कृष्ण

जब बालक कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया पूरा गोवर्धन पर्वत

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भगवान श्रीकृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि प्रेम, धर्म, करुणा, साहस और दिव्य ज्ञान के जीवंत स्वरूप हैं। उनकी हर लीला में जीवन का कोई न कोई गहरा रहस्य छिपा है। इस विशेष संग्रह में हम आपके लिए श्रीकृष्ण की 20 अद्भुत कथाएं और दिव्य लीलाएं लेकर आए हैं, जिनमें बाल लीलाओं की मधुरता, अधर्म के विनाश का पराक्रम, भक्तों के प्रति उनका प्रेम और गीता का अमर ज्ञान समाहित है। ये कथाएं केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को समझने और आत्मा को भक्ति से भर देने वाली अमूल्य प्रेरणाएं हैं

जब बालक कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया पूरा गोवर्धन पर्वत

    वृंदावन की उस सुबह में कुछ अजीब बेचैनी थी। चारों तरफ गायों की घंटियों की मधुर आवाज़ गूंज रही थी, ग्वाल-बाल खेल रहे थे, और यमुना के किनारे हल्की ठंडी हवा बह रही थी। लेकिन नंद बाबा के आंगन में गांव के बड़े-बुज़ुर्ग एक बड़ी पूजा की तैयारी में लगे हुए थे। घी के दीपक सजाए जा रहे थे, तरह-तरह के पकवान बन रहे थे, और हर कोई बड़े उत्साह से इंद्र देव की आराधना की तैयारी कर रहा था।

    उसी समय नन्हे कृष्ण अपनी मासूम मुस्कान के साथ वहां पहुंचे। उनकी आंखों में शरारत भी थी और जिज्ञासा भी। उन्होंने नंद बाबा से पूछा, “पिताश्री, आज गांव में इतनी बड़ी तैयारी किसलिए हो रही है?”
    नंद बाबा मुस्कुराए, “लाला, आज हम सब इंद्र देव की पूजा करेंगे। वे वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से ही खेतों में अन्न उगता है, गायों को चारा मिलता है और हमारा जीवन चलता है।”

    कृष्ण कुछ पल शांत रहे। फिर धीरे से बोले, “लेकिन बाबा, क्या केवल इंद्र ही हमारी रक्षा करते हैं? हमारी गायों को घास तो गोवर्धन पर्वत देता है, पेड़-पौधे हमें फल देते हैं, यमुना हमें जल देती है। फिर हमें पूजा उस गोवर्धन की करनी चाहिए जो हर दिन हमारा पालन करता है।”

    गांव के लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। किसी ने इतनी छोटी उम्र में इतनी गहरी बात कभी नहीं सुनी थी। कुछ बुज़ुर्ग बोले, “कन्हैया, इंद्र देव बहुत शक्तिशाली हैं। यदि वे क्रोधित हो गए तो भारी वर्षा कर देंगे।”
    कृष्ण हंस पड़े, “जो सच्चे मन से प्रकृति का सम्मान करता है, उसे किसी देवता का भय नहीं होना चाहिए।”
    कृष्ण की बातें धीरे-धीरे सबके मन में उतरने लगीं। अंततः नंद बाबा ने घोषणा कर दी कि इस बार इंद्र पूजा नहीं होगी। पूरा गांव गोवर्धन पर्वत की पूजा करेगा।

    उस दिन वृंदावन में अद्भुत उत्सव हुआ। गायों को सजाया गया, पर्वत के चारों ओर परिक्रमा की गई, और सैकड़ों प्रकार के व्यंजन गोवर्धन को अर्पित किए गए। कृष्ण स्वयं सबके आगे-आगे नाच रहे थे। पूरा वातावरण भक्ति और आनंद से भर उठा।
    लेकिन स्वर्गलोक में बैठे इंद्र देव यह सब देख रहे थे। उनका चेहरा क्रोध से लाल हो उठा।

    “एक छोटा सा बालक मेरी पूजा रुकवा रहा है?” इंद्र गरजे। “इन ग्वालों का अहंकार तोड़ना ही होगा।”
    उन्होंने तुरंत अपने भयंकर बादलों को आदेश दिया। अगले ही पल वृंदावन के ऊपर काले बादल छा गए। आसमान में बिजली ऐसी चमकने लगी मानो प्रलय आने वाली हो। तेज गर्जना के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।

