लोक-कथा : आधे पैसे पर कैसे गुज़ारा करें
बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव में एक गरीब बुढ़िया अपनी इकलौती बेटी भारो के साथ रहती थी। बुढ़िया दिन-रात मेहनत करके जैसे-तैसे अपना घर चलाती थी। उसकी झोपड़ी छोटी थी, कपड़े साधारण थे और खाने के लिए भी कभी पूरा अन्न नहीं होता था, फिर भी वह ईमानदारी और संतोष से जीवन बिताती थी।
उसकी सबसे बड़ी चिंता उसकी बेटी भारो थी, जो अब विवाह योग्य हो चुकी थी। देखने में वह बहुत सुंदर थी, उसके नयन-नक्श आकर्षक थे, परंतु स्वभाव से वह अत्यंत आलसी थी। घर के किसी काम में उसका मन नहीं लगता था। सुबह देर तक सोना, दिन भर घूमना, सजना-संवरना और आराम करना ही उसका प्रिय काम था।
हर रोज़ बुढ़िया सुबह अंधेरे में उठ जाती। वह झाड़ू लगाती, पानी भरती, चौका-बर्तन करती और चूल्हा जलाकर खाना बनाती। इतने काम करने के बाद भी वह अपनी बेटी को प्यार से जगाती और कहती, “भारो उठो! सूरज छप्पर तक चढ़ आया है।” लेकिन भारो हर दिन एक ही जवाब देती, “सूरज छप्पर तक चढ़ आया है तो चढ़ने दो। मैं तो डोरे-कंघे के बिना ही चोटी गूँथ लूँगी और एक दमड़ी से ही गुज़ारा कर लूँगी।” इतना कहकर वह फिर से करवट बदल लेती। बुढ़िया उसकी बात सुनकर दुखी होती, पर बेटी होने के कारण उसे कुछ कह नहीं पाती थी।
एक दिन उसी रास्ते से राज्य का राजकुमार गुज़र रहा था। उसका घोड़ा बुढ़िया की झोपड़ी के सामने से निकला ही था कि उसे बुढ़िया की आवाज़ सुनाई दी। उसने रुककर सुना कि बुढ़िया अपनी बेटी को उठा रही है और जवाब में भारो वही बात कह रही है कि वह एक दमड़ी में भी गुज़ारा कर सकती है। यह बात सुनकर राजकुमार के मन में कौतूहल जागा।
उसने सोचा कि यह कैसी लड़की है जो इतनी निर्धन होकर भी इतनी बड़ी बात कहती है। उसे यह जानने की इच्छा हुई कि क्या सचमुच यह लड़की इतनी समझदार और साहसी है या केवल घमंड में ऐसी बातें करती है। उसी समय उसने निश्चय कर लिया कि वह उसी लड़की से विवाह करेगा और उसकी परीक्षा लेगा।
राजकुमार जानता था कि सीधे जाकर किसी गरीब लड़की से विवाह की इच्छा जताना आसान नहीं होगा। इसलिए उसने एक योजना बनाई। वह महल के अस्तबल में जाकर छिप गया। पूरे महल में जब राजकुमार दिखाई नहीं दिया तो हड़कंप मच गया। सैनिक, दास-दासियाँ और मंत्री उसे ढूँढने लगे।
शाम के समय कुछ दासियाँ घोड़ों को चारा देने अस्तबल में आईं। राजकुमार ने छिपकर देखा कि वे घोड़ों के लिए लाए गए चने स्वयं खा रही थीं और घोड़ों को केवल छिलके डाल रही थीं। यह देखकर उसे बहुत क्रोध आया। वह तुरंत बाहर निकल आया और उन्हें डाँटने लगा। दासियाँ पहले तो डर गईं, फिर हँसते हुए राजा को खबर देने भागीं कि राजकुमार मिल गया है।
राजा अपने बेटे को लेकर बहुत चिंतित था। जब उसे पता चला कि राजकुमार अस्तबल में है, तो वह तुरंत वहाँ पहुँचा। उसने बेटे से प्रेम से पूछा कि क्या किसी ने उसका अपमान किया है या कोई कष्ट दिया है। राजकुमार ने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है। उसने शांत स्वर में कहा कि वह केवल एक गरीब बुढ़िया की बेटी भारो से विवाह करना चाहता है।
यह सुनकर राजा हैरान रह गया। उसने बहुत समझाया कि राजकुमार को किसी राजघराने की लड़की से विवाह करना चाहिए, लेकिन राजकुमार अपने निर्णय पर अडिग रहा। अंततः राजा को उसकी बात माननी पड़ी।
