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अलंकार — तपोभूमि का रहस्य: मुंशी प्रेमचंद

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अलंकार — तपोभूमि का रहस्य: मुंशी प्रेमचंद

नील नदी के शांत किनारों पर उन दिनों दूर-दूर तक तपस्वियों की छोटी-छोटी कुटियाएँ बसी हुई थीं। कहीं मिट्टी की झोंपड़ियाँ थीं, कहीं पत्थरों से बने मठ और कहीं सलीब से सजे गिरजाघर। हर तपस्वी एकांत में रहकर कठोर साधना करता था, पर आवश्यकता पड़ने पर सब एक-दूसरे की सहायता के लिए तत्पर रहते। दिनभर उपवास, रात को थोड़ी रोटी और नमक—यही उनका जीवन था। वे ऊन के मोटे वस्त्र पहनते, धरती पर सोते और अपने शरीर को कष्ट देकर आत्मा को पवित्र बनाने का प्रयत्न करते थे। उनके लिए घाव और कष्ट भी ईश्वर की आराधना का साधन थे।

इन तपस्वियों में कुछ ऐसे थे जो दिन-रात ध्यान में लीन रहते, जबकि कुछ श्रम करके किसानों की सहायता करते थे। कोई ताड़ के रेशों से रस्सियाँ बनाता, कोई खेतों में मजदूरी करता। नगर के लोग उन्हें अक्सर डाकुओं का गिरोह समझते थे, पर वास्तव में उनका जीवन त्याग और आत्मशुद्धि का प्रतीक था। उनका विश्वास था कि धन और सुख केवल भ्रम हैं, सच्चा आनंद तो आत्मा के उद्धार में है। उनके तेज और तपस्या की चर्चाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं और लोग उन्हें अलौकिक शक्तियों का स्वामी मानते थे।

रात्रि के समय यह तपोभूमि किसी अद्भुत युद्धभूमि जैसी प्रतीत होती थी। कहा जाता था कि स्वर्गदूत साधुओं की रक्षा करने आते हैं, जबकि दैत्य और पिशाच उन्हें भ्रमित करने का प्रयास करते हैं।

कई बार तपस्वियों को अपनी कुटियों में मोह और वासना के विचित्र दृश्य दिखाई देते, मानो कोई अदृश्य शक्ति उनकी परीक्षा ले रही हो। लेकिन वे सलीब का स्मरण कर उन प्रलोभनों से बच निकलते। सुबह होते ही वे दुष्ट शक्तियाँ भयभीत होकर भाग जातीं और साधु फिर से ध्यान और प्रार्थना में डूब जाते।

इस तपोभूमि का सबसे प्रसिद्ध महात्मा था पापनाशी। उसके कठोर व्रत और तपस्या की चर्चा पूरे प्रदेश में थी। वह कई-कई दिन उपवास करता, रातभर जागकर प्रार्थना करता और अपने शरीर को कष्ट देकर आत्मशुद्धि में लगा रहता। उसके चारों ओर चौबीस शिष्य रहते थे, जिनमें कई ऐसे लोग भी थे जो पहले डाकू और अपराधी रह चुके थे। अब वही लोग धर्म और संयम का जीवन जी रहे थे। उनमें एक भोला किसान युवक पॉल भी था, जिसे लोग मूर्ख समझते थे, पर साधु उसे ईश्वर का प्रिय मानते थे क्योंकि उसमें भविष्य देखने की अद्भुत शक्ति थी।

पापनाशी स्वयं कभी इस्कन्द्रिया नगर का शिक्षित और समृद्ध युवक था। उसने युवावस्था में ऐश्वर्य, स्वादिष्ट भोजन और रंगशालाओं का आनंद लिया था। लेकिन एक दिन एक संत के उपदेश ने उसका जीवन बदल दिया। उसने अपनी सारी संपत्ति गरीबों में बाँट दी और तपस्या के मार्ग पर चल पड़ा। अब वह अपने पुराने जीवन को पाप समझकर गहरी ग्लानि से भर उठता था। उसे लगता था कि संसार के सुख केवल आत्मा को अंधकार की ओर ले जाते हैं।

