जातक कथा

सिंह और सियार : घमंड के विनाश की प्रसिद्ध जातक कथा

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सिंह और सियार : घमंड के विनाश की प्रसिद्ध जातक कथा

बहुत प्राचीन समय की बात है। हिमालय के घने और भयावह वनों में एक अत्यंत बलवान सिंह रहता था। उसका शरीर विशाल और शक्तिशाली था। उसकी गर्जना सुनकर पूरा जंगल काँप उठता था। वह जंगल का निर्विवाद राजा माना जाता था। पर्वतों की गुफाएँ उसका निवास थीं और वन के सभी पशु उससे भय खाते थे। किंतु अपनी अपार शक्ति के बावजूद वह अत्याचारी नहीं था। वह केवल भूख मिटाने के लिए शिकार करता और फिर शांत भाव से अपनी गुफा में लौट जाता।

एक दिन वह एक विशाल भैंसे का शिकार करके उसका भक्षण कर रहा था। पेट भर जाने के बाद वह अपने निवास की ओर लौटने लगा। रास्ते में उसे एक अत्यंत दुर्बल और मरियल-सा सियार दिखाई दिया। उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा बन चुका था। भूख के कारण उसकी आँखें धँस गई थीं और वह काँपता हुआ धीरे-धीरे सिंह की ओर बढ़ा।
जैसे ही वह सिंह के निकट पहुँचा, वह तुरंत भूमि पर लेट गया और दंडवत प्रणाम करते हुए बोला, “हे वनराज! मैं अत्यंत दुखी और भूखा प्राणी हूँ। यदि आप कृपा करें, तो मुझे अपनी शरण में ले लें। मैं आपका सेवक बनकर रहूँगा। आपकी सेवा करूँगा और आपके द्वारा छोड़े गए शिकार से अपना जीवन चला लूँगा।”

सिंह ने उसकी दयनीय अवस्था देखी। उसके मन में करुणा जाग उठी। उसने सोचा कि यह बेचारा भूख से मर जाएगा। इसलिए उसने सियार को अपनी शरण में रहने की अनुमति दे दी।
उस दिन से सियार सिंह के साथ रहने लगा। जब भी सिंह कोई शिकार करता, तो पेट भरने के बाद बचा हुआ मांस सियार को मिल जाता। स्वादिष्ट भोजन और सुरक्षा मिलने के कारण कुछ ही दिनों में सियार का शरीर भरने लगा। जो सियार पहले कमजोर और कंकाल जैसा दिखाई देता था, अब मोटा-ताजा और ताकतवर दिखने लगा।
धीरे-धीरे उसके भीतर अहंकार जन्म लेने लगा।

वह प्रतिदिन सिंह को बड़े-बड़े पशुओं का शिकार करते देखता और मन ही मन सोचने लगा कि अब वह भी सिंह जितना शक्तिशाली हो चुका है। उसके मन में यह भ्रम बैठ गया कि केवल अच्छा भोजन और मोटा शरीर ही शक्ति का प्रमाण हैं। उसने यह नहीं समझा कि सिंह की वास्तविक शक्ति उसके साहस, अनुभव और जन्मजात सामर्थ्य में थी।

एक दिन घमंड में भरकर वह सिंह के पास गया और अकड़ते हुए बोला, “हे सिंह! अब मैं भी तुम्हारी तरह शक्तिशाली बन गया हूँ। आज मैं स्वयं एक हाथी का शिकार करूँगा। उसका मांस खाऊँगा और जो बच जाएगा, वह तुम्हारे लिए छोड़ दूँगा।”

सियार की बातें सुनकर सिंह मुस्कराया। वह समझ गया कि सियार अहंकार और मूर्खता के जाल में फँस चुका है। किंतु क्योंकि वह उसे अपना साथी मानता था, इसलिए उसने शांत स्वर में समझाया, “मित्र, हर प्राणी की अपनी सीमा होती है। हाथी का शिकार करना अत्यंत कठिन कार्य है। यह तुम्हारे बस की बात नहीं है। व्यर्थ के घमंड में अपनी जान मत गँवाओ।”
लेकिन घमंड मनुष्य ही नहीं, पशु की बुद्धि भी छीन लेता है। सियार ने सिंह की सलाह को कमजोरी समझा। उसने गर्व से कहा, “तुम मुझे कमज़ोर समझते हो, लेकिन आज मैं अपनी शक्ति सिद्ध करके दिखाऊँगा।”

