सनी और तनु

दादी माँ की कहानियाँ-सनी और तनु

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दादी माँ की कहानियाँ-सनी और तनु

सनी सात वर्ष का एक प्यारा और चंचल लड़का था। वह दूसरी कक्षा में पढ़ता था और पढ़ाई में ठीक-ठाक था, लेकिन एक विषय ऐसा था जिससे वह हमेशा दूर भागता था—भूगोल। उसे समझ ही नहीं आता था कि दुनिया के देशों, राज्यों, शहरों और नदियों के बारे में जानने से आखिर फायदा क्या है।

उसे क्रिकेट खेलना, कार्टून देखना और अपनी छोटी बहन तनु के साथ मस्ती करना ज्यादा पसंद था। लेकिन अब उसकी परीक्षाएँ आने वाली थीं और मम्मी रोज़ उसे पढ़ने के लिए समझाती रहती थीं। सुबह से शाम तक घर में एक ही आवाज़ गूंजती रहती—“सनी बेटा, थोड़ा पढ़ लो। परीक्षा सिर पर है।”

एक दिन दोपहर का समय था। बाहर हल्की धूप फैली हुई थी और घर में शांति थी। मम्मी किसी जरूरी काम से बाहर जा रही थीं। जाते-जाते उन्होंने सनी से कहा, “बेटा, मैं थोड़ी देर में वापस आ जाऊँगी। तब तक तनु का ध्यान रखना और थोड़ा पढ़ाई भी कर लेना।” सनी ने धीरे से “ठीक है” कहा, लेकिन अंदर ही अंदर वह परेशान हो गया। एक तरफ उसकी भूगोल की मोटी किताब थी और दूसरी तरफ उसकी नटखट छोटी बहन तनु, जो एक मिनट भी शांत नहीं बैठती थी।

मम्मी के जाते ही सनी अपनी किताब लेकर बैठ गया। उसने मन में सोचा कि आज चाहे कुछ भी हो जाए, वह पूरा पाठ याद करके ही उठेगा। उसने किताब खोली और पढ़ना शुरू किया—“भारत के राज्यों और उनकी राजधानियाँ…” वह मुश्किल से दो-चार लाइनें ही पढ़ पाया था कि तभी तनु अपनी गुड़िया लेकर वहाँ आ गई।

वह मासूम आवाज़ में बोली, “भैया, मेरी डॉल के लिए घर बना दो न।” सनी ने पहले तो उसे मना करने की कोशिश की, लेकिन तनु की गोल-गोल आँखें देखकर उसका दिल पिघल गया। उसने तकियों और चादर से उसकी गुड़िया के लिए एक सुंदर-सा घर बना दिया।

तनु खुशी से उछलने लगी और अपनी डॉल को लेकर खेलने चली गई। सनी ने राहत की साँस ली और फिर से किताब खोलकर पढ़ने बैठ गया। लेकिन मुश्किल से पाँच मिनट बीते होंगे कि तनु फिर दौड़ती हुई आ गई। इस बार उसके चेहरे पर चिंता थी। उसने कहा, “भैया, घर टूट गया। जल्दी ठीक कर दो न!” सनी ने माथा पकड़ लिया। फिर भी उसने चुपचाप जाकर तकियों का घर दोबारा ठीक किया।

अब सनी थोड़ा चिढ़ गया था। उसने सोचा कि अब कोई उसे परेशान नहीं करेगा। वह फिर से पूरा पाठ शुरू से पढ़ने बैठ गया, क्योंकि पिछला सब कुछ उसके दिमाग से निकल चुका था। तभी तनु फिर आ पहुँची। इस बार उसने सनी का हाथ पकड़ लिया और बोली, “भैया, मेरे साथ खेलो न।” अब तो सनी का धैर्य टूट गया। उसने गुस्से में किताब बंद की और बोला, “तुम मुझे पढ़ने ही नहीं देती!” तनु उसका चेहरा देखकर उदास हो गई। उसे लगा शायद उसने कुछ गलत कर दिया है।

