भैंस के बदले मुर्ग़ा

भैंस के बदले मुर्ग़ा : लोक-कथा

7
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

भैंस के बदले मुर्ग़ा : लोक-कथा

बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव में पाटिल नाम का एक गरीब किसान अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था। उनका घर मिट्टी का बना हुआ था और जीवन अत्यंत कठिनाइयों में गुजरता था। उनके पास खेती के लिए बहुत कम साधन थे और आमदनी का कोई स्थायी जरिया भी नहीं था। फिर भी पति-पत्नी एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। गरीबी ने उनके जीवन को कठिन जरूर बना दिया था, लेकिन उनके मन में शिकायत या लालच नहीं था।

उनके पास केवल दो भैंसें थीं, जिनके दूध से किसी तरह घर का खर्च चलता था। लेकिन समय बीतने के साथ भैंसें बूढ़ी होने लगीं और परिवार की जरूरतें बढ़ती गईं। एक दिन पाटिल की पत्नी ने चिंता भरे स्वर में कहा, “अगर हम एक भैंस बेच दें तो कुछ पैसे हाथ में आ जाएँगे। शायद उससे कुछ दिनों तक घर का खर्च चल सके।”

पत्नी की बात सुनकर पाटिल भी सोच में पड़ गया। उसे अपनी भैंसों से बहुत लगाव था, लेकिन मजबूरी इंसान से सब कुछ करवा देती है। अगले दिन सुबह-सुबह वह एक भैंस को लेकर पास के गाँव की हाट के लिए निकल पड़ा। रास्ता लंबा था और धूप भी तेज हो रही थी। चलते-चलते उसकी मुलाकात एक आदमी से हुई जो अपना घोड़ा बेचने के लिए उसी हाट में जा रहा था।

दोनों ने बातचीत शुरू की। जब उस आदमी को पता चला कि पाटिल अपनी भैंस बेचने जा रहा है, तो उसने भैंस को गौर से देखा और बोला, “इतनी दूर हाट तक जाने की क्या जरूरत है? तुम मुझे अपनी भैंस दे दो और बदले में मेरा घोड़ा ले लो।”

पाटिल ने कुछ देर सोचा। उसे लगा कि घोड़े की देखभाल आसान होगी और बच्चे भी उस पर बैठकर खुश होंगे। उसे यह सौदा ठीक लगा और उसने भैंस के बदले घोड़ा ले लिया। वह खुशी-खुशी घोड़े पर बैठकर आगे बढ़ने लगा, लेकिन थोड़ी ही दूर जाकर उसे एहसास हुआ कि घोड़ा अंधा है।

अब उसे पछतावा होने लगा, लेकिन जो हो चुका था उसे बदला नहीं जा सकता था। वह सोच ही रहा था कि आगे उसे एक आदमी मिला जिसके पास एक गाय थी। उस आदमी ने पूछा, “भाई, यह घोड़ा कहाँ ले जा रहे हो?” पाटिल ने पूरी बात बता दी कि कैसे उसने भैंस के बदले घोड़ा लिया और अब पता चला कि घोड़ा अंधा है।

वह आदमी मुस्कराया और बोला, “मेरी गाय बहुत सीधी है और खूब दूध देती है। यदि चाहो तो यह गाय ले लो और मुझे अपना घोड़ा दे दो।” पाटिल को गाय देखकर अच्छा लगा। उसे लगा कि गाय का दूध बच्चों के लिए उपयोगी होगा और उसकी देखभाल भी आसान होगी। उसने तुरंत घोड़े के बदले गाय ले ली। लेकिन थोड़ी देर बाद चलते समय उसे पता चला कि गाय एक पैर से लंगड़ी है। अब उसका मन और उदास हो गया। उसे लगने लगा कि शायद आज उसका भाग्य ही खराब है। फिर भी वह चुपचाप आगे बढ़ता रहा।

