दादी माँ की कहानियाँ-झूठ

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दादी माँ की कहानियाँ-झूठ

एक बड़े राज्य के बीचों-बीच हर सप्ताह एक विशाल बाज़ार लगता था। दूर-दूर के गाँवों से किसान, व्यापारी और दुकानदार वहाँ आया करते थे। बाज़ार हमेशा लोगों की आवाज़ों, जानवरों की आवाज़ों और गाड़ियों की खड़खड़ाहट से भरा रहता था। कहीं सब्जियाँ बिक रही थीं, कहीं कपड़े, तो कहीं खिलौनों और मिठाइयों की दुकानें सजी थीं। बैलगाड़ियाँ, ऊँट गाड़ियाँ और घोड़ागाड़ियाँ सड़क पर इधर-उधर जा रही थीं। उस दिन बाज़ार में और भी अधिक भीड़ थी, क्योंकि खबर थी कि स्वयं राजा भी बाज़ार देखने आने वाले हैं।

बाज़ार के पास ही एक बड़ा अस्तबल था, जहाँ कई सुंदर घोड़े रखे जाते थे। उसी सुबह वहाँ एक घोड़ी ने एक प्यारे-से बच्चे को जन्म दिया था। वह छोटा-सा घोड़े का बच्चा अभी ठीक से खड़ा होना भी नहीं सीख पाया था। उसका मालिक बहुत खुश था। वह बार-बार उसे प्यार से सहला रहा था और उसकी देखभाल कर रहा था।

कुछ देर बाद घोड़े का बच्चा धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा होने लगा। पहले वह लड़खड़ाया, फिर थोड़ा चला। नई दुनिया उसके लिए बहुत रोमांचक थी। जिज्ञासा में वह अस्तबल के बाहर निकल आया। लेकिन जैसे ही वह बाहर पहुँचा, बाज़ार का शोर सुनकर डर गया। चारों तरफ लोगों की भीड़, जानवरों की आवाज़ें और गाड़ियों की हलचल देखकर वह घबरा गया। डर के मारे वह भागकर पास खड़ी एक गाय और बैल के बीच जाकर छिप गया।

उधर घोड़े का मालिक अपने बच्चे को ढूँढ़ता हुआ बाहर आया। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि उसका प्यारा बच्चा गाय और बैल के बीच खड़ा है। वह तुरंत उसे लेने के लिए आगे बढ़ा। लेकिन तभी गाय का मालिक वहाँ आ गया। उसने घोड़े के मालिक का हाथ रोकते हुए कहा, “अरे! तुम मेरे बछड़े को कहाँ ले जा रहे हो?”

घोड़े का मालिक हैरान होकर बोला, “तुम क्या कह रहे हो? यह तो मेरे घोड़े का बच्चा है!”
लेकिन गाय वाला ज़िद करने लगा। वह बोला, “नहीं, यह मेरी गाय का बच्चा है। देखो, यह कितने प्यार से गाय और बैल के पास खड़ा है। अगर यह उनका बच्चा नहीं होता, तो इनके पास क्यों खड़ा रहता?”

दोनों में जोरदार बहस होने लगी। आसपास के लोग भी इकट्ठा हो गए। कोई घोड़े वाले की बात का समर्थन कर रहा था, तो कोई तमाशा देखने में मज़ा ले रहा था। तभी राजा अपने सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचे। उन्होंने दोनों को झगड़ते देखा और कारण पूछा।
गाय के मालिक ने तुरंत अपनी बात बड़े आत्मविश्वास से रखी। उसने कहा, “महाराज, यह बच्चा मेरी गाय का है। देखिए, यह उनके पास कितना सुरक्षित महसूस कर रहा है।” घोड़े के मालिक ने भी विनम्रता से कहा, “महाराज, यह घोड़े का बच्चा है। अभी सुबह ही मेरे अस्तबल में पैदा हुआ है।”

