महान मर्कट : करुणा, विश्वासघात और कर्मफल की मार्मिक जातक कथा
बहुत प्राचीन समय की बात है। हिमालय के विशाल और निर्जन वनों में एक महान मर्कट निवास करता था। वह साधारण बंदरों की तरह चंचल या स्वार्थी नहीं था। उसका स्वभाव अत्यंत शांत, दयालु और सात्विक था। वह किसी को कष्ट पहुँचाना नहीं जानता था। पूरे वन में उसकी करुणा और सदाचार की चर्चा होती थी। वह एकांतप्रिय था और हिंसा से दूर रहकर पेड़ों के फल, कंद-मूल और वनस्पतियों से अपना जीवन बिताता था। वन के पशु-पक्षी भी उससे भय नहीं खाते थे, क्योंकि उसने कभी किसी को हानि नहीं पहुँचाई थी।
जिस वन में वह रहता था, वहाँ ऊँचे-ऊँचे पर्वत, गहरी खाइयाँ और प्रचंड झरने थे। घना जंगल इतना भयावह था कि कोई मनुष्य वहाँ जाने का साहस नहीं करता था। दिन में भी वहाँ कई स्थानों पर अंधकार छाया रहता था। उसी जंगल में सिंह, बाघ और अन्य हिंसक पशु भी घूमते रहते थे।
एक दिन एक चरवाहा अपने पशुओं को चराते-चराते उस वन के पास आ पहुँचा। धीरे-धीरे अपने जानवरों को खोजते हुए वह जंगल के भीतर बहुत दूर निकल गया। चलते-चलते उसे यह भी पता नहीं चला कि वह रास्ता भटक चुका है। सूरज सिर पर चढ़ आया था। भूख और प्यास से उसका शरीर कमजोर होने लगा। वह इधर-उधर रास्ता खोजता रहा, परंतु चारों ओर केवल घना जंगल दिखाई देता था।
थक-हारकर वह एक पेड़ की छाया में बैठ गया। तभी उसकी नजर पास खड़े एक विशाल तिंदुक के वृक्ष पर पड़ी, जो रसीले और पके फलों से लदा हुआ था। उन फलों को देखकर उसकी भूख और बढ़ गई। वह तुरंत पेड़ पर चढ़ने लगा। भूख के कारण उसका ध्यान इस बात पर नहीं गया कि उस वृक्ष की जड़ एक पथरीली पहाड़ी की संकरी दरार से निकली हुई थी और उसके नीचे एक गहरा झरना बह रहा था।
चरवाहा जल्दी-जल्दी शाखाओं पर चढ़ता हुआ सबसे ऊपरी डाल तक पहुँच गया, जहाँ बड़े-बड़े मीठे फल लगे थे। वह लालच में भरकर फलों को तोड़ने लगा। लेकिन जिस शाखा पर वह खड़ा था, वह उसके भारी शरीर का भार सहन न कर सकी। अचानक जोर की आवाज हुई और शाखा टूट गई।
अगले ही क्षण चरवाहा उस टूटती शाखा के साथ नीचे बहते प्रचंड झरने में जा गिरा। पानी का वेग इतना तेज था कि वह स्वयं को संभाल भी नहीं पाया। बहते-बहते वह एक गहरे खड्ड में जा फँसा, जहाँ चारों ओर चिकनी और सीधी चट्टानें थीं। वहाँ से बाहर निकलना असंभव था। उसने कई बार ऊपर चढ़ने का प्रयास किया, लेकिन हर बार फिसलकर नीचे गिर जाता।
अब उसे अपनी मृत्यु सामने दिखाई देने लगी। भय और निराशा से वह जोर-जोर से चीखने लगा। उसकी दर्द भरी आवाजें पूरे जंगल में गूँजने लगीं। लेकिन उस निर्जन वन में कोई मनुष्य नहीं था, जो उसकी सहायता कर सके।
उसी वन में रहने वाले महान मर्कट ने जब उसकी करुण पुकार सुनी, तो वह तुरंत उस दिशा में दौड़ा। थोड़ी ही देर में वह उस खड्ड के पास पहुँच गया। उसने नीचे झाँककर देखा कि एक मनुष्य मृत्यु के भय से काँप रहा है।