कुछ दूर जाने पर उसे एक आदमी मिला जो बकरी लिए जा रहा था। उसने भी पाटिल से बातचीत की। जब उसे लंगड़ी गाय की बात पता चली, तो उसने कहा, “अगर तुम चाहो तो अपनी गाय मुझे दे दो और बदले में मेरी बकरी ले लो।” पाटिल ने सोचा कि बकरी छोटी होती है और उसकी देखभाल भी आसान होगी। उसने खुशी-खुशी सौदा कर लिया।

लेकिन जैसे ही उसने बकरी को आगे बढ़ाया, उसे पता चला कि बकरी बीमार है। अब तक पाटिल पूरी तरह निराश हो चुका था। उसे लग रहा था कि वह हर बार ठगा जा रहा है। लेकिन अब वापस लौटने का कोई फायदा नहीं था, इसलिए वह बकरी को लेकर हाट पहुँच गया।

हाट में काफी भीड़ थी। लोग खरीद-बिक्री में लगे हुए थे। वहीं उसकी नजर एक आदमी पर पड़ी जिसके हाथ में एक सुंदर मुर्गा था। वह मुर्गा लाल कलगी वाला और देखने में बहुत आकर्षक था। पाटिल ने सोचा कि शायद मुर्गा घर के काम आ जाए। उसने उस आदमी से बात की और बकरी के बदले मुर्गा ले लिया।

अब उसके पास न भैंस थी, न घोड़ा, न गाय और न बकरी। केवल एक मुर्गा बचा था। इतने सौदों के बाद दोपहर हो चुकी थी और पाटिल को जोर की भूख लगने लगी। लेकिन उसकी जेब में एक पैसा भी नहीं था। मजबूर होकर उसने मुर्गा एक रुपए में बेच दिया और उस पैसे से थोड़ा खाना खरीद लिया।

वह पास के तालाब पर गया, हाथ-मुँह धोया और एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगा। उसने पहला कौर तोड़ा ही था कि तभी फटे-पुराने कपड़े पहने एक बूढ़ा भिखारी वहाँ आ पहुँचा। उसकी आँखों में भूख और बेबसी साफ दिखाई दे रही थी। उसने काँपती आवाज़ में कहा, “बेटा, कई दिनों से मैंने कुछ नहीं खाया।

यदि एक रोटी मिल जाए तो बड़ी दया होगी।” यह सुनकर पाटिल का दिल पिघल गया। उसने सोचा कि वह खुद तो किसी तरह घर जाकर खा लेगा, लेकिन यह बूढ़ा शायद कई दिनों से भूखा है। उसने बिना एक पल सोचे अपनी पूरी पत्तल उस भिखारी को दे दी। भिखारी ने कृतज्ञता से उसकी ओर देखा और खाना खाने लगा। उधर पाटिल खाली पेट ही घर लौट आया।

घर पहुँचने पर उसकी पत्नी बेसब्री से उसका इंतजार कर रही थी। उसने मुस्कराकर पूछा, “क्या हुआ? भैंस कितने में बिकी? और तुम इतने उदास क्यों हो?” पाटिल थका हुआ था। उसने पहले पानी माँगा। पत्नी ने तुरंत पानी लाकर दिया। पानी पीने के बाद उसने धीरे-धीरे सारी कहानी सुनानी शुरू की।

उसने बताया कि कैसे उसने भैंस के बदले घोड़ा लिया, फिर घोड़े के बदले गाय, गाय के बदले बकरी और अंत में बकरी के बदले मुर्गा लिया। हर बार उसकी पत्नी बड़े धैर्य और खुशी से उसकी बात सुनती रही। वह हर चीज़ में अच्छाई खोज लेती थी। जब उसने कहा कि उसने मुर्गा बेचकर खाना खरीदा, तब भी पत्नी ने कहा, “अच्छा किया। भूखे पेट कैसे रहते?”