एक दिन ध्यान करते हुए उसे अपने पुराने दिनों की एक स्त्री याद आई—थायस। वह इस्कन्द्रिया की अत्यंत सुंदर नर्तकी और रंगमंच की प्रसिद्ध अभिनेत्री थी। उसके रूप और नृत्य पर नगर के धनवान और युवक मोहित रहते थे। पापनाशी भी कभी उसके आकर्षण में पड़ते-पड़ते बचा था। अब उसे यह विचार सताने लगा कि वह स्त्री केवल अपनी ही नहीं, असंख्य लोगों की आत्मा को भी पतन की ओर धकेल रही है। उसके मन में करुणा जागी और उसने निश्चय किया कि वह थायस को पाप के मार्ग से निकालकर ईश्वर की शरण में लाएगा।

उस रात उसे एक विचित्र दृश्य दिखाई दिया। ध्यान में डूबी अवस्था में उसे लगा कि थायस उसके सामने खड़ी है—पहले की तरह रूपवती, पर इस बार उसकी आँखों में गहरी पीड़ा और आँसू थे। उसका चेहरा करुणा से भरा हुआ था, मानो वह स्वयं अपने पापों से दुखी हो। यह दृश्य देखकर पापनाशी की आत्मा काँप उठी। उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि उसे इतनी शक्ति दे जिससे वह उस भटकी हुई स्त्री का उद्धार कर सके। उसी क्षण उसे अपनी कुटिया में एक गीदड़ दिखाई दिया, जो अचानक सलीब का चिन्ह बनाते ही गायब हो गया। पापनाशी समझ गया कि यह दैत्य का संकेत था और उसका मार्ग कठिन होने वाला है।

अगली सुबह वह वृद्ध संत पालम के पास पहुँचा और अपनी योजना बताई। पालम ने उसे सावधान किया कि संसार में लौटना तपस्वी के लिए खतरनाक होता है, जैसे मछली सूखी भूमि पर जीवित नहीं रह सकती। फिर भी पापनाशी का निश्चय अटल था। लौटते समय उसने एक तीतरी को शिकारी के जाल में फँसा देखा।

तभी एक नर तीतर आया और अपनी चोंच से जाल काटकर उसे मुक्त कर गया, पर स्वयं उसी जाल में फँस गया। यह दृश्य पापनाशी के लिए संकेत बन गया—उसे लगा कि वह भी थायस को पाप के बंधन से मुक्त करेगा, चाहे स्वयं संकट में क्यों न पड़ जाए।

रातभर वह इसी विचार में व्याकुल रहा। अंततः उसने निर्णय कर लिया कि ईश्वर का आदेश यही है। उसने अपने शिष्यों को आश्रम का भार सौंपा और अकेला इस्कन्द्रिया की ओर चल पड़ा। वह तपती रेत, भूख और प्यास की परवाह किए बिना यात्रा करता रहा। रास्ते में वह गाँवों और नगरों से बचता, क्योंकि उसे भय था कि कहीं सांसारिक मोह फिर उसके मन को विचलित न कर दे। वह केवल ईश्वर का स्मरण करता हुआ आगे बढ़ता रहा, जबकि उसके मन में थायस को बचाने की तीव्र इच्छा और भी प्रबल होती जा रही थी।

आख़िरी तोहफ़ा (मुंशी प्रेमचंद)

सारे शहर में सिर्फ एक ऐसी दुकान थी, जहाँ विलायती रेशमी साड़ी मिल सकती थीं। और सभी दुकानदारों ने विलायती कपड़े पर कांग्रेस की मुहर लगवायी थी। मगर अमरनाथ की प्रेमिका की फ़रमाइश थी, उसको पूरा करना जरुरी था। वह कई दिन तक शहर की दुकानों का चक्कर लगाते रहे, दुगुना दाम देने पर तैयार थे, लेकिन कहीं सफल-मनोरथ न हुए और उसके तक़ाजे बराबर बढ़ते जाते थे। होली आ रही थी। आख़िर वह होली के दिन कौन-सी साड़ी पहनेगी।

उसके सामने अपनी मजबूरी को जाहिर करना अमरनाथ के पुरुषोचित अभिमान के लिए कठिन था। उसके इशारे से वह आसमान के तारे तोड़ लाने के लिए भी तत्पर हो जाते। आख़िर जब कहीं मक़सद पूरा न हुआ, तो उन्होंने उसी खास दुकान पर जाने का इरादा कर लिया। उन्हें यह मालूम था कि दुकान पर धरना दिया जा रहा है। सुबह से शाम तक स्वयंसेवक तैनात रहते हैं और तमाशाइयों की भी हरदम खासी भीड़ रहती है। इसलिए उस दुकान में जाने के लिए एक विशेष प्रकार के नैतिक साहस की जरुरत थी और यह साहस अमरनाथ में जरुरत से कम था।

