दादी माँ की कहानियाँ-स्वर्ग में अमीर-गरीब
बहुत समय पहले की बात है। एक ज्ञानी संत अपने शिष्यों को जीवन की अच्छी बातें समझाया करते थे। वे हमेशा कहते थे कि इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों, धन-दौलत या ऊँचे पद से नहीं होती, बल्कि उसके कर्मों और उसके मन की अच्छाई से होती है। एक दिन उनके शिष्यों ने उनसे पूछा, “गुरुदेव, क्या सचमुच स्वर्ग में सभी लोगों को बराबर सम्मान मिलता है? क्या वहाँ अमीर और गरीब में कोई फर्क नहीं किया जाता?” संत मुस्कुराए और बोले, “मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। इस कहानी से तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।”
उन्होंने कहानी शुरू की। एक दिन स्वर्ग के विशाल दरवाजे पर दो व्यक्ति एक साथ पहुँचे। उनमें से एक बहुत अमीर व्यक्ति था। उसने बहुत कीमती और चमकदार वस्त्र पहन रखे थे। उसके शरीर पर सोने और हीरे के आभूषण चमक रहे थे। उसके चेहरे पर अभिमान साफ दिखाई देता था। दूसरा व्यक्ति बहुत गरीब था। उसने साधारण-सी पुरानी धोती पहन रखी थी। उसके पैरों में चप्पल भी नहीं थी। लेकिन उसके चेहरे पर शांति और विनम्रता थी।
दोनों स्वर्ग के द्वार के सामने खड़े हो गए। सबसे पहले अमीर व्यक्ति ने आगे बढ़कर दरवाजा खटखटाया। कुछ ही क्षणों बाद दरवाजा खुला और एक देवदूत बाहर आया। उसने सामने खड़े अमीर व्यक्ति को देखा। फिर मुस्कुराकर उसका स्वागत किया और बड़े आदर से उसे अंदर ले गया। गरीब व्यक्ति पीछे ही खड़ा रहा। देवदूत ने उस समय उसकी ओर ध्यान नहीं दिया और दरवाजा बंद हो गया।
गरीब व्यक्ति चुपचाप वहीं खड़ा रहा। उसे यह देखकर थोड़ा दुख हुआ। उसने सोचा, “धरती पर तो हमेशा अमीरों को ज्यादा सम्मान मिलता था। लगता है स्वर्ग में भी वही सब होता है।” लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह शांत भाव से वहीं प्रतीक्षा करने लगा।
तभी उसे अंदर से तेज आवाजें सुनाई देने लगीं। ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत बड़ा उत्सव मनाया जा रहा हो।
वहाँ संगीत बज रहा था, लोग खुश होकर गीत गा रहे थे और किसी के स्वागत में आनंद मनाया जा रहा था। गरीब व्यक्ति ने यह सब सुना तो उसके मन में एक उम्मीद जगी। उसने सोचा, “शायद जब मुझे अंदर बुलाया जाएगा, तब मेरा भी ऐसा ही स्वागत होगा। धरती पर तो कभी किसी ने मेरा सम्मान नहीं किया। शायद स्वर्ग में मुझे भी प्रेम और आदर मिलेगा।”
कुछ देर बाद अंदर का शोर शांत हो गया। तब गरीब व्यक्ति ने धीरे से दरवाजा खटखटाया। इस बार भी वही देवदूत बाहर आया। उसने गरीब व्यक्ति को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “स्वागत है।” फिर उसने बड़े सम्मान के साथ उसे अंदर आने का निमंत्रण दिया।
देवदूत गरीब व्यक्ति को आदरपूर्वक स्वर्ग के सुंदर रास्तों से होते हुए उसके कक्ष तक ले गया।
रास्ते में हर कोई उसे सम्मान से देख रहा था। वातावरण बहुत शांत और सुखद था। लेकिन गरीब व्यक्ति के मन में एक बात बार-बार आ रही थी। उसने देखा कि उसके स्वागत में न कोई संगीत बजा, न कोई गीत गाया गया और न ही कोई उत्सव हुआ। यह बात उसके मन को खटकने लगी।
आखिर उसने साहस करके देवदूत से कहा, “मैंने हमेशा सुना था कि स्वर्ग में सभी को समान सम्मान मिलता है। लेकिन अब मुझे लगता है कि यह बात सही नहीं है।”
देवदूत ने आश्चर्य से पूछा, “आपको ऐसा क्यों लगा?”