इतना कहकर वह तेजी से पहाड़ की ऊँची चोटी पर जा पहुँचा। वहाँ खड़े होकर उसने नीचे चारों ओर नजर दौड़ाई। थोड़ी दूर पर हाथियों का एक समूह धीरे-धीरे जंगल में आगे बढ़ रहा था। उन हाथियों में एक अत्यंत विशाल और शक्तिशाली हाथी भी था।
सियार ने उसे अपना शिकार बनाने का निश्चय किया।

वह अपने भीतर झूठा साहस भरने लगा। फिर उसने सिंह की नकल करते हुए तीन बार जोर-जोर से आवाज निकाली, मानो वह भी वनराज हो। उसकी आवाज सुनकर जंगल के कई पशु आश्चर्य से इधर-उधर देखने लगे।
इसके बाद सियार पूरी ताकत से पहाड़ की चोटी से छलांग लगाकर उस हाथी पर टूट पड़ा।
लेकिन वह न तो सिंह था और न ही उसके भीतर वैसी शक्ति या कौशल था।

वह हाथी के सिर पर गिरने के बजाय सीधे उसके पैरों के पास जा गिरा। विशाल हाथी ने पहले तो उसकी ओर ध्यान भी नहीं दिया। फिर अपनी भारी चाल से आगे बढ़ते हुए उसने अनजाने में अपना विशाल पैर सियार के सिर पर रख दिया।
क्षणभर में सियार का सिर चकनाचूर हो गया। उसका घमंड, उसकी मूर्खता और उसके प्राण — सब उसी पल समाप्त हो गए।
ऊपर पहाड़ी से सिंह यह सब देख रहा था। उसने दुखभरे स्वर में कहा,
“जो मूर्ख और घमंडी होते हैं,

उनकी गति हमेशा ऐसी ही होती है।”
फिर सिंह शांत भाव से अपनी गुफा की ओर लौट गया।
यह कथा हमें सिखाती है कि केवल दूसरों की नकल करने से कोई महान नहीं बन जाता। अपनी शक्ति और सीमाओं को पहचाने बिना बड़े कार्य करने का अहंकार विनाश का कारण बनता है। बुद्धिमानों की सलाह को अनदेखा करना और झूठे अभिमान में जीना अंततः दुखद परिणाम ही देता है।

सोमदन्त : मोह और वैराग्य की मार्मिक जातक कथा

बहुत प्राचीन समय की बात है। हिमालय के शांत और घने वनों में एक तपस्वी सन्यासी निवास करता था। वह संसार के मोह-माया को त्याग चुका था और एक छोटी-सी कुटिया बनाकर एकांत में तपस्या तथा ध्यान किया करता था। उसका जीवन अत्यंत सरल था। वह जंगल से फल, कंद-मूल लाकर अपना निर्वाह करता और दिनभर ईश्वर-चिंतन में लीन रहता। वन के पशु-पक्षी भी उससे भय नहीं खाते थे, क्योंकि उसके मन में किसी के प्रति हिंसा या द्वेष नहीं था।

एक दिन प्रातःकाल वह सन्यासी जंगल में भ्रमण कर रहा था। तभी उसकी नजर एक छोटे हाथी के बच्चे पर पड़ी। वह बच्चा अकेला खड़ा रो रहा था। शायद किसी दुर्घटना में वह अपने झुंड से बिछड़ गया था। उसकी आँखों में भय और असहायता साफ दिखाई दे रही थी। वह इतना छोटा था कि अकेले जंगल में जीवित रह पाना उसके लिए असंभव था।
सन्यासी का हृदय दया से भर उठा। उसने सोचा, “यदि मैं इसे यहीं छोड़ दूँ, तो कोई हिंसक पशु इसे मार डालेगा।” यह सोचकर वह उस हाथी के बच्चे को अपनी कुटिया में ले आया।

धीरे-धीरे वह हाथी का बच्चा सन्यासी के साथ रहने लगा। सन्यासी बड़े प्रेम से उसका पालन-पोषण करने लगा। वह उसके लिए जंगल से ताजे फल, कोमल पत्तियाँ और जल लाता। हाथी का बच्चा भी सन्यासी से अत्यंत स्नेह करने लगा। जहाँ भी सन्यासी जाता, वह उसके पीछे-पीछे चलता।

