दुम कट गई पर झड़ गए फिरते हैं लंडूरे

दुम कट गई पर झड़ गए फिरते हैं लंडूरे (उर्दू कहानी हिंदी में)

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दुम कट गई पर झड़ गए फिरते हैं लंडूरे (उर्दू कहानी हिंदी में)

यह कहानी एक जंगल के स्कूल से शुरू होती है जहाँ कई पक्षी पढ़ने आते थे। वहाँ दो मोर—एक हरा मोर और एक लाल मोर—पढ़ाई करते थे। दोनों बहुत सुंदर थे, लेकिन स्वभाव में बहुत अंतर था। लाल मोर मिलनसार था, सभी के साथ खेलता-कूदता और दूसरों की मदद भी करता था, जबकि हरा मोर अकेला रहता और किसी से ज्यादा घुलता-मिलता नहीं था। यही अंतर आगे चलकर उनके जीवन को बदलने वाला था।

एक दिन खेलते समय हरे मोर का स्वभाव सामने आया। वह खेल में हारने पर बहुत गुस्सा हो गया और छोटी-सी बात पर मैना पर चिल्लाने लगा। उसकी इस आदत से सभी पक्षी परेशान हो गए और वह धीरे-धीरे सबसे अलग-थलग पड़ गया। समय बीतने के साथ सभी पक्षी स्कूल से निकलकर अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए, लेकिन हरे और लाल मोर दोनों बड़े होकर सुंदर पंखों वाले हो गए।

एक दिन दोनों मोरों ने एक खूबसूरत मोरनी को देखा और दोनों ही उससे शादी करना चाहते थे। मोरनी दोनों की सुंदरता और नृत्य देखकर उलझन में पड़ गई कि वह किसे चुने। उसने निर्णय लिया कि वह पहले उनकी परीक्षा लेगी। इस परीक्षा का विचार उसकी सहेली चुहिया ने दिया, जो शहर में रहती थी और चालाक मानी जाती थी।

रात के समय चुहिया ने हरे मोर के पंख काट दिए, जिससे वह सुबह उठकर खुद को बहुत बदहाल और असहाय पाया। अब वह उड़ नहीं सकता था और उसकी सुंदरता भी खत्म हो गई थी। जंगल के अन्य पक्षी उसे देखकर उसका मजाक उड़ाने लगे। यहाँ तक कि उसे अपमान और तानों का सामना करना पड़ा, जिससे वह पूरी तरह टूट गया।

इधर, लाल मोर और उसके साथी—मैना, कव्वा और जुगनू—उसकी मदद के लिए आगे आए। उन्हें एक वैद्य के पास जाना था जहाँ से दवा मिल सकती थी, लेकिन रास्ता बहुत कठिन था। रास्ते में खतरनाक मैदान, अंधेरे और एक विशाल साँप भी था। लेकिन दोस्ती और हिम्मत के साथ वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़े।

साँप ने उन पर हमला करने की कोशिश की, लेकिन मैना और कव्वे ने मिलकर उसे हरा दिया। फिर जुगनू ने अंधेरे में रास्ता दिखाया और सभी सुरक्षित वैद्य के पास पहुँच गए। वहाँ लाल मोर को दवा मिली, जिससे उसके पंख और ताकत पहले से भी बेहतर होकर वापस आ गए। यह देखकर सभी खुश हो गए।

लाल मोर की अच्छाई और साहस से मोरनी बहुत प्रभावित हुई और उसे सही साथी चुनने का एहसास हुआ। अंत में लाल मोर और मोरनी की शादी धूमधाम से हुई, और यह साबित हो गया कि सच्चा गुण केवल सुंदरता नहीं बल्कि व्यवहार, साहस और मित्रता में होता है।

ऑल इंडिया ख़रगोश कॉन्फ्रेंस

यह कहानी गोशी नाम के एक प्यारे खरगोश की सालगिरह से शुरू होती है, जिसे हर साल बड़े उत्साह और प्यार से मनाया जाता था। इस दिन नन्हे-मुन्ने बच्चे अपने-अपने खरगोशों के साथ आते और उनके लिए तरह-तरह के उपहार लाते थे—हरी घास, गाजर, मूली, फल, बिस्कुट और कई स्वादिष्ट चीज़ें। गोशी इन सब उपहारों से बहुत खुश होता और अपने लंबे कान हिलाकर अपनी खुशी जाहिर करता था।