गरीब व्यक्ति ने थोड़ा दुखी होकर कहा, “क्योंकि धरती पर तो हमेशा गरीबों के साथ भेदभाव किया जाता था। अमीरों को ज्यादा सम्मान मिलता था और गरीबों को कम। अभी मैंने देखा कि जो अमीर व्यक्ति मुझसे पहले आया था, उसका कितना धूमधाम से स्वागत किया गया। उसके लिए संगीत बजाया गया और उत्सव मनाया गया। लेकिन मेरे लिए ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। क्या यहाँ भी अमीर और गरीब में अंतर किया जाता है?”
देवदूत यह सुनकर हल्के से मुस्कुराया। फिर उसने बहुत प्रेम से कहा, “नहीं श्रीमान, यहाँ किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता। स्वर्ग में आने के बाद हर व्यक्ति को समान सम्मान और प्रेम मिलता है। आपने जो देखा, उसके पीछे एक अलग कारण है।”
गरीब व्यक्ति ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।
देवदूत बोला, “आप जैसे अच्छे, दयालु और नेक लोग यहाँ हर रोज़ आते रहते हैं। जिन्होंने धरती पर सच्चाई, प्रेम और ईमानदारी से जीवन बिताया हो, वे अक्सर स्वर्ग में आते हैं। लेकिन वह अमीर व्यक्ति, जिसे आपने अभी देखा, ऐसा व्यक्ति महीनों में कभी-कभार ही यहाँ पहुँचता है। इसलिए जब कोई अमीर व्यक्ति अपने घमंड और लालच को छोड़कर अच्छे कर्मों के कारण स्वर्ग तक पहुँच जाता है, तब हम उसकी खुशी में उत्सव मनाते हैं। यह उत्सव उसके अमीर होने के कारण नहीं, बल्कि उसके दुर्लभ रूप से यहाँ पहुँचने के कारण मनाया जाता है।”
गरीब व्यक्ति यह सुनकर चुप हो गया। उसके मन का सारा दुख और भ्रम दूर हो गया। अब उसे समझ आ गया था कि स्वर्ग में किसी की कीमत उसके धन से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होती है। वहाँ हर व्यक्ति को समान आदर मिलता है।
वह मुस्कुराकर बोला, “अब मेरी सारी परेशानी दूर हो गई। आपने मुझे बहुत अच्छी बात समझाई।”
देवदूत ने प्रेम से कहा, “इंसान चाहे गरीब हो या अमीर, यदि उसका मन साफ हो, वह दूसरों से प्रेम करे और अच्छे कर्म करे, तो उसे हर जगह सम्मान मिलता है। सच्ची अच्छाई ही इंसान की सबसे बड़ी दौलत होती है।” यह सुनकर गरीब व्यक्ति प्रसन्न मन से अपने कक्ष की ओर चला गया।
उसके चेहरे पर अब संतोष और शांति थी। उसे समझ आ गया था कि दुनिया में सबसे मूल्यवान चीज धन नहीं, बल्कि अच्छा हृदय और नेक कर्म होते हैं। जो इंसान दूसरों की मदद करता है, सबसे प्रेम करता है और अपने मन को साफ रखता है, वही सच्चे अर्थों में सबसे अमीर होता है।
बंदर का जिगर

