दादी माँ की कहानियाँ

दादी माँ की कहानियाँ-पुरानी आदत

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दादी माँ की कहानियाँ-पुरानी आदत

एक छोटे-से गाँव में राजू नाम का एक मछुआरा रहता था। वह बहुत मेहनती और सीधा-सादा आदमी था। हर सुबह वह अपनी नाव और जाल लेकर नदी पर जाता और घंटों मेहनत करके मछलियाँ पकड़ता। उसी से उसके घर का खर्च चलता था। गाँव के लोग उसे एक अच्छे मछुआरे के रूप में जानते थे, लेकिन राजू की एक और खास पहचान थी। उसे बाँसुरी बजाने का बहुत शौक था। जब भी उसे खाली समय मिलता, वह नदी किनारे बैठकर अपनी बाँसुरी बजाने लगता। उसकी बाँसुरी की धुन इतनी मीठी और मधुर होती थी कि आस-पास के लोग अपना काम छोड़कर उसे सुनने चले आते थे।

गाँव के बच्चे उसके चारों ओर बैठ जाते, बूढ़े लोग मुस्कुराते हुए उसकी धुन सुनते और कई लोग तो उसकी बाँसुरी सुनते-सुनते अपनी परेशानियाँ भी भूल जाते। राजू को लोगों की तारीफ सुनकर बहुत खुशी मिलती थी। धीरे-धीरे उसे अपनी कला पर बड़ा गर्व होने लगा। वह सोचने लगा कि अगर इंसानों को उसकी बाँसुरी इतनी पसंद है, तो जानवर और पक्षी भी जरूर उसकी धुन के दीवाने होंगे।

एक दिन उसके मन में एक अजीब विचार आया। उसने सोचा, “जब मेरी बाँसुरी की आवाज़ सुनकर लोग खिंचे चले आते हैं, तो मछलियाँ भी जरूर इसकी तरफ आकर्षित होंगी। अगर ऐसा हुआ, तो मुझे जाल फेंकने की मेहनत ही नहीं करनी पड़ेगी।” यह सोचकर वह बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि उसने मछली पकड़ने का एक नया और आसान तरीका खोज लिया है।

अगली सुबह वह बड़े उत्साह के साथ नदी किनारे पहुँचा। आज उसके हाथ में जाल नहीं था। वह अपनी बाँसुरी और एक बड़ी टोकरी लेकर आया था। उसने टोकरी को पानी के बिल्कुल पास रख दिया ताकि मछलियाँ सीधे उसमें कूद जाएँ। फिर वह आराम से एक पत्थर पर बैठ गया और बाँसुरी बजाने लगा।

नदी के किनारे सुबह का सुहावना वातावरण था। हल्की हवा चल रही थी, पेड़ों की पत्तियाँ सरसराती थीं और राजू की बाँसुरी की मीठी धुन दूर तक फैल रही थी। राजू पूरे आत्मविश्वास से बाँसुरी बजा रहा था। वह बार-बार टोकरी की ओर देखता और सोचता कि अभी मछलियाँ उछलती हुई आएँगी।

कुछ देर बीती, लेकिन एक भी मछली टोकरी के पास नहीं आई। राजू ने सोचा शायद धुन ठीक नहीं है। उसने दूसरी धुन बजाई, फिर तीसरी। कभी तेज़, कभी धीमी। लेकिन नदी में कोई हलचल नहीं हुई। मछलियाँ अपने ढंग से पानी में तैरती रहीं। उन्हें राजू की बाँसुरी से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।

धीरे-धीरे दोपहर हो गई। धूप तेज हो गई और राजू थकने लगा। उसके चेहरे की खुशी अब चिंता में बदलने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मछलियाँ उसकी धुन सुनकर क्यों नहीं आ रहीं। आखिरकार उसने हार मान ली और घर वापस गया। वहाँ से वह अपना पुराना जाल उठा लाया।

