हिमादास — खेतों में दौड़ने वाली लड़की का दुनिया जीतने तक का सफर
असम के एक छोटे से गाँव धींग के धान के खेतों में जब एक नन्हीं बच्ची अपने नंगे पैरों से मिट्टी को छूती थी, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यही पैर एक दिन इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़ेंगे। यह कहानी है हिमादास की, जिन्हें आज पूरी दुनिया ‘धींग एक्सप्रेस’ के नाम से जानती है।
एक साधारण किसान परिवार में जन्मी हिमा का जीवन संघर्ष, दृढ़ संकल्प और कभी न हार मानने वाले जज्बे की जीती-जागती मिसाल है। उनके पास न तो महंगे जूते थे और न ही अभ्यास करने के लिए कोई आधुनिक ट्रैक, लेकिन उनके पास एक ऐसी उड़ान थी जिसे वक्त की कोई भी दीवार रोक नहीं सकती थी। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय उन्हें अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।
धींग गाँव की ऊबड़-खाबड़ गलियों और कीचड़ से भरे खेतों में दौड़ना हिमा के दैनिक जीवन का एक हिस्सा था। बचपन में वे लड़कों के साथ फुटबॉल खेला करती थीं, जहाँ उनकी रफ्तार को देखकर लोग हैरान रह जाते थे। उस समय उनके पास किसी प्रकार की औपचारिक कोचिंग नहीं थी, लेकिन उनके भीतर एक अनजानी ऊर्जा और कुछ कर गुजरने की तड़प हमेशा मौजूद रहती थी।
परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे खेल के सामान या पौष्टिक आहार का खर्च उठा सकें। इसके बावजूद, हिमा के पिता जोनिंद्र दास ने हमेशा अपनी बेटी के सपनों को पंख देने की कोशिश की, भले ही इसके लिए उन्हें समाज के तानों और वित्तीय तंगहाली का सामना क्यों न करना पड़ा हो।
हिमादास का शुरुआती जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि आपके इरादे मजबूत हों, तो साधनों का अभाव कभी भी आपकी सफलता के रास्ते में रोड़ा नहीं बन सकता। उन्होंने खेतों की गीली मिट्टी में दौड़कर अपने पैरों को इतना मजबूत बना लिया था कि जब वे पहली बार असली सिंथेटिक ट्रैक पर उतरीं, तो उनकी गति को देखकर बड़े-बड़े कोच दंग रह गए। यह सफर केवल एक लड़की के खिलाड़ी बनने का नहीं था, बल्कि यह भारत के एक सुदूर और पिछड़े इलाके से निकलकर वैश्विक पटल पर तिरंगा लहराने की एक ऐसी महागाथा थी जो आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
खेतों की धूल से ट्रैक का सफर
हिमादास का बचपन असम के नगांव जिले के धींग गाँव में बीता, जहाँ चारों तरफ केवल हरे-भरे धान के खेत थे। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी हिमा हमेशा से ही स्वभाव से बेहद चंचल और ऊर्जा से भरपूर थीं। गाँव के माहौल में लड़कियों का खेलों में भाग लेना आम बात नहीं थी, लेकिन हिमा ने इन रूढ़ियों को तोड़ते हुए लड़कों के साथ फुटबॉल खेलना शुरू किया। वे मैदान पर इतनी तेजी से दौड़ती थीं कि विरोधी टीम के लड़के उनका पीछा तक नहीं कर पाते थे। फुटबॉल के प्रति उनका यह जुनून ही था जिसने अनजाने में उनकी दौड़ने की क्षमता और फेफड़ों की ताकत को बहुत मजबूत बना दिया था।