बहुत समय पहले की बात है। एक शांत और सुंदर नदी के किनारे एक विशाल केला का पेड़ था। उस पेड़ पर हर मौसम में मीठे और बड़े-बड़े केले लगे रहते थे। पेड़ इतना ऊँचा था कि दूर से ही उसके पीले चमकदार फल दिखाई देते थे। उसी पेड़ पर एक चंचल और बुद्धिमान बंदर रहता था। वह पूरे दिन डालियों पर उछल-कूद करता, मीठे केले खाता और खुशी-खुशी अपना समय बिताता था।
उस नदी में एक मगरमच्छ भी रहता था। वह बड़ा भारी और ताकतवर था, लेकिन उसकी एक परेशानी थी। उसे केले बहुत पसंद थे, पर वह पेड़ पर चढ़ नहीं सकता था। वह अक्सर नदी के किनारे आकर उन केलों को ललचाई नजरों से देखता रहता। कभी-कभी उसकी इच्छा होती कि किसी तरह वह भी उन मीठे फलों का स्वाद चख सके, लेकिन बेचारा कुछ कर नहीं पाता था।
पेड़ पर रहने वाला बंदर यह सब रोज देखा करता था। वह समझ गया था कि मगरमच्छ केले खाना चाहता है। एक दिन बंदर को उस पर दया आ गई। उसने पेड़ से केलों का एक बड़ा गुच्छा तोड़ा और नीचे नदी के किनारे गिरा दिया। मगरमच्छ खुशी से उछल पड़ा। उसने बड़े मजे से केले खाए। इतने स्वादिष्ट केले उसने पहले कभी नहीं खाए थे।
उसका पेट भर गया, लेकिन कुछ केले अभी भी बचे हुए थे। उसने सोचा कि ये केले अपनी पत्नी के लिए ले जाता हूँ। वह बचे हुए केले लेकर नदी के भीतर अपने घर चला गया।
जब मगरमच्छ की पत्नी ने वे मीठे केले खाए तो वह बहुत खुश हुई। उसने आश्चर्य से पूछा, “इतने स्वादिष्ट केले तुम्हें कहाँ से मिले?”
मगरमच्छ ने मुस्कुराकर सारी बात बता दी कि नदी किनारे रहने वाले एक बंदर ने उसे ये केले दिए हैं। उसने यह भी बताया कि बंदर रोज यही केले खाता है और बहुत खुश रहता है।
मगरमच्छ की पत्नी लालची स्वभाव की थी। उसने मन ही मन सोचा कि जो बंदर रोज इतने मीठे केले खाता है, उसका जिगर कितना स्वादिष्ट होगा। उसने मगरमच्छ से कहा, “मैंने सुना है कि बंदरों का जिगर बहुत स्वादिष्ट होता है। और जो बंदर रोज इतने मीठे केले खाता हो, उसका जिगर तो और भी मीठा होगा। तुम किसी तरह उस बंदर को यहाँ ले आओ। फिर हम दोनों उसका जिगर खाएँगे।”
यह सुनकर मगरमच्छ चौंक गया। उसे अपनी पत्नी की बात अच्छी नहीं लगी। आखिर बंदर उसका दोस्त था। उसने कहा, “नहीं, मैं अपने दोस्त के साथ ऐसा धोखा नहीं कर सकता।”
लेकिन मगरमच्छ की पत्नी बहुत चालाक थी। वह बार-बार उसे समझाने लगी। कभी प्यार से, कभी गुस्से से और कभी लालच देकर उसने मगरमच्छ को मना लिया। आखिरकार मगरमच्छ अपनी पत्नी की बातों में आ गया और उसने बंदर को धोखे से लाने का फैसला कर लिया।
अगली सुबह मगरमच्छ नदी किनारे पहुँचा। बंदर खुशी से बोला, “अरे मित्र, आज सुबह-सुबह कैसे आना हुआ?”