अंत में जब पाटिल ने बताया कि उसने अपना खाना भी एक भूखे भिखारी को दे दिया, तब पत्नी की आँखों में गर्व भर आया। उसने प्रेम से कहा, “तुमने बहुत अच्छा किया। भूखे को खाना खिलाने से बड़ा पुण्य कोई नहीं। चलो, हाथ-मुँह धो लो, मैं तुम्हारे लिए खाना लाती हूँ।” पत्नी के चेहरे पर न शिकायत थी, न गुस्सा। उसके मन में केवल अपने पति के लिए प्रेम और सम्मान था। यह देखकर पाटिल की आँखें नम हो गईं। उसने सोचा कि संसार में उससे अधिक भाग्यशाली शायद कोई नहीं, जिसे इतनी समझदार और दयालु पत्नी मिली हो।

अगली सुबह जब पाटिल नींद से उठा और झोपड़ी का दरवाजा खोला, तो उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। उसके घर के सामने एक सुंदर और तंदुरुस्त भैंस खड़ी थी। पास ही एक स्वस्थ घोड़ा था जिसकी दोनों आँखें सही थीं। एक अच्छी गाय, मोटी-ताजी बकरी और लाल कलगी वाला शानदार मुर्गा भी वहाँ मौजूद थे। इतना ही नहीं, एक पत्तल पर चमचमाता हुआ एक रुपया भी रखा था।

पाटिल को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने तुरंत पत्नी को आवाज दी। पत्नी बाहर आई और यह दृश्य देखकर स्तब्ध रहगई। कुछ देर बाद उसने श्रद्धा से कहा, “यह सब कौन छोड़ गया? कहीं वह भिखारी तो नहीं जिसे तुमने खाना खिलाया था?”
पाटिल की आँखों में आँसू आ गए।

उसने आकाश की ओर देखते हुए कहा, “हाँ, वही भिखारी था। वह कोई साधारण इंसान नहीं था। जरूर भगवान ही थे, जो हमारी परीक्षा लेने आए थे।” उस दिन पति-पत्नी को यह समझ आ गया कि सच्ची दया और निस्वार्थ सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान किसी न किसी रूप में अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं और सही समय आने पर उनका फल भी अवश्य देते हैं।

ध्यान से सुनने का परिणाम

बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव में एक देहाती आदमी अपनी पत्नी के साथ रहता था। वह आदमी स्वभाव से सीधा तो था, लेकिन बिल्कुल असभ्य और अनपढ़ था। उसे न कला में रुचि थी, न संगीत में और न ही धर्म-कथाओं में। गाँव के लोग जब भजन-कीर्तन, कथा या किसी धार्मिक आयोजन में भाग लेते, तब वह उनका मजाक उड़ाता और कहता कि इन सब बातों से पेट नहीं भरता। उसका अधिकतर समय खेतों, चौपाल या यूँ ही इधर-उधर घूमने में बीतता था।

इसके विपरीत उसकी पत्नी बहुत संस्कारी और समझदार स्त्री थी। उसे धर्म, साहित्य और सत्संग में गहरी आस्था थी। वह चाहती थी कि उसका पति भी थोड़ा सभ्य बने, जीवन के गहरे अर्थ समझे और अच्छे विचारों की ओर आकर्षित हो। लेकिन हर बार उसकी कोशिश व्यर्थ चली जाती।

पत्नी अक्सर पति को समझाती कि मनुष्य केवल खाने-पीने और मेहनत करने के लिए नहीं जन्मा है। जीवन में ज्ञान, संस्कार और भक्ति का भी महत्व होता है। वह चाहती थी कि उसका पति धार्मिक कथाएँ सुने ताकि उसके भीतर भी अच्छे विचार जागें। लेकिन पति को यह सब बेहद नीरस लगता था। वह कहता, “ये सब पंडितों की बातें हैं, मेरे बस की नहीं।” पत्नी उसके इस व्यवहार से दुखी तो होती, लेकिन उसने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। वह जानती थी कि एक दिन जरूर उसके पति का मन बदलेगा।