पिछले साल की गोशी की सालगिरह खास बन गई थी क्योंकि वह “ऑल इंडिया खरगोश कॉन्फ्रेंस” में बदल गई। इस कार्यक्रम में कई बच्चे अपने-अपने खरगोशों को लेकर आए थे और पूरा घर एक छोटे से सम्मेलन स्थल की तरह सज गया था। कमरे में लगभग 20 खरगोश थे, जो काले और सफेद कालीन पर उछल-कूद कर रहे थे और सोफों पर बैठकर शान से आसपास देख रहे थे।

गोशी को इस कार्यक्रम का अध्यक्ष बनाया गया क्योंकि वह सबसे उम्रदराज और समझदार खरगोश था। उसके सामने गुलाब के फूलों का ढेर रखा गया था और बच्चों ने उसे घेर लिया था। सभी बच्चे अपने-अपने खरगोशों के लिए लाए गए उपहार बीच में रख देते हैं और गोशी उन्हें देखकर खुशी से कान हिलाता है। फिर एक सुंदर हरे घास जैसा दिखने वाला केक लाया जाता है, जिसे असल में बच्चों के लिए स्वादिष्ट केक बनाया गया था।

केक काटने की रस्म पूरी होती है और सभी बच्चे, खरगोश और गोशी मिलकर उसे खाते हैं। माहौल बहुत खुशहाल और उत्सव जैसा होता है। लेकिन इसी बीच पोली का बड़ा भाई बल्लू वहाँ आ जाता है, जो थोड़ा शरारती स्वभाव का होता है। वह सभी बच्चों को एक नई “कॉन्फ्रेंस” के लिए तैयार करता है और खरगोशों की समस्याओं पर चर्चा शुरू कर देता है।

बल्लू सभी बच्चों को दीवार के पास खड़ा कर देता है और उन्हें कहता है कि वे अपने-अपने खरगोशों की माँगें पढ़कर सुनाएँ। इसके बाद बच्चे एक-एक करके खरगोशों की इच्छाएँ बताते हैं। कोई कहता है कि उन्हें पढ़ने के लिए स्कूल चाहिए, कोई कहता है कि अलग “खरगोश देश” बनना चाहिए जहाँ कुत्ते और बिल्लियाँ न आ सकें, और कोई अलग अस्पताल की मांग करता है क्योंकि उन्हें दूसरे जानवरों के साथ इलाज पसंद नहीं।

इन सभी बातों पर खूब हंसी-मजाक और तालियाँ बजती हैं। खरगोश भी कान हिलाकर इन मांगों का समर्थन करते हैं। माहौल एक मजेदार लेकिन सोचने योग्य सभा जैसा बन जाता है, जहाँ जानवरों की कल्पनाएँ और बच्चों की दुनिया मिलकर एक नया रूप ले लेती हैं।

अंत में गोशी अपनी “अध्यक्षीय” बात रखता है और कहता है कि वह इन सभी मांगों को समझेगा और इंसानों तक पहुँचाने की कोशिश करेगा। लेकिन साथ ही वह यह भी याद दिलाता है कि सभी को अब भूख लग रही है, इसलिए खाने का समय हो गया है। यह सुनते ही बच्चे खाने की ओर भाग जाते हैं और खरगोश अपने तोहफे खोलने लगते हैं।

कहानी के अंत में पूरा दृश्य खुशी, मासूमियत और कल्पना से भर जाता है। यह कहानी बच्चों की दुनिया, जानवरों के प्रति प्रेम और समाज में उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं को एक मजेदार तरीके से दिखाती है, जहाँ खेल-खेल में गंभीर बातें भी छिपी होती हैं।

एक दिन की बादशाहत (कहानी)

आरिफ़ और सलीम दो भाई थे जो अपने घर के रोज़मर्रा के नियमों और पाबंदियों से बहुत परेशान रहते थे। उनकी जिंदगी हर समय आदेशों और रोक-टोक से भरी हुई थी। कभी अम्मी उन्हें जल्दी सोने का हुक्म देतीं, कभी आपा उन्हें समय पर स्कूल जाने के लिए झिंझोड़ देतीं, और कभी दादी उनके शोर से परेशान होकर उन्हें डाँट देती थीं। घर में हर बड़े की अपनी हुकूमत थी, और बच्चों को अपनी मर्ज़ी से कुछ करने की इजाज़त नहीं थी।