गाँव के एक स्थानीय शारीरिक शिक्षक निपुन दास ने सबसे पहले हिमा के भीतर छिपी इस अद्भूत प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने देखा कि यह लड़की बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के भी इतनी तीव्र गति से दौड़ सकती है, जो किसी पेशेवर एथलीट के लिए भी आसान नहीं होता। निपुन दास ने हिमा के पिता से बात की और उन्हें सलाह दी कि हिमा को फुटबॉल छोड़कर पूरी तरह से एथलेटिक्स यानी दौड़ने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पिता के लिए अपनी बेटी को अकेले शहर भेजना एक बेहद कठिन और बड़ा फैसला था, क्योंकि उनके पास गुवाहाटी जैसे बड़े शहर में हिमा के रहने और खाने का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे।
कोच निपुन दास ने हिमा के परिवार को भरोसा दिलाया कि वे उसकी पूरी जिम्मेदारी उठाएंगे और उसके रहने-खाने का प्रबंध करेंगे। इसके बाद हिमा असम की राजधानी गुवाहाटी आ गईं और सरुसजई स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में उनका वास्तविक प्रशिक्षण शुरू हुआ। पहली बार जब हिमा ने सिंथेटिक ट्रैक देखा, तो उन्हें समझ में आया कि खेतों की मिट्टी और इस आधुनिक ट्रैक पर दौड़ने में कितना अंतर होता है। शुरुआत में बिना स्पाइक्स (दौड़ने वाले विशेष जूते) के दौड़ने वाली इस लड़की ने बहुत जल्द ही आधुनिक तकनीकों को सीख लिया और अपनी टाइमिंग में लगातार सुधार करना शुरू कर दिया, जिससे उनके कोच भी काफी प्रभावित हुए।
गुवाहाटी में अभ्यास के दौरान हिमा को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्हें अपने परिवार से दूर रहने की आदत नहीं थी, जिससे शुरुआत में उन्हें काफी अकेलापन और घर की याद सताती थी। लेकिन उनके मन में देश के लिए कुछ बड़ा करने का एक ऐसा सपना था जिसने उन्हें कभी रुकने नहीं दिया। सुबह के चार बजे से ही उनका कड़ा अभ्यास सत्र शुरू हो जाता था, जहाँ वे घंटों तक बिना थके दौड़ती रहती थीं। उनके पैर अक्सर छिल जाते थे और मांसपेशियों में भयंकर खिंचाव होता था, परंतु उन्होंने कभी भी दर्द की शिकायत नहीं की और हर चुनौती का मुस्कुराकर सामना किया।
इस कठिन परिश्रम का परिणाम बहुत जल्द ही राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में देखने को मिला, जहाँ हिमा ने एक के बाद एक कई स्वर्ण पदक अपने नाम किए। उनकी रफ्तार की चर्चा अब केवल असम तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के चयनकर्ताओं की नजरें भी इस उभरती हुई खिलाड़ी पर टिक चुकी थीं। हिमा ने यह साबित कर दिया था कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या अमीर घराने की मोहताज नहीं होती; वह तो बस एक सच्चे जौहरी और सही अवसर की तलाश में रहती है। खेतों की धूल से निकलकर ट्रैक तक का यह सफर हिमा के जीवन का पहला और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय साबित हुआ।
राष्ट्रीय मंच पर धमाका और पहचान
राज्य स्तर पर अपनी धाक जमाने के बाद हिमादास ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की ओर अपने कदम बढ़ाए, जहाँ उनका मुकाबला देश के बेहतरीन और अनुभवी एथलीटों से होना था। साल 2017 में जब उन्होंने राष्ट्रीय अंतर-राज्य चैंपियनशिप में भाग लिया, तो उन्होंने 200 मीटर दौड़ में अपनी बेहतरीन गति का प्रदर्शन करते हुए सबको चौंका दिया। हालांकि, उनके कोच निपुन दास और राष्ट्रीय कोचों का मानना था कि हिमा की शारीरिक बनावट और सहनशक्ति 400 मीटर की दौड़ के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त है। शुरुआत में हिमा 400 मीटर की दौड़ने से थोड़ा कतराती थीं क्योंकि इसमें बहुत अधिक स्टैमिना की आवश्यकता होती थी।
