अमावस्या की रात्रि

अमावस्या की रात— मुंशी प्रेमचंद

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अमावस्या की रात्रि — मुंशी प्रेमचंद

दीवाली की जगमगाती रात थी। पूरा श्रीनगर दीपों की रोशनी से चमक रहा था, लेकिन उसी नगर में पंडित देवदत्त का विशाल सतधारा भवन अंधकार में डूबा खड़ा था। कभी यह हवेली वैभव और सम्मान का प्रतीक थी, पर अब खंडहर बन चुकी थी। दीवारें टूट रही थीं, आँगन सूना था और गरीबी ने उसके गौरव को निगल लिया था। पंडित देवदत्त अपने पूर्वजों की शान और पुरानी चिट्ठियों के सहारे जीवन काट रहे थे। उन्हीं पुराने कागज़ों में उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा की स्मृतियाँ बसती थीं।

उनकी पत्नी गिरिजा कई दिनों से भयंकर बीमारी से जूझ रही थी। घर में दवा के लिए पैसे नहीं थे। देवदत्त दिन-रात उसकी सेवा करते, उसे सांत्वना देते, लेकिन भीतर से टूट चुके थे। दीवाली की रात जब पूरे नगर में दीप जल रहे थे, तब गिरिजा ने कमजोर आवाज़ में पूछा—“क्या हमारे घर में दीपक नहीं जलेंगे?” यह सुनकर देवदत्त का हृदय फट पड़ा। वह जानते थे कि घर में तेल तक नहीं है। गिरिजा की अंतिम इच्छा भी शायद पूरी न हो सके।

नगर में लाला शंकरदास नाम का वैद्य था। वह दवा से अधिक अपने विज्ञापनों में रुचि रखता था। गरीबों के लिए उसके मन में दया नहीं थी। देवदत्त कई दिनों से उसके पास जाते रहे, लेकिन हर बार अपमानित होकर लौटते। उस रात भी वे हाथ जोड़कर वैद्य के घर पहुँचे और गिरिजा की जान बचाने की विनती की। परंतु स्वार्थी वैद्य ने उनकी गरीबी देखकर आने से इंकार कर दिया। निराश होकर देवदत्त लौट आये।

घर पहुँचकर उन्होंने सोचा कि अब इन पुराने कागज़ों और हुंडियों का क्या उपयोग, जिनसे पत्नी की जान भी नहीं बच सकती। वे एक-एक करके उन कागज़ों को दीपक की लौ में जलाने लगे। तभी अचानक बाहर से हाथियों और मशालों की आवाज़ सुनाई दी। एक युवा ठाकुर अपने सेवकों के साथ वहाँ आया। उसने विनम्रता से बताया कि उसके पूर्वजों ने देवदत्त के पूर्वजों से पच्चीस हजार रुपये उधार लिये थे। अब वह गया जाकर अपने पूर्वजों का श्राद्ध करना चाहता था, इसलिए वह यह ऋण चुकाने आया है। ब्याज सहित वह रकम पचहत्तर हजार रुपये हो चुकी थी।

ठाकुर ने ऋण की पुरानी चिट्ठी माँगी। देवदत्त के मन में भय पैदा हुआ कि कहीं वह कागज़ अभी-अभी जल न चुका हो। काँपते हाथों से उन्होंने बचे हुए कागज़ टटोलने शुरू किये और सौभाग्य से वह पत्र मिल गया। ठाकुर ने तुरंत पचहत्तर हजार रुपये उनके सामने रख दिये। देवदत्त खुशी से पागल हो उठे। उन्हें लगा कि अब गिरिजा बच जायेगी, अब उनका दुःख समाप्त हो जायेगा।

वे दौड़ते हुए गिरिजा के पास पहुँचे और उत्साह से बोले—“गिरिजा, देखो भगवान ने हमारी सुन ली!” लेकिन जब उन्होंने चादर हटाई, तो पाया कि गिरिजा संसार छोड़ चुकी थी। उसकी देह शांत पड़ी थी। देवदत्त वहीं बैठ गये। उनकी आँखों से आँसू नहीं, मानो रक्त टपक रहा था। उन्हें लगा जैसे भगवान ने धन देकर उनकी सबसे प्रिय वस्तु छीन ली हो।

अगली सुबह वे पागलों की तरह पचहत्तर हजार रुपये लेकर वैद्य शंकरदास के घर पहुँचे और नोट उसके सामने फेंककर बोले—“ये लो तुम्हारी फीस! बस मेरी गिरिजा को एक बार जगा दो।” वैद्य के हृदय पर यह वज्राघात था। पहली बार उसे अपनी कठोरता और लालच पर पश्चाताप हुआ। उसने सिर झुकाकर कहा कि वह जीवन भर इस अपराध को नहीं भूल सकेगा।

यह कहानी केवल गरीबी और दुःख की कथा नहीं, बल्कि मनुष्य के स्वार्थ, धन के अहंकार और सच्चे प्रेम की गहरी व्यथा है। प्रेमचंद ने दिखाया कि धन कभी जीवन और प्रेम की भरपाई नहीं कर सकता। जब तक मनुष्य के पास अपना प्रिय होता है, तब तक वही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति है; उसके चले जाने पर संसार का सारा वैभव भी अर्थहीन हो जाता है।

अलग्योझा — मुंशी प्रेमचंद

गाँव के किसान भोला महतो ने अपनी पहली पत्नी के मर जाने के बाद दूसरी शादी कर ली। उसकी दूसरी पत्नी का नाम पन्ना था। भोला का छोटा-सा बेटा रग्घू उस समय केवल दस साल का था। पहले वह गाँव में बच्चों के साथ खेलता-कूदता था, लेकिन सौतेली माँ के आते ही उसकी जिंदगी बदल गई।

