श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस का अंत किया
मथुरा वर्षों से भय और अत्याचार के अंधकार में डूबी हुई थी। वहां का राजा कंस शक्ति और क्रूरता के नशे में इतना अंधा हो चुका था कि उसकी प्रजा दिन-रात डर के साये में जीती थी। जिसने भी उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की कोशिश की, उसे मृत्यु दे दी जाती। लेकिन कंस के मन में सबसे बड़ा भय उस भविष्यवाणी का था जिसने उसकी नींद छीन ली थी। आकाशवाणी हुई थी कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगा।
इसी भय में पागल होकर कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में कैद कर दिया। उसने उनके कई नवजात पुत्रों को जन्म लेते ही मार डाला। लेकिन जब आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण ने जन्म लिया, तब स्वयं भगवान की माया से वे गोकुल पहुंचा दिए गए। कंस को वर्षों तक यही भ्रम रहा कि वह बालक कहीं छिपा हुआ है, लेकिन धीरे-धीरे उसे समाचार मिलने लगे कि गोकुल में एक अद्भुत बालक है जिसने कई भयानक राक्षसों का अंत कर दिया है।
पूतना वध, कालिया नाग दमन, गोवर्धन धारण जैसी घटनाओं ने कंस के भय को और बढ़ा दिया। अब उसे पूरा विश्वास हो चुका था कि वही बालक कृष्ण है। उसने निश्चय किया कि अब वह स्वयं कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाकर उनका अंत करेगा।
कंस ने एक विशाल धनुष यज्ञ और मल्लयुद्ध प्रतियोगिता का आयोजन करवाया। उसने अक्रूर को गोकुल भेजा और आदेश दिया कि कृष्ण और बलराम को सम्मानपूर्वक मथुरा लाया जाए। जब अक्रूर गोकुल पहुंचे और उन्होंने कृष्ण को यह समाचार दिया, तब पूरा वृंदावन दुख में डूब गया। गोपियां रोने लगीं। यशोदा माता का हृदय कांप उठा। उन्हें ऐसा लग रहा था मानो उनका कन्हैया उनसे दूर जा रहा है।
लेकिन कृष्ण शांत थे। वे जानते थे कि अब समय आ चुका है।
अगले दिन कृष्ण और बलराम रथ पर बैठकर मथुरा के लिए निकल पड़े। रास्तेभर वृंदावन की गोपियां उन्हें रोकने की कोशिश करती रहीं। कई लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन कृष्ण मुस्कुराते हुए सबको सांत्वना देते रहे।
जब कृष्ण पहली बार मथुरा पहुंचे, तब पूरा नगर उन्हें देखने उमड़ पड़ा। लोगों ने ऐसा तेजस्वी और सुंदर युवक पहले कभी नहीं देखा था। कृष्ण की आंखों में दिव्य चमक थी और उनके चेहरे पर अद्भुत शांति। मथुरा के लोग उन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो गए।
उसी दौरान कृष्ण की नजर एक गरीब फूल बेचने वाले पर पड़ी। उसने प्रेम से कृष्ण को फूलों की माला पहनाई। बदले में कृष्ण ने उसे सुख और समृद्धि का आशीर्वाद दिया। फिर वे आगे बढ़े और एक कुबड़ी स्त्री कुब्जा से मिले, जो चंदन ले जा रही थी। कृष्ण ने प्रेम से उसका हाथ पकड़ा और अगले ही क्षण उसका शरीर सीधा और सुंदर हो गया। यह देखकर पूरा नगर चमत्कृत रह गया।
लेकिन कंस के महल में भय बढ़ता जा रहा था। उसे बार-बार अपशकुन दिखाई दे रहे थे। रातभर उसे नींद नहीं आई। उसे लग रहा था कि मृत्यु धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रही है।
अगले दिन विशाल रंगभूमि में मल्लयुद्ध का आयोजन हुआ। हजारों लोग वहां इकट्ठा थे। ऊंचे सिंहासन पर कंस बैठा था। उसके चेहरे पर क्रूर मुस्कान थी, लेकिन भीतर भय छिपा हुआ था।
सबसे पहले कंस ने अपने विशाल हाथी कुवलयापीड़ को आदेश दिया कि वह प्रवेश द्वार पर ही कृष्ण को कुचल दे। वह हाथी अत्यंत भयानक और युद्ध में प्रशिक्षित था। जैसे ही कृष्ण द्वार पर पहुंचे, हाथी चिंघाड़ता हुआ उनकी ओर दौड़ा।
लेकिन अगले ही क्षण कृष्ण बिजली की गति से आगे बढ़े। उन्होंने हाथी की सूंड पकड़ ली और उसे इतनी शक्ति से घुमाया कि विशाल हाथी धरती पर गिर पड़ा। फिर कृष्ण ने उसका अंत कर दिया।
पूरा मथुरा स्तब्ध रह गया।
इसके बाद कृष्ण और बलराम रंगभूमि में पहुंचे। वहां कंस के सबसे भयानक पहलवान—चाणूर और मुष्टिक—उनका इंतजार कर रहे थे। चाणूर का शरीर पर्वत जैसा विशाल था। उसने क्रोधित होकर कृष्ण को ललकारा।
“ग्वाले! आज तेरा अंत निश्चित है।”
कृष्ण मुस्कुराए।
“अहंकार हमेशा हारता है।”
युद्ध शुरू हुआ। चाणूर पूरी शक्ति से कृष्ण पर टूट पड़ा, लेकिन कृष्ण के सामने उसकी ताकत व्यर्थ साबित हो रही थी। कुछ ही देर में कृष्ण ने उसे पकड़कर इतनी जोर से भूमि पर पटक दिया कि उसका प्राण निकल गया। दूसरी ओर बलराम ने मुष्टिक का अंत कर दिया।
पूरा मैदान जयकारों से गूंज उठा। लोग पहली बार आशा की रोशनी महसूस कर रहे थे।
लेकिन कंस अब भय से कांप उठा था। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। उसने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया—
“इन दोनों को पकड़ लो! वसुदेव और नंद को मार डालो!”