पड़े-लिखे आदमी थे, राष्ट्रीय भावनाओं से भी अपरिचित न थे, यथाशक्ति स्वदेशी चीजें ही इस्तेमाल करते थे। मगर इस मामले में बहुत कट्टर न थे। स्वदेशी मिल जाय तो बेहतर वर्ना विदेशी ही सही—इस उसूल के मानने वाले थे। और खासकर जब उसकी फ़रमाइश थी तब तो कोई बचाव की सूरत ही न थी। यों दिल को मजबूत करके वह शाम को दुकान पर पहुँचे। देखा तो पाँच वालंटियर पिकेटिंग कर रहे हैं और दुकान के सामने सड़क पर हज़ारों तमाशाई खड़े हैं।

सोचने लगे, दुकान में कैसे जाएं। कई बार कलेजा मज़बूत किया और चले मगर बरामदे तक जाते-जाते हिम्मत ने जवाब दे दिया। संयोग से एक जान-पहचान के पण्डितजी मिल गये। उनसे पूछा—क्यों भाई, यह धरना कब तक रहेगा? शाम तो हो गयी। पण्डितजी ने कहा—इन सिरफिरों को सुबह और शाम से क्या मतलब, जब तक दुकान बन्द न हो जाएगी, यहां से न टलेंगे। कहिए, कुछ खरीदने को इरादा है? आप तो रेशमी कपड़ा नहीं खरीदते?

अमरनाथ ने विवशता की मुद्रा बनाकर कहा—मैं तो नहीं खरीदता, मगर औरतों की फ़रमाइश को कैसे टालूँ। पण्डितजी ने मुस्कराकर कहा—वाह, इससे ज्यादा आसान तो कोई बात नहीं, औरतों को भी चकमा नहीं दे सकते? सौ हीले-हजार बहाने हैं। अमरनाथ—आप ही कोई हीला सोचिए। पण्डितजी—सोचना क्या है, सौ-पचास हीले हमेशा जेबों में पड़े रहते हैं… इसी तरह कई बातें होती रहीं, तरह-तरह के बहाने सुझाए गए, और आखिर अमरनाथ किसी तरह पीछे के दरवाज़े से दुकान में घुसकर साड़ी खरीद लेता है, लेकिन बाहर निकलते ही स्वदेशी समर्थक एक महिला से उसका सामना होता है जो उसे देशभक्ति और नैतिकता का पाठ पढ़ाती है।

वह शर्मिंदा हो जाता है और झूठ का सहारा लेकर अपनी स्थिति बचाने की कोशिश करता है। बाद में वही महिला उसके घर आने की बात कहती है, और वह और उलझ जाता है। अंत में मालती और वह महिला आमने-सामने आ जाती हैं, जहाँ स्वदेशी बनाम विदेशी, प्रेम और नैतिकता का टकराव गहरा जाता है, और अमरनाथ पूरी तरह मानसिक द्वंद्व में फँस जाता है।

आख़िरी मंज़िल (कहानी) – मुंशी प्रेमचंद

आह! आज तीन साल बीत चुके हैं। वही मकान है, वही बाग है, वही गंगा का शांत किनारा और वही संगमरमर का हौज भी। सब कुछ पहले जैसा ही है, पर मैं पहले जैसा नहीं रहा। इन दीवारों और दृश्यों में अब कोई आकर्षण नहीं बचा। कभी गंगा की हवा और उसकी लहरों का संगीत दिल को जो नशा देता था, वह अब कहीं खो गया है। दिल सूना है… क्योंकि वह युवती अब इस दुनिया में नहीं रही, जिसने मेरे जीवन को अर्थ दिया था।

मोहिनी… उसका रूप साधारण नहीं था, उसमें एक दिव्य आकर्षण था। उसे केवल चाहा नहीं जा सकता था, उसे पूजा जा सकता था। उसके चेहरे पर एक शांत, पवित्र तेज झलकता था। उसकी आँखों में लज्जा, गंभीरता और प्रेम का ऐसा संगम था जो सीधे आत्मा को छू लेता था। उसकी हर चितवन में सच्चाई झलकती थी। जब वह मुझे देखती, तो लगता जैसे मेरे भीतर कोई तूफान उठ गया हो। वह प्रेम बोलकर नहीं, मौन भावों से जीती थी।