सनी को अपनी बहन की उदासी देखकर बुरा लगा। वह गुस्सा भूल गया और उसके साथ खेलने लगा। दोनों ने खिलौनों से खेला, तकियों का घर बनाया और खूब हँसी-मज़ाक किया। शाम कब हो गई, पता ही नहीं चला। लेकिन रात होते-होते सनी को अपनी परीक्षा की चिंता फिर सताने लगी। उसे याद आया कि उसके दोस्त सृजन ने एक बार उसे एक अजीब तरकीब बताई थी। सृजन ने कहा था, “अगर रात को किताब तकिए के नीचे रखकर सोओ, तो पाठ अपने-आप याद हो जाता है।”

सनी को उस समय यह बात मजाक लगी थी, लेकिन अब उसे लगा कि एक बार कोशिश करने में क्या बुराई है। उसने भूगोल की किताब अपने तकिए के नीचे रखी और सो गया। कुछ ही देर में उसे गहरी नींद आ गई। तभी उसे लगा जैसे वह हवा में उड़ रहा हो। उसने आँखें खोलीं तो देखा कि वह एक सफेद चमकदार घोड़े पर बैठा है। वह कोई साधारण घोड़ा नहीं था, बल्कि उड़ने वाला जादुई घोड़ा था।

घोड़े को एक सैनिक चला रहा था। सैनिक ने पुराने समय के राजाओं जैसी पोशाक पहन रखी थी। उसके हाथ में चमकती हुई तलवार थी और चेहरे पर मुस्कान थी। सैनिक ने सनी से कहा, “डरो मत। आज मैं तुम्हें पूरे भारत की सैर कराऊँगा। तुम राज्यों, शहरों, लोगों की वेशभूषा, खान-पान और संस्कृति के बारे में जानोगे। यह यात्रा इतनी मजेदार होगी कि तुम सब कुछ कभी नहीं भूलोगे।”

फिर जादुई घोड़ा आसमान में उड़ने लगा। सबसे पहले वे राजस्थान पहुँचे। वहाँ सनी ने बड़े-बड़े किले, रंग-बिरंगे कपड़े और रेगिस्तान देखे। फिर वे पंजाब गए, जहाँ लोग भांगड़ा कर रहे थे और स्वादिष्ट पराठे खा रहे थे। इसके बाद वे केरल पहुँचे, जहाँ चारों तरफ हरियाली और नारियल के पेड़ थे। सैनिक हर राज्य के बारे में मजेदार बातें बताता जा रहा था और सनी बड़े ध्यान से सब देखता जा रहा था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे भूगोल की किताब जीवित हो गई हो।

पूरी रात दोनों ने देश के अलग-अलग राज्यों की सैर की। सनी ने नदियाँ, पहाड़, जंगल, बड़े शहर और गाँव सब कुछ देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि भूगोल कितना रोचक विषय है। हर राज्य की अपनी खास पहचान थी और हर जगह कुछ नया सीखने को था।

सुबह जब सनी की आँख खुली तो वह अपने बिस्तर पर था। उसने तुरंत तकिए के नीचे से अपनी किताब निकाली और पढ़ना शुरू किया। जैसे ही उसने पहला पन्ना खोला, उसे सब कुछ याद आने लगा। वह आगे पढ़ता गया और हैरान होता गया। हर राज्य, हर राजधानी और हर जानकारी उसे बिल्कुल साफ-साफ याद थी।

सनी खुशी से उछल पड़ा और जोर से बोला, “वाह! तरकीब सचमुच काम कर गई!” तभी तनु दौड़ती हुई कमरे में आई और बोली, “क्या हुआ भैया?” सनी मुस्कुराया और उसे गोद में उठाकर बोला, “कुछ नहीं, अब भूगोल मेरा दोस्त बन गया है।”
उस दिन के बाद सनी ने पढ़ाई को बोझ समझना छोड़ दिया। उसने समझ लिया कि अगर किसी चीज़ को मजे और उत्साह के साथ सीखा जाए, तो कठिन से कठिन विषय भी आसान और दिलचस्प बन जाता है।