एक दिन गाँव में एक प्रसिद्ध रामायणी आया। वह प्रतिदिन शाम को रामायण का पाठ करता और बीच-बीच में मधुर स्वर में चौपाइयाँ और दोहे भी गाता। उसकी वाणी इतनी प्रभावशाली थी कि पूरे गाँव के लोग कथा सुनने के लिए उमड़ पड़ते। मंदिर का आँगन हर शाम लोगों से भर जाता। स्त्रियाँ, बच्चे, बूढ़े और जवान सभी श्रद्धा से बैठकर कथा सुनते। गाँव का वातावरण भक्ति और आनंद से भर गया था। यह देखकर देहाती की पत्नी के मन में आशा जागी कि शायद इस अवसर पर वह अपने पति को भी कथा सुनने भेज सके।

उसने कई दिनों तक पति को मनाया। कभी प्यार से समझाती, कभी झुंझलाकर डाँटती और कभी उसे शर्म दिलाती कि पूरे गाँव के लोग कथा सुनने जाते हैं, केवल वही ऐसा है जिसे धर्म-कर्म से कोई मतलब नहीं। पति हर बार टालने की कोशिश करता। अंत में पत्नी की जिद और प्रेम के आगे उसे झुकना पड़ा।

उसने सोचा कि एक रात जाकर बैठ आने में क्या हर्ज है। उस शाम वह अनमने मन से कथा स्थल पर पहुँचा और सबसे पीछे जाकर बैठ गया। शुरुआत में उसने थोड़ी देर कथा सुनी, लेकिन जल्द ही उसकी आँखें भारी होने लगीं। कुछ ही देर में वह गहरी नींद में सो गया। पूरी रात कथा चलती रही और वह खर्राटे भरता रहा।

सुबह जब उस दिन का पाठ समाप्त हुआ, तो परंपरा के अनुसार प्रसाद बाँटा गया। किसी ने सोते हुए देहाती के मुँह में बतासे और मखाने डाल दिए। मिठास का स्वाद मिलते ही उसकी आँख खुल गई। उसे लगा कि यही शायद रामायण का आनंद है। वह उठकर घर चला आया। उसकी पत्नी बेसब्री से उसका इंतजार कर रही थी। उसने उत्सुकता से पूछा, “कहो, रामायण का पाठ कैसा लगा?” देहाती ने आलस से अंगड़ाई लेते हुए कहा, “बहुत मीठा!” पत्नी यह सुनकर खुशी से भर उठी। उसे लगा कि उसके पति के मन में कथा के प्रति रुचि पैदा हो रही है।

अगले दिन पत्नी ने उसे फिर कथा सुनने भेजा। इस बार वह आगे जाकर दीवार के सहारे बैठ गया। लेकिन उसकी आदत तो वही थी। थोड़ी ही देर में फिर उसे नींद आ गई। उस दिन कथा सुनने वालों की भीड़ बहुत अधिक थी। एक छोटा बच्चा जगह न मिलने के कारण उसके कंधे पर चढ़कर बैठ गया।

बच्चा पूरी रात बड़े ध्यान से कथा सुनता रहा और देहाती नींद में उसका भार उठाए बैठा रहा। सुबह होते-होते उसकी गर्दन, कंधे और पीठ दर्द से अकड़ गए। जब वह घर पहुँचा तो पत्नी ने फिर पूछा, “आज कैसा लगा?” उसने कराहते हुए जवाब दिया, “सुबह तक तो बहुत बोझिल हो गया था।” पत्नी ने उसकी बात का अलग ही अर्थ निकाल लिया। उसे लगा कि पति अब रामायण की गंभीरता और उसके गूढ़ अर्थों को महसूस करने लगा है।