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
कृष्ण की आंखों में दिव्य तेज चमक उठा। वे एक ही छलांग में ऊंचे मंच पर पहुंच गए जहां कंस बैठा था। कंस घबराकर पीछे हटने लगा। उसके हाथ कांप रहे थे।
“नहीं… नहीं… मुझे मत मारो!”
लेकिन श्रीकृष्ण शांत स्वर में बोले,
“जिसने निर्दोषों पर अत्याचार किया, उसका अंत निश्चित है।”
अगले ही क्षण कृष्ण ने कंस के बाल पकड़कर उसे सिंहासन से नीचे खींच लिया। पूरा राजमहल कांप उठा। फिर उन्होंने उसे भूमि पर पटक दिया। कुछ ही क्षणों में अत्याचारी कंस का अंत हो चुका था।
पूरा मथुरा मौन हो गया।
फिर अचानक चारों ओर से जय-जयकार गूंज उठी।
“कृष्ण भगवान की जय!”
लोगों की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। वर्षों बाद मथुरा भय से मुक्त हुई थी। कारागार के द्वार खोले गए। वसुदेव और देवकी को कैद से मुक्त किया गया। अपने पुत्रों को सामने देखकर उनकी आंखें भर आईं।
कृष्ण ने आगे बढ़कर अपने माता-पिता के चरण स्पर्श किए। देवकी कांपते हाथों से उनके चेहरे को छूने लगीं। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनका वही पुत्र आज पूरे संसार का रक्षक बनकर खड़ा है।
उस दिन केवल कंस का वध नहीं हुआ था…
उस दिन अहंकार, अत्याचार और अधर्म का अंत हुआ था।
और मथुरा की धरती ने पहली बार खुलकर सांस ली थी।
जब श्रीकृष्ण की रासलीला में प्रेम ने समय और संसार की सीमाएं तोड़ दीं

वृंदावन की वह रात साधारण नहीं थी। शरद पूर्णिमा का चांद पूरे आकाश में अपनी शीतल चांदनी बिखेर रहा था। यमुना का जल चांदी की तरह चमक रहा था। पेड़ों की पत्तियां मंद हवा में धीरे-धीरे झूम रही थीं और पूरा वन किसी दिव्य स्वप्न जैसा दिखाई दे रहा था। उस रात वातावरण में एक ऐसी अद्भुत शांति थी, मानो स्वयं प्रकृति किसी अनोखी घटना की प्रतीक्षा कर रही हो।
उसी समय नंदलाल श्रीकृष्ण अकेले यमुना किनारे खड़े थे। उनके हाथों में बांसुरी थी। उनके चेहरे पर मधुर मुस्कान थी और आंखों में अनंत प्रेम की चमक। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी बांसुरी को होंठों से लगाया।
जैसे ही बांसुरी की पहली धुन वृंदावन में गूंजी, पूरा वातावरण बदल गया।
वह स्वर साधारण संगीत नहीं था। उसमें ऐसा आकर्षण था जो सीधे आत्मा को छू ले। वृंदावन की हर गोपी उस धुन को सुनते ही मानो सम्मोहित हो उठी। कोई घर में दूध उबाल रही थी, कोई चक्की चला रही थी, कोई अपने परिवार के साथ बैठी थी… लेकिन जैसे ही कानों में वह मधुर बांसुरी पहुंची, सब कुछ रुक गया।
उनके हृदय केवल एक ही नाम पुकारने लगे—कृष्ण।
गोपियां सब कुछ छोड़कर घरों से बाहर निकलने लगीं। किसी ने अपने आभूषण पूरे नहीं पहने, किसी के बाल खुले रह गए, कोई अधूरी बात छोड़कर दौड़ पड़ी। उन्हें न समाज का भय था, न संसार की चिंता। उस समय उनके लिए केवल एक सत्य था—उनके प्रिय श्रीकृष्ण।
धीरे-धीरे सैकड़ों गोपियां यमुना तट पर पहुंचने लगीं। वहां चंद्रमा की रोशनी में खड़े कृष्ण सभी को मुस्कुराकर देख रहे थे। उनकी आंखों में प्रेम और करुणा थी।
कृष्ण ने मुस्कुराते हुए पूछा, “तुम सब इतनी रात को यहां क्यों आई हो? वृंदावन के लोग क्या कहेंगे? तुम्हें अपने घर लौट जाना चाहिए।”
गोपियां यह सुनकर दुखी हो गईं। उनमें से एक कांपती आवाज़ में बोली, “प्राणनाथ… हमें मत भेजिए। आपका बांसुरी स्वर सुनकर हम स्वयं को रोक नहीं सके। अब हमारा मन कहीं और नहीं लगता।”