सन्यासी ने प्यार से उसका नाम “सोमदन्त” रखा।
समय बीतने लगा। सोमदन्त अब पहले से स्वस्थ और चंचल हो गया था। उसकी सूंड लंबी होने लगी और शरीर भी मजबूत बनने लगा। वह पूरे दिन कुटिया के आसपास खेलता रहता। कभी वह पेड़ों की डालियाँ हिलाता, कभी तालाब में पानी उछालता और कभी अपनी सूंड से सन्यासी के वस्त्र खींचकर खेलता। उसकी मासूम हरकतों से सन्यासी का मन प्रसन्न हो उठता।

धीरे-धीरे सन्यासी को सोमदन्त से अत्यधिक मोह हो गया। वह उसे अपने पुत्र के समान प्रेम करने लगा। अब उसका अधिकांश समय उसी की देखभाल में बीतने लगा। वह उसके भोजन का विशेष ध्यान रखता और कभी उसे भूखा नहीं रहने देता।
एक दिन किसी आवश्यक कार्य से सन्यासी को जंगल के दूसरे भाग में जाना पड़ा। जाने से पहले उसने सोमदन्त के लिए बहुत-से फल और भोजन कुटिया में रख दिए।

जब सन्यासी चला गया, तो सोमदन्त अकेला रह गया। उसने सामने रखे स्वादिष्ट फलों को देखा और खाने लगा। पहले उसने कुछ फल खाए, फिर और खाने लगा। मीठे और रसीले फलों का स्वाद उसे इतना अच्छा लगा कि वह स्वयं को रोक नहीं पाया।
वहाँ उसे टोकने वाला कोई नहीं था। न कोई सीमा बताने वाला और न ही कोई समझाने वाला।

लोभ में आकर वह लगातार खाता ही चला गया। उसे यह भी ध्यान नहीं रहा कि उसके शरीर की क्षमता कितनी है। उसका पेट भर चुका था, लेकिन स्वाद की लालसा खत्म नहीं हुई। अंततः उसने इतना अधिक खा लिया कि उसका पेट फट गया।
कुछ ही क्षणों में बेचारा सोमदन्त तड़पकर वहीं गिर पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।

संध्या के समय जब सन्यासी अपनी कुटिया में लौटा, तो उसने सामने सोमदन्त को मृत अवस्था में पड़ा देखा। यह दृश्य देखकर उसका हृदय टूट गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह दुख से व्याकुल होकर जोर-जोर से विलाप करने लगा।
वह बार-बार सोमदन्त के सिर को सहलाता और रोते हुए कहता, “हे सोमदन्त! तू मुझे छोड़कर क्यों चला गया? अब मैं इस निर्जन वन में अकेला कैसे रहूँगा?”

उसका दुख इतना गहरा था कि वह अपने सन्यास और वैराग्य को भी भूल बैठा। वह पूरी रात रोता-बिलखता रहा।
देवताओं के राजा शक्र ने जब एक तपस्वी सन्यासी को इस प्रकार मोह में डूबा देखा, तो उन्हें आश्चर्य हुआ। वे उसका मोह दूर करना चाहते थे। इसलिए वे एक दिव्य रूप धारण करके उसके सामने प्रकट हुए।

उन्होंने शांत स्वर में कहा, “हे सन्यासी! तुम पहले एक धनी गृहस्थ थे, लेकिन संसार के मोह और बंधनों को त्यागकर तुमने सन्यास ग्रहण किया। तुमने वैराग्य का मार्ग चुना ताकि जन्म-मरण के दुखों से मुक्त हो सको। फिर आज एक हाथी के लिए इतना विलाप क्यों कर रहे हो?”

सन्यासी ने सिर उठाकर उनकी ओर देखा, लेकिन उसके पास कोई उत्तर नहीं था।
शक्र ने आगे कहा, “जिस संसार को तुम छोड़ चुके हो, उसी संसार के मोह ने फिर तुम्हारे हृदय को बाँध लिया। यह शरीर नश्वर है। जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। यदि ज्ञानी व्यक्ति भी मोह में डूब जाए, तो उसके ज्ञान और तपस्या का क्या अर्थ रह जाता है?”