तीसरे दिन भी पत्नी ने उसे कथा सुनने भेजा। इस बार वह भीड़ से हटकर एक कोने में बैठ गया ताकि आराम से सो सके। कुछ ही देर बाद वह जमीन पर लेट गया और गहरी नींद में डूब गया। आधी रात के बाद एक आवारा कुत्ता वहाँ आ पहुँचा। उसने सोते हुए देहाती का खुला मुँह देखा और उसी में पेशाब करके चला गया।

थोड़ी देर बाद देहाती की नींद खुली। उसके मुँह का स्वाद बेहद खराब और खारा हो चुका था। वह गुस्से और घृणा से भरा घर पहुँचा। पत्नी ने रोज की तरह पूछा, “आज रामायण कैसी लगी?” इस बार उसने मुँह बनाकर कहा, “बहुत खराब! बिल्कुल खारी!” पत्नी तुरंत समझ गई कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। उसने पति से सच्चाई जानने की ठान ली।

बहुत पूछने पर आखिरकार देहाती ने सारी बात बता दी कि वह तीनों दिन कथा सुनने नहीं, बल्कि वहाँ जाकर सोता रहा था। यह सुनकर पत्नी को बहुत दुख हुआ। उसने तय किया कि अब वह खुद पति के साथ जाएगी और उसे सोने नहीं देगी। चौथे दिन शाम को वह पति को साथ लेकर कथा स्थल पहुँची। उसने उसे सबसे आगे बिठाया और सख्ती से कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, इस बार वह सोएगा नहीं। पत्नी खुद उसके पास बैठ गई ताकि वह जागता रहे। मजबूरी में देहाती ने ध्यान से कथा सुननी शुरू की।

उस दिन रामायण का अत्यंत रोचक प्रसंग चल रहा था। रामायणी बड़े भावपूर्ण स्वर में सुना रहा था कि कैसे हनुमान समुद्र लाँघकर सीता की खोज में लंका जा रहे हैं। कथा इतनी जीवंत थी कि देहाती पहली बार पूरी तरह उसमें डूब गया। उसे लगने लगा जैसे वह स्वयं उस घटना को अपनी आँखों से देख रहा हो। तभी कथा में आया कि समुद्र पार करते समय राम की अंगूठी हनुमान के हाथ से छूटकर समुद्र में गिर गई। हनुमान चिंतित हो उठे कि अब वे सीता को क्या प्रमाण देंगे कि वे सचमुच रामदूत हैं।

देहाती यह सुनकर बेचैन हो गया। उसे ऐसा लगा जैसे हनुमान सचमुच उसके सामने खड़े हों और सहायता माँग रहे हों। अचानक वह उठ खड़ा हुआ और जोर से बोला, “हनुमान जी, आप चिंता मत करो! मैं अभी अंगूठी निकालकर लाता हूँ।” इतना कहकर वह पास के तालाब की ओर भागा और उसमें छलांग लगा दी।

कुछ देर बाद वह पानी में हाथ मारता हुआ बाहर निकला। संयोग से उसके हाथ में एक चमकती हुई अंगूठी थी, जो शायद किसी यात्री की खोई हुई थी। वह दौड़ता हुआ कथा स्थल पर आया और श्रद्धा से वह अंगूठी रामायणी के सामने रख दी।

यह दृश्य देखकर पूरा गाँव स्तब्ध रह गया। लोगों को लगा कि इस आदमी पर अवश्य ही राम और हनुमान की विशेष कृपा है। जो व्यक्ति पहले मूर्ख और असभ्य माना जाता था, वही अब सबकी नजरों में अद्भुत और श्रद्धेय बन गया।

लोग उसके चरण छूने लगे और उसे समझदार तथा भक्तिमान कहने लगे। स्वयं देहाती को भी पहली बार महसूस हुआ कि ध्यानपूर्वक कथा सुनने में कितनी शक्ति होती है। उसके भीतर एक नया आत्मविश्वास जाग उठा और धीरे-धीरे उसका स्वभाव भी बदलने लगा।

