द्रौपदी

जब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई

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श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई

हस्तिनापुर का राजमहल उस दिन असाधारण रूप से भरा हुआ था। विशाल सभा में बड़े-बड़े महारथी, गुरुजन, मंत्री और राजा उपस्थित थे। चमचमाते स्तंभों और स्वर्ण सिंहासनों के बीच एक ऐसा खेल खेला जा रहा था जो आने वाले विनाश की नींव बनने वाला था।
वह था—जुए का खेल।

दुर्योधन के मामा शकुनि अपनी चालाकी और कुटिलता के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी उंगलियां पासों पर नहीं, मानो पांडवों के भाग्य पर चल रही थीं। युधिष्ठिर धर्मराज कहलाते थे, लेकिन जुए की कमजोरी उस दिन उनके विवेक पर भारी पड़ चुकी थी।
एक-एक करके वे सब कुछ हारते चले गए।


पहले सोना-चांदी, फिर महल, सेना, राज्य… यहां तक कि अपने चारों भाइयों को भी दांव पर हार गए। सभा में बैठे लोग स्तब्ध थे, लेकिन कोई कुछ बोलने का साहस नहीं कर पा रहा था।
फिर शकुनि ने मुस्कुराते हुए कहा, “धर्मराज, अब आपके पास दांव पर लगाने के लिए क्या बचा है?”
युधिष्ठिर का सिर झुक चुका था। कुछ क्षणों की भयावह चुप्पी के बाद उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
“मेरे पास… द्रौपदी है।”
पूरा सभा भवन कांप उठा।

भीष्म पितामह की आंखें दुख से भर गईं। विदुर क्रोध से कांप उठे। लेकिन दुर्योधन और शकुनि के चेहरे पर क्रूर मुस्कान फैल गई।
पासा फेंका गया…
और द्रौपदी भी हार गईं।
दुर्योधन तुरंत सिंहासन से उठ खड़ा हुआ। उसकी आंखों में घमंड और प्रतिशोध की आग जल रही थी।
“दुःशासन! जाओ, द्रौपदी को सभा में घसीटकर लाओ।”
दुःशासन क्रूर हंसी हंसता हुआ द्रौपदी के कक्ष की ओर दौड़ा। उस समय द्रौपदी अपने महल में थीं। अचानक दुःशासन वहां पहुंचा और गरजते हुए बोला,
“चलो द्रौपदी! अब तुम हमारी दासी हो।”
द्रौपदी स्तब्ध रह गईं।

“यह असंभव है! धर्मराज मुझे दांव पर कैसे लगा सकते हैं?”
लेकिन दुःशासन ने उनकी एक न सुनी। उसने उनके बाल पकड़ लिए और उन्हें घसीटते हुए राजसभा में ले आया।
पूरी सभा यह दृश्य देखकर शर्म से सिर झुकाए बैठी रही।

द्रौपदी रोती हुई बोलीं, “सभा के महान पुरुषों! उत्तर दीजिए-जिस व्यक्ति ने पहले स्वयं को हार दिया, क्या उसे अपनी पत्नी को दांव पर लगाने का अधिकार था?”

सभा में सन्नाटा छा गया।

भीष्म पितामह मौन थे। द्रोणाचार्य मौन थे।

धृतराष्ट्र भी चुप बैठे रहे। किसी में इतना साहस नहीं था कि दुर्योधन के विरुद्ध आवाज़ उठा सके।

दुर्योधन ने घमंड से अपनी जांघ पर हाथ मारा और द्रौपदी की ओर देखकर बोला, “अब यह हमारी दासी है।”

फिर उसने दुःशासन को आदेश दिया-“इसके वस्त्र उतार दो!”

सभा में बैठे सभी लोग कांप उठे। यह केवल एक स्त्री का अपमान नहीं था… यह धर्म, मर्यादा और मानवता का अपमान था।

दुःशासन तुरंत द्रौपदी की ओर बढ़ा। द्रौपदी भय और अपमान से कांपने लगीं। उन्होंने एक-एक कर सभा में बैठे सभी लोगों से सहायता मांगी, लेकिन हर ओर केवल मौन था।

तब द्रौपदी की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्हें समझ आ गया कि इस सभा में अब कोई उनकी रक्षा नहीं करेगा।

उन्होंने अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठा दिए।

“हे द्वारकाधीश कृष्ण ! अब केवल आप ही मेरी लाज बचा सकते हैं!”