इस बार उसने बिना कोई प्रयोग किए सीधे नदी में जाल डाल दिया। कुछ ही देर बाद उसने जाल खींचा तो उसमें ढेर सारी मछलियाँ फँसी हुई थीं। इतनी मछलियाँ कि उसकी टोकरी भी छोटी पड़ गई। राजू हैरान रह गया। सुबह से जो मछलियाँ उसकी बाँसुरी की तरफ नहीं आई थीं, वे अब आसानी से जाल में फँस गई थीं।

राजू गुस्से और झुंझलाहट में बोला, “अरे मूर्ख मछलियों! जब मैं तुम्हें प्यार से बुला रहा था, तब तुम नहीं आईं, लेकिन जाल में फँसने के लिए तुरंत चली आईं!” वह अपनी ही बात पर सिर हिलाने लगा।

तभी वहाँ से एक बूढ़ा आदमी गुजर रहा था। उसने राजू की बातें सुन लीं। वह मुस्कुराकर बोला, “बेटा, मछलियों की गलती नहीं है। उन्होंने वही किया जो वे हमेशा से करती आई हैं। वे संगीत समझने नहीं, बल्कि अपने स्वभाव के अनुसार जीने की आदी हैं। पुरानी आदतें इतनी आसानी से नहीं बदलतीं।”

राजू ने बूढ़े की बात सुनी और कुछ देर चुप रहा। फिर उसे अपनी गलती समझ में आने लगी। उसने सोचा कि हर जीव और हर इंसान की अपनी प्रकृति होती है। केवल अपनी इच्छा या उम्मीद के कारण यह मान लेना कि दूसरे भी वैसा ही सोचेंगे, सही नहीं है।
उस दिन के बाद राजू ने फिर कभी ऐसा अजीब प्रयोग नहीं किया।

वह पहले की तरह मेहनत से जाल डालकर मछलियाँ पकड़ता और खाली समय में लोगों को अपनी बाँसुरी सुनाकर खुश करता। अब वह समझ चुका था कि हर चीज़ का अपना तरीका होता है और पुरानी आदतें एक दिन में नहीं बदलतीं।

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि किसी की पुरानी आदत या स्वभाव को बदलना बहुत कठिन होता है। हर व्यक्ति और हर जीव वही करता है, जिसकी उसे आदत होती है। इसलिए हमें दूसरों से अपनी उम्मीदों के अनुसार व्यवहार करने की ज़िद नहीं करनी चाहिए।

किसान की बेटी

बहुत समय पहले एक छोटे-से गाँव में एक गरीब किसान अपनी बेटी के साथ रहता था। उनकी झोंपड़ी मिट्टी और घास-फूस से बनी हुई थी। बरसात के दिनों में छत टपकती थी और सर्दियों में ठंडी हवा अंदर तक चली आती थी। किसान बहुत मेहनती था। वह सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में चला जाता और देर शाम तक काम करता रहता, लेकिन उसके पास खेती के लिए बहुत थोड़ी-सी जमीन थी। उस जमीन से इतनी कम फसल होती थी कि उसे बेचकर मुश्किल से दो वक्त का भोजन जुट पाता था। कई बार पिता और बेटी आधा पेट खाना खाकर ही सो जाते थे।

किसान की बेटी बहुत समझदार और बुद्धिमान थी। वह छोटी उम्र में ही अपने पिता की परेशानियों को समझने लगी थी। वह घर का सारा काम करती, पिता की मदद करती और हमेशा उन्हें हिम्मत बंधाती रहती। किसान अपनी बेटी से बहुत प्रेम करता था और उसकी समझदारी देखकर अक्सर सोचता था कि भगवान ने गरीबी तो दी है, लेकिन बेटी के रूप में एक बड़ा सहारा भी दिया है।
एक दिन किसान ने तय किया कि अब वह अपनी परेशानी लेकर राजा के पास जाएगा।

गाँव के लोग कहते थे कि उनका राजा बहुत दयालु और न्यायप्रिय है। किसान सुबह-सुबह राजमहल पहुँचा। उसने हाथ जोड़कर राजा को अपनी गरीबी और कठिनाइयों के बारे में बताया। राजा ने किसान की बातें ध्यान से सुनीं। उन्हें उस गरीब किसान पर दया आ गई। उन्होंने कहा, “तुम चिंता मत करो। हम तुम्हें अपनी कुछ जमीन खेती करने के लिए देते हैं। जमीन हमारी रहेगी, लेकिन उस पर होने वाली पूरी फसल तुम्हारी होगी।”