उस दिन के बाद गाँव में यह बात प्रसिद्ध हो गई कि यदि कोई मन लगाकर रामायण सुने, तो उसके भीतर भी भक्ति, समझ और साहस जाग सकता है। यह कथा लोगों को यह सिखाने लगी कि सच्चे मन और पूरे ध्यान से सुनी गई अच्छी बातें मनुष्य का जीवन बदल सकती हैं।

हांची

बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव में एक बुढ़िया अपने दो बच्चों के साथ रहती थी। उसका एक बेटा था और एक बेटी। बेटी असाधारण रूप से सुंदर थी। उसके लंबे, चमकदार बाल सोने की तरह दमकते थे। जब धूप उन बालों पर पड़ती तो ऐसा लगता जैसे किसी ने पिघला हुआ सोना उसके सिर पर उँडेल दिया हो। बचपन में उसके भाई ने कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे दोनों साथ खेलते-कूदते बड़े हुए थे।

लेकिन जैसे-जैसे वे जवान हुए, लड़के की नज़र अपनी बहन की सुंदरता पर टिक गई। उसके मन में गलत भावनाएँ पैदा होने लगीं। वह अपनी ही बहन के प्रति आसक्त हो गया। एक दिन वह अपनी माँ के पास गया और बोला कि वह अपनी बहन से विवाह करना चाहता है। यह सुनते ही माँ के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे लगा जैसे कोई भयंकर विपत्ति उनके घर पर टूट पड़ी हो।

माँ समझ गई कि यदि उसने तुरंत कोई उपाय नहीं किया, तो उसकी बेटी का जीवन नष्ट हो जाएगा। लेकिन उसने अपने भय को चेहरे पर प्रकट नहीं होने दिया। उसने बेटे को बहाना बनाकर शहर भेज दिया ताकि वह विवाह के लिए सामान खरीद लाए। बेटे के जाते ही वह बेटी के पास पहुँची। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने काँपती आवाज़ में कहा, “बेटी, अब तुम्हें यहाँ से जाना होगा। तुम्हारी सुंदरता ही तुम्हारे लिए अभिशाप बन गई है। मैं तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकती।

दुनिया के लोग ही नहीं, तुम्हारा अपना भाई भी तुम्हारे पीछे पागल हो चुका है।” बेटी यह सुनकर स्तब्ध रह गई। माँ उसे लेकर तुरंत कुम्हार के पास गई और सोने का एक बर्तन देकर बेटी के लिए मिट्टी का एक भद्दा मुखौटा बनवाया। वह मुखौटा उसके सुंदर चेहरे और सुनहरे बालों को पूरी तरह ढँक देता था।

उसी रात माँ ने बेटी को थोड़े चावल, रोटियाँ और कुछ खाने का सामान बाँधकर दिया। विदा करते समय उसने बेटी को सीने से लगाकर कहा, “जब तक तुम्हारे अच्छे दिन न आ जाएँ, यह मुखौटा मत उतारना।” बेटी रोती हुई अंधेरी रात में घर छोड़कर निकल गई। माँ अपनी बेटी के दुख को सह नहीं पाई। अगले दिन उसने ज़हर खाकर प्राण त्याग दिए। जब बेटा शहर से लौटा तो उसने माँ को मृत पाया और बहन को गायब। वह पागलों की तरह बहन को खोजने लगा, लेकिन उसे कहीं कुछ पता नहीं चला। धीरे-धीरे वह स्वयं पागल होकर भटकने लगा।

उधर लड़की कई दिनों तक जंगलों, रास्तों और गाँवों में भटकती रही। धीरे-धीरे उसकी पोटली का खाना खत्म हो गया। मिट्टी के उस मुखौटे के कारण उसका चेहरा किसी पुराने खपरैल जैसा दिखता था। इसी कारण उसने अपना नाम बदलकर “हांची” रख लिया। भूख और थकान से बेहाल होकर वह कभी नदी किनारे बैठती, कभी किसी पेड़ के नीचे रात बिताती।