उसी क्षण उन्होंने स्वयं को पूरी तरह श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया।

और फिर

एक चमत्कार हुआ।

जैसे ही दुःशासन ने द्रौपदी की साड़ी खींचनी शुरू की, वस्त्र समाप्त ही नहीं हुआ। वह जितना खींचता, साड़ी उतनी ही बढ़ती जाती।

सभा में बैठे लोग आश्चर्य से खड़े हो गए।

दुःशासन पूरी शक्ति से साड़ी खींच रहा था। उसके हाथ थकने लगे, सांसें तेज हो गईं, शरीर पसीने से भीग गया… लेकिन द्रौपदी का चीर अनंत होता चला गया।

पूरा राजसभा भवन वस्त्रों के ढेर से भरने लगा। दुर्योधन की आंखों में पहली बार भय दिखाई देने लगा।

दुःशासन अंततः थककर भूमि पर गिर पड़ा। उसका शरीर कांप रहा था।

और द्रौपदी…

वे अब भी पूर्ण सम्मान के साथ खड़ी थीं। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर दिव्य शांति थी। उन्हें समझ आ चुका था कि जब संसार साथ छोड़ देता है, तब भगवान स्वयं अपने भक्त की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।

सभा में बैठे सभी लोगों के सिर शर्म से झुक गए।

विदुर की आंखों में आंसू थे। भीष्म पितामह भीतर ही भीतर टूट चुके थे।

तभी भयंकर क्रोध में भीम उठ खड़े हुए। उन्होंने गर्जना करते हुए प्रतिज्ञा ली-

“दुःशासन ! मैं युद्धभूमि में तुम्हारा सीना चीरकर तुम्हारे रक्त से द्रौपदी के बाल धोऊंगा। और दुर्योधन ! मैं तुम्हारी उसी जांघ को तोडूंगा जिसे तुमने आज अभिमान से उठाया है।”

उनकी प्रतिज्ञा सुनकर पूरा सभा भवन कांप उठा। उधर द्रौपदी ने मन ही मन श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। वे जान चुकी थीं कि सच्ची रक्षा केवल शक्ति से नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास और भक्ति से होती है।

उस दिन हस्तिनापुर की सभा में केवल एक स्त्री की लाज नहीं बची थी…

उस दिन अधर्म को खुली चुनौती मिली थी। और उसी क्षण महाभारत के विनाशकारी युद्ध का बीज हमेशा के लिए बो दिया गया था।

जब मां यशोदा ने पूरे ब्रह्मांड के स्वामी श्रीकृष्ण को ऊखल से बांध दिया

गोकुल की सुबह हमेशा की तरह आनंद और चहल-पहल से भरी हुई थी। नंद बाबा के आंगन में गायों की मधुर रंभाहट गूंज रही थी। गोपियां दही मथ रही थीं, बच्चे खेलते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे और पूरे गांव में ताजे माखन की सुगंध फैली हुई थी। लेकिन इन सबके बीच एक नाम ऐसा था जो हर घर में चर्चा का विषय बना रहता था—नन्हे कान्हा।

    कृष्ण की शरारतों से पूरा गोकुल परेशान भी था और मोहित भी। वे कभी किसी गोपी के घर से माखन चुरा लेते, कभी दही की मटकी फोड़ देते, तो कभी बंदरों को माखन खिलाकर खुद हंसते रहते। हर दिन कोई न कोई गोपी शिकायत लेकर यशोदा माता के पास पहुंच जाती।
    “यशोदा! तुम्हारा लाला बहुत शरारती हो गया है।”
    लेकिन जब कृष्ण मासूम चेहरा बनाकर मुस्कुरा देते, तो सबका गुस्सा पिघल जाता।

    एक दिन सुबह-सुबह यशोदा माता स्वयं दही मथ रही थीं। वे अपने लाडले कान्हा के लिए ताजा माखन बना रही थीं। उसी समय नन्हे कृष्ण नींद से उठकर वहां पहुंचे। उनकी आंखों में शरारत चमक रही थी।
    वे धीरे से यशोदा माता की गोद में चढ़ गए और बोले,
    “मैय्या, मुझे भूख लगी है।”
    यशोदा माता मुस्कुराईं और उन्हें दूध पिलाने लगीं। कृष्ण बड़े प्रेम से दूध पी रहे थे। तभी अचानक चूल्हे पर रखा दूध उबलने लगा।
    यशोदा माता तुरंत उठ खड़ी हुईं।
    “लाला, जरा रुक… दूध गिर जाएगा।”

    लेकिन कृष्ण को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा कि उनकी मां उन्हें छोड़कर चली जाएं। उनका छोटा सा चेहरा नाराज़ हो गया।
    उन्होंने होंठ फुलाए और गुस्से में इधर-उधर देखने लगे।
    फिर अचानक उनकी नजर पास रखी दही की मटकी पर पड़ी।

    अगले ही क्षण उन्होंने एक पत्थर उठाया…
    और जोर से मटकी पर दे मारा।
    मटकी टूट गई। दही और माखन पूरे फर्श पर फैल गया।
    लेकिन कृष्ण यहीं नहीं रुके।
    वे चुपके से दूसरे कमरे में चले गए, जहां माखन के मटके रखे थे। वहां पहुंचकर उन्होंने माखन निकालना शुरू कर दिया और अपने मित्र बंदरों को खिलाने लगे।
    कृष्ण हंस-हंसकर बंदरों से कह रहे थे,
    “लो, तुम भी खाओ। मैय्या का माखन बहुत स्वादिष्ट है।”

