कान्हा की माखन चोरी
वृंदावन की गलियों में सुबह का समय था। चारों तरफ गायों की मधुर रंभाहट गूंज रही थी। घरों के आंगन में गोपियां दही मथ रही थीं। कहीं मटकों में ताजा मक्खन जमा हो रहा था, तो कहीं बच्चे खेलते हुए दौड़ रहे थे। पूरा गांव हमेशा की तरह खुशियों से भरा था… लेकिन एक बात ऐसी थी जिसने सभी गोपियों की नींद उड़ा रखी थी।
उनके घरों से रोज माखन चोरी हो रहा था।
और चोर कोई साधारण नहीं था…
वह था नंदलाल—नन्हा कृष्ण।
हर सुबह कोई न कोई गोपी गुस्से में नंद बाबा के घर पहुंच जाती।
“यशोदा! अपने लाला को संभालो। आज फिर हमारे घर का सारा माखन चुरा ले गया!”
दूसरी गोपी तुरंत बोल पड़ती, “अरे केवल माखन ही नहीं, हमारे बच्चों को भी बहला देता है। सबको साथ लेकर पूरा मटका खाली कर देता है!”
तीसरी गोपी नाराज़ होकर बोली, “इतना ही नहीं… जाते-जाते बंदरों को भी माखन खिला देता है!”
यशोदा माता सबकी बातें सुनतीं और मुस्कुराने की कोशिश रोकतीं। लेकिन सामने बैठा कृष्ण मासूम चेहरा बनाकर ऐसे दिखाते मानो उन्हें कुछ पता ही न हो।
वे बड़ी भोली आवाज़ में कहते, “मैय्या, ये सब मुझसे जलती हैं। मैंने कुछ नहीं किया।”
गोपियां चिल्ला उठतीं, “देखो! चोरी भी करता है और झूठ भी बोलता है!”
लेकिन समस्या यह थी कि कोई भी कृष्ण को पकड़ नहीं पाता था।
कृष्ण और उनके ग्वाल-मित्रों ने माखन चोरी के इतने अनोखे तरीके खोज लिए थे कि पूरा वृंदावन परेशान हो चुका था।
कभी वे खिड़की से घर में घुस जाते, कभी बच्चों को हंसा-हंसाकर उनका ध्यान भटका देते। कई बार तो वे अपने दोस्तों के कंधों पर चढ़कर ऊंचाई पर टंगे मटके तक पहुंच जाते।
एक दिन एक गोपी ने सोचा, “आज मैं इस नटखट को रंगे हाथों पकड़कर रहूंगी।”
उसने अपने घर के सारे दरवाजे बंद कर दिए। माखन के मटकों को बहुत ऊंचाई पर लटका दिया और खुद पर्दे के पीछे छिप गई।
कुछ देर बाद खिड़की से धीरे-धीरे एक छोटी सी परछाई भीतर आई।
वह कृष्ण थे।
उनके साथ सुदामा और बाकी ग्वाल-बाल भी थे। कृष्ण ने चारों तरफ नजर घुमाई और मुस्कुराकर बोले, “लगता है आज गोपी हमें पकड़ने की पूरी तैयारी करके बैठी है।”
सभी बच्चे धीरे से हंस पड़े।
कृष्ण ने तुरंत योजना बनाई। एक मित्र नीचे झुका, दूसरा उसके ऊपर चढ़ा, फिर तीसरा… और सबसे ऊपर जाकर स्वयं कृष्ण खड़े हो गए।
उन्होंने मटका पकड़ा, लेकिन वह बहुत ऊंचा था।
कृष्ण ने आंख मारते हुए कहा, “थोड़ा और ऊपर!”
नीचे खड़े बच्चे कांपने लगे।
“कन्हैया, हम गिर जाएंगे!”
कृष्ण हंस पड़े, “अरे, मैं हूं ना!”