राजा ने बुढ़िया को महल में बुलवाया। अचानक राजदरबार का बुलावा आने पर बुढ़िया घबरा गई। उसे लगा कि शायद उससे कोई गलती हो गई है। काँपते हुए वह महल पहुँची। राजा ने उसे आदर से बैठाया और कहा कि वह अपनी बेटी का विवाह राजकुमार से करना चाहता है। यह सुनकर बुढ़िया अवाक रह गई।
उसे अपनी किस्मत पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उसने विनम्रता से कहा कि वह एक गरीब स्त्री है और उसकी बेटी में कोई विशेष गुण नहीं है। लेकिन राजा ने बताया कि यह राजकुमार की इच्छा है। जब बुढ़िया घर लौटी और उसने भारो को सारी बात बताई, तो भारो खुशी से झूम उठी। उसने तुरंत माँ को वापस जाकर विवाह के लिए हाँ कहने को कहा।
कुछ ही दिनों में बड़े धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ। पूरे राज्य में उत्सव जैसा माहौल था। गरीब बुढ़िया की बेटी अब राजमहल की बहू बन चुकी थी। विवाह के बाद कुछ समय तक सब सुखपूर्वक चलता रहा, पर एक दिन राजकुमार को भारो की कही हुई बात याद आई कि वह एक दमड़ी में भी गुज़ारा कर सकती है। उसने उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। उसने राजा से कहा कि वह व्यापार करने के लिए समुद्री यात्रा पर जाना चाहता है। राजा ने बहुत समझाया कि उसे राज्य संभालना चाहिए, लेकिन राजकुमार ने आग्रह किया और अंततः एक बड़ा जहाज़ तैयार कर दिया गया।
राजकुमार भारो को भी अपने साथ यात्रा पर ले गया। कई दिनों तक समुद्र में यात्रा करने के बाद वे एक दूर देश के किनारे पहुँचे। वहाँ पहुँचकर राजकुमार ने एक योजना बनाई। वह जहाज़ के सभी मल्लाहों और सेवकों को लेकर बहाने से किनारे चला गया और भारो को जहाज़ पर अकेला छोड़ दिया। जाते समय उसने चुपके से भारो की साड़ी के पल्लू में आधे पैसे का एक सिक्का बाँध दिया। उसका उद्देश्य यह देखना था कि क्या सचमुच भारो इतनी समझदार है कि इतने कम पैसे में अपना जीवन चला सके।
जब भारो ने जहाज़ पर खुद को अकेला पाया तो वह घबरा गई। उसने खाने के लिए पूरा जहाज़ छान मारा, लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला। भूख से परेशान होकर वह रोने लगी। तभी उसे अपने पल्लू में बंधा आधे पैसे का सिक्का मिला। उसने सोचा कि शायद इसी के सहारे उसे अपना जीवन बचाना होगा। उसी समय उसे एक बूढ़ा मछुआरा दिखाई दिया। भारो ने उसे पुकारा और आधा पैसा देकर थोड़े भुने हुए चने और चावल लाने को कहा। बूढ़ा मछुआरा दयालु था।
वह तुरंत सामान लेकर आया और भारो को दे गया।जैसे ही भारो खाने लगी, अचानक उसके हाथ से चने और चावल की पोटली समुद्र में गिर गई। वह दुखी होकर रोने लगी, लेकिन तभी उसने एक अद्भुत दृश्य देखा। सैकड़ों बड़ी-बड़ी मछलियाँ आईं और उन चनों-चावलों को खाने लगीं। कुछ देर बाद वे तट पर गईं और उनके मुँह से सोने की मोहरें निकलने लगीं। देखते ही देखते वहाँ मोहरों का ढेर लग गया। भारो आश्चर्यचकित रह गई। उसने सारी मोहरें इकट्ठा कीं और अपने जहाज़ पर ले आई। अब उसकी किस्मत बदल चुकी थी।
अगले दिन बूढ़ा मछुआरा फिर आया। भारो ने उसे एक मोहर देकर स्वादिष्ट भोजन मँगवाया और उसकी सहायता के बदले इनाम भी दिया। धीरे-धीरे उसने तट पर जमीन खरीदी और एक भव्य महल बनवाना शुरू कर दिया। उसने पुरुषों का वेश धारण कर लिया ताकि लोग उसे पहचान न सकें। बूढ़ा मछुआरा उसका सबसे बड़ा सहायक बन गया। महीनों की मेहनत के बाद एक सुंदर और आलीशान महल तैयार हो गया। उस महल की भव्यता देखकर दूर-दूर के लोग चकित रह जाते थे।