यह सुनकर किसान की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने राजा को बार-बार धन्यवाद दिया और खुशी-खुशी घर लौट आया। उसने अपनी बेटी को सारी बात बताई। बेटी भी बहुत खुश हुई। अगले ही दिन किसान नए खेत में हल चलाने चला गया। वह पूरे उत्साह से मेहनत कर रहा था। उसे लग रहा था कि अब उसके बुरे दिन खत्म हो जाएंगे।

अचानक हल किसी कठोर चीज़ से टकराया। किसान चौंक गया। उसने वहीं मिट्टी खोदनी शुरू की। कुछ देर बाद उसे मिट्टी के अंदर से सोने की एक सुंदर ओखली मिली। वह चमचमा रही थी। किसान उसे देखकर हैरान रह गया। उसने तुरंत उसे उठाया और घर ले आया।

घर पहुँचकर उसने अपनी बेटी को ओखली दिखाई और कहा, “बेटी, यह ओखली मुझे राजा की जमीन से मिली है। इसलिए यह हमारी नहीं, राजा की है। हमें इसे उन्हें लौटा देना चाहिए।” किसान की बेटी थोड़ी देर सोचती रही। फिर वह बोली, “पिताजी, आप बहुत ईमानदार हैं, लेकिन दुनिया हमेशा इतनी सीधी नहीं होती। आपको केवल ओखली मिली है। अगर राजा ने आपसे इसकी सोने की मूसल भी माँग ली, तो आप क्या करेंगे? बेहतर होगा कि आप इसे अपने पास ही रख लें।”

लेकिन किसान ने सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं बेटी, जो चीज़ हमारी नहीं है, उसे रखना गलत होगा। और रही बात मूसल की, तो जो चीज़ हमें मिली ही नहीं, उसे कोई हमसे कैसे माँग सकता है?” बेटी ने फिर समझाने की कोशिश की, लेकिन किसान अपनी ईमानदारी से पीछे हटने को तैयार नहीं था।

अगले दिन किसान सोने की ओखली लेकर राजदरबार पहुँचा। उसने राजा के सामने सारी बात सच-सच बता दी और ओखली उन्हें सौंप दी। राजा पहले तो उसकी ईमानदारी से खुश हुए, लेकिन अचानक उनके मन में लालच आ गया। उन्होंने सोचा कि यदि किसान को ओखली मिली है, तो जरूर उसकी मूसल भी मिली होगी, जिसे उसने छिपा लिया है।

राजा ने कठोर आवाज़ में पूछा, “ओखली तो तुम ले आए, लेकिन उसकी मूसल कहाँ है?” किसान घबरा गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, मुझे केवल ओखली मिली थी। मूसल मुझे नहीं मिली।” लेकिन राजा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्हें लगा कि किसान झूठ बोल रहा है। गुस्से में उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि किसान को जेल में डाल दिया जाए।

बेचारा किसान निर्दोष होते हुए भी जेल में डाल दिया गया। वहाँ उसे ठीक से खाना नहीं मिलता था और न ही आराम। वह दिन-रात दुखी रहता। उसे सबसे ज्यादा पछतावा इस बात का था कि उसने अपनी बेटी की बात नहीं मानी। वह अक्सर रोते हुए कहता, “काश, मैंने अपनी बेटी की बात मान ली होती।”

एक दिन राजा जेल के निरीक्षण के लिए आए। उन्होंने किसान को रोते हुए यह कहते सुना। राजा ने उससे पूछा, “तुम बार-बार अपनी बेटी की बात क्यों कर रहे हो?” तब किसान ने सारी कहानी सच-सच बता दी। उसने बताया कि उसकी बेटी ने पहले ही अंदेशा जताया था कि ऐसा हो सकता है।