महान मर्कट के मन में दया उमड़ पड़ी। उसने बिना अपने प्राणों की चिंता किए तुरंत छलांग लगाई और बड़ी कठिनाई से नीचे खड्ड में उतर गया। वहाँ पहुँचकर उसने उस चरवाहे को संभाला और धीरे-धीरे उसे ऊपर खींचने लगा। रास्ता अत्यंत कठिन था। कई बार मर्कट स्वयं भी फिसलने लगा, लेकिन उसने साहस नहीं छोड़ा। लंबे प्रयास के बाद वह किसी प्रकार उस आदमी को खड्ड से बाहर निकालने में सफल हुआ।
लेकिन इस प्रयास में महान मर्कट का शरीर बुरी तरह थक चुका था। उसके हाथ-पैरों में असहनीय पीड़ा हो रही थी। वह इतना थक गया था कि खड़ा रहना भी मुश्किल हो गया। उसकी साँसें तेज चल रही थीं और शरीर काँप रहा था।
उसने उस चरवाहे से कहा, “मैं अत्यंत थक चुका हूँ। इस वन में हिंसक पशु घूमते रहते हैं। जब तक मैं थोड़ी देर विश्राम करूँ, तुम मेरी रखवाली करना।”
इतना कहकर वह पास ही एक चट्टान पर लेट गया और कुछ ही क्षणों में गहरी नींद में सो गया।
लेकिन मनुष्य का लोभ कभी-कभी उसकी मानवता को भी निगल जाता है।
चरवाहा धीरे-धीरे उठकर बैठा। उसने सोते हुए मर्कट को देखा और उसके मन में एक पापपूर्ण विचार आया। उसने सोचा, “इस भयानक जंगल में मुझे भोजन कहाँ मिलेगा? यदि मैं इस मर्कट को मार दूँ, तो कई दिनों तक इसके मांस से अपना पेट भर सकता हूँ।”
जिस प्राणी ने अभी-अभी उसकी जान बचाई थी, उसी के प्रति उसके मन में विश्वासघात की भावना जाग उठी। वह चुपचाप उठा और पास पड़ी एक बड़ी चट्टान को दोनों हाथों से उठाकर ले आया। फिर उसने पूरी ताकत से वह पत्थर सोते हुए मर्कट के ऊपर पटक दिया।
पत्थर मर्कट के शरीर पर जोर से गिरा। वह पीड़ा से कराह उठा। उसके शरीर से रक्त बहने लगा, परंतु सौभाग्य से उसकी मृत्यु नहीं हुई। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। सामने भयभीत खड़ा चरवाहा, पास पड़ा पत्थर और उसके चेहरे की अपराधपूर्ण मुद्रा देखकर महान मर्कट सब समझ गया।
उसकी आँखों में दुख था, क्रोध नहीं। वह धीमे स्वर में बोला, “हे मनुष्य! मैं तुम्हें मृत्यु के मुँह से निकालकर लाया, लेकिन तुमने बदले में मेरे साथ यही किया। तुम्हारे शरीर को तो मैंने खड्ड से बाहर निकाल दिया, परंतु तुम्हारा मन अब एक और भी गहरे अंधकार में गिर चुका है। यह पाप और कृतघ्नता का गर्त है, जहाँ से निकलना बहुत कठिन होता है।”
फिर उसने करुण स्वर में कहा, “मुझे अपने घावों की उतनी पीड़ा नहीं हो रही, जितना इस बात का दुख है कि मैंने जिस व्यक्ति की सहायता की, वही इतना क्रूर और स्वार्थी निकला।”
इतना सब होने के बाद भी महान मर्कट के मन में द्वेष नहीं आया। घायल अवस्था में भी उसने उस चरवाहे को जंगल के सुरक्षित रास्ते तक पहुँचाया ताकि वह बाहर निकल सके।
चरवाहा वहाँ से तो चला गया, लेकिन उसके पाप ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।
कुछ समय बाद वह भयंकर कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गया। उसका शरीर गलने लगा। घावों से बदबू आने लगी। उसके अपने परिवार और गाँव वालों ने भी उसे घर से निकाल दिया। कोई उसके पास बैठना तक नहीं चाहता था। वह अकेला और तिरस्कृत होकर फिर उसी जंगल में आकर रहने लगा।
अब वह दिन-रात अपने कर्मों पर पछताता रहता। उसे बार-बार महान मर्कट का दयालु चेहरा याद आता। वह सोचता, “जिसने मेरी जान बचाई, मैंने उसी को मारने का प्रयास किया। आज मैं अपने ही पापों का फल भोग रहा हूँ।”
उसका शरीर रोग से जल रहा था और मन पश्चाताप की अग्नि में। अब उसे समझ आ चुका था कि कृतघ्नता और लोभ मनुष्य को अंततः विनाश की ओर ही ले जाते हैं।
यह कथा हमें सिखाती है कि दया और उपकार का बदला कभी विश्वासघात से नहीं देना चाहिए। जो व्यक्ति अपने हितैषियों के साथ छल करता है, उसका अंत दुख और पश्चाताप में ही होता है। कर्मों का फल अवश्य मिलता है, चाहे देर से ही क्यों न मिले।
महान मत्स्य : सत्य और करुणा की अद्भुत जातक कथा

बहुत प्राचीन समय की बात है। जेतवन के निकट एक विशाल और सुंदर जलाशय हुआ करता था। चारों ओर हरे-भरे वृक्ष, कमल के फूलों से भरा शांत जल और मधुर स्वर में गाते पक्षी उस स्थान की शोभा बढ़ाते थे। उस जलाशय में अनेक प्रकार की मछलियाँ, कछुए, मेंढक और जलचर जीव निवास करते थे। दूर-दूर से पशु-पक्षी वहाँ पानी पीने आते थे। वह जलाशय पूरे क्षेत्र के लिए जीवन का आधार था।
उसी जलाशय में एक अत्यंत विशाल मत्स्य रहता था। वह साधारण मछली नहीं था। उसका शरीर विशाल होने के साथ-साथ उसका हृदय भी महान था। वह शीलवान, दयालु और शांत स्वभाव का था। अन्य जीवों की रक्षा करना और सबके सुख-दुख में सहभागी बनना उसका स्वभाव था। वह किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता था और केवल जल में उत्पन्न वनस्पतियों तथा शाकाहारी आहार से अपना जीवन बिताता था। सभी जलचर उसे सम्मान की दृष्टि से देखते थे और उसे “महान मत्स्य” कहकर पुकारते थे।
कुछ वर्षों बाद उस प्रदेश में भयंकर सूखा पड़ा। आकाश में बादल दिखाई देना बंद हो गए। नदियाँ और तालाब धीरे-धीरे सूखने लगे। धरती तपने लगी। खेतों की हरियाली पीली पड़ गई। किसान आकाश की ओर आशा भरी आँखों से देखते, लेकिन वर्षा का कोई संकेत नहीं मिलता। पेड़-पौधे सूखने लगे और पशु-पक्षी प्यास से व्याकुल होकर इधर-उधर भटकने लगे।
धीरे-धीरे उस जलाशय का जल भी कम होने लगा। जो जलाशय कभी लबालब भरा रहता था, अब सिकुड़कर छोटा होता जा रहा था। जल कम होने के कारण उसमें रहने वाले जीवों पर संकट टूट पड़ा। मछलियाँ तड़पने लगीं। कछुए कीचड़ में फँस गए। जल के अभाव में अनेक छोटे जीव मरने लगे। ऊपर से भूख से परेशान मनुष्य और पक्षी उन असहाय जीवों का शिकार करने लगे।
पूरा जलाशय मानो मृत्यु का मैदान बन गया था। हर ओर भय, पीड़ा और करुण क्रंदन था।