कोच के समझाने और सही मार्गदर्शन के बाद हिमा ने 400 मीटर की स्पर्धा को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और इसके लिए दिन-रात एक कर दिया। राष्ट्रीय शिविर में शामिल होने के बाद उन्हें विश्व स्तरीय सुविधाएं और वैज्ञानिक प्रशिक्षण मिलने लगा, जिससे उनकी दौड़ने की तकनीक में अभूतपूर्व सुधार हुआ। उन्होंने अपनी दौड़ के शुरुआती और अंतिम मीटरों के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाना सीख लिया, जो एक सफल 400 मीटर धावक के लिए सबसे महत्वपूर्ण कौशल माना जाता है। पटियाला के राष्ट्रीय खेल संस्थान में उनके कड़े अभ्यास ने उन्हें मानसिक रूप से भी बेहद मजबूत बना दिया।
साल 2018 की शुरुआत में फेडरेशन कप नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हिमा ने 400 मीटर की दौड़ को रिकॉर्ड समय में पूरा करके स्वर्ण पदक जीता और राष्ट्रमंडल खेलों के लिए अपना टिकट पक्का कर लिया। ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में हालांकि वे पदक जीतने से चूक गईं और छठे स्थान पर रहीं, लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने उनके भीतर के डर को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धावकों को बहुत करीब से देखा और यह समझा कि वैश्विक स्तर पर पोडियम तक पहुँचने के लिए उन्हें अपनी टाइमिंग में और कितना सुधार करने की जरूरत है।
राष्ट्रमंडल खेलों की इस सीख ने हिमा को और अधिक भूखा और जुनूनी बना दिया। उन्होंने अपनी कमियों पर काम करना शुरू किया, विशेषकर दौड़ के अंतिम 100 मीटर में अपनी गति को कैसे बरकरार रखा जाए, इस पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया। राष्ट्रीय मंच पर उनके इस निरंतर शानदार प्रदर्शन ने खेल प्रेमियों और मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया था। लोग अब इस असमिया लड़की की कहानी जानने के लिए उत्सुक थे, जिसने बहुत ही कम समय में भारतीय एथलेटिक्स में अपनी एक अलग और मजबूत पहचान बना ली थी।
हिमा की सफलता ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के अन्य युवाओं के भीतर भी एक नया विश्वास पैदा किया कि वे भी मुख्यधारा के खेलों में अपना परचम लहरा सकते हैं। वे राष्ट्रीय चैंपियनशिप में केवल एक धाविका के रूप में नहीं दौड़ रही थीं, बल्कि वे उन लाखों लड़कियों की उम्मीदों को लेकर दौड़ रही थीं जिन्हें समाज अक्सर चार दीवारों के भीतर कैद रखने की कोशिश करता है। राष्ट्रीय मंच पर किए गए इस धमाके ने हिमा के लिए उस ऐतिहासिक वैश्विक सफर का द्वार खोल दिया, जिसने आगे चलकर भारतीय खेल इतिहास को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।
फिनलैंड में इतिहास रचना और विश्व विजय

जुलाई 2018 का वह महीना भारतीय खेल इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने जा रहा था, जब हिमादास फिनलैंड के टाम्परे शहर में आयोजित आईएएएफ (IAAF) विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भाग लेने पहुँचीं। भारत ने इससे पहले कभी भी किसी भी विश्व स्तरीय ट्रैक स्पर्धा में स्वर्ण पदक नहीं जीता था, इसलिए उम्मीदें तो थीं लेकिन इतिहास हमारे पक्ष में नहीं था। 12 जुलाई 2018 को जब 400 मीटर की फाइनल रेस शुरू हुई, तो पूरा देश अपनी सांसें थामकर टीवी स्क्रीन के सामने बैठा हुआ था। हिमा आठवीं लेन में दौड़ रही थीं, जिसे एथलेटिक्स में सबसे कठिन माना जाता है।
दौड़ शुरू होते ही पहली 300 मीटर तक हिमा दास अपनी प्रतिद्वंद्वियों से काफी पीछे चल रही थीं और ऐसा लग रहा था कि वे पदक की दौड़ से बाहर हो जाएंगी। लेकिन असली रोमांच तो अंतिम 100 मीटर के स्ट्रेच में आना बाकी था, जहाँ हिमा ने अपनी गियर बदली और एक अविश्वसनीय गति पकड़ी। उन्होंने हवा को चीरते हुए एक-एक करके अपनी आगे चल रही सभी धाविकाओं को पीछे छोड़ना शुरू कर दिया। उनके पैर इतनी तेजी से चल रहे थे मानो वे ट्रैक पर दौड़ नहीं रही थीं बल्कि उड़ रही थीं। अंतिम 50 मीटर में उन्होंने जो रफ्तार दिखाई, उसने पूरी दुनिया के खेल विशेषज्ञों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया।
हिमादास ने 51.46 सेकंड का समय निकालते हुए फिनिशिंग लाइन को सबसे पहले पार किया और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। जैसे ही वे जीतीं, उन्होंने गर्व से अपने हाथों में भारतीय तिरंगा लहराया और पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाया। यह नजारा देखकर हर भारतीय की आँखें खुशी से नम हो गई थीं। पोडियम पर खड़े होकर जब राष्ट्रगान बजा और तिरंगा ऊपर उठा, तो हिमा के आँसू रुक नहीं रहे थे। वह एक ऐतिहासिक क्षण था जिसने एक साधारण किसान की बेटी को रातों-रात वैश्विक स्तर पर भारत की सबसे बड़ी खेल सनसनी और महानायिका बना दिया था।
इस ऐतिहासिक जीत के बाद दुनिया भर से हिमादास पर बधाइयों की बौछार होने लगी। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति और बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारों ने इस युवा धाविका के जज्बे को सलाम किया। फिनलैंड की धरती पर रचा गया यह इतिहास केवल एक पदक की जीत नहीं थी, बल्कि इसने मिल्खा सिंह और पीटी उषा जैसे महान दिग्गजों के उन अधूरे सपनों को पूरा किया था, जो विश्व स्तर पर ट्रैक स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतने से चूक गए थे। हिमा ने साबित कर दिया कि भारतीय एथलीट भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों से आँख में आँख डालकर मुकाबला कर सकते हैं और उन्हें हरा सकते हैं।
विश्व चैंपियन बनने के बाद हिमा का नाम हर घर में गूंजने लगा और उन्हें ‘धींग एक्सप्रेस’ की उपाधि दी गई। उनकी इस अविश्वसनीय सफलता ने देश के युवाओं को यह संदेश दिया कि यदि आपके पास अटूट विश्वास और कड़ी मेहनत का जज्बा है, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको शीर्ष पर पहुँचने से नहीं रोक सकती। फिनलैंड की वह शाम हिमा के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई, जिसने उन्हें एक सामान्य एथलीट से उठाकर एक वैश्विक खेल आइकन के रूप में स्थापित कर दिया और उनके आगे के सुनहरे सफर की मजबूत नींव रख दी।
एशियाई खेल और ‘धींग एक्सप्रेस’ का दबदबा