    कुछ ही देर में पूरे वृंदावन में हाहाकार मच गया। घर टूटने लगे, पेड़ उखड़ने लगे, यमुना का जल उफान मारने लगा। गायें भय से इधर-उधर भाग रही थीं। बच्चे रो रहे थे। लोग चिल्लाते हुए कृष्ण के पास पहुंचे।
    “कन्हैया! हमें बचाओ!”
    कृष्ण शांत खड़े सब देख रहे थे। उनके चेहरे पर ज़रा भी भय नहीं था। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “डरो मत। गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा।”

    इतना कहकर कृष्ण सीधे गोवर्धन पर्वत की ओर बढ़े। तेज तूफान के बीच उनका पीतांबर हवा में लहरा रहा था। सभी लोग हैरानी से उन्हें देख रहे थे।
    अचानक कृष्ण ने अपनी छोटी सी कनिष्ठा उंगली आगे बढ़ाई… और अगले ही क्षण पूरा गोवर्धन पर्वत उनकी उंगली पर उठ गया।

    पूरा वृंदावन स्तब्ध रह गया।
    इतना विशाल पर्वत… और उसे उठाए खड़ा था सात वर्ष का एक बालक!
    कृष्ण ने ऊंची आवाज़ में कहा, “सभी लोग अपने परिवार और गायों के साथ पर्वत के नीचे आ जाओ।”
    गांव वाले भागते हुए पर्वत के नीचे पहुंचने लगे। आश्चर्य की बात यह थी कि पर्वत के नीचे बिल्कुल सूखा और सुरक्षित स्थान था। बाहर प्रचंड तूफान था, लेकिन भीतर शांति थी।

    ग्वाल-बाल कृष्ण को देखकर बोले, “कन्हैया, तुम्हारी उंगली दुख नहीं रही?”
    कृष्ण हंस पड़े, “यदि तुम सब साथ हो तो मुझे कोई भार महसूस नहीं होता।”
    सात दिनों तक लगातार वर्षा होती रही। इंद्र ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। आसमान से ऐसी बारिश बरस रही थी जैसी पहले कभी नहीं हुई थी। लेकिन कृष्ण अडिग खड़े रहे। उनके चेहरे पर दिव्य तेज चमक रहा था। वृंदावन के लोग अब समझ चुके थे कि उनका कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं है।

    सातवें दिन इंद्र का अभिमान टूटने लगा। उन्होंने देखा कि उनकी सारी शक्ति उस बालक के सामने व्यर्थ हो गई है। तभी देवताओं ने इंद्र से कहा, “देवराज, यह कोई साधारण ग्वाला नहीं। ये स्वयं भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण हैं।”
    यह सुनते ही इंद्र का क्रोध भय में बदल गया। वे तुरंत ऐरावत हाथी पर बैठकर वृंदावन पहुंचे। वहां उन्होंने देखा—कृष्ण अब भी अपनी छोटी उंगली पर पर्वत उठाए मुस्कुरा रहे थे।

    इंद्र शर्म से सिर झुकाकर उनके चरणों में गिर पड़े।
    “प्रभु, मुझे क्षमा कर दीजिए। अपने अहंकार में मैं आपको पहचान नहीं पाया।”
    कृष्ण ने प्रेम से कहा, “इंद्र, शक्ति का घमंड सबसे बड़ा अंधकार होता है। जो स्वयं को सबसे बड़ा समझने लगे, उसका पतन निश्चित है।”

    इंद्र की आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उन्होंने हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। तभी कृष्ण ने धीरे से गोवर्धन पर्वत को वापस उसके स्थान पर रख दिया।

    जैसे ही पर्वत नीचे आया, आसमान पूरी तरह साफ हो गया। सूरज की सुनहरी किरणें वृंदावन पर बिखर गईं। पक्षी फिर से चहचहाने लगे। गायें शांत होकर घास चरने लगीं।
    पूरा वृंदावन “गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण की जय!” के नारों से गूंज उठा।

    उस दिन से वृंदावन के लोगों का विश्वास और प्रेम कृष्ण के प्रति हजार गुना बढ़ गया। वे समझ चुके थे कि उनका कन्हैया केवल नंद बाबा का पुत्र नहीं, बल्कि स्वयं वह दिव्य शक्ति है जो अपने भक्तों की रक्षा के लिए पूरी प्रकृति को भी झुका सकती है।