कुत्तों की भाषा

बहुत समय पहले एक बड़े शहर में एक बहुत अमीर व्यक्ति रहता था। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। बड़े-बड़े मकान, नौकर-चाकर, घोड़े-गाड़ियाँ और दूर-दूर तक फैला व्यापार था। लेकिन उसकी सबसे बड़ी इच्छा यह थी कि उसका इकलौता बेटा सोहन पढ़-लिखकर बहुत योग्य और बुद्धिमान बने। वह चाहता था कि लोग उसके बेटे की प्रशंसा करें और उसका नाम सम्मान से लें। इसी कारण उसने सोहन को पढ़ाई के लिए विदेश भेजने का निर्णय लिया।

जब सोहन विदेश जाने लगा, तब उसके पिता ने उसे समझाते हुए कहा, “बेटा, खूब मन लगाकर पढ़ाई करना। खर्चे की बिल्कुल चिंता मत करना। जितनी हो सके उतनी भाषाएँ सीखना। दुनिया में वही व्यक्ति आगे बढ़ता है जो कई भाषाएँ जानता हो।” सोहन ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और अपने पिता का आशीर्वाद लेकर विदेश चला गया।

कई वर्ष बीत गए। इस दौरान सोहन ने बहुत कुछ सीखा, नई जगहें देखीं और अलग-अलग लोगों से मिला। आखिर वह दिन भी आ गया जब उसके घर लौटने की खबर आई। उसके स्वागत की तैयारी पूरे घर में बड़े धूमधाम से होने लगी। नौकरों ने घर सजाया, स्वादिष्ट भोजन बनाए गए और रिश्तेदारों को भी बुलाया गया। सोहन के पिता बहुत उत्साहित थे। उन्हें पूरा विश्वास था कि उनका बेटा कई विदेशी भाषाएँ सीखकर आया होगा और अब बड़े-बड़े लोगों से बातचीत करेगा।

जब सोहन घर पहुँचा तो सबने उसका स्वागत किया। थोड़ी देर बाद उसके पिता ने उत्सुकता से पूछा, “तो बेटा, बताओ तुमने कौन-कौन-सी भाषाएँ सीखी हैं?” सोहन ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “पिताजी, मैंने केवल एक भाषा सीखी है।” यह सुनकर उसके पिता थोड़े हैरान हुए। उन्होंने पूछा, “सिर्फ एक भाषा? कौन-सी?” सोहन ने मुस्कुराकर कहा, “मैं कुत्तों की भाषा सीखकर आया हूँ।”

यह सुनते ही उसके पिता का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने क्रोधित होकर कहा, “मैंने इतना धन खर्च किया और तुमने सीखी भी तो कुत्तों की भाषा? तुम्हें जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेज़ी या चीनी जैसी भाषाएँ सीखनी चाहिए थीं। कुत्तों की भाषा सीखकर क्या करोगे?” सोहन ने उन्हें समझाने की कोशिश की। उसने कहा, “पिताजी, अगर मैं कोई दूसरी भाषा सीखता तो शायद आप खुश होते, लेकिन उन भाषाओं का उपयोग तभी होता जब सामने वाला भी वही भाषा जानता। हर भाषा की अपनी उपयोगिता होती है।” लेकिन उसके पिता ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी। गुस्से में उन्होंने सोहन को घर से बाहर निकाल दिया।

सोहन दुखी मन से घर छोड़कर चल पड़ा। वह कई दिनों तक चलता रहा। रास्ते में जंगल, पहाड़ और छोटे-छोटे गाँव आए। आखिर एक शाम वह एक गाँव में पहुँचा। वहाँ के लोग बहुत परेशान दिखाई दे रहे थे। उनके चेहरों पर डर साफ झलक रहा था। सोहन ने एक बूढ़े आदमी से पूछा, “क्या बात है? आप लोग इतने चिंतित क्यों हैं?” बूढ़े ने बताया, “जंगल से कुछ भयानक कुत्ते आते हैं। वे बहुत बड़े और डरावने हैं। वे हमसे खाना छीन लेते हैं और सबको डरा देते हैं। हम उनसे बहुत परेशान हैं।”

