श्रीकृष्ण ने अर्जुन का मोह तोड़ा
कुरुक्षेत्र की विशाल धरती उस दिन युद्ध की आहट से कांप रही थी। चारों दिशाओं में लाखों योद्धाओं की सेनाएं सजी खड़ी थीं। हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की टापें, कवचों की चमक और शंखों की गूंज से पूरा वातावरण भयावह हो उठा था। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं समय रुककर इस महायुद्ध का साक्षी बनने आया हो।
यह केवल राज्य का युद्ध नहीं था…
यह धर्म और अधर्म के बीच अंतिम निर्णायक संघर्ष था।
एक ओर कौरवों की विशाल सेना थी, जिसका नेतृत्व भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण और अनेक महारथी कर रहे थे। दूसरी ओर पांडवों की सेना खड़ी थी, जिनके साथ धर्म, सत्य और न्याय था।
लेकिन उस युद्धभूमि का सबसे अद्भुत दृश्य था—
अर्जुन के रथ की सारथी सीट पर स्वयं श्रीकृष्ण का बैठे होना।
स्वयं भगवान उस दिन शस्त्र नहीं, बल्कि रथ की लगाम संभाले हुए थे।
दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। तभी अर्जुन ने अपना गांडीव उठाया और श्रीकृष्ण से कहा,
“हे माधव, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलिए। मैं देखना चाहता हूं कि मुझे किन लोगों से युद्ध करना होगा।”
श्रीकृष्ण शांत भाव से मुस्कुराए और रथ को धीरे-धीरे दोनों सेनाओं के बीच ले आए।
रथ ठीक वहां जाकर रुका जहां सामने भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य खड़े थे।
अर्जुन ने जैसे ही चारों ओर नजर दौड़ाई, उनका हृदय कांप उठा।
सामने उनके अपने लोग खड़े थे।
पितामह… गुरु… भाई… मित्र… रिश्तेदार…
हर ओर वही चेहरे थे जिनके साथ उन्होंने बचपन बिताया था।
उनकी आंखें भर आईं। हाथ कांपने लगे। शरीर से शक्ति मानो समाप्त होने लगी।
वे भारी आवाज़ में बोले,
“हे कृष्ण… यह मैं क्या देख रहा हूं? जिनके लिए राज्य चाहिए, वे ही आज मेरे सामने मृत्यु के लिए खड़े हैं। मैं अपने ही परिवार का वध करके कैसे सुखी रह सकूंगा?”
उनकी सांसें तेज हो गईं।
“मुझे न विजय चाहिए, न राज्य, न सुख। यदि इन सबकी कीमत अपने प्रियजनों का रक्त है, तो ऐसा राज्य व्यर्थ है।”
अर्जुन का मन मोह और दुख से भर चुका था।
उन्होंने गांडीव धनुष नीचे रख दिया।
“हे गोविंद, मैं यह युद्ध नहीं करूंगा।”
इतना कहकर वे रथ में बैठ गए। उनकी आंखों में निराशा थी और मन पूरी तरह भ्रम में डूब चुका था।
पूरा युद्धक्षेत्र मानो कुछ क्षणों के लिए शांत हो गया।
तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन की ओर देखा।
उनके चेहरे पर करुणा थी, लेकिन साथ ही दिव्य तेज भी था।
उन्होंने गंभीर स्वर में कहा,
“अर्जुन, यह कमजोरी एक वीर को शोभा नहीं देती। यह मोह और भय तुम्हारे योग्य नहीं है।”
अर्जुन दुखी स्वर में बोले,
“लेकिन प्रभु, मैं अपने ही गुरुओं और संबंधियों पर अस्त्र कैसे उठाऊं? उनका वध करके मुझे पाप ही मिलेगा।”
कृष्ण मुस्कुराए।
“तुम जिनके लिए शोक कर रहे हो, वे वास्तव में कभी नष्ट नहीं होते। आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।”
उन्होंने आगे कहा,
“जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।”
अर्जुन ध्यान से सुनने लगे।

कृष्ण का स्वर अब और गहरा हो चुका था।
“मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं। इसलिए जो अपरिहार्य है, उसके लिए शोक करना अज्ञान है।”
अर्जुन का मन धीरे-धीरे शांत होने लगा, लेकिन भीतर अभी भी संघर्ष चल रहा था।
“फिर भी प्रभु, अपने ही लोगों के विरुद्ध युद्ध कैसे धर्म हो सकता है?”