अब वही गोबर उठाता, बैलों को चारा देता, बर्तन माँजता और घर के सारे काम करता। पन्ना रूपवती थी और अपने रूप पर उसे बड़ा घमंड था। वह खुद कोई काम नहीं करती थी। भोला भी पत्नी के कहने में आकर रग्घू को ही हर बात का दोषी मानता था। धीरे-धीरे रग्घू ने शिकायत करना छोड़ दिया, क्योंकि उसकी सुनने वाला कोई नहीं था।

समय बीतता गया। आठ साल बाद भोला की मृत्यु हो गई। पन्ना के चार छोटे-छोटे बच्चे थे और कमाने वाला कोई नहीं था। अब उसे डर था कि रग्घू अपनी पत्नी लाकर अलग हो जाएगा और उसे बच्चों सहित बेसहारा छोड़ देगा। लेकिन रग्घू के मन में परिवार के लिए प्रेम और जिम्मेदारी थी। एक दिन पन्ना ने देखा कि रग्घू बच्चों के लिए लकड़ी की छोटी-छोटी गाड़ियाँ बना रहा है और उन्हें प्यार से खिलाता है। यह देखकर उसका मन बदलने लगा। उसे पहली बार लगा कि रग्घू बुरा नहीं, बल्कि बहुत दयालु है।

रग्घू ने अपने भाइयों की खुशी के लिए अपनी मुहर बेचकर गाय खरीदने का फैसला किया ताकि बच्चों को दूध मिल सके। पन्ना उसकी त्याग-भावना देखकर भावुक हो गई। अब उसके मन में रग्घू के लिए सम्मान और स्नेह पैदा हो गया।

कुछ वर्षों बाद रग्घू जवान हो गया। उसकी पत्नी मुलिया मायके से घर आई। वह सुंदर थी, लेकिन मन से स्वार्थी और अहंकारी थी। उसे यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि रग्घू अपनी कमाई भाइयों और पन्ना पर खर्च करे। वह चाहती थी कि घर अलग हो जाए ताकि सारी कमाई केवल उसके परिवार पर लगे।

धीरे-धीरे घर में तनाव बढ़ने लगा। मुलिया अक्सर झगड़ा करती और कहती कि वह किसी की गुलामी नहीं करेगी। रग्घू बहुत समझाता, लेकिन वह नहीं मानी। एक दिन दशहरे के मेले के समय पैसे को लेकर बड़ा झगड़ा हो गया। मुलिया ने खाना-पीना छोड़ दिया और साफ कह दिया कि अब वह तभी खाएगी जब घर अलग होगा।

रग्घू यह सुनकर टूट गया। उसके लिए परिवार केवल एक घर नहीं, बल्कि उसके जीवन का आधार था। उसने कहा— “जिस दिन इस घर में दो चूल्हे जलेंगे, उस दिन मेरे कलेजे के दो टुकड़े हो जाएँगे।” लेकिन आखिरकार परिस्थितियों के सामने उसे झुकना पड़ा और घर बँट गया।

इस अलगाव ने रग्घू को भीतर से तोड़ दिया। पहले जो घर प्रेम और अपनापन से भरा था, अब उसमें दूरी और परायापन आ गया। खेत अलग हो गए, बैल अलग बँध गए और दिल भी अलग हो गए। रग्घू दिन-रात मेहनत करता रहा, लेकिन चिंता और दुख ने उसे कमजोर बना दिया। वह समय से पहले बूढ़ा लगने लगा। उसे लगातार बुखार और खाँसी रहने लगी। इलाज कराने के पैसे भी नहीं थे।

उधर पन्ना और उसके बच्चे भी दुखी थे। उन्हें अब समझ आने लगा था कि रग्घू ने उनके लिए कितना त्याग किया था। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आखिरकार एक दिन रग्घू की मृत्यु हो गई। उसकी मौत के साथ ही पूरे परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा।

अब मुलिया अकेली पड़ गई। खेती-बाड़ी संभालना कठिन हो गया। गाँव वाले भी उसे ताने देते कि उसी की जिद और स्वार्थ ने रग्घू की जान ले ली। तभी पन्ना ने उसके दुख में उसका साथ दिया। उसने मुलिया के बच्चों को अपने बच्चों की तरह प्यार दिया। केदार और उसके भाई भी रग्घू के परिवार की जिम्मेदारी उठाने लगे।

समय बीतता गया। केदार बड़ा होकर घर का मालिक बना, लेकिन उसने शादी नहीं की। वह कहता था कि उसे अपने भैया रग्घू के बच्चों में ही अपना परिवार दिखाई देता है। आखिर में पन्ना ने केदार और मुलिया के विवाह की बात छेड़ी। यह सुनकर मुलिया लजा गई। उसके सूने जीवन में जैसे फिर से आशा की किरण जाग उठी।

इस प्रकार प्रेमचंद ने “अलग्योझा” कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया कि परिवार का बँटवारा केवल दीवारों का नहीं, दिलों का भी होता है। स्वार्थ और अलगाव इंसान को भीतर से खोखला कर देते हैं, जबकि प्रेम, त्याग और अपनापन ही परिवार की असली ताकत होते हैं।

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मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणादायक और यथार्थवादी कहानी समाज, मानवता, नैतिकता और जीवन के गहरे सत्य को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। उनकी रचनाएँ पाठकों को सोचने, सीखने और बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं।

लेखक / मूल रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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