राजा यह सुनकर सोच में पड़ गए। उन्हें धीरे-धीरे अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने समझ लिया कि किसान सच बोल रहा था और उसकी बेटी बहुत बुद्धिमान है। राजा को अपने व्यवहार पर शर्म आई। उन्होंने तुरंत किसान को जेल से रिहा कर दिया और उससे माफी माँगी।

इसके बाद राजा ने किसान की बेटी को दरबार में बुलवाया। जब उन्होंने उससे बातचीत की, तो उसकी समझदारी, ईमानदारी और दूरदर्शिता देखकर बहुत प्रभावित हुए। इतनी छोटी उम्र में भी वह बहुत बुद्धिमान थी। राजा ने सोचा कि ऐसी समझदार लड़की राज्य के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।

राजा ने किसान की बेटी को राज्य के खजाने का मंत्री बना दिया। अब किसान और उसकी बेटी को रहने के लिए अच्छा घर मिला। उनके जीवन की सारी परेशानियाँ दूर हो गईं। किसान अपनी बेटी पर गर्व करने लगा और बेटी भी पूरी ईमानदारी से राज्य का काम संभालने लगी।

इस तरह अंत में सच्चाई और बुद्धिमानी की जीत हुई। किसान को थोड़ी कठिनाइयाँ जरूर सहनी पड़ीं, लेकिन उसकी ईमानदारी और उसकी बेटी की समझदारी ने आखिरकार उन्हें सुख और सम्मान दिलाया। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चाई का रास्ता कठिन जरूर हो सकता है, लेकिन अंत में जीत हमेशा सत्य और बुद्धिमानी की ही होती है।

कोल्डड़िंक का तालाब

बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य में शांतनु नाम का एक बहादुर योद्धा रहता था। वह अपनी वीरता, ईमानदारी और बुद्धिमानी के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। लोग कहते थे कि शांतनु कभी किसी मुसीबत से नहीं डरता। वह हमेशा कमजोर और परेशान लोगों की मदद करता था। उसके पास एक तेज़ घोड़ा और चमकदार तलवार थी, जिनके साथ वह अक्सर दूर-दूर की यात्राएँ किया करता था।

एक दिन शांतनु किसी काम से घने जंगल के रास्ते जा रहा था। जंगल बहुत डरावना और सुनसान था। ऊँचे-ऊँचे पेड़ आसमान तक फैले हुए थे और चारों तरफ अजीब-सी खामोशी थी। केवल पक्षियों की आवाज़ें और हवा की सरसराहट सुनाई दे रही थी। चलते-चलते अचानक शांतनु की नज़र एक पुराने और टूटे-फूटे मकान पर पड़ी। वह मकान जंगल के बीचों-बीच अकेला खड़ा था। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे वर्षों से वहाँ कोई नहीं रहता।

जैसे ही शांतनु उस मकान के पास पहुँचा, उसे अंदर से किसी लड़की के रोने की आवाज़ सुनाई दी। वह तुरंत सावधान हो गया। उसने धीरे-धीरे खिड़की के पास जाकर अंदर झाँका। अंदर एक सुंदर राजकुमारी बैठी रो रही थी। उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। शांतनु ने धीरे से पूछा, “तुम कौन हो और यहाँ क्यों बंद हो?” राजकुमारी ने आँसू पोंछते हुए बताया, “मैं पड़ोसी राज्य की राजकुमारी हूँ। एक दुष्ट जादूगर मुझे पकड़कर यहाँ ले आया है। वह मुझे हमेशा के लिए अपनी कैद में रखना चाहता है।”

शांतनु को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। उसने तुरंत राजकुमारी को वहाँ से निकालने का निश्चय किया। मौका देखकर उसने दरवाज़ा खोला और राजकुमारी को चुपके से बाहर ले आया। फिर दोनों जल्दी से घोड़े पर सवार होकर वहाँ से भागने लगे।
लेकिन उनकी किस्मत इतनी आसान नहीं थी। वे अभी थोड़ी ही दूर पहुँचे थे कि जादूगर ने उन्हें देख लिया। वह बहुत क्रोधित हो गया और तेज़ी से उनके पीछे दौड़ पड़ा। उसकी आँखों से आग निकल रही थी और वह जोर-जोर से मंत्र पढ़ रहा था।

राजकुमारी कुछ समय तक जादूगर की कैद में रही थी, इसलिए उसने थोड़ा-बहुत जादू सीख लिया था। जैसे ही उसने देखा कि जादूगर तेजी से पास आ रहा है, उसने तुरंत अपना जादू इस्तेमाल किया। अगले ही पल वह खुद एक घड़े में बदल गई। घोड़ा एक पुराने कुएँ में बदल गया और शांतनु एक बूढ़े आदमी का रूप धारण कर बैठ गया।

कुछ ही देर में जादूगर वहाँ पहुँचा। उसने चारों ओर देखा, लेकिन उसे राजकुमारी और शांतनु दिखाई नहीं दिए। उसने बूढ़े आदमी बने शांतनु से पूछा, “क्या तुमने यहाँ से एक युवक और एक राजकुमारी को जाते देखा है?” शांतनु ने काँपती आवाज़ में कहा, “हाँ, वे लोग उस दिशा में गए हैं।” और उसने जादूगर को गलत रास्ता बता दिया।

जादूगर तेजी से उस दिशा में चला गया। लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद उसे शक हुआ। उसने सोचा, “कुछ तो गड़बड़ है। वह बूढ़ा आदमी मुझे बेवकूफ बना रहा था।” वह तुरंत वापस लौटा। इस बार राजकुमारी ने फिर जादू किया। वह एक सुंदर मंदिर बन गई। घोड़ा मंदिर में जलता हुआ दीपक बन गया और शांतनु एक पुजारी का रूप धारण करके बैठ गया।

जब जादूगर वापस पहुँचा, तो उसने वहाँ एक मंदिर देखा। वह कुछ पल के लिए उलझन में पड़ गया। उसने पुजारी से पूछा, “क्या यहाँ कोई युवक और राजकुमारी आए थे?” शांतनु ने शांत स्वर में कहा, “नहीं, यहाँ तो केवल भगवान का मंदिर है।”

जादूगर फिर धोखा खा गया और आगे बढ़ गया। लेकिन कुछ दूर जाकर उसे अचानक याद आया कि पहले यहाँ कोई मंदिर नहीं था। वह समझ गया कि फिर से उसके साथ चाल चली गई है। वह तुरंत पलटकर वापस आया। मगर इस बार वहाँ न मंदिर था, न पुजारी और न दीपक। वे तीनों फिर गायब हो चुके थे।
अब जादूगर गुस्से से पागल हो चुका था। वह जंगल में इधर-उधर भागने लगा। उधर राजकुमारी ने तीसरी बार जादू किया। इस बार वह एक सफेद बत्तख बन गई। शांतनु एक हरे पौधे में बदल गया और घोड़ा कहीं छिप गया। साथ ही वहाँ अचानक चॉकलेट के बड़े-बड़े टीले और कोल्डड़िंक का एक विशाल तालाब दिखाई देने लगा।

जादूगर लगातार पीछा करते-करते बहुत थक चुका था। उसे जोर की भूख और प्यास लगी हुई थी। जैसे ही उसकी नज़र चॉकलेट और कोल्डड़िंक पर पड़ी, वह खुद को रोक नहीं पाया। वह लालच में आ गया। उसने ढेर सारी चॉकलेट खानी शुरू कर दी और तालाब से खूब कोल्डड़िंक पीने लगा।

कुछ ही देर बाद उसका पेट दर्द से मरोड़ने लगा। उसके दाँतों में भयंकर दर्द होने लगा। एक-एक करके उसके दाँत गिरने लगे। उसका पेट इतना फूल गया कि वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। उसकी सारी जादुई शक्तियाँ कमजोर पड़ने लगीं। आखिरकार वह वहीं जमीन पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया।

काफी देर बाद जब उसे होश आया, तो उसने चारों तरफ देखा। वहाँ न चॉकलेट के टीले थे, न कोल्डड़िंक का तालाब, न बत्तख और न पौधा। सब कुछ गायब हो चुका था। शांतनु और राजकुमारी बहुत दूर निकल चुके थे।