उधर कई महीने बाद राजकुमार को भारो की चिंता हुई। वह उसे देखने वापस उसी स्थान पर आया। जब उसने पुराना जहाज़ खाली देखा तो उसे लगा कि भारो शायद मर चुकी है। तभी उसकी नजर समुद्र किनारे बने विशाल महल पर पड़ी। उत्सुकतावश वह मजदूर का भेष बनाकर वहाँ काम माँगने पहुँचा। भारो ने उसे तुरंत पहचान लिया, लेकिन स्वयं को प्रकट नहीं किया। उसने उसे महल में काम पर रख लिया और बड़े सम्मान से रहने और खाने की व्यवस्था की। राजकुमार उस दयालु मालिक के व्यवहार से प्रभावित हो गया।
कुछ दिनों बाद जब महल पूरी तरह सज गया, तब एक दिन भारो ने अपने स्त्री रूप में सुंदर वस्त्र और गहने पहनकर राजकुमार को अपने कक्ष में बुलाया। अपनी पत्नी को सामने देखकर राजकुमार स्तब्ध रह गया। तब भारो ने उसे पूरी कहानी सुनाई कि कैसे उसने आधे पैसे के सहारे अपना भाग्य बदल दिया। राजकुमार ने भी स्वीकार किया कि उसने उसकी परीक्षा लेने के लिए ही उसे अकेला छोड़ा था। वह यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ कि भारो ने अपनी बुद्धिमानी और साहस से सचमुच एक दमड़ी में गुज़ारा करके दिखा दिया।
इसके बाद दोनों ने वह महल बेच दिया और ढेर सारी मोहरों के साथ अपने राज्य लौट आए। राजा और प्रजा ने उनका भव्य स्वागत किया। भारो अब केवल एक आलसी लड़की नहीं रही थी, बल्कि बुद्धिमान, साहसी और कुशल स्त्री बन चुकी थी। राजकुमार और भारो ने जीवनभर प्रेम और सुख से अपना जीवन बिताया और उनकी कहानी पूरे राज्य में मिसाल बन गई कि बुद्धि और साहस से इंसान सबसे कठिन परिस्थितियों को भी बदल सकता है।
चीते का दत्तक पुत्र

बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव में एक बूढ़ा दंपति रहता था। वे इतने गरीब थे कि उनके पास अपनी खेती के लिए ज़मीन का एक छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं था। उनका जीवन जंगल पर ही निर्भर था। हर सुबह दोनों हाथों में टोकरी और कुदाल लेकर जंगल जाते, वहाँ से कंदमूल खोदकर लाते और उसी से अपना पेट भरते। कभी-कभी उन्हें खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिल जाता, तो कभी केवल पानी पीकर ही रात गुजारनी पड़ती।
गरीबी के बावजूद दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे, लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख यह था कि उनकी कोई संतान नहीं थी। बुढ़ापा धीरे-धीरे उनके शरीर को कमजोर कर रहा था और उन्हें हमेशा इस बात की चिंता सताती रहती थी कि उनके बाद उनका सहारा कौन बनेगा।
ईश्वर की लीला भी बड़ी विचित्र होती है। जब दोनों ने संतान की आशा लगभग छोड़ दी थी, तभी एक दिन उन्हें पता चला कि बुढ़िया गर्भवती है। यह समाचार सुनकर दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वे भविष्य के सपने देखने लगे। उन्हें लगने लगा कि अब उनका जीवन अकेलेपन में नहीं बीतेगा। नौ महीने तक उन्होंने जैसे-तैसे कठिनाइयों में दिन काटे। एक दिन हमेशा की तरह दोनों जंगल में कंदमूल खोदने गए हुए थे कि अचानक बुढ़िया को प्रसव पीड़ा होने लगी। जंगल के बीचोंबीच, पेड़ों और झाड़ियों के बीच, उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया।
बच्चे के जन्म के बाद बुढ़िया की आँखों में खुशी के आँसू आ गए, लेकिन उसी क्षण चिंता ने उसके मन को घेर लिया। उसने बूढ़े को पुकारकर कहा, “सुनते हो, बच्चा हुआ है। अब हम इसका पालन कैसे करेंगे? हमारे पास तो खुद खाने के लिए कुछ नहीं है।” बूढ़े ने दुखी होकर चारों ओर देखा।
जंगल के सूखे पत्तों और पत्थरों के अलावा वहाँ कुछ भी नहीं था। उसने भारी मन से कहा, “हम इतने गरीब हैं कि इसे दूध तक नहीं पिला सकते। न कपड़े हैं, न घर में अनाज का एक दाना। शायद भगवान ने इसके भाग्य में कुछ और लिखा है।” बहुत सोच-विचार के बाद दोनों ने काँपते दिल से निर्णय लिया कि वे बच्चे को वहीं छोड़ देंगे, इस आशा में कि शायद कोई दयालु जीव या इंसान उसकी रक्षा कर ले।
बच्चे को जंगल में अकेला छोड़कर बूढ़ा दंपति रोते हुए घर लौट गया। उधर नवजात शिशु भूख और डर से रो रहा था। उसकी रोने की आवाज़ जंगल में दूर तक गूँज रही थी। उसी समय एक चीता वहाँ से गुजरा। उसने बच्चे की आवाज़ सुनी और झाड़ियों के पास जाकर देखा। छोटे-से बच्चे को अकेला देखकर उसके भीतर करुणा जाग उठी। वह उसे अपने मुँह में बहुत सावधानी से उठाकर अपनी गुफा में ले गया। आश्चर्य की बात यह थी कि वह खूंखार चीता उस बच्चे को खाने के बजाय अपने बच्चे की तरह पालने लगा। वह उसके लिए फल, कंदमूल और दूसरे खाने की चीज़ें लाता और उसकी हर प्रकार से रक्षा करता।
समय बीतता गया और वह बालक बड़ा होने लगा। चीता उसे अपने बेटे की तरह प्यार करता था। जंगल के दूसरे जानवर भी उस लड़के को देखकर हैरान होते थे कि एक चीता किसी इंसानी बच्चे को इतने स्नेह से पाल सकता है। लड़का भी चीते को ही अपना पिता मानता था। वह उसकी बातों का आदर करता और उसके साथ जंगल में घूमता। धीरे-धीरे वह जवान हो गया। उसका शरीर बलवान और स्वभाव सरल था। उसे यह नहीं पता था कि वह वास्तव में इंसान है और उसका पालन-पोषण एक जंगली जानवर ने किया है।
एक दिन चीते के मन में विचार आया कि अब उसका बेटा बड़ा हो गया है और उसका विवाह कर देना चाहिए। उसने बड़े प्रेम से लड़के से कहा, “बेटे, अब तुम जवान हो गए हो। क्या तुम्हारे लिए एक लड़की लाऊँ?” लड़के ने सरलता से उत्तर दिया, “पिताजी, जैसा आप उचित समझें। यदि आप चाहते हैं कि मेरा विवाह हो जाए, तो मेरे लिए कोई अच्छी लड़की ले आइए।” यह सुनकर चीता बहुत प्रसन्न हुआ और तुरंत जंगल के रास्ते पर जाकर किसी लड़की की प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ समय बाद एक लड़की उधर से गुजरी। चीते ने उसे देखा और तुरंत पकड़कर अपने घर की ओर चल पड़ा। लेकिन रास्ते में उसकी जंगली प्रवृत्ति जाग उठी। वह खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाया और लड़की का आधा कान खा गया। जब वह लड़की को घर लाया और अपने बेटे को दिखाया, तो लड़का घबरा गया। उसने देखा कि लड़की का एक कान गायब है। वह वापस चीते के पास गया और बोला, “पिताजी, मुझे ऐसी लड़की नहीं चाहिए जिसका शरीर अधूरा हो।” चीता थोड़ा शर्मिंदा हुआ, लेकिन उसने बेटे की बात मान ली।
इसके बाद चीता कई बार लड़कियाँ पकड़कर लाया, लेकिन हर बार उसकी आदत उसके रास्ते में आ जाती। कभी वह किसी लड़की का हाथ खा जाता, कभी उसकी नाक, तो कभी कान। हर बार लड़का उसे देखकर मना कर देता। आखिर एक दिन उसने चीते से कहा, “पिताजी, यदि आप सच में मेरा विवाह करना चाहते हैं, तो इस बार पूरी और सुंदर लड़की लेकर आइए। उसे किसी तरह का नुकसान मत पहुँचाइए।”