विश्व चैंपियनशिप की ऐतिहासिक सफलता के तुरंत बाद ही जकार्ता में 2018 एशियाई खेलों का आयोजन होना था, जहाँ हिमादास पर अपनी जीत के सिलसिले को बरकरार रखने का भारी दबाव था। पूरा देश अब उनसे केवल स्वर्ण पदक की उम्मीद कर रहा था, और इस स्तर के अंतरराष्ट्रीय दबाव को संभालना किसी भी 18 साल की खिलाड़ी के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण काम होता है। लेकिन हिमा तो अलग ही मिट्टी की बनी थीं; दबाव उन्हें डराता नहीं था बल्कि उनके प्रदर्शन को और निखार देता था। जकार्ता पहुँचते ही उन्होंने अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया था।
400 मीटर की व्यक्तिगत स्पर्धा में हिमा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा और 50.79 सेकंड के समय के साथ रजत पदक जीता। हालांकि वे स्वर्ण पदक से चूक गईं, लेकिन उनकी इस टाइमिंग ने यह दिखा दिया कि वे लगातार अपनी गति में सुधार कर रही हैं। असली जादू तो रिले स्पर्धाओं में होना अभी बाकी था, जहाँ हिमा को अपनी टीम के साथ मिलकर देश के लिए तिरंगा लहराना था। महिलाओं की 4×400 मीटर रिले दौड़ में हिमादास, पूवम्मा राजू, सरिताबेन गायकवाड़ और विस्मया की जोड़ी ने ऐसा तहलका मचाया कि विरोधी टीमें देखती रह गईं।
भारतीय महिला टीम ने इस स्पर्धा में पूरी तरह से अपना दबदबा बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता, जिसमें हिमा ने अपनी टीम को एक बेहतरीन और मजबूत शुरुआत दी थी। इसके अलावा, एशियाई खेलों में पहली बार शामिल की गई 4×400 मीटर मिक्स्ड रिले स्पर्धा में भी हिमा ने भारतीय टीम के साथ मिलकर रजत पदक जीता (जो बाद में स्वर्ण में बदल गया)। इन खेलों में कुल तीन पदक (एक स्वर्ण और दो रजत) जीतकर हिमादास ने यह पूरी तरह से साबित कर दिया कि फिनलैंड की जीत कोई तुक्का या इत्तेफाक नहीं थी, बल्कि वे वास्तव में एशिया की सबसे तेज और बेहतरीन धाविकाओं में से एक हैं।
जकार्ता एशियाई खेलों से लौटने के बाद हिमा का स्वागत एक राष्ट्रीय नायक की तरह किया गया। असम सरकार ने खेल के क्षेत्र में उनके इस अभूतपूर्व योगदान को देखते हुए उन्हें राज्य पुलिस में पुलिस उपाधीक्षक (DSP) के प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त किया। यह उस लड़की के लिए एक बेहद भावुक और गर्व का क्षण था, जिसने कभी फटे जूतों में दौड़ना शुरू किया था और आज वह वर्दी पहनकर देश की सेवा करने के योग्य बन चुकी थी। यूनिफॉर्म में उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुईं और वे देश की लाखों युवा लड़कियों के लिए महिला सशक्तिकरण की एक नई और मजबूत प्रतीक बन गईं।
हिमा की इस यात्रा ने यह दिखाया कि खेल न केवल आपको शोहरत और पदक दिलाते हैं, बल्कि वे आपके पूरे जीवन और सामाजिक स्तर को भी पूरी तरह से बदल सकते हैं। खेतों की पगडंडियों से शुरू हुआ यह सफर अब राजशाही सम्मान और वर्दी के गौरव तक पहुँच चुका था। ‘धींग एक्सप्रेस’ की यह रफ्तार अब रुकने वाली नहीं थी, क्योंकि उनके सामने अभी और भी कई बड़ी चुनौतियाँ और ऐतिहासिक मंजिलें थीं, जिन्हें पार करके उन्हें भारतीय खेल जगत में अपनी इस शानदार विरासत को और अधिक मजबूत करना था।
चोटों से संघर्ष और भविष्य की उम्मीदें