ये वचन सुनते ही सन्यासी का हृदय भीतर तक काँप उठा। उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि वह फिर से सांसारिक मोह में फँस गया था। उसने आँसू पोंछे और शांत होकर विचार करने लगा।

धीरे-धीरे उसका मन स्थिर हो गया। उसने सोमदन्त के मृत शरीर को श्रद्धा से देखा और मन ही मन उसके लिए मंगलकामना की। फिर उसने विलाप करना बंद कर दिया और पुनः वैराग्य तथा साधना के मार्ग पर लौट आया।
उस दिन के बाद वह पहले से भी अधिक सावधानी से अपने मन को मोह से दूर रखने लगा।

यह कथा हमें सिखाती है कि संसार की हर वस्तु और हर संबंध नश्वर है। अत्यधिक मोह अंततः दुख का कारण बनता है। ज्ञानी वही है जो प्रेम तो करे, लेकिन आसक्ति में बंधकर अपने विवेक को न खोए। जीवन और मृत्यु प्रकृति का नियम हैं, और जो इस सत्य को समझ लेता है, वही वास्तविक शांति प्राप्त करता है।

कालबाहु : गुण और बाहरी आकर्षण की शिक्षाप्रद जातक कथा

बहुत प्राचीन समय की बात है। एक समृद्ध राज्य में एक न्यायप्रिय और कलाप्रेमी राजा राज्य करता था। उसे दुर्लभ पशु-पक्षियों को पालने का बड़ा शौक था। उसके राजमहल में अनेक सुंदर पक्षी, हिरण और दूसरे विचित्र जीव रखे जाते थे। राजा उनका बहुत आदर करता और उनकी देखभाल के लिए विशेष सेवकों को नियुक्त करता था।

एक दिन किसी शिकारी ने जंगल से दो सुंदर तोते पकड़कर राजा को भेंट किए। वे दोनों तोते साधारण पक्षियों से बिल्कुल अलग थे। उनके पंख चमकीले हरे रंग के थे, आँखों में अद्भुत चमक थी और उनकी वाणी अत्यंत मधुर थी। वे मनुष्यों की बोली भी स्पष्ट रूप से बोल लेते थे। राजा उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ।

राजा ने उन दोनों तोतों को बड़े आदर से महल में रखवाया। उनके लिए सोने का सुंदर पिंजरा बनवाया गया। प्रतिदिन उन्हें स्वादिष्ट भोजन दिया जाता। शहद, भुने हुए मक्के और मीठे फलों से उनका सत्कार होता। राजमहल के लोग भी उन्हें बड़े प्रेम से देखते थे।
उन दोनों भाइयों में बड़े तोते का नाम “राधा” था और छोटे का नाम “पोट्ठपाद”। राधा अत्यंत बुद्धिमान, शांत और धैर्यवान था, जबकि पोट्ठपाद स्वभाव से थोड़ा भावुक और चंचल था। दोनों भाई आपस में बहुत प्रेम करते थे।

कुछ समय तक पूरा राजमहल उन्हीं दोनों तोतों की चर्चा करता रहा। दूर-दूर से लोग उनकी मधुर वाणी और सुंदरता देखने आते। जब वे बोलते, तो सब प्रसन्न होकर हँस पड़ते। राजा भी प्रतिदिन उनके पास बैठकर उनसे बातें करता।
लेकिन संसार का स्वभाव परिवर्तनशील होता है।

एक दिन एक वनवासी राजा के पास एक अत्यंत विचित्र जीव लेकर आया। वह एक बड़ा काला लंगूर था। उसके हाथ असामान्य रूप से लंबे और विशाल थे। उसका चेहरा डरावना था और उसकी आँखें चमकती रहती थीं। लोग उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाते। ऐसा जीव राज्य में पहले कभी किसी ने नहीं देखा था।

राजा भी उस विचित्र प्राणी को देखकर उत्सुक हो उठा। उसने उसे महल में रखने का आदेश दिया। क्योंकि वह दुर्लभ था, इसलिए महल के लोग और नगरवासी उसे देखने के लिए उमड़ पड़े। अब जहाँ पहले सबकी नजरें राधा और पोट्ठपाद पर रहती थीं, वहीं अब लोग उस काले लंगूर को देखने में अधिक रुचि लेने लगे।