दोनों भाइयों को लगता था कि बड़े हमेशा छोटे बच्चों पर बेवजह सख्ती करते हैं। इसलिए उन्होंने मिलकर एक अनोखी योजना बनाई। उन्होंने अपने अब्बा से एक दिन की “बादशाहत” माँग ली, जिसमें उन्हें पूरे घर पर अधिकार मिल जाएँ और बड़े लोग एक दिन के लिए छोटे बन जाएँ। शुरुआत में अम्मी और बाकी घरवाले इस विचार का विरोध करते हैं, लेकिन आखिरकार अब्बा मान जाते हैं और तय होता है कि अगले दिन बच्चों को पूरे अधिकार मिलेंगे।

अगली सुबह जैसे ही दिन शुरू होता है, आरिफ़ और सलीम घर के नए “हाकिम” बन जाते हैं। वे सबसे पहले अम्मी को जल्दी उठाकर नाश्ता बनाने का आदेश देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे अम्मी उन्हें जगाया करती थीं। अम्मी चाहकर भी कुछ नहीं कह पातीं क्योंकि उस दिन घर के नियम बदल चुके थे। दादी को भी उनके ही अंदाज़ में रोका जाता है, जैसे वे बच्चों को रोकती थीं।

नाश्ते की मेज़ पर भी स्थिति बदल जाती है। अब बच्चे तय करते हैं कि कौन क्या खाएगा और क्या नहीं। अम्मी और आपा को वही नियम मानने पड़ते हैं जो वे हमेशा बच्चों पर लागू करती थीं। दादी को भी उनके खाने-पीने पर टोका जाता है, जिससे घर में एक अजीब सा हास्यपूर्ण माहौल बन जाता है। हर बड़ा व्यक्ति अब बच्चों की भूमिका में और बच्चे बड़े बनकर आदेश दे रहे होते हैं।

धीरे-धीरे दिन भर घर में उल्टा-पुल्टा हाल चलता रहता है। भाई जान को फ़िल्म जाने से रोका जाता है, अब्बा को समय पर दफ़्तर जाने का आदेश मिलता है, और आपा के कपड़ों तक पर टिप्पणी की जाती है। आरिफ़ और सलीम हर उस नियम को लागू करते हैं जो कभी उन पर लागू किया जाता था। इस दौरान घर के बड़े लोग मज़बूरी में वही सब सहते हैं जो वे रोज़ बच्चों से करवाते हैं।

लेकिन जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ता है, आरिफ़ और सलीम को समझ आने लगता है कि आदेश देना उतना आसान नहीं जितना वे सोचते थे। हर किसी की अपनी पसंद, अपनी आदतें और अपनी परेशानियाँ होती हैं। लगातार नियम बनाना और सबको नियंत्रित करना थका देने वाला काम है। उन्हें पहली बार एहसास होता है कि बड़े होना केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है।

रात होते-होते घर का माहौल फिर बदल जाता है। अगले दिन सुबह जब सभी अपनी पुरानी भूमिका में लौटते हैं, तो एक अजीब-सी शांति और समझदारी घर में आ जाती है। अम्मी, अब्बा, आपा और दादी अपने बच्चों को पहले से ज्यादा समझने लगते हैं, और आरिफ़-सलीम भी बड़े लोगों की मुश्किलों को महसूस करने लगते हैं।

कहानी के अंत में यह साफ हो जाता है कि एक दिन की यह “बादशाहत” सिर्फ एक खेल नहीं थी, बल्कि एक सीख थी—कि हर रिश्ते में समझ, संतुलन और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान जरूरी होता है।

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बालकथाएँ बच्चों के लिए रोचक, सरल और प्रेरणादायक कहानियाँ होती हैं। ये उनकी कल्पनाशक्ति, नैतिक मूल्यों, भाषा कौशल और रचनात्मक सोच को विकसित करती हैं। मनोरंजन के साथ-साथ जीवन की महत्वपूर्ण सीख भी प्रदान करती हैं।

बालकथाएँ 
प्रस्तुति: Saying Central Team

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