जादूगर ने उन्हें ढूँढने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह कभी सफल नहीं हो पाया। उधर शांतनु राजकुमारी को सुरक्षित उसके राज्य तक ले गया। राजकुमारी के माता-पिता अपनी बेटी को वापस पाकर बहुत खुश हुए। उन्होंने शांतनु का खूब सम्मान किया।
उस दिन के बाद शांतनु और राजकुमारी अच्छे मित्र बन गए।

दोनों ने मिलकर यह निश्चय किया कि वे हमेशा दूसरों की मदद करेंगे और कभी किसी लालची और दुष्ट व्यक्ति से नहीं डरेंगे। इस कहानी से यह सीख मिलती है कि बुद्धिमानी और साहस से बड़ी-से-बड़ी मुसीबत को भी हराया जा सकता है, जबकि लालच इंसान को हमेशा नुकसान पहुँचाता है।

मूल्यवान वस्तु

बहुत समय पहले एक विशाल और समृद्ध राज्य था। उस राज्य के राजा का नाम मयंक था और उनकी रानी का नाम गार्गी। राजा मयंक बहुत बहादुर और बुद्धिमान शासक माने जाते थे, जबकि रानी गार्गी अपनी सुंदरता, दयालुता और समझदारी के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध थीं। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। वे हर काम साथ करते, प्रजा की भलाई के बारे में सोचते और सुख-दुःख में हमेशा एक-दूसरे का साथ निभाते थे। महल में हमेशा खुशियों का माहौल रहता था और लोग राजा-रानी की जोड़ी की मिसाल दिया करते थे।

लेकिन एक दिन ऐसी घटना हुई जिसने सब कुछ बदल दिया। एक प्रसिद्ध ज्योतिषी राजा के दरबार में आया। वह बहुत विद्वान माना जाता था और दूर-दूर के लोग उससे भविष्य जानने आते थे। राजा ने भी उत्सुकता से उसे अपने और रानी के ग्रहों के बारे में पूछने को कहा। ज्योतिषी ने दोनों की कुंडलियाँ ध्यान से देखीं और फिर बोला, “महाराज, रानी गार्गी के ग्रह बहुत प्रबल और शुभ हैं। भविष्य में ऐसा समय भी आ सकता है जब राज्य की बागडोर उनके हाथों में आ जाए।”

दरबार में बैठे लोग यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गए। लेकिन सबसे अधिक असर राजा मयंक पर पड़ा। उनके मन में अचानक ईर्ष्या और असुरक्षा की भावना पैदा हो गई। उन्हें लगा कि कहीं भविष्य में रानी उनसे अधिक सम्मान और शक्ति न पा लें। धीरे-धीरे उनका मन बदलने लगा। जो राजा पहले रानी से बहुत प्रेम करते थे, वही अब उनसे दूरी बनाने लगे। वे छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ हो जाते और रानी से कम बात करने लगे।

रानी गार्गी समझ नहीं पा रही थीं कि अचानक राजा के व्यवहार में इतना बदलाव क्यों आ गया है। उन्होंने कई बार कारण जानने की कोशिश की, लेकिन राजा हर बार बात टाल देते। समय बीतता गया और राजा का गुस्सा और ईर्ष्या बढ़ती गई। आखिर एक दिन वे इतने क्रोधित हो गए कि उन्होंने रानी को अपने कक्ष में बुलाया और कठोर स्वर में कहा, “हम चाहते हैं कि आप तुरंत यह महल छोड़कर अपने माता-पिता के घर चली जाएँ।”

यह सुनकर रानी गार्गी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि जिन राजा से वे इतना प्रेम करती हैं, वही उन्हें महल से जाने के लिए कह देंगे। वे चुपचाप खड़ी रहीं। राजा ने जब उन्हें रोते देखा, तो कुछ नरम पड़ते हुए बोले, “आप इस महल की सुख-सुविधाओं को छोड़कर जा रही हैं, इसलिए हम आपको एक अनुमति देते हैं। आप अपनी सबसे प्यारी और सबसे मूल्यवान वस्तु अपने साथ ले जा सकती हैं। बस उससे अधिक कुछ नहीं।”

इतना कहकर राजा अपने कक्ष में चले गए। रानी गार्गी सारी रात सोचती रहीं। उन्हें महल की दौलत, गहनों या कीमती वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। उनके लिए सबसे मूल्यवान केवल उनके पति, राजा मयंक थे। उन्होंने मन ही मन एक योजना बनाई।
रात गहरी हो चुकी थी। महल में चारों ओर शांति थी। राजा अपने कक्ष में गहरी नींद में सो रहे थे। तभी रानी ने कुछ विश्वसनीय सैनिकों को बुलाया। उन्होंने धीरे-धीरे राजा के पूरे पलंग को उठवाया ताकि उनकी नींद न टूटे। फिर बहुत सावधानी से राजा को उनके पलंग सहित रानी के मायके पहुँचाया गया।

अगली सुबह जब राजा मयंक की आँख खुली, तो वे हैरान रह गए। उन्होंने चारों ओर देखा। वह उनका शाही महल नहीं था। कमरे की सजावट अलग थी और वातावरण भी बदला हुआ था। वे समझ ही नहीं पाए कि वे कहाँ हैं। तभी रानी गार्गी मुस्कुराती हुई वहाँ आईं।

राजा उन्हें देखकर गुस्से में बोले, “यह हम कहाँ हैं? हमें यहाँ कौन लाया? और आप यहाँ क्या कर रही हैं?” रानी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “महाराज, यह मेरे माता-पिता का घर है। आपके आदेश के अनुसार ही मैं यहाँ आई हूँ।”
राजा और अधिक क्रोधित होकर बोले, “लेकिन हमें यहाँ क्यों लाया गया?” तब रानी ने मुस्कुराते हुए कहा, “महाराज, आपने ही तो कहा था कि मैं अपनी सबसे प्यारी और मूल्यवान वस्तु अपने साथ ले जा सकती हूँ। मैंने वही किया। इस दुनिया में मेरे लिए सबसे मूल्यवान वस्तु आप हैं। इसलिए मैं आपको अपने साथ यहाँ ले आई।”

रानी की यह बात सुनते ही राजा मयंक स्तब्ध रह गए। उनके मन में जो ईर्ष्या और क्रोध भरा हुआ था, वह पलभर में पिघलने लगा। उन्हें एहसास हुआ कि रानी उनसे कितना सच्चा प्रेम करती हैं। उन्होंने सोचा कि जिस स्त्री ने महल की सारी दौलत छोड़कर केवल अपने पति को सबसे मूल्यवान माना, उसके साथ उन्होंने कितना अन्याय किया है।

राजा की आँखें नम हो गईं। उन्होंने रानी का हाथ पकड़कर कहा, “गार्गी, मुझे क्षमा कर दो। मैंने ईर्ष्या में आकर तुम्हारे प्रेम और समर्पण को समझने में बहुत बड़ी गलती की।” रानी ने मुस्कुराकर उन्हें क्षमा कर दिया।

उस दिन के बाद राजा मयंक कभी रानी से ईर्ष्या नहीं करने लगे। वे समझ चुके थे कि सच्चा प्रेम किसी भी शक्ति या पद से अधिक मूल्यवान होता है। कुछ दिनों बाद दोनों वापस अपने महल लौट आए। अब उनके बीच पहले से भी अधिक प्रेम और विश्वास था। वे मिलकर राज्य चलाने लगे और प्रजा की भलाई के लिए काम करते रहे।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि प्रेम और विश्वास संसार की सबसे मूल्यवान चीज़ें हैं। ईर्ष्या और अहंकार रिश्तों को कमजोर कर देते हैं, जबकि सच्चा प्रेम हर दूरी और गलतफहमी को मिटा सकता है।

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दादी माँ की कहानियाँ प्यार, संस्कार, अनुभव और जीवन की अनमोल सीख से भरपूर होती हैं। ये रोचक कथाएँ बच्चों और बड़ों को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्य, पारिवारिक प्रेम और अच्छे आचरण की प्रेरणा देती हैं।

दादी माँ की कहानियाँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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