धीरे-धीरे तोतों के पास आने वाले लोगों की संख्या कम हो गई। राजा भी अब पहले की तरह उनके पास अधिक समय नहीं बिताता था। यह परिवर्तन देखकर छोटा तोता पोट्ठपाद बहुत दुखी रहने लगा। उसे लगने लगा कि अब कोई उनकी कद्र नहीं करता।
एक रात वह उदास होकर अपने बड़े भाई राधा से बोला, “भैया, क्या तुमने देखा नहीं? पहले लोग हमें कितना प्यार करते थे। सब हमारी प्रशंसा करते थे। लेकिन अब उस भयानक लंगूर के आने के बाद कोई हमारी ओर देखता तक नहीं। ऐसा लगता है जैसे हमारा सम्मान समाप्त हो गया हो।”

पोट्ठपाद की आँखों में पीड़ा थी। वह स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा था।
राधा शांत स्वभाव का था। उसने प्रेम से अपने छोटे भाई को समझाया, “भाई, दुखी मत हो। संसार में केवल नया और विचित्र दिखाई देने वाला आकर्षण हमेशा नहीं टिकता। सच्चे गुणों का मूल्य कभी कम नहीं होता। लोग कुछ समय के लिए किसी नई चीज़ से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन अंत में वही सम्मान पाता है जिसके भीतर वास्तविक गुण होते हैं। धैर्य रखो, समय स्वयं सबको सत्य दिखा देगा।”

पोट्ठपाद ने अपने भाई की बात तो सुन ली, लेकिन उसका मन अभी भी दुखी था।
कुछ दिनों बाद राजमहल के छोटे राजकुमारों ने उस लंगूर के साथ खेलने की इच्छा जताई। वे उत्साह से उसके पास गए। शुरू में लंगूर शांत बैठा रहा, लेकिन अचानक उसने अपना भयानक मुँह फैलाया, तेज दाँत दिखाए और जोर-जोर से डरावनी आवाजें निकालने लगा।

उसका विकराल रूप देखकर छोटे राजकुमार भय से काँप उठे। वे जोर-जोर से रोने और चीखने लगे। महल में अफरा-तफरी मच गई। सेवक दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे और बच्चों को किसी तरह बचाकर दूर ले गए।
जब यह समाचार राजा तक पहुँचा, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ। उसे समझ आ गया कि यह लंगूर देखने में भले ही विचित्र और आकर्षक हो, लेकिन उसका स्वभाव उग्र और भयावह है। वह बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
राजा ने तुरंत आदेश दिया कि उस लंगूर को जंगल में छोड़ दिया जाए।

अगले ही दिन सैनिक उसे दूर वन में छोड़ आए।
लंगूर के जाने के बाद महल का वातावरण फिर शांत हो गया। अब लोगों का ध्यान पुनः राधा और पोट्ठपाद की ओर लौटने लगा। उनकी मधुर वाणी और शांत स्वभाव ने फिर सबका मन जीत लिया। राजा भी पहले की तरह उनसे प्रेमपूर्वक बातें करने लगा और उनकी सेवा-सत्कार फिर से पहले जैसा होने लगा।

पोट्ठपाद अब समझ चुका था कि उसके बड़े भाई की बात बिल्कुल सत्य थी। बाहरी आकर्षण और नया होने का मोह कुछ समय के लिए लोगों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन सच्चे गुण, मधुर व्यवहार और अच्छा स्वभाव ही अंत में सम्मान दिलाते हैं।
राधा मुस्कराकर बोला, “देखा भाई, गुणों की चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। समय आने पर संसार स्वयं अच्छे और बुरे का अंतर समझ जाता है।”

यह कथा हमें सिखाती है कि केवल बाहरी रूप, नवीनता या दिखावा स्थायी सम्मान नहीं दिला सकते। वास्तविक आदर सद्गुणों, विनम्रता और अच्छे आचरण से ही प्राप्त होता है। जो व्यक्ति धैर्य रखता है और अपने गुणों को बनाए रखता है, अंततः वही लोगों के हृदय में स्थान पाता है।

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जातक कथाएँ बुद्धिमत्ता, करुणा, सत्य, दया और नैतिक मूल्यों से भरपूर प्रेरणादायक कहानियाँ हैं। इन कथाओं के माध्यम से जीवन जीने की सही राह, अच्छे कर्मों का महत्व और मानवता का अमूल्य संदेश मिलता है।

रचनाकार: जातक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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