महान मत्स्य यह सब देखकर अत्यंत दुखी हुआ। उसका हृदय करुणा से भर उठा। वह अपने साथियों की तड़प सहन नहीं कर पा रहा था। उसने देखा कि यदि शीघ्र वर्षा नहीं हुई, तो जलाशय के सभी प्राणी नष्ट हो जाएँगे।
उसने मन ही मन विचार किया, “यदि मेरे जीवन में सत्य, दया और धर्म का पालन सच्चे मन से हुआ है, तो उसका फल आज इन प्राणियों को मिलना चाहिए।”
तब वह शांत होकर जलाशय के मध्य पहुँचा। उसने अपने मन को एकाग्र किया और सत्य की शक्ति से वर्षा देवता पर्जन्य का आह्वान किया। उसका स्वर अत्यंत गंभीर और करुणा से भरा हुआ था।
उसने प्रार्थना की, “हे वर्षा देव! यदि मैंने जीवनभर किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाया, यदि मेरे कर्म सच्चे और धर्मपूर्ण रहे हैं, यदि मैंने सदैव दया और सत्य का पालन किया है, तो कृपा करके इस भूमि पर वर्षा करें। इन असहाय प्राणियों के जीवन की रक्षा करें।”
उस महान मत्स्य की वाणी में सत्य की शक्ति थी। उसका हृदय पूर्णतः निष्कपट और पवित्र था। कहते हैं कि सच्चे मन से बोले गए सत्य में अद्भुत प्रभाव होता है। उसकी सत्य-प्रतिज्ञा व्यर्थ नहीं गई।
कुछ ही क्षणों बाद आकाश में परिवर्तन होने लगा। जो आकाश कई महीनों से सूना पड़ा था, वहाँ धीरे-धीरे काले बादल उमड़ने लगे। ठंडी हवाएँ बहने लगीं। बिजली चमकी और गर्जना होने लगी।
फिर अचानक मूसलाधार वर्षा आरंभ हो गई।
बारिश इतनी तेज हुई कि सूखी धरती आनंद से झूम उठी। खेतों में फिर से हरियाली लौटने लगी। जलाशय का सूखता हुआ तल पुनः पानी से भरने लगा। कीचड़ में फँसे जीवों को नया जीवन मिल गया। मछलियाँ फिर से आनंदपूर्वक तैरने लगीं। कछुए बाहर निकल आए। पशु-पक्षियों की प्यास बुझ गई और पूरा वन जीवन से भर उठा।
सभी जीव महान मत्स्य की ओर कृतज्ञता और सम्मान से देखने लगे। उन्होंने समझ लिया कि यह चमत्कार उसकी सत्यनिष्ठा, करुणा और पुण्य के प्रभाव से ही संभव हुआ है।
महान मत्स्य ने किसी चमत्कार या शक्ति का घमंड नहीं किया। वह शांत भाव से अपने साथियों के बीच रहने लगा। उसके लिए सबसे बड़ा सुख यही था कि असंख्य प्राणियों का जीवन बच गया।
यह कथा हमें सिखाती है कि सत्य, दया और निष्कपट कर्मों में अद्भुत शक्ति होती है। जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से दूसरों के कल्याण के लिए जीता है, प्रकृति भी उसकी सहायता करती है। सच्चे मन से किया गया शुभ कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता और उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अनेक प्राणियों के जीवन को बचा सकता है।
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जातक कथाएँ बुद्धिमत्ता, करुणा, सत्य, दया और नैतिक मूल्यों से भरपूर प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। इन कथाओं के माध्यम से जीवन जीने की सही राह, अच्छे कर्मों का महत्व और मानवता का अमूल्य संदेश मिलता है।
रचनाकार: जातक कथाएँ
प्रस्तुति: Saying Central Team