दूसरी गोपी की आंखों से आंसू बहने लगे।
“कृष्ण, हमारे लिए संसार का हर सुख व्यर्थ है यदि आप हमारे साथ नहीं हैं।”
कृष्ण सबकी भावनाएं समझ रहे थे। वे जानते थे कि यह साधारण प्रेम नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण है।
अचानक कृष्ण मुस्कुराए।
और अगले ही क्षण वृंदावन का वह वन दिव्य प्रकाश से भर उठा।
रासलीला आरंभ हो चुकी थी।
मधुर संगीत गूंजने लगा। चांदनी और भी उज्ज्वल हो गई। वृक्षों के फूल स्वयं झरने लगे। फिर कृष्ण हर गोपी के बीच प्रकट हो गए। प्रत्येक गोपी को ऐसा लग रहा था मानो कृष्ण केवल उसी के साथ हैं। कोई उनके साथ नृत्य कर रही थी, कोई उनके नेत्रों में खोई हुई थी, कोई उनके चरणों को देख रही थी।
वह दृश्य इतना दिव्य था कि देवता भी आकाश से उसे देखने लगे। गंधर्व संगीत गाने लगे और अप्सराएं पुष्प वर्षा करने लगीं।
रासलीला में समय जैसे थम गया था।
कृष्ण का रूप हर दिशा में दिखाई दे रहा था। उनके पीतांबर चांदनी में चमक रहे थे, मुकुट में मोरपंख लहरा रहा था और उनकी मुस्कान हर गोपी के हृदय को प्रेम से भर रही थी।
धीरे-धीरे गोपियों के मन में एक भाव आने लगा।
उन्हें लगने लगा कि संसार में उनसे अधिक भाग्यशाली कोई नहीं। स्वयं श्रीकृष्ण उनके साथ नृत्य कर रहे हैं। यह विचार आते ही उनके भीतर हल्का सा गर्व जन्म लेने लगा।
कृष्ण सब समझ गए।
अचानक अगले ही क्षण वे वहां से अदृश्य हो गए।
संगीत रुक गया। पूरा वन एकदम शांत हो गया।
गोपियां घबरा उठीं।
“कृष्ण!… कान्हा!… तुम कहां हो?”
वे पागलों की तरह पूरे वन में उन्हें खोजने लगीं। कोई पेड़ों से पूछ रही थी, कोई यमुना किनारे रो रही थी। उनके हृदय विरह की अग्नि में जलने लगे। अब उन्हें समझ आ चुका था कि कृष्ण को केवल प्रेम से पाया जा सकता है, अहंकार से नहीं।
राधा सबसे अधिक व्याकुल थीं। उनकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। वे धीरे-धीरे जंगल में भटकती हुई केवल कृष्ण का नाम पुकार रही थीं।
उसी विरह में गोपियों का प्रेम और भी पवित्र हो गया।
तभी अचानक फिर से वही मधुर बांसुरी गूंजी।
सभी गोपियां उस दिशा में दौड़ पड़ीं।
वहां श्रीकृष्ण फिर से प्रकट हुए। उनके चेहरे पर वही मोहक मुस्कान थी। गोपियां उन्हें देखते ही भावविभोर हो गईं। कई उनकी चरणों में गिर पड़ीं।
कृष्ण ने प्रेम से कहा, “मैं तुमसे दूर नहीं गया था। मैं केवल तुम्हारे प्रेम की गहराई देख रहा था। जहां सच्चा प्रेम होता है, वहां मैं सदैव उपस्थित रहता हूं।”
इसके बाद फिर से रास आरंभ हुआ। इस बार गोपियों के मन में न कोई गर्व था, न कोई इच्छा। केवल समर्पण था, केवल प्रेम था।
उस रात वृंदावन में जो रासलीला हुई, वह केवल नृत्य नहीं था।
वह आत्मा और परमात्मा का मिलन था।
वह ऐसा दिव्य प्रेम था जिसमें न समय की सीमा थी, न संसार का बंधन।
और तभी से वृंदावन की हर हवा, हर बांसुरी की धुन और हर चांदनी रात आज भी उसी रासलीला की अमर कहानी सुनाती है।
अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।
“श्री कृष्ण की दिव्य और प्रेरणादायक कहानियों का संग्रह। बाल लीलाओं, चमत्कारों, प्रेम, भक्ति और जीवन के अनमोल संदेशों से भरपूर कथाएँ, जो हर आयु के पाठकों को ज्ञान, प्रेरणा और आनंद प्रदान करती हैं।”
लेखक / मूल रचनाकार: श्री कृष्ण की कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team