बेटे की बात सुनकर चीते ने मन ही मन निश्चय किया कि इस बार वह बहुत सावधानी बरतेगा।
कुछ दिनों बाद चीता एक गाँव में पहुँचा जहाँ बड़े धूमधाम से शादी हो रही थी। ढोल-नगाड़ों की आवाज़ें गूँज रही थीं और मंडप में दूल्हा-दुल्हन फेरे ले रहे थे। अचानक चीते के वहाँ पहुँचते ही अफरा-तफरी मच गई।
सभी लोग डरकर भागने लगे। उसी अवसर का लाभ उठाकर चीता दुल्हन को उठाकर जंगल की ओर भाग गया। इस बार उसने पूरी सावधानी रखी और रास्ते में दुल्हन को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। वह उसे सुरक्षित अपने घर ले आया और बड़े गर्व से बेटे से कहा, “देखो बेटे, इस बार मैं तुम्हारे लिए बिल्कुल सही लड़की लाया हूँ।”
लड़के ने दुल्हन को देखा तो वह सचमुच सुंदर और स्वस्थ थी। उसने खुशी-खुशी उससे विवाह कर लिया। कुछ समय तक दोनों पति-पत्नी जंगल में बहुत सुख से रहने लगे। पत्नी भी धीरे-धीरे उस अनोखे परिवार के साथ सामंजस्य बैठाने लगी।
चीता उन्हें देखकर खुश होता और सोचता कि अब उसका परिवार पूरा हो गया है। लेकिन जंगली स्वभाव पूरी तरह कभी नहीं बदलता। एक दिन पत्नी सब्जी काट रही थी कि अचानक उसकी उँगली कट गई। खून बहने लगा। उसने जल्दी से पत्तियों से खून पोंछ दिया और उन्हें एक ओर फेंक दिया।
थोड़ी देर बाद चीता वहाँ आया। उसे खून की गंध महसूस हुई। वह उन पत्तियों के पास गया और उन्हें चाटने लगा। इंसानी खून का स्वाद उसके भीतर छिपे शिकारी स्वभाव को जगा गया। उसने मन ही मन सोचा, “यदि इनके खून का स्वाद इतना अच्छा है, तो इनके मांस का स्वाद कितना स्वादिष्ट होगा!” उसके मन में अपने ही बेटे और बहू को खाने का विचार आने लगा।
शायद उसके चेहरे के भाव बदल गए थे या उसने अनजाने में कुछ कह दिया था, क्योंकि पति-पत्नी तुरंत समझ गए कि चीते की नीयत बदल चुकी है। उस रात दोनों ने तय किया कि यदि वे वहीं रहे तो चीता उन्हें मार डालेगा। इसलिए अंधेरा होते ही वे चुपचाप वहाँ से भाग निकले। पूरी रात वे जंगल में दौड़ते रहे और अंत में एक ऊँचे पेड़ पर चढ़कर छिप गए। सुबह जब चीते ने देखा कि दोनों गायब हैं, तो वह क्रोध से पागल हो गया। उसने जमीन पर बने उनके पैरों के निशानों को सूँघा और उनका पीछा करते हुए उस पेड़ तक पहुँच गया जहाँ दोनों छिपे बैठे थे।
जैसे ही चीता पेड़ के नीचे पहुँचा, लड़का पहले से तैयार बैठा था। उसके हाथ में तलवार थी। उसने साहस जुटाया और पेड़ से छलांग लगाकर सीधे चीते पर हमला कर दिया। लड़ाई बहुत भयंकर थी, लेकिन आखिरकार लड़के ने चीते को मार गिराया। चीता जमीन पर गिर पड़ा और हमेशा के लिए शांत हो गया। लड़के की आँखों में आँसू थे, क्योंकि वह चीते को अपना पिता मानता था। लेकिन उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी जीवन में सही और गलत का निर्णय कठिन होने पर भी लेना पड़ता है।
इसके बाद लड़का अपनी पत्नी के साथ उसके गाँव पहुँचा। जब लड़की के माता-पिता ने अपनी बेटी को जीवित देखा, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें लगा था कि चीता उसे खा गया होगा। उन्होंने अपने दामाद का सम्मान से स्वागत किया और दोनों को अपने साथ रहने के लिए कहा।