सोहन ने यह सुना तो वह बोला, “मैं जंगल में जाकर उनसे बात करूँगा।” गाँववाले डर गए। उन्होंने कहा, “नहीं बेटा, वहाँ मत जाओ। वे बहुत खतरनाक हैं।” लेकिन सोहन ने उनकी बात नहीं मानी। अगली सुबह वह अकेला जंगल की ओर निकल पड़ा।
गाँव के लोग दूर खड़े होकर उसकी चिंता करते रहे। दो घंटे बीत गए, लेकिन सोहन वापस नहीं आया। सबको लगने लगा कि शायद कुत्तों ने उसे नुकसान पहुँचा दिया होगा। तभी अचानक जंगल के रास्ते से सोहन बाहर आता दिखाई दिया। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि उसके पीछे छह बड़े-बड़े कुत्ते भी थे। लेकिन वे गुर्रा नहीं रहे थे। वे अपनी पूँछ हिला रहे थे और बिल्कुल शांत थे।

गाँववाले डरकर पीछे हट गए। तब सोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, “डरिए मत। ये अब आपको नुकसान नहीं पहुँचाएँगे।” लोगों ने आश्चर्य से पूछा, “तुमने ऐसा कैसे किया?” तब सोहन ने बताया, “मैं कुत्तों की भाषा जानता हूँ। मैंने इनसे बात की और इनके दुख के बारे में जाना। जंगल के अंदर जहाँ ये रहते हैं, वहाँ जमीन के नीचे एक खजाना छिपा हुआ था। एक जादूगरनी ने इन कुत्तों पर जादू कर दिया था। उन्हें उस खजाने की रक्षा करनी पड़ती थी। वे वहाँ से कहीं जा नहीं सकते थे। भूख लगने पर वे मजबूरी में गाँव आकर खाना ले जाते थे।”

फिर सोहन गाँववालों को जंगल के अंदर ले गया। वहाँ उसने जमीन खोदकर एक बड़ा खजाना निकाला। उसमें सोने के सिक्के, कीमती गहने और कई अनमोल वस्तुएँ थीं। सोहन ने वह खजाना गाँववालों के सामने रख दिया और कहा, “अब यह खजाना यहाँ नहीं रहेगा, इसलिए ये कुत्ते भी आजाद हो गए हैं। अब ये किसी को परेशान नहीं करेंगे।”

गाँववाले बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा, “तुमने हमारी बहुत बड़ी मदद की है। यह खजाना तुम्हारा है।” लेकिन सोहन ने विनम्रता से कहा, “मैंने केवल अपना कर्तव्य निभाया है।” फिर भी गाँववालों ने आग्रह करके उसे बहुत-से उपहार दिए।
उसी रात जोरदार बर्फबारी शुरू हो गई। अगली सुबह पूरा गाँव सफेद बर्फ से ढका हुआ था। कुत्ते भी वहीं बैठे थे। सोहन ने एक स्लेज तैयार की और उन कुत्तों को उसमें जोत दिया। उसने खजाना और उपहार स्लेज में रखे और कुत्तों के साथ अपने घर की ओर चल पड़ा।

जब वह अपने घर पहुँचा, तो उसके पिता उसे देखकर दंग रह गए। उन्होंने सारी बात सुनी और उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि कोई भी ज्ञान बेकार नहीं होता। अगर बुद्धिमानी और सही समय पर उसका उपयोग किया जाए, तो छोटी-से-छोटी कला भी बहुत बड़ा काम कर सकती है।

उस दिन के बाद सोहन के पिता कभी उससे नाराज़ नहीं हुए। वे अपने बेटे पर गर्व करने लगे और लोगों से कहा करते थे कि हर व्यक्ति की योग्यता अलग होती है। जरूरत केवल उसे सही दिशा में उपयोग करने की होती है।