राजा कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने कहा, “क्योंकि यह बच्चा गाय और बैल के बीच खड़ा होकर अपने आपको सुरक्षित महसूस कर रहा है, इसलिए वही इसके माता-पिता होंगे।” राजा का फैसला सुनकर घोड़े का मालिक स्तब्ध रह गया। वह जानता था कि यह अन्याय है, लेकिन राजा की आज्ञा का विरोध करना संभव नहीं था। दुखी मन से उसे अपना घोड़े का बच्चा गाय वाले को देना पड़ा।

दिन बीतते गए, लेकिन घोड़े का मालिक उस अन्याय को भूल नहीं पाया। वह बार-बार सोचता कि राजा ने बिना सही बात समझे फैसला क्यों दे दिया। आखिर उसने राजा को सच्चाई समझाने की एक तरकीब निकाली। कुछ दिनों बाद राजा अपनी शानदार बग्घी में बैठकर कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक आदमी सड़क के बीचों-बीच मछली पकड़ने का जाल बिछाकर बैठा है। यह देखकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपनी बग्घी रुकवाई और उस आदमी को बुलाया।

राजा ने पूछा, “तुम यह क्या कर रहे हो? सड़क पर जाल क्यों बिछाया है?”
वह आदमी शांत स्वर में बोला, “महाराज, मैं मछलियाँ पकड़ रहा हूँ।”
राजा हैरान होकर बोले, “क्या तुम पागल हो गए हो? सड़क पर कभी मछलियाँ मिलती हैं क्या?”
तब उस आदमी ने आदरपूर्वक सिर झुकाकर कहा, “महाराज, यदि गाय और बैल एक घोड़े के बच्चे को जन्म दे सकते हैं, तो सड़क पर मछलियाँ भी मिल सकती हैं।”

यह सुनते ही राजा चौंक गए। उन्होंने ध्यान से उस आदमी को देखा। अब उन्हें पहचान में आया कि यह वही घोड़े का मालिक था, जिसके साथ बाज़ार में विवाद हुआ था। राजा को तुरंत अपनी गलती का एहसास हो गया। उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने बिना ठीक से सोच-विचार किए गलत फैसला दे दिया था। राजा ने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया, “अभी जाओ और उस गाय वाले को यहाँ लेकर आओ!”

कुछ ही देर में गाय का मालिक दरबार में उपस्थित किया गया। इस बार राजा ने कठोर स्वर में कहा, “तुमने झूठ बोलकर दूसरे का हक छीनने की कोशिश की। यह बहुत बड़ा अपराध है।” डर के मारे गाय वाले का सिर झुक गया। उसे अपना अपराध स्वीकार करना पड़ा। राजा ने आदेश दिया कि घोड़े का बच्चा तुरंत उसके असली मालिक को वापस दिया जाए।

साथ ही राजा ने गाय वाले को झूठ बोलने की सज़ा भी दी। उन्होंने कहा, “एक महीने तक तुम अपनी गाय का ताज़ा दूध हर दिन घोड़े के मालिक के घर भेजोगे, वह भी बिना कोई पैसा लिए।” गाय वाले को मजबूरी में राजा की आज्ञा माननी पड़ी। उधर घोड़े का मालिक अपना बच्चा वापस पाकर बहुत खुश हुआ। उसने राजा को धन्यवाद दिया।

राजा ने भी इस घटना से एक बड़ी सीख ली। उन्होंने समझ लिया कि बिना पूरी सच्चाई जाने फैसला नहीं करना चाहिए।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि झूठ कुछ समय के लिए फायदा पहुँचा सकता है, लेकिन अंत में सच सामने आ ही जाता है। जो व्यक्ति दूसरों का हक छीनने की कोशिश करता है, उसे एक दिन अपनी गलती की सज़ा जरूर मिलती है।

