तब्ध कर दिया। लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये वही दयाकृष्ण मेहता हैं, जो कभी जनता के हितों की बात किया करते थे।
विदेश में रहने वाला उनका पुत्र बालकृष्ण यह सब पढ़कर बहुत आहत हुआ। उसने अपने पिता को पत्र लिखकर उनके विचारों का विरोध किया। उसके अनुसार मेहता जी ने पद और सम्मान के लिए अपने सिद्धांतों का त्याग कर दिया था। उसने यह भी कहा कि अंग्रेजों की कृपा पाने के लिए अपने राष्ट्र और आत्मा को बेच देना उचित नहीं है। मेहता जी को पुत्र का यह पत्र अत्यंत अपमानजनक लगा। क्रोध में आकर उन्होंने भी कठोर शब्दों में उत्तर लिखा।
कुछ समय बाद लंदन में भारतीय युवकों की एक सभा हुई, जिसमें मेहता जी के भाषण की तीखी आलोचना की गयी। सभा में कहा गया कि उच्च पद प्राप्त करने से व्यक्ति स्वतंत्र नहीं हो जाता, बल्कि वह और अधिक पराधीन हो जाता है। उसी सभा में बालकृष्ण भी उपस्थित था। जब लोगों ने उसके पिता की निंदा की, तो वह यह अपमान सहन न कर सका। वह वहाँ से चुपचाप चला गया।
अगले दिन उसके मित्र जब उससे मिलने पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि बालकृष्ण ने आत्महत्या कर ली है। उसकी मेज पर एक डायरी खुली पड़ी थी, जिसमें लिखा था कि वह अपने पिता के आदर्शों और अपने विचारों के बीच इस संघर्ष को सहन नहीं कर सकता। उसे लगता था कि उसका जीवन अब अपने पिता के मार्ग में बाधा बन गया है। यह घटना मेहता जी के जीवन पर वज्रपात की तरह गिरी।
इस प्रकार “आदर्श विरोध” कहानी यह दिखाती है कि सत्ता और सम्मान के आकर्षण में मनुष्य अपने सिद्धांतों से कितना दूर चला जाता है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से बताया कि जब व्यक्ति अपने आदर्शों से समझौता करता है, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान उसके अपने परिवार और आत्मा को होता है।
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मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणादायक और यथार्थवादी कहानी समाज, मानवता, नैतिकता और जीवन के गहरे सत्य को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। उनकी रचनाएँ पाठकों को सोचने, सीखने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।
लेखक / मूल रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद
प्रस्तुति: Saying Central Team