लड़का और उसकी पत्नी वहीं बस गए और आगे का जीवन सुख और शांति से बिताने लगे। इस प्रकार एक अनोखी कहानी समाप्त हुई, जिसने यह सिखाया कि प्रेम और पालन-पोषण से रिश्ते बनते तो हैं, लेकिन स्वभाव की सच्चाई कभी पूरी तरह छिप नहीं सकती।
या अपना असली चेहरा दिखाऊँ?-लोक-कथा
बहुत समय पहले घने जंगलों और छोटे-छोटे गाँवों से घिरे एक प्रदेश में एक अत्यंत खूंखार चीता रहता था। वह साधारण जंगली जानवरों जैसा नहीं था। उसमें एक विचित्र चतुराई और चालाकी थी। वर्षों तक जंगल में भटकते-भटकते उसने किसी तांत्रिक से रूप बदलने की विद्या सीख ली थी। अब वह जब चाहे इंसान का रूप धारण कर सकता था। उसके मन में एक अजीब इच्छा जन्म ले चुकी थी। वह किसी ब्राह्मण कन्या से विवाह करना चाहता था।
उसका कारण केवल प्रेम नहीं था। उसे ब्राह्मणों के घर का शाकाहारी भोजन बहुत प्रिय लगता था। घी में बनी सब्जियों की खुशबू, गरम भात, दही और मसालों की महक उसे पागल कर देती थी। हालांकि वह मांस खाना कभी नहीं छोड़ सकता था, फिर भी वह इंसानों के बीच रहकर ऐश और स्वाद दोनों पाना चाहता था।
एक दिन उसने सुंदर, विद्वान और युवा ब्राह्मण का रूप धारण किया। माथे पर चंदन का तिलक, शरीर पर साफ़ धोती, हाथ में पुस्तक और मधुर आवाज़ में संस्कृत के श्लोक बोलता हुआ वह एक गाँव में पहुँचा। गाँव के लोग उसके ज्ञान और विनम्रता से प्रभावित हो गए। वह एक ब्राह्मण के घर पहुँचा जहाँ उसका आदर-सत्कार किया गया।
उसे बड़े प्रेम से भात, रसेदार साग, आम का अचार और दही परोसा गया। वह भोजन खाते हुए मन ही मन प्रसन्न हो रहा था। भोजन के बाद उसने मधुर स्वर में रामायण का पाठ किया। उसकी आवाज़ इतनी मीठी थी कि घर के लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रह गए। कुछ ही समय में उसने उस घर की सुंदर कन्या से विवाह करने की इच्छा प्रकट कर दी।
ब्राह्मण परिवार के लिए यह बहुत सम्मान की बात थी। उन्हें लगा कि इतना विद्वान, संस्कारी और सुशील युवक उनकी बेटी के लिए उत्तम वर है। वर के परिवार या रिश्तेदारों के बारे में पूछने पर उसने कहा कि उसके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं और वह अकेला रहता है।
कुछ दिनों बाद पूरे विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ विवाह संपन्न हो गया। विवाह के बाद कुछ दिन वह वहीं ससुराल में रहा। फिर एक दिन उसने कहा कि अब वह अपनी पत्नी को लेकर जंगल के उस पार अपने घर जाना चाहता है। बूढ़े ससुर का मन भारी हो गया, लेकिन उन्होंने बेटी को विदा करते हुए कहा, “बेटी अब तुम्हारी पत्नी है। इसका ध्यान रखना। हमने इसे बड़े लाड़-प्यार से पाला है।”
दूसरे दिन विदाई का समय आया। माँ ने बेटी के लिए मिठाइयाँ, शकरपारे और रास्ते के लिए खाना बाँधा। पुराने विश्वास के अनुसार उसने हर पोटली में नीम की पत्तियाँ रखीं ताकि रास्ते के बुरे प्रभाव और राक्षसी शक्तियों से रक्षा हो सके। कुछ नीम की पत्तियाँ उसने बेटी के बालों में भी गूँथ दीं। विदा के समय माँ-बेटी दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।
लड़की भारी मन से पति के साथ चल पड़ी। शुरुआत में सब सामान्य लगा, लेकिन जैसे-जैसे वे जंगल के भीतर बढ़ते गए, पति का व्यवहार बदलने लगा। जब भी लड़की थककर थोड़ी देर किसी पेड़ की छाया में बैठने को कहती, उसका पति गुस्से में कहता, “चुपचाप चलती हो या अपना असली चेहरा दिखाऊँ?”
पहले तो लड़की ने सोचा कि शायद वह मजाक कर रहा है, लेकिन जब उसने कई बार वही बात दोहराई तो उसके मन में डर बैठ गया। उसके पति की आँखों में अब एक अजीब चमक दिखाई देने लगी थी। उसकी आवाज़ भी भारी और डरावनी हो रही थी। आखिरकार लड़की से रहा नहीं गया।
उसने साहस करके कहा, “अच्छा, दिखाओ अपना असली चेहरा!” उसके इतना कहते ही एक भयानक परिवर्तन हुआ। उसके सामने खड़ा सुंदर ब्राह्मण अचानक चार पैरों वाला विशाल चीता बन गया। उसका पीला शरीर काली धारियों से ढका था, दाँत बाहर निकले हुए थे और आँखों में खून उतर आया था। लड़की भय से काँप उठी।
चीते ने गुर्राते हुए कहा, “अब जान गई न कि तुम्हारा पति कौन है? याद रखना, मैं चीता हूँ। लेकिन यदि तुम मेरी बात मानोगी तो तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा। तुम मेरे लिए खाना बनाना, घर साफ़ रखना और कभी मेरा विरोध मत करना।” भयभीत लड़की के पास और कोई रास्ता नहीं था।
वह उसके साथ जंगल के भीतर बने एक घर में रहने लगी। चीता रोज़ शिकार करके मांस लाता और उससे खाना बनवाता। लड़की को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं था। वह ब्राह्मण परिवार में पली-बढ़ी थी और हिंसा तथा मांस से घृणा करती थी, लेकिन मजबूरी में उसे सब सहना पड़ रहा था।
समय बीतता गया और लड़की ने एक चीते के शावक को जन्म दिया। बाहर से वह परिवार जैसा दिखता था, लेकिन उसके मन में हमेशा डर और घृणा भरी रहती। उसे लगता कि वह एक भयानक कैद में जी रही है। एक दिन जब वह घर में अकेली बैठी रो रही थी, तभी एक कौवा वहाँ आकर बिखरे चावल चुगने लगा।
कौवे ने उसे रोते देखा तो पूछा, “तुम इतनी दुखी क्यों हो?” लड़की ने उसे अपनी पूरी कहानी सुना दी और विनती की कि वह उसके घरवालों तक एक संदेश पहुँचा दे। कौवा दयालु था। उसने मदद करने का वचन दिया।
लड़की ने ताड़ के पत्ते पर लोहे की कील से अपने भाइयों के नाम एक पत्र लिखा। उसने उसमें विस्तार से अपना दुख और चीते की सच्चाई बताई तथा उन्हें उसे बचाने की विनती की। कौवे ने वह पत्र अपने गले में बँधवाया और उड़कर उसके गाँव पहुँच गया। भाइयों ने पत्र पढ़ा तो उनके होश उड़ गए।
वे तुरंत अपनी बहन को बचाने निकल पड़े। रास्ते में उन्हें एक गधा मिला, जिसे छोटे भाई ने साथ ले लिया। फिर एक काला चींटा मिला, जिसे मझले भाई ने नारियल के खोल में बंद कर लिया। बड़े भाई ने रास्ते में पड़ा ताड़ का भारी तना उठा लिया। आगे उन्हें एक पुरानी धोबी की टंकी भी मिली जिसे वे अपने साथ ले गए। वे नहीं जानते थे कि इन सब चीजों का क्या उपयोग होगा, लेकिन उन्हें लगा कि शायद आगे काम आ जाएँ।
आखिरकार वे जंगल में अपनी बहन के घर पहुँच गए। बहन उन्हें देखकर रो पड़ी। उसने डरते हुए कहा कि चीता किसी भी समय वापस आ सकता है, इसलिए वे ऊपर दुछत्ती में छिप जाएँ। थोड़ी देर बाद चीता घर लौटा। उसने आते ही सूँघते हुए कहा, “मुझे आदमी की गंध आ रही है।”