गिद्ध के उपहार

बहुत समय पहले एक विशाल और समृद्ध राज्य में एक राजा शासन करता था। वह बहादुर तो था, लेकिन उसे शिकार का बहुत शौक था। जब भी उसे समय मिलता, वह अपने सैनिकों और सेवकों के साथ जंगलों में शिकार खेलने निकल जाता। उसे अपने निशानेबाजी के कौशल पर बड़ा गर्व था। एक दिन वह घने जंगल में शिकार की तलाश में घूम रहा था। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे, पक्षियों की आवाज़ें गूँज रही थीं और हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

अचानक राजा की नज़र आकाश में उड़ते हुए एक विशाल गिद्ध पर पड़ी। वह साधारण गिद्ध नहीं था। उसके पंख इतने बड़े थे कि जब वह नीचे से उड़ता, तो उसकी छाया में कई लोग आराम से खड़े हो सकते थे। उसकी आँखों में अजीब-सी चमक थी और वह बहुत शक्तिशाली दिखाई दे रहा था।

राजा ने तुरंत अपनी बंदूक उठाई और गिद्ध की ओर निशाना साधा। वह सोच ही रहा था कि गोली चला दे, तभी अचानक गिद्ध मनुष्य की आवाज़ में बोला, “हे राजा, मुझे मत मारो। मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा। यदि तुम चाहो, तो मुझे अपने साथ अपने महल ले चलो। यदि तुम एक वर्ष तक मेरी देखभाल करोगे, तो मैं तुम्हें दुनिया का सबसे महान राजा बना दूँगा।”

गिद्ध की बात सुनकर राजा हैरान रह गया। उसने पहले कभी किसी पक्षी को बोलते नहीं सुना था। उसे गिद्ध की बात पर पूरी तरह विश्वास तो नहीं हुआ, लेकिन उसकी जिज्ञासा बढ़ गई। उसने सोचा, “यदि यह सच बोल रहा है, तो शायद इसमें कोई रहस्य छिपा हो।” इसलिए उसने गिद्ध को मारने के बजाय अपने साथ महल ले जाने का निर्णय लिया।

महल पहुँचते ही गिद्ध ने खूब सारा खाना माँगा। राजा ने उसके लिए तरह-तरह के फल, मांस और स्वादिष्ट भोजन मँगवाए। लेकिन गिद्ध की भूख बहुत ज़्यादा थी। वह रोज़ इतना खाना खाता कि धीरे-धीरे राजमहल का खजाना खाली होने लगा। राजा की धन-दौलत कम होती चली गई। मंत्री और दरबारी भी चिंता में पड़ गए। वे राजा से कहते, “महाराज, यह गिद्ध आपका सारा खजाना खत्म कर देगा।” लेकिन राजा ने अपना वचन निभाने का निश्चय किया था। उन्होंने कहा, “मैंने इसे एक वर्ष तक अपने पास रखने का वादा किया है। मैं अपना वचन नहीं तोड़ूँगा।”

समय बीतता गया। धीरे-धीरे राजा को अपने कई कीमती सामान बेचने पड़े। महल की शानो-शौकत भी कम होने लगी। लेकिन फिर भी राजा ने कभी शिकायत नहीं की। वे धैर्य और ईमानदारी से गिद्ध की देखभाल करते रहे।
आखिरकार एक वर्ष पूरा हो गया। उस दिन गिद्ध राजा के पास आया और बोला, “महाराज, अब समय आ गया है कि मैं आपको आपका इनाम दूँ। मेरी पीठ पर बैठ जाइए। मैं आपको एक खास जगह ले जाना चाहता हूँ।”

राजा थोड़ा घबराया, लेकिन फिर भी वह गिद्ध की पीठ पर बैठ गया। अगले ही पल गिद्ध ने अपने विशाल पंख फैलाए और आकाश में उड़ने लगा। वह इतनी तेजी से उड़ रहा था कि महल, गाँव और शहर धीरे-धीरे बहुत छोटे दिखाई देने लगे। कुछ ही देर में वे समुद्र के ऊपर पहुँच गए।