कई दिनों बाद उसकी मुलाकात एक दयालु बुढ़िया से हुई। बुढ़िया ने उसे अपने घर में शरण दी और खाना खिलाया। कुछ समय बाद बुढ़िया ने उसे बताया कि पास के नगर में एक अमीर साहूकार के घर नौकरानी की आवश्यकता है। हांची वहाँ काम करने चली गई।

हांची बेहद मेहनती और कुशल थी। वह इतने स्वादिष्ट व्यंजन बनाती कि खाने वाला उंगलियाँ चाटता रह जाए। विशेष रूप से चावल से बने मीठे पकवान बनाने में उसका कोई मुकाबला नहीं था। धीरे-धीरे साहूकार के घर के सभी लोग उसकी मेहनत और विनम्रता से प्रभावित हो गए।

लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा वही भद्दा मिट्टी का मुखौटा रहता, इसलिए कोई उसकी वास्तविक सुंदरता के बारे में नहीं जानता था। एक दिन साहूकार ने अपने बगीचे में एक बड़ा भोज रखा। घर के सभी लोग वहाँ चले गए। केवल हांची और साहूकार का बेटा घर पर थे। हांची ने सोचा कि यह अच्छा अवसर है। उसने पानी गर्म किया, मुखौटा उतारा और अपने लंबे सुनहरे बाल खोल दिए। फिर वह स्नान करने लगी।

इसी बीच साहूकार का बेटा घर लौट आया। उसने हांची को आवाज़ दी, लेकिन स्नानघर के भीतर होने के कारण हांची ने कुछ नहीं सुना। वह उसे ढूँढते-ढूँढते स्नानघर तक पहुँच गया। जैसे ही उसने भीतर झाँका, वह स्तब्ध रह गया। उसके सामने कोई साधारण नौकरानी नहीं, बल्कि अपूर्व सौंदर्य की देवी खड़ी थी।

उसके सुनहरे बाल चमक रहे थे और उसका चेहरा किसी राजकुमारी जैसा लग रहा था। साहूकार का बेटा उसी क्षण उस पर मोहित हो गया। उसने तय कर लिया कि वह हांची से ही विवाह करेगा।

जब उसने अपनी माँ को यह बात बताई तो वह बहुत नाराज हुई। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका बेटा एक काली-कलूटी नौकरानी से विवाह करना चाहता है। लेकिन बेटे ने हठ नहीं छोड़ा।

अंत में वह माँ को हांची के पास ले गया और अचानक उसका मुखौटा उतार दिया। हांची की असली सुंदरता देखकर माँ की आँखें फटी रह गईं। जब उसने हांची की दुखभरी कहानी सुनी तो उसका हृदय द्रवित हो उठा। जल्द ही शुभ मुहूर्त निकालकर साहूकार के बेटे और हांची का विवाह कर दिया गया। विवाह के बाद दोनों बहुत सुखी रहने लगे।

लेकिन उनकी खुशी को एक दुष्ट तांत्रिक की नज़र लग गई। वह तांत्रिक गुरुस्वामी कहलाता था और साहूकार का खास सलाहकार था। वह जादू-टोने और तंत्र-मंत्र का ज्ञाता माना जाता था। बहुत समय से उसकी नज़र हांची पर थी। वह किसी भी तरह उसे प्राप्त करना चाहता था।

एक दिन उसने हांची की सास से कहा कि यदि वह हांची को उसके पास भेजे तो वह ऐसा अनुष्ठान करेगा जिससे जल्दी ही उसके घर संतान का जन्म होगा। सास खुशी-खुशी तैयार हो गई। गुरुस्वामी ने मंत्र पढ़कर केले, बादाम और सुपारी तैयार की, ताकि उन्हें खाने के बाद हांची उसके वश में आ जाए।