आखिरकार उन्होंने मटका तोड़ दिया।
सफेद माखन नीचे गिरने लगा। सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े। कृष्ण ने दोनों हाथों में माखन भर लिया और खाने लगे।
उसी समय गोपी पर्दे के पीछे से निकलकर चिल्लाई—
“आज पकड़ लिया!”
सभी बच्चे डरकर भाग गए, लेकिन कृष्ण वहीं खड़े मुस्कुरा रहे थे। उनके गालों और होंठों पर माखन लगा हुआ था।
गोपी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“अब चलो मेरे साथ! आज तुम्हारी शिकायत सीधे यशोदा से करूंगी।”
कृष्ण मासूम बनते हुए बोले, “लेकिन माखन तो बहुत स्वादिष्ट था…”
गोपी अपनी हंसी रोक ही नहीं पाई। फिर भी वह कृष्ण को पकड़कर नंद भवन ले गई।
रास्तेभर गांव वाले हंसते हुए पीछे-पीछे चलने लगे।
जैसे ही वे यशोदा माता के पास पहुंचे, गोपी बोली, “देखो यशोदा! आज तुम्हारा लाल चोरी करते हुए पकड़ा गया है।”
यशोदा माता ने गुस्से में कृष्ण की ओर देखा।
“कन्हैया! कितनी बार कहा है चोरी मत किया करो!”
कृष्ण ने तुरंत सिर झुका लिया।
“मैय्या, मैंने चोरी नहीं की…”
गोपी गुस्से में बोली, “तो क्या माखन खुद तुम्हारे मुंह पर लग गया?”
कृष्ण धीरे से मुस्कुराए।
“मैय्या… मैं तो बस देखने गया था कि माखन अच्छा बना है या नहीं।”
सभी लोग हंस पड़े।
लेकिन उस दिन यशोदा माता सच में नाराज़ थीं। उन्होंने कृष्ण को रस्सी से बांधने का निश्चय किया।
वे रस्सी लेकर आईं और कृष्ण को एक बड़े ऊखल से बांधने लगीं। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि हर बार रस्सी दो अंगुल छोटी रह जाती।
यशोदा माता दूसरी रस्सी जोड़तीं… फिर भी छोटी।
तीसरी जोड़तीं… फिर भी छोटी।
पूरा आंगन यह अद्भुत दृश्य देखकर हैरान था। आखिरकार बहुत प्रयास के बाद कृष्ण स्वयं मुस्कुराए और बंधने के लिए तैयार हो गए।
यशोदा ने राहत की सांस ली।
“अब बैठो यहीं और अपनी शरारतों के बारे में सोचो।”
कृष्ण चुपचाप बैठे रहे। लेकिन उनकी आंखों में वही शरारती चमक थी।
कुछ देर बाद उन्होंने ऊखल को पीछे खींचना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वह भारी ऊखल जमीन पर घिसटने लगा। कृष्ण उसे खींचते हुए आंगन से बाहर ले गए।
आगे दो विशाल अर्जुन वृक्ष खड़े थे।
कृष्ण सीधे उनके बीच से निकल गए… लेकिन ऊखल बीच में फंस गया।
अगले ही क्षण जोरदार आवाज़ हुई।
दोनों विशाल वृक्ष धरती पर गिर पड़े।
पूरा वृंदावन कांप उठा। लोग दौड़ते हुए वहां पहुंचे। सबने देखा—नन्हा कृष्ण आराम से ऊखल के पास बैठे मुस्कुरा रहे थे।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि उन वृक्षों में दो श्रापित देवता कैद थे, जिन्हें कृष्ण ने मुक्त कर दिया था।
उस दिन के बाद भी कृष्ण की माखन चोरी बंद नहीं हुई। बल्कि गोपियां अब जानबूझकर अपने घरों में ज्यादा माखन रखने लगीं, ताकि कान्हा चोरी करने आएं।
क्योंकि वे समझ चुकी थीं…
यह कोई साधारण चोरी नहीं थी।
कृष्ण माखन नहीं चुराते थे… वे लोगों का प्रेम चुराते थे।
और वृंदावन में ऐसा कोई नहीं था जो अपने हृदय का माखन उस नटखट कान्हा को देने से खुद को रोक सके।
जब नन्हे कान्हा ने राक्षसी पूतना का अंत कर पूरे गोकुल को बचाया

मथुरा का अत्याचारी राजा कंस दिन-रात एक ही भय में जी रहा था। आकाशवाणी हो चुकी थी कि उसकी मृत्यु उसकी बहन देवकी के आठवें पुत्र के हाथों होगी। इसी डर ने उसे निर्दयी और पागल बना दिया था। उसने देवकी और वसुदेव के कई नवजात बच्चों की हत्या कर दी, लेकिन आठवें पुत्र श्रीकृष्ण जन्म लेते ही गोकुल पहुंच चुके थे। कंस को जब यह समाचार मिला कि नंद बाबा के घर एक अद्भुत बालक जन्मा है, तो उसके मन में भय और बढ़ गया। उसने निश्चय किया कि वह उस बालक को किसी भी कीमत पर जीवित नहीं छोड़ेगा।
कंस ने अपने सबसे भयानक राक्षसों को गोकुल भेजना शुरू कर दिया। उन्हीं में से एक थी—पूतना। वह एक ऐसी राक्षसी थी जो छोटे बच्चों का वध करने में माहिर थी। उसके पास मायावी शक्तियां थीं।
वह जब चाहे अपना रूप बदल सकती थी। उसका असली रूप इतना डरावना था कि उसे देखकर बड़े-बड़े योद्धाओं की भी रूह कांप जाए, लेकिन उस दिन उसने स्वयं को एक अत्यंत सुंदर स्त्री के रूप में बदल लिया। उसके शरीर से सुगंध आ रही थी, चेहरे पर मोहक मुस्कान थी और उसे देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि उसके भीतर मृत्यु छिपी हुई है।
पूतना सीधे गोकुल पहुंची। उस समय पूरा गांव अपने कामों में व्यस्त था। किसी को उस अजनबी स्त्री पर संदेह नहीं हुआ। वह धीरे-धीरे नंद भवन की ओर बढ़ी। जैसे ही वह भीतर पहुंची, यशोदा माता और रोहिणी उसे देखकर चकित रह गईं। पूतना का रूप इतना आकर्षक था कि सभी उसे किसी देवी के समान समझ बैठे। किसी ने उसे रोकने की हिम्मत नहीं की।
उस समय नन्हे कृष्ण पालने में लेटे मुस्कुरा रहे थे।
पूतना ने जैसे ही उन्हें देखा, उसके मन में एक पल के लिए अजीब कंपन हुआ। उसे ऐसा महसूस हुआ मानो यह कोई साधारण बालक नहीं है। लेकिन अगले ही क्षण उसने अपने मन को कठोर बना लिया। उसने अपने स्तनों पर भयंकर विष लगाया हुआ था। उसका इरादा था कि जैसे ही बालक दूध पिएगा, उसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाएगी।
वह धीरे से कृष्ण को गोद में उठाकर बैठ गई। यशोदा माता को लगा कि कोई स्नेहमयी स्त्री उनके पुत्र को प्यार कर रही है, इसलिए वे निश्चिंत रहीं। पूतना ने मुस्कुराते हुए कृष्ण को अपना विषैला दूध पिलाना शुरू किया। लेकिन अगले ही क्षण उसके चेहरे का रंग बदलने लगा।
कृष्ण साधारण बालक नहीं थे।
उन्होंने केवल दूध ही नहीं पीना शुरू किया, बल्कि पूतना की जीवन शक्ति भी खींचने लगे। पूतना की आंखें भय से फैल गईं। उसे ऐसा लगा मानो उसका प्राण शरीर से बाहर निकाला जा रहा हो। उसने तुरंत कृष्ण को दूर फेंकने की कोशिश की, लेकिन अब वह असहाय हो चुकी थी। नन्हे कृष्ण उसके सीने से ऐसे चिपके थे मानो स्वयं मृत्यु उसके भीतर प्रवेश कर चुकी हो।
पूतना दर्द से भयानक चीख मारने लगी। उसकी चीख इतनी भयंकर थी कि पूरा गोकुल कांप उठा। लोग भयभीत होकर नंद भवन की ओर दौड़ पड़े। उसी समय पूतना का सुंदर रूप टूटने लगा। उसका शरीर अचानक विशाल और विकराल हो गया। उसकी आंखें लाल अंगारों की तरह जलने लगीं, बाल बिखर गए, दांत तलवार जैसे बाहर निकल आए। कुछ ही क्षणों में वह अपने असली राक्षसी रूप में आ गई।
फिर एक जोरदार गर्जना के साथ उसका विशाल शरीर धरती पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही पूरा गोकुल हिल गया। पेड़ कांप उठे, पशु डरकर भागने लगे और लोगों के चेहरे भय से सफेद पड़ गए।
लेकिन सबसे आश्चर्यजनक दृश्य उसके बाद दिखाई दिया।
उस विशाल राक्षसी के मृत शरीर के ऊपर नन्हे कृष्ण हंसते हुए खेल रहे थे।
यशोदा माता यह दृश्य देखकर चीख पड़ीं। वे दौड़कर कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया और रोने लगीं। नंद बाबा सहित पूरा गोकुल स्तब्ध था। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि एक छोटा सा बालक इतनी भयानक राक्षसी से कैसे बच गया।
गांव के बुज़ुर्गों ने तुरंत मंत्रोच्चार शुरू कर दिए। कृष्ण की रक्षा के लिए तरह-तरह के पूजन किए जाने लगे। लेकिन किसी को यह ज्ञात नहीं था कि जिसकी रक्षा के लिए वे पूजा कर रहे हैं, वही स्वयं पूरे संसार का रक्षक है।
जब लोगों ने पूतना के विशाल शरीर को देखा तो वे भय से कांप उठे। उसका शरीर कई वृक्षों जितना बड़ा था। उसके नाखून तलवार जैसे और आंखें भयानक थीं। सभी समझ चुके थे कि यह कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि मृत्यु बनकर आई राक्षसी थी।
बाद में जब पूतना के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया, तो एक अद्भुत घटना घटी। उसके शरीर से दुर्गंध नहीं, बल्कि सुगंध निकलने लगी। लोग आश्चर्यचकित रह गए। ऋषियों ने बताया कि यद्यपि पूतना कृष्ण को मारने आई थी, लेकिन उसने उन्हें मां की तरह दूध पिलाने का प्रयास किया। श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि उन्होंने उसके भीतर के उस छोटे से मातृत्व भाव को भी स्वीकार कर लिया और उसे मोक्ष प्रदान कर दिया।
उस दिन पूरे गोकुल को यह आभास हो गया कि नंद बाबा का यह नन्हा बालक साधारण नहीं है। उसके भीतर कोई दिव्य शक्ति छिपी हुई है। लेकिन यशोदा माता के लिए वह अब भी वही मासूम कन्हैया था, जिसे वे हर रात अपनी गोद में सुलाती थीं।
और उधर मथुरा में बैठा कंस… यह समाचार सुनकर पहली बार सचमुच डर गया था।
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“श्री कृष्ण की दिव्य और प्रेरणादायक कहानियों का संग्रह। बाल लीलाओं, चमत्कारों, प्रेम, भक्ति और जीवन के अनमोल संदेशों से भरपूर कथाएँ, जो हर आयु के पाठकों को ज्ञान, प्रेरणा और आनंद प्रदान करती हैं।”
लेखक / मूल रचनाकार: श्री कृष्ण की कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team