राजा ने नीचे देखा तो उसकी साँसें रुक गईं। नीचे केवल गहरा और अंतहीन समुद्र दिखाई दे रहा था। चारों ओर नीला पानी ही पानी था। वे इतनी ऊँचाई पर थे कि राजा डर से काँपने लगा। उसे लगा कि यदि वह नीचे गिर गया, तो उसकी जान नहीं बचेगी। घबराकर उसने आँखें बंद कर लीं और मन-ही-मन ईश्वर को याद करने लगा। उसने प्रार्थना की कि वह सुरक्षित बच जाए।
कुछ देर बाद गिद्ध धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा और आखिरकार एक सुरक्षित जगह पर आकर रुक गया। राजा ने राहत की साँस ली और तुरंत ईश्वर को धन्यवाद दिया।

तभी गिद्ध मुस्कुराकर बोला, “महाराज, मैंने आपको तीन अनमोल उपहार दिए हैं। इन्हें हमेशा संभालकर रखिएगा।”
राजा आश्चर्य में पड़ गया। उसने पूछा, “तीन उपहार? लेकिन तुमने मुझे कुछ दिया तो नहीं।” गिद्ध बोला, “मैंने आपको वस्तुएँ नहीं, बल्कि जीवन की तीन सबसे महत्वपूर्ण सीखें दी हैं। पहला उपहार है—दयालुता। आपने मुझ पर दया की और मुझे मारा नहीं।

दूसरा उपहार है—अपना वचन निभाना। आपने कठिन परिस्थितियों में भी अपना वादा पूरा किया। तीसरा उपहार है—ईश्वर पर विश्वास। जब हम समुद्र के ऊपर उड़ रहे थे और आप डर गए थे, तब आपने ईश्वर को याद किया और उन पर भरोसा रखा।”
गिद्ध ने आगे कहा, “जिस राजा के अंदर ये तीन गुण हों—दयालुता, सच्चाई और ईश्वर में विश्वास—वह हमेशा महान शासक बनता है। अब आपके अंदर एक अच्छे राजा के सारे गुण आ चुके हैं। जाइए और अपनी प्रजा की सेवा कीजिए।”

इतना कहकर गिद्ध उड़ गया। राजा कुछ देर तक उसे जाते हुए देखता रहा। फिर वह अपने राज्य वापस लौट आया।
जब राजा महल पहुँचा, तो वह हैरान रह गया। उसने देखा कि उसकी सारी खोई हुई धन-दौलत वापस लौट आई थी। महल फिर से पहले जैसा भव्य दिखाई देने लगा। लोगों के चेहरे पर खुशी थी। राजा समझ गया कि यह कोई साधारण गिद्ध नहीं था। वह ईश्वर का भेजा हुआ दूत था, जो उसे जीवन की सबसे बड़ी सीख देने आया था।

उस दिन के बाद राजा पूरी तरह बदल गया। वह पहले से अधिक दयालु, न्यायप्रिय और विनम्र बन गया। उसने अपनी प्रजा की भलाई के लिए बहुत काम किए। गरीबों की सहायता की, न्याय को महत्व दिया और हमेशा अपने वचनों का पालन किया।
कई वर्षों तक उसके राज्य में सुख और शांति बनी रही।

लोग अपने राजा से बहुत प्रेम करते थे, क्योंकि अब वह केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि एक सच्चा और नेक इंसान भी बन चुका था। इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि दया, सच्चाई और ईश्वर में विश्वास इंसान के सबसे बड़े गुण होते हैं। जो व्यक्ति इन गुणों को अपनाता है, वह जीवन में सच्चा सम्मान और सफलता प्राप्त करता है।

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दादी माँ की कहानियाँ प्यार, संस्कार, अनुभव और जीवन की अनमोल सीख से भरपूर होती हैं। ये रोचक कथाएँ बच्चों और बड़ों को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्य, पारिवारिक प्रेम और अच्छे आचरण की प्रेरणा देती हैं।

दादी माँ की कहानियाँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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