    जब श्रीकृष्ण ने यमुना में रहने वाले भयंकर कालिया नाग का घमंड तोड़ा

      वृंदावन की पावन धरती पर बहने वाली यमुना नदी कभी जीवन का आधार मानी जाती थी। उसके जल से खेत हरे-भरे रहते, गायें तृप्त होतीं और ग्वाल-बाल दिनभर उसके किनारे खेलते थे। लेकिन धीरे-धीरे यमुना का एक हिस्सा मृत्यु का कुंड बन चुका था।

      उस जल के पास जाते ही पक्षी आकाश से गिरकर मर जाते थे। गायें यदि भूल से वह पानी पी लेतीं, तो तड़प-तड़पकर प्राण छोड़ देतीं। नदी के ऊपर हमेशा जहरीली भाप तैरती रहती थी। वहां का वातावरण इतना भयावह था कि कोई भी उस दिशा में जाने की हिम्मत नहीं करता था।

      उस भय का कारण था—कालिया नाग।
      विशालकाय, काले विष से भरा, सैकड़ों फनों वाला वह भयंकर नाग यमुना के भीतर रहता था। उसके विष ने पूरे जल को जहरीला बना दिया था। वृंदावन के लोग उसका नाम सुनते ही कांप उठते थे।

      एक दिन दोपहर के समय कृष्ण अपने मित्रों और गायों के साथ जंगल में खेल रहे थे। खेलते-खेलते सभी को प्यास लगी। कुछ ग्वाल-बाल जल्दी से यमुना के उसी हिस्से की ओर भागे जहां कालिया रहता था। उन्हें खतरे का अंदाज़ा नहीं था।

      जैसे ही उन्होंने पानी पिया, कुछ ही क्षणों में वे ज़मीन पर गिर पड़े। उनकी सांसें रुकने लगीं। गायें भी तड़पने लगीं।
      सभी बच्चे भय से चिल्लाने लगे, “कन्हैया! बचाओ!”
      कृष्ण तुरंत वहां पहुंचे। उन्होंने अपने मित्रों को देखा और उनकी आंखों में करुणा भर आई। उन्होंने धीरे से अपनी दिव्य दृष्टि उन पर डाली। अगले ही पल सभी ग्वाल-बाल और गायें फिर से जीवित हो उठीं।
      लेकिन कृष्ण समझ चुके थे कि अब कालिया का अंत करना आवश्यक है।

      उन्होंने यमुना की ओर देखा। काला पानी मानो जहर से उबल रहा था। नदी के बीचोंबीच विशाल बुलबुले उठ रहे थे। वातावरण में ऐसी दुर्गंध थी कि सांस लेना कठिन हो रहा था।
      कृष्ण मुस्कुराए।

      “आज इस आतंक का अंत होगा।”
      इतना कहकर वे पास खड़े एक विशाल कदंब के पेड़ पर चढ़ गए। सभी ग्वाल-बाल डरकर चिल्लाए, “कन्हैया, मत जाओ! वहां कालिया है!”
      लेकिन कृष्ण बिना डरे पेड़ की सबसे ऊंची शाखा पर पहुंचे… और अगले ही पल सीधे यमुना में छलांग लगा दी।

      जैसे ही कृष्ण जल में उतरे, पूरी नदी भयंकर लहरों से कांप उठी। ऐसा लगा मानो जल के भीतर कोई विशाल पर्वत हिल गया हो।
      कुछ क्षण बाद अचानक यमुना के बीचोंबीच पानी फटने लगा। वहां से कालिया नाग बाहर निकला।
      उसका विशाल शरीर कई हाथियों जितना बड़ा था। उसकी आंखें आग की तरह लाल चमक रही थीं। सैकड़ों फनों से काला विष निकल रहा था। उसे देखकर बड़े-बड़े योद्धा भी भय से कांप जाते।

      कालिया ने फुफकारते हुए कृष्ण को देखा।
      “कौन है जो मेरी मृत्यु बनकर यहां आया है?”
      कृष्ण शांत खड़े रहे।
      “मैं वृंदावन का रक्षक हूं।”
      कालिया क्रोध से पागल हो उठा। उसने अपने विशाल कुंडलों में कृष्ण को जकड़ लिया। नदी का जल ऊंची-ऊंची लहरों में बदल गया। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं यमुना युद्ध देख रही हो।

      उधर वृंदावन में खबर फैल चुकी थी।
      “कृष्ण को कालिया नाग ने पकड़ लिया!”
      यह सुनते ही पूरा गांव यमुना की ओर दौड़ पड़ा। यशोदा माता रोने लगीं। नंद बाबा के चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था। ग्वाल-बाल कांपते हुए नदी के किनारे खड़े थे।