पत्नी ने डर छिपाते हुए कहा, “मैं इंसान हूँ, इसलिए आदमी की गंध आएगी ही।” लेकिन चीते का शक पूरी तरह दूर नहीं हुआ। वह खाने बैठ गया। तभी दुछत्ती में छिपे छोटे भाई को शरारत सूझी। उसने ऊपर से पेशाब कर दिया जो सीधे चीते की पत्तल में गिरा। चीता चौंककर बोला, “यह क्या है?” पत्नी ने तुरंत कहा, “दुछत्ती में घी की हाँडी रखी थी, शायद वही गिर गई होगी।”
कुछ देर बाद छोटे भाई ने फिर शरारत की और इस बार ऊपर से गंदगी गिरा दी। चीता गुर्राया, लेकिन पत्नी ने बात संभाल ली कि शायद मसूर की खिचड़ी गिर गई है। तभी ऊपर से बड़े भाई ने भारी आवाज़ में कहा, “चीते! तुम्हारा अंत आ गया। मैं तुम्हारा साला हूँ और तुम्हें कच्चा चबा जाऊँगा!” उसी समय छोटे भाई ने गधे के भीतर चींटा छोड़ दिया।
चींटे के काटते ही गधा जोर-जोर से रेंकने लगा। चीता डर के मारे काँप उठा। उसे लगा कि ऊपर कोई विशाल और भयंकर राक्षस छिपा है। बड़े भाई ने ताड़ का विशाल तना नीचे लटका दिया और मझले भाई ने धोबी की टंकी दिखाकर कहा, “देखो मेरा पेट कितना बड़ा है!” यह सब देखकर चीते के प्राण सूख गए और वह जान बचाकर भाग खड़ा हुआ।
रात होते ही भाई अपनी बहन को लेकर वहाँ से भाग निकले। जाते-जाते उन्होंने चीते के शावक को मार दिया और उसके टुकड़े चूल्हे के ऊपर लटका दिए ताकि खून टपकने की आवाज़ से चीते को भ्रम हो कि घर में कोई खाना बना रहा है। आधी रात को जब चीता वापस लौटा तो उसने दरवाज़ा बंद पाया और भीतर से छन-छन की आवाज़ सुनी। उसे लगा कि उसकी पत्नी रसोई में काम कर रही है। लेकिन पीछे से घर में घुसकर उसने जो दृश्य देखा, उससे उसका कलेजा फट गया। उसका बच्चा मरा पड़ा था, पत्नी गायब थी और घर का सारा कीमती सामान भी ले जाया जा चुका था।
क्रोध और दुख से पागल होकर चीते ने कसम खाई कि वह अपनी पत्नी को कहीं से भी ढूँढ निकालेगा। उसने फिर से ब्राह्मण युवक का रूप धारण किया और अपनी ससुराल पहुँच गया। लेकिन इस बार उसके साले पहले से तैयार थे। उन्होंने उसका आदर-सत्कार किया और स्नान के बहाने उसे एक पुराने सूखे कुएँ के ऊपर बिछी रेशमी दरी पर बैठा दिया।
जैसे ही वह बैठा, दरी टूट गई और वह सीधे कुएँ में गिर पड़ा। तुरंत तीनों भाइयों ने कुएँ में पत्थर, मिट्टी और कचरा डालकर उसे हमेशा के लिए बंद कर दिया। इस प्रकार उस दुष्ट चीते का अंत हुआ और ब्राह्मण की बेटी हमेशा के लिए उसके भय से मुक्त हो गई।
तभी से यह लोक-कथा लोगों के बीच सुनाई जाती है। यह सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी चालाकी से अपना रूप बदल ले, एक दिन उसका असली चेहरा दुनिया के सामने आ ही जाता है।
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लोक कथाएँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा हैं। इनमें जीवन के अनुभव, नैतिक शिक्षा, लोक परंपराएँ और मनोरंजन का सुंदर समन्वय मिलता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली ये कहानियाँ समाज की संस्कृति और मूल्यों को जीवंत बनाए रखती हैं।
लोक कथाएं
प्रस्तुति: Saying Central Team