उसका प्रेम वासना नहीं था, वह एक शुद्ध, गहरा और आत्मिक भाव था, जिसमें मिलन से अधिक वियोग की मिठास थी। वह कहती थी—“मिलन प्रेम का अंत नहीं, आरंभ है।” उसकी यह बात मेरे हृदय में हमेशा अंकित रह गई। मैं स्वयं समझ नहीं पाता था कि मुझमें ऐसा क्या था जो उसे मुझसे इतना प्रेम था। शायद मेरी कमजोरियाँ ही उसके प्रेम का कारण थीं।

उसमें न चंचलता थी, न बनावटी अदाएँ, न मुस्कान का दिखावा। फिर भी उसके चेहरे पर कभी-कभी जो हल्की मुस्कान आती, वह चाँदनी जैसी कोमल होती और आँखों में आंसुओं की चमक भर देती। वह सौंदर्य नहीं, भावनाओं का जीवंत रूप थी।

एक शाम हम दोनों उसी हौज के किनारे बैठे थे। आसमान में बादल छाए थे, हवा में ठंडक थी और गंगा उफान पर थी। तभी हमने नदी में एक दीपक को बहते देखा। वह छोटा-सा दीपक लहरों से संघर्ष करता आगे बढ़ रहा था, कभी डूबता, कभी उभरता, मानो किसी अदृश्य यात्रा पर निकला हो। उसकी टिमटिमाती रोशनी हमारे मन को बाँध रही थी।

मोहिनी उसे टकटकी लगाकर देखती रही। फिर अचानक उठी और बोली—“मैं उसे पास से देखना चाहती हूँ।” उसके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी। वह नदी की ओर दौड़ पड़ी, मैं भी उसके पीछे गया। अंधेरा गहरा था, नदी उफान पर थी, लेकिन वह रुकी नहीं। वह उसी दीपक की तरह बहते जीवन के पीछे भाग रही थी।

डोंगी में बैठकर हम नदी के बीचों-बीच चले गए। लहरें तेज थीं, हवा डरावनी थी, लेकिन मोहिनी की आँखों में बस वही दीपक था। वह बार-बार कहती—“अभी है… अभी है…” जैसे वह दीपक नहीं, अपना कोई सपना देख रही हो।
तभी उसने एक गीत गाना शुरू किया—
“मैं साजन से मिलन चली…”
उसकी आवाज़ में दर्द भी था और प्रेम भी। ऐसा लगता था जैसे पूरा संसार उस एक धुन में बह रहा हो। नदी, हवा, पेड़—सब उसी गीत के साथ चल पड़े हों।
कुछ देर बाद दीपक दूर जाकर बुझने लगा। उसकी रोशनी धीमी पड़ती गई और फिर अंधेरे में खो गई।

मोहिनी फुसफुसाई—“अब नहीं दिखता… बुझ गया…”
उसके बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा—“क्या यही उसकी आख़िरी मंज़िल थी?”
यह शब्द मेरे दिल में तीर की तरह उतर गए। उसी क्षण मुझे लगा जैसे उस दीपक का अंत ही हमारे प्रेम की कहानी का संकेत था। आँखें भर आईं, और मन भारी हो गया।

उस रात के बाद मोहिनी बदल गई। उसके चेहरे की मुस्कान जैसे खो गई। वह अक्सर उदास रहने लगी। कविता में उसे अब आनंद नहीं, बल्कि अपने दर्द को बहाने का रास्ता दिखता था। वह रोने के लिए कविताएँ पढ़ती और लिखती थी।

कुछ समय बाद एक शाम, जब हम फिर उसी बाग में बैठे थे, चाँदनी फैली हुई थी और गंगा शांत थी। अचानक दूर नदी के उस पार एक चिता जलती दिखाई दी। मोहिनी ने पूछा—“वहाँ क्या जल रहा है?”
मैंने टालने की कोशिश की, पर वह समझ गई। उसकी आँखें भर आईं और वह धीमे स्वर में बोली—“अपनी आख़िरी मंज़िल पर पहुँच गया…”
उस क्षण मुझे लगा जैसे जीवन का हर दीपक, हर प्रेम, हर यात्रा अंततः उसी अनंत अंधकार में विलीन हो जाती है… यही उसकी आख़िरी मंज़िल थी।

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मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणादायक और यथार्थवादी कहानी समाज, मानवता, नैतिकता और जीवन के गहरे सत्य को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। उनकी रचनाएँ पाठकों को सोचने, सीखने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।

लेखक / मूल रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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