    कुछ देर बाद जब यशोदा माता वापस आईं, तो टूटी हुई मटकी देखकर समझ गईं कि यह सब किसकी शरारत है।
    वे हल्का सा मुस्कुराईं, लेकिन फिर जानबूझकर गुस्से का अभिनय करते हुए बोलीं,
    “आज तो इस नटखट को पकड़कर रहूंगी।”
    उन्होंने हाथ में एक छोटी सी छड़ी उठाई और कृष्ण को खोजने लगीं।

    उधर कृष्ण को जैसे ही आभास हुआ कि मैय्या आ रही हैं, वे तुरंत भाग खड़े हुए। उनके छोटे-छोटे पैर पूरे घर में तेजी से दौड़ने लगे। पीछे-पीछे यशोदा माता थीं।
    पूरा आंगन यह दृश्य देखकर हंस रहा था।
    आखिरकार काफी देर दौड़ने के बाद यशोदा माता ने कृष्ण को पकड़ लिया। कृष्ण की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने मासूम चेहरा बनाकर कहा,
    “मैय्या, अब मैं ऐसा नहीं करूंगा।”

    लेकिन यशोदा माता इस बार सचमुच नाराज़ थीं।
    उन्होंने कहा,
    “आज तुझे बांधकर रखूंगी, तभी तू थोड़ी देर शांत बैठेगा।”
    वे एक रस्सी लेकर आईं और कृष्ण को पास पड़े भारी ऊखल से बांधने लगीं। लेकिन जैसे ही रस्सी बांधतीं, वह दो अंगुल छोटी रह जाती।
    यशोदा माता हैरान हो गईं।
    उन्होंने दूसरी रस्सी जोड़ दी… फिर भी छोटी।
    तीसरी जोड़ दी… फिर भी छोटी।
    आसपास खड़ी गोपियां यह अद्भुत दृश्य देखकर आश्चर्य करने लगीं।

    “अरे यशोदा, इतनी सारी रस्सियां भी छोटी कैसे पड़ रही हैं?”
    किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसी लीला है।
    दरअसल जिनके भीतर पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है, उन्हें कोई साधारण रस्सी कैसे बांध सकती थी?
    लेकिन यशोदा माता हार मानने वालों में से नहीं थीं। वे बार-बार कोशिश करती रहीं। उनके माथे पर पसीना आ गया। सांसें तेज हो गईं।

    तभी नन्हे कृष्ण ने अपनी मैय्या की थकान देखी।
    उनका हृदय प्रेम से भर उठा।
    वे हल्का सा मुस्कुराए…
    और अगले ही क्षण रस्सी आसानी से बंध गई।
    पूरा आंगन यह देखकर हैरान रह गया।
    यशोदा माता ने राहत की सांस ली।
    “अब यहीं बैठे रहो और अपनी शरारतों के बारे में सोचो।”

    इतना कहकर वे घर के काम में लग गईं।
    लेकिन उस समय कोई यह नहीं समझ पा रहा था कि यह दृश्य कितना अद्भुत है।
    जिन्हें योगी वर्षों की तपस्या के बाद भी अपने ध्यान में बांध नहीं पाते…
    जिनके आदेश से सूर्य, चंद्रमा और पूरी सृष्टि चलती है…

    उन्हीं श्रीकृष्ण को एक साधारण मां ने अपने प्रेम से बांध लिया था।
    कृष्ण उस ऊखल से बंधे हुए भी मुस्कुरा रहे थे। उनके चेहरे पर नाराज़गी नहीं, बल्कि आनंद था। क्योंकि उन्हें रस्सी ने नहीं, मां यशोदा के प्रेम ने बांधा था।
    यही कारण है कि इस लीला को “दामोदर लीला” कहा जाता है—वह लीला जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्त के प्रेम के आगे बंध जाते हैं।

    उस दिन गोकुल में केवल एक शरारती बालक को ऊखल से नहीं बांधा गया था…
    उस दिन संसार ने देखा था कि सच्चा प्रेम इतना शक्तिशाली होता है कि वह स्वयं भगवान को भी अपने बंधन में बांध सकता है।

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    “श्री कृष्ण की दिव्य और प्रेरणादायक कहानियों का संग्रह। बाल लीलाओं, चमत्कारों, प्रेम, भक्ति और जीवन के अनमोल संदेशों से भरपूर कथाएँ, जो हर आयु के पाठकों को ज्ञान, प्रेरणा और आनंद प्रदान करती हैं।”

    लेखक / मूल रचनाकार: श्री कृष्ण की कथाएं
     प्रस्तुति: Saying Central Team

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