काठ की बछिया

बहुत समय पहले एक छोटे-से गाँव में एक गरीब बढ़ई रहता था। वह बहुत मेहनती और ईमानदार आदमी था। गाँव के लोग उससे लकड़ी की मेज़ें, कुर्सियाँ, दरवाज़े और अलमारियाँ बनवाते थे। उसके हाथों में अद्भुत कला थी। वह जो भी चीज़ बनाता, इतनी सुंदर और साफ-सुथरी होती कि लोग उसकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे। लेकिन इतनी मेहनत के बावजूद उसकी कमाई बहुत कम थी। जैसे-तैसे उसका घर चलता था। उसके मन में एक बड़ी इच्छा थी कि उसके पास भी एक अच्छी दूध देने वाली गाय हो, ताकि उसे और उसके परिवार को रोज़ ताज़ा दूध मिल सके। मगर गाय खरीदने के लिए उसके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे।

हर रोज़ जब वह गाँव के दूसरे लोगों को अपनी गायों के साथ देखता, तो उसका मन उदास हो जाता। कई बार वह सोचता कि काश उसके घर के आँगन में भी एक प्यारी-सी गाय बंधी होती। लेकिन फिर वह अपनी गरीबी याद करके चुप हो जाता। एक दिन उसने सोचा कि जब असली गाय नहीं खरीद सकता, तो क्यों न अपने मन को बहलाने के लिए लकड़ी की एक बछिया बना ली जाए। यही सोचकर वह अपने काम में लग गया।

बढ़ई ने बड़े मन से लकड़ी चुनी और कई दिनों तक मेहनत करके एक छोटी-सी बछिया तैयार की। उसकी कला इतनी अच्छी थी कि वह बछिया बिल्कुल असली लगती थी। उसने उसे सुंदर रंगों से रंग दिया। उसकी गर्दन घूम सकती थी, पैर मुड़ सकते थे और पूँछ भी हिलती थी। गाँव के लोग जब उसे देखते, तो पहली नज़र में धोखा खा जाते। बढ़ई रोज़ उसे प्यार से देखता और मन ही मन सोचता, “एक दिन मेरी यह बछिया सचमुच बड़ी गाय बन जाएगी।”

बढ़ई का एक मित्र था, जो गड़रिया था। वह रोज़ अपनी भेड़-बकरियों को लेकर चरागाह में जाता था। एक दिन वह बढ़ई के घर आया। उसकी नज़र जैसे ही उस सुंदर बछिया पर पड़ी, वह हैरान रह गया। उसे लगा कि यह सचमुच की बछिया है। उसने हँसते हुए कहा, “अरे वाह! तुमने तो बड़ी सुंदर बछिया पाल रखी है। इसे भी मेरी भेड़-बकरियों के साथ चरने भेज दिया करो।”
बढ़ई थोड़ा घबरा गया। उसने कहा, “नहीं भाई, यह अभी बहुत छोटी है। चल-फिर नहीं सकती। इसे यहीं रहने दो।” लेकिन गड़रिया ज़िद करने लगा। वह बोला, “कोई बात नहीं। मैं इसे अपने कंधे पर बैठाकर चरागाह तक ले जाऊँगा और शाम को वापस ले आऊँगा।”

गड़रिया अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। आखिर बढ़ई मजबूर होकर मान गया। उसने लकड़ी की बछिया गड़रिये के कंधे पर रख दी। बछिया लकड़ी की थी, इसलिए काफी भारी थी। गड़रिया उसे उठाकर बोला, “अरे! यह तो बहुत भारी है। लगता है जल्दी ही बड़ी गाय बन जाएगी।” बढ़ई यह सुनकर हल्का-सा मुस्कुराया, लेकिन मन ही मन सोचने लगा, “काश ऐसा सच में हो पाता।”

चरागाह तक पहुँचते-पहुँचते गड़रिया थक गया। उसने अपनी भेड़-बकरियों को घास चरने के लिए छोड़ दिया और बछिया को भी एक जगह रख दिया। दिनभर सभी जानवर इधर-उधर घूमते रहे। शाम होने लगी तो गड़रिया अपनी भेड़ों और बकरियों को बुलाने लगा। उसकी आवाज़ सुनकर सारे जानवर उसके पास आ गए। लेकिन लकड़ी की बछिया तो वहीं पड़ी रही। गड़रिया ने दो-तीन बार आवाज़ लगाई, लेकिन बछिया कैसे आती? वह तो लकड़ी की बनी थी।

अब गड़रिया सोच में पड़ गया। वह फिर से भारी बछिया को अपने कंधे पर उठाकर ले जाना नहीं चाहता था। उसने आलस करते हुए सोचा, “जब यह सुबह से शाम तक अकेली रह सकती है, तो घर भी अपने-आप पहुँच जाएगी।” यह सोचकर वह अपनी भेड़-बकरियों को लेकर घर लौट आया।

उधर बढ़ई शाम से ही अपनी बछिया का इंतज़ार कर रहा था। रात होने लगी, लेकिन बछिया नहीं आई। आखिर वह चिंतित होकर गड़रिये के घर पहुँचा और पूछा, “मेरी बछिया कहाँ है?” गड़रिया आराम से बोला, “मैंने सोचा वह खुद ही घर आ जाएगी, इसलिए उसे चरागाह में छोड़ आया।”


यह सुनते ही बढ़ई परेशान हो गया। उसने कहा, “लेकिन उसे ले जाने की ज़िद तो तुमने की थी। तुम्हारी जिम्मेदारी थी कि उसे वापस भी लाते।” गड़रिया हँसकर बोला, “अरे भाई, तुम्हारी बछिया भी बड़ी आलसी निकली। मैंने इतनी आवाज़ लगाई, लेकिन वह हिली तक नहीं।”

दोनों तुरंत चरागाह की ओर दौड़े। लेकिन जब वे वहाँ पहुँचे, तो बछिया गायब थी। शायद कोई उसे उठाकर ले गया था। बढ़ई बहुत दुखी हो गया। उसकी मेहनत से बनाई हुई प्यारी बछिया खो चुकी थी। आखिर वह न्याय माँगने राजा के दरबार में पहुँचा।
राजा ने दोनों की बातें ध्यान से सुनीं।

फिर कुछ देर सोचकर बोले, “गड़रिया बछिया को अपने साथ ले गया था, इसलिए उसे सुरक्षित वापस पहुँचाना उसकी जिम्मेदारी थी। उसे चरागाह में छोड़ आना उसकी गलती है। इसलिए हमारा आदेश है कि गड़रिया उस बछिया के बदले बढ़ई को दूसरी बछिया देगा।

राजा का आदेश मानना पड़ा। गड़रिया ने बढ़ई को एक असली छोटी बछिया लाकर दे दी। बढ़ई उसे बहुत प्यार से पालने लगा। वह रोज़ उसे चारा खिलाता, उसकी देखभाल करता और उससे बातें करता। धीरे-धीरे वह बछिया बड़ी होने लगी। कुछ ही महीनों में वह एक सुंदर, स्वस्थ और दूध देने वाली गाय बन गई।

अब बढ़ई के घर में रोज़ दूध आने लगा। उसका सपना सच हो गया था। वह अपनी गाय को देखकर अक्सर मुस्कुराता और सोचता कि उसकी काठ की बछिया सचमुच एक असली गाय में बदल गई है। गाँव के लोग भी यह कहानी सुनकर कहते कि सच्ची मेहनत और अच्छे भाग्य से कभी-कभी सपने सच हो ही जाते हैं।

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दादी माँ की कहानियाँ प्यार, संस्कार, अनुभव और जीवन की अनमोल सीख से भरपूर होती हैं। ये रोचक कथाएँ बच्चों और बड़ों को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्य, पारिवारिक प्रेम और अच्छे आचरण की प्रेरणा देती हैं।

दादी माँ की कहानियाँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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