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया,
“जब अधर्म बढ़ जाए, निर्दोषों पर अत्याचार होने लगे और सत्य को कुचलने का प्रयास किया जाए, तब धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना ही कर्तव्य बन जाता है। यदि तुम अपने धर्म से पीछे हटोगे, तो लोग तुम्हें कायर कहेंगे।”
फिर कृष्ण ने वह अमर वचन कहा जो युगों से मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात—
“तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में नहीं।”
अर्जुन चुपचाप सुनते रहे।
कृष्ण बोले,
“फल की चिंता मनुष्य को भय और मोह में बांध देती है। जो व्यक्ति बिना स्वार्थ और आसक्ति के अपना कर्तव्य निभाता है, वही सच्चा योगी है।”
धीरे-धीरे अर्जुन का भ्रम टूटने लगा।
लेकिन तभी उनके मन में एक और प्रश्न उठा।
“प्रभु… यदि आप वास्तव में परमात्मा हैं, तो मैं आपका दिव्य स्वरूप देखना चाहता हूं।”
कृष्ण मुस्कुराए।
“तुम मुझे इन साधारण आंखों से नहीं देख सकते। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूं।”
अगले ही क्षण जो हुआ, उसे देखकर अर्जुन का शरीर कांप उठा।
श्रीकृष्ण का रूप अचानक बदलने लगा।
उनका शरीर प्रकाश से भर गया। उनके भीतर पूरा ब्रह्मांड दिखाई देने लगा। अनगिनत मुख, अनगिनत नेत्र, असंख्य दिव्य अस्त्र, सूर्य और चंद्रमा उनकी आंखों में चमक रहे थे।
ऐसा लग रहा था मानो हजारों सूर्य एक साथ आकाश में प्रकट हो गए हों।
अर्जुन ने देखा कि सम्पूर्ण सृष्टि उसी विराट रूप में समाई हुई है। देवता, ऋषि, ग्रह, नक्षत्र… यहां तक कि युद्धभूमि के सभी योद्धा भी उसी विराट अग्नि में प्रवेश करते दिखाई दे रहे थे।
उनका शरीर भय और भक्ति से कांप उठा।
वे हाथ जोड़कर बोले,
“हे देवों के देव… अब मुझे समझ आ गया कि आप ही परम सत्य हैं। आपको बार-बार प्रणाम है।”
कुछ क्षण बाद श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप समेट लिया और पुनः अपने सहज स्वरूप में आ गए।
फिर उन्होंने शांत स्वर में कहा,
“उठो अर्जुन। मोह त्यागो और अपने धर्म के लिए युद्ध करो।”
अब अर्जुन पूरी तरह बदल चुके थे।
उनकी आंखों में फिर से आत्मविश्वास लौट आया। मन का भय समाप्त हो चुका था।
उन्होंने अपना गांडीव धनुष उठाया और दृढ़ स्वर में कहा,
“हे कृष्ण, अब मेरा मोह नष्ट हो गया है। आपकी कृपा से मुझे सत्य का ज्ञान प्राप्त हो गया। मैं आपके आदेश का पालन करूंगा।”
अगले ही क्षण कुरुक्षेत्र में फिर से शंखनाद गूंज उठा।
महाभारत का महान युद्ध आरंभ होने वाला था।
लेकिन उस दिन रणभूमि में केवल युद्ध की शुरुआत नहीं हुई थी…
उस दिन मानवता को जीवन का सबसे महान ज्ञान मिला था—श्रीमद्भगवद्गीता।
एक ऐसा ज्ञान, जो आज भी हर उस व्यक्ति को मार्ग दिखाता है जो जीवन के संघर्षों में भय, मोह और भ्रम में उलझ जाता है।
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लेखक / मूल रचनाकार: श्री कृष्ण की कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team