      यमुना के भीतर कालिया लगातार कृष्ण को दबाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन अचानक उसके चेहरे पर डर उभरने लगा।
      कृष्ण का शरीर धीरे-धीरे प्रकाश से चमकने लगा।
      अगले ही क्षण कृष्ण ने अपने शरीर को इतना विशाल कर लिया कि कालिया की पकड़ टूट गई। नाग दर्द से तड़प उठा।

      इससे पहले कि वह संभल पाता, कृष्ण बिजली की गति से उसके सबसे बड़े फन पर चढ़ गए।
      और फिर शुरू हुआ वह अद्भुत दृश्य जिसे देखकर देवता भी स्तब्ध रह गए।

      कृष्ण कालिया के फनों पर नृत्य करने लगे।
      हर कदम के साथ कालिया का घमंड टूटता जा रहा था। जब कृष्ण एक फन पर पैर रखते, दूसरा फन नीचे झुक जाता। उनके चरणों का भार इतना दिव्य था कि कालिया का शरीर कमजोर पड़ने लगा।
      आसमान में देवता प्रकट हो गए। वे पुष्प वर्षा करने लगे। गंधर्व मधुर संगीत गाने लगे। पूरा वृंदावन आश्चर्य से वह दिव्य दृश्य देख रहा था।

      कृष्ण का नृत्य अब और तेज हो चुका था। उनके घुंघराले बाल हवा में लहरा रहे थे, पीतांबर चमक रहा था, और उनके चरणों के नीचे कालिया का विष समाप्त होता जा रहा था।

      कुछ ही देर में कालिया की शक्ति पूरी तरह खत्म हो गई। उसके फनों से रक्त बहने लगा। उसकी आंखों का क्रोध भय में बदल चुका था।
      तभी कालिया की पत्नियां हाथ जोड़कर कृष्ण के सामने आ गईं।

      “प्रभु, हमारे स्वामी को क्षमा कर दीजिए। वे आपके दिव्य स्वरूप को पहचान नहीं पाए।”
      कालिया भी कांपते हुए बोला, “हे प्रभु… मैं हार गया। कृपा करके मुझे जीवनदान दें।”
      कृष्ण ने अपना नृत्य रोक दिया। उन्होंने शांत स्वर में कहा,

      “कालिया, शक्ति का उपयोग दूसरों को कष्ट देने के लिए नहीं होता। तुमने यमुना को विषैला बनाकर निर्दोष जीवों को पीड़ा दी है। अब तुम्हें यह स्थान छोड़ना होगा।”
      कालिया ने सिर झुका दिया।
      “जैसी आपकी आज्ञा, प्रभु।”

      कृष्ण ने अपने चरण उसके फनों पर रख दिए। उसी क्षण कालिया के भीतर का सारा विष शांत हो गया। उसके मन का अहंकार भी समाप्त हो चुका था।
      फिर कालिया अपने पूरे परिवार के साथ यमुना छोड़कर समुद्र की ओर चला गया।

      जैसे ही वह गया, यमुना का जल फिर से निर्मल होने लगा। जहरीली भाप गायब हो गई। पक्षी दोबारा उड़ने लगे। गायें खुशी से रंभाने लगीं।
      पूरा वृंदावन आनंद से झूम उठा।
      यशोदा माता दौड़कर कृष्ण को गले लगा लिया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
      “लाला, तू हर बार हमें डरा देता है।”

      कृष्ण मासूम मुस्कान के साथ बोले, “मैय्या, जब तक मैं हूं, वृंदावन को कोई कष्ट नहीं पहुंचा सकता।”
      उस दिन से वृंदावन के लोगों का विश्वास और भी गहरा हो गया। वे समझ चुके थे कि उनका नटखट कन्हैया केवल बांसुरी बजाने वाला ग्वाला नहीं, बल्कि वह दिव्य शक्ति है जो अधर्म और अहंकार का अंत करने स्वयं धरती पर आई है।

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      “श्री कृष्ण की दिव्य और प्रेरणादायक कहानियों का संग्रह। बाल लीलाओं, चमत्कारों, प्रेम, भक्ति और जीवन के अनमोल संदेशों से भरपूर कथाएँ, जो हर आयु के पाठकों को ज्ञान, प्रेरणा और आनंद प्रदान करती हैं।”

      लेखक / मूल रचनाकार: श्री कृष्ण की कथाएं
       प्रस्तुति: Saying Central Team

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