हर खिलाड़ी के जीवन में सफलताओं के सुनहरे दिनों के साथ-साथ कठिन परीक्षाओं और संघर्ष के काले दिन भी आते हैं, और हिमादास का जीवन भी इसका अपवाद नहीं रहा। साल 2019 और उसके बाद का समय हिमा के लिए शारीरिक रूप से बेहद कठिन साबित हुआ, क्योंकि वे पीठ की गंभीर चोट (Lumbosacral Spine Injury) से ग्रसित हो गईं। इस चोट के कारण वे लंबे समय तक ट्रैक से दूर रहीं और उनकी दौड़ने की गति और स्टैमिना पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ा। आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया कि शायद ‘धींग एक्सप्रेस’ का सफर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है।
चोट के इस दर्दनाक और मानसिक रूप से थका देने वाले दौर में हिमा ने कभी भी अपनी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने राष्ट्रीय खेल संस्थान में रहकर डॉक्टरों और फिजियोथेरेपिस्ट की देखरेख में अपना कड़ा पुनर्वास (Rehabilitation) कार्यक्रम शुरू किया। एक धावक के लिए अपनी पुरानी लय को वापस पाना बहुत मुश्किल होता है, खासकर तब जब आपकी पीठ की मांसपेशियां आपका साथ न दे रही हों। लेकिन हिमा ने अपनी इच्छाशक्ति के बल पर धीरे-धीरे अभ्यास पर वापसी की और 400 मीटर के बजाय छोटी दूरियों यानी 100 मीटर और 200 मीटर की रेस पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया ताकि उनकी पीठ पर अधिक दबाव न पड़े।
साल 2021 में पटियाला में आयोजित फेडरेशन कप में उन्होंने 200 मीटर की दौड़ में वापसी करते हुए स्वर्ण पदक जीता और यह दिखा दिया कि उनके भीतर की आग अभी बुझी नहीं है। हालांकि चोटों के दोबारा उभर आने के कारण वे टोक्यो ओलंपिक खेलों में भाग लेने से चूक गईं, जो उनके जीवन का एक बहुत बड़ा सपना था। इस बड़े झटके के बाद भी हिमा टूटी नहीं, बल्कि उन्होंने इसे एक ब्रेक के रूप में लिया और अपने शरीर को पूरी तरह से फिट करने में जुट गईं। उनका यह सकारात्मक नजरिया ही उन्हें एक साधारण खिलाड़ी से अलग कर एक महान एथलीट बनाता है।
हिमादास आज भी भारतीय एथलीटों के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने बहुत ही कम उम्र में जो कुछ भी हासिल किया है, वह किसी भी खिलाड़ी के लिए पूरे जीवन भर की पूंजी हो सकता है। कॉर्पोरेट ब्रांड्स से लेकर खेल प्रेमियों तक, हर कोई उनकी वापसी का बेसब्री से इंतजार करता है। हिमा का मानना है कि जीवन में आने वाली रुकावटें आपको केवल कुछ समय के लिए धीमा कर सकती हैं, लेकिन वे आपकी मंजिल का रास्ता कभी नहीं बदल सकतीं। उनका अगला मुख्य लक्ष्य आने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए एक बार फिर से पदक जीतना और राष्ट्रगान की गूंज को पूरी दुनिया में फैलाना है।
खेतों की मिट्टी से निकलकर विश्व पटल पर तिरंगा लहराने वाली हिमादास की कहानी इस बात का सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण है कि सपने सच होते हैं, बशर्ते आपके भीतर उन्हें पूरा करने का पागलपन और अटूट साहस हो। उन्होंने भारतीय खेलों के इतिहास को एक नई दिशा दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा रास्ता तैयार किया, जिस पर चलकर देश की न जाने कितनी और बेटियां दुनिया जीतने का हौसला रख सकेंगी। ‘धींग एक्सप्रेस’ की यह अद्भुत और प्रेरणादायक कहानी हमेशा-हमेशा के लिए हर भारतीय के दिल में देशभक्ति और गर्व की भावना जगाती रहेगी।
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हिमादास
प्रस्तुति: Saying Central Team