मगरमच्छ दुखी बनने का नाटक करते हुए बोला, “भैया, कल रात मेरी पत्नी ने पहली बार केले खाए। शायद उसी कारण उसकी तबीयत खराब हो गई है। वह बहुत परेशान है। तुम तो रोज केले खाते हो, इसलिए तुम्हें उनके बारे में अच्छी जानकारी होगी। कृपया चलकर देखो न कि उसे क्या हुआ है।”
बंदर सीधा-सादा था, लेकिन दिल का अच्छा था। उसने सोचा कि दोस्त की मदद करनी चाहिए। इसलिए वह बिना ज्यादा सोचे मगरमच्छ की पीठ पर बैठ गया। मगरमच्छ उसे लेकर नदी पार करने लगा। बंदर पहली बार किसी मगरमच्छ की पीठ पर बैठा था। उसकी खुरदुरी और सख्त पीठ उसे चुभ रही थी, लेकिन वह चुपचाप बैठा रहा।
कुछ ही देर में वे मगरमच्छ के घर पहुँच गए। वहाँ पहुँचकर बंदर ने देखा कि मगरमच्छ की पत्नी तो बिल्कुल स्वस्थ बैठी है। उसे देखते ही वह जोर-जोर से हँसने लगी। उसकी हँसी बहुत डरावनी थी। वह बोली, “मूर्ख बंदर! अब तू नहीं बचेगा। हम दोनों तेरा जिगर खाएँगे। हा-हा-हा!”
अब बंदर को पूरी बात समझ में आ गई। उसे एहसास हो गया कि उसके दोस्त ने उसे धोखे से यहाँ बुलाया है। लेकिन बंदर बहुत बुद्धिमान था। उसने डरने के बजाय तुरंत एक चाल चली। वह हँसते हुए बोला, “अरे भाभीजी, अगर ऐसी बात थी तो आपने पहले क्यों नहीं बताया? मैं अपना जिगर साथ लेकर थोड़ी घूमता हूँ! वह तो मैंने पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर सुरक्षित रख छोड़ा है। इतना कीमती जिगर मैं हमेशा संभालकर रखता हूँ। अगर आप चाहें तो मुझे वापस पेड़ तक छोड़ दीजिए। मैं जिगर लेकर तुरंत वापस आ जाता हूँ।”
मगरमच्छ और उसकी पत्नी दोनों मूर्ख थे। वे बंदर की बात पर विश्वास कर बैठे। मगरमच्छ तुरंत बंदर को अपनी पीठ पर बैठाकर वापस नदी किनारे ले आया। जैसे ही वे पेड़ के पास पहुँचे, बंदर फुर्ती से कूदकर पेड़ की ऊँची डाल पर चढ़ गया।
ऊपर बैठकर वह जोर-जोर से हँसने लगा और बोला, “मूर्ख मगरमच्छ! क्या कोई अपना जिगर शरीर से अलग रख सकता है? तुमने दोस्ती का विश्वास तोड़ा है। अब मैं कभी तुम्हारी बातों में नहीं आऊँगा।”
मगरमच्छ को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह शर्म से सिर झुकाकर नदी किनारे बैठ गया। कहते हैं कि वह आज भी बंदर का इंतजार करता है। इसी कारण मगरमच्छ अक्सर नदी के किनारे मुँह खोलकर घंटों पड़ा रहता है, जैसे अभी भी सोच रहा हो कि शायद बंदर वापस आ जाए।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि लालच इंसान से गलत काम करवा देता है और बुद्धिमानी से बड़ी से बड़ी मुसीबत से भी बचा जा सकता है। साथ ही, सच्ची दोस्ती में कभी धोखा नहीं देना चाहिए, क्योंकि एक बार विश्वास टूट जाए तो फिर उसे वापस पाना बहुत कठिन होता है।
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दादी माँ की कहानियाँ प्यार, संस्कार, अनुभव और जीवन की अनमोल सीख से भरपूर होती हैं। ये रोचक कथाएँ बच्चों और बड़ों को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्य, पारिवारिक प्रेम और अच्छे आचरण की प्रेरणा देती हैं।
दादी माँ की कहानियाँ
प्रस्तुति: Saying Central Team