लेकिन हांची बहुत चतुर थी। उसने तांत्रिक की नीयत पहले ही भाँप ली थी। उसने गुरुस्वामी द्वारा दिए गए मंत्रबिद्ध फल और मेवे चुपके से फेंक दिए और अपने साथ लाए हुए फल खा लिए। संयोग से वे मंत्रबिद्ध केले एक भैंस ने खा लिए। रात को वही भैंस गुरुस्वामी के कमरे में पहुँच गई और उस पर टूट पड़ी। गुरुस्वामी बुरी तरह घायल हो गया। इसके बाद भी उसने हार नहीं मानी। उसने फिर बादाम और सुपारी के जरिए जादू करने की कोशिश की, लेकिन हर बार हांची अपनी बुद्धिमानी से बच निकलती और गुरुस्वामी को अपमान और चोट ही मिलती।

आखिरकार गुरुस्वामी ने एक भयानक षड्यंत्र रचा। उसने साहूकार और उसके परिवार को विश्वास दिला दिया कि हांची का किसी पराए पुरुष से संबंध है। उसने उसके कमरे में नकली सबूत रख दिए—पुरुषों के कपड़े, बीड़ी के टोंटे और पान के अवशेष। परिवार वालों ने बिना सच्चाई जाने हांची पर विश्वासघात का आरोप लगा दिया। उसकी लाख सफाई देने पर भी किसी ने उसकी बात नहीं मानी। उसे पीटा गया, भूखा रखा गया और अंत में एक संदूक में बंद करके गुरुस्वामी को सौंप दिया गया ताकि वह उसे नदी में फिंकवा दे।

गुरुस्वामी उस संदूक को शहर के बाहर रहने वाली एक बुढ़िया के घर ले गया। संयोग से वही बुढ़िया हांची की मुँहबोली माँ थी। जब उसने संदूक में से हांची की आवाज़ सुनी तो उसे बाहर निकाल लिया। हांची ने उसे सारी सच्चाई बताई। बुढ़िया ने तुरंत एक योजना बनाई। उसने एक पागल कुत्ते को पकड़कर संदूक में बंद कर दिया। जब रात को गुरुस्वामी खुश होकर संदूक खोलने आया तो पागल कुत्ता उस पर टूट पड़ा। वह उसे बुरी तरह काटने लगा। पड़ोसी दौड़े आए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। गुरुस्वामी की वहीं दर्दनाक मृत्यु हो गई।

कुछ समय बाद बुढ़िया ने साहूकार और उसके परिवार को खाने पर बुलाया। उसने इतने स्वादिष्ट चावल के व्यंजन परोसे कि सबको हांची की याद आ गई। जब उन्होंने पूछा कि यह खाना किसने बनाया है, तब बुढ़िया हांची को उनके सामने ले आई। उसे जीवित देखकर सब दंग रह गए। बुढ़िया ने उन्हें पूरी सच्चाई बताई। साहूकार और उसके परिवार को अपनी गलती पर बहुत पछतावा हुआ। उन्होंने हांची से क्षमा माँगी और उसे सम्मानपूर्वक वापस घर ले गए।

उस दिन के बाद हांची के जीवन से सारे दुख दूर हो गए। उसे वह सम्मान, प्रेम और सुख मिला जिसकी वह सच्ची हकदार थी। उसकी बुद्धिमानी, धैर्य और सच्चाई ने अंत में बुराई पर विजय प्राप्त की।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

लोक कथाएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा हैं। इनमें जीवन के अनुभव, नैतिक शिक्षा, लोक परंपराएँ और मनोरंजन का सुंदर समन्वय मिलता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली ये कहानियाँ समाज की संस्कृति और मूल्यों को जीवंत बनाए रखती हैं।

लोक कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES