मिल्खा सिंह

मिल्खा सिंह — शरणार्थी बच्चे से “फ्लाइंग सिख” बनने तक का सफर

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मिल्खा सिंह — शरणार्थी बच्चे से “फ्लाइंग सिख” बनने तक का सफर

विभाजन की उस भयानक त्रासदी और आगजनी के बीच, जहां इंसानी रिश्ते और जिंदगियां पल भर में खाक हो रही थीं, कोट अद्दु (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के एक छोटे से गांव में एक मासूम बच्चा अपनी जान बचाने के लिए नंगे पैर भाग रहा था। उस बच्चे के कानों में अभी भी उसके पिता के वे आखिरी शब्द गूंज रहे थे, जिन्होंने अपनी अंतिम सांस लेते हुए चिल्लाकर कहा था, “भाग मिल्खा भाग!” यह महज एक पिता की अपने बेटे को बचाने की गुहार नहीं थी, बल्कि यह नियति का वह क्रूर और ऐतिहासिक आदेश था जिसने आने वाले समय में भारतीय खेल इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे प्रेरणादायक दास्तान की नींव रख दी थी।

वह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि भविष्य के ‘फ्लाइंग सिख’ मिल्खा सिंह थे, जिनका बचपन एक झटके में उनसे छीन लिया गया था और उन्हें एक शरणार्थी के रूप में एक ऐसे सफर पर धकेल दिया गया था, जहां जिंदा रहने के लिए हर रोज एक नई जंग लड़नी थी। अपनी आंखों के सामने अपने माता-पिता और भाई-बहनों के कत्लेआम को देखने के बाद, मिल्खा के दिल और दिमाग पर जो गहरा सदमा लगा था, उसने उनके भीतर एक ऐसी असहनीय टीस पैदा कर दी थी जो उन्हें जीवन भर भागने और खुद को साबित करने के लिए प्रेरित करती रही। भारत की ओर आती हुई लाशों से भरी ट्रेनों और शरणार्थी शिविरों की नारकीय स्थितियों के बीच, मिल्खा सिंह ने भूख, अकेलेपन और पहचान के संकट का सामना किया, लेकिन उनके भीतर छिपा हुआ वह अटूट जज्बा और जीने की जिद कभी कम नहीं हुई।

दिल्ली के पुराने किले के शरणार्थी शिविर में बिताए गए वे दिन मिल्खा सिंह के जीवन के सबसे अंधकारमय और कष्टदायक दिनों में से थे, जहां रोटी के एक-एक टुकड़े के लिए हजारों की भीड़ आपस में संघर्ष करती थी और जिंदगी केवल सांस लेने के नाम पर सिमट कर रह गई थी। अपनी बहन ईश्वर कौर की मदद से किसी तरह जीवित रहने की जद्दोजहद में जुटे मिल्खा ने पेट भरने के लिए छोटे-मोटे काम किए, कभी ढाबों पर बर्तन धोए तो कभी दिल्ली की सड़कों पर जूते पॉलिश करने का काम भी किया ताकि वे इस बेरहम दुनिया में खुद को जिंदा रख सकें।

इस भयानक दौर में कई बार उनके कदम भटके और वे गलत संगत में पड़कर छोटी-मोटी चोरियों और पॉकेटमारी जैसी गतिविधियों में भी शामिल हो गए, जिसके कारण उन्हें तिहाड़ जेल की हवा भी खानी पड़ी, जहां उनकी बहन ने अपने गहने बेचकर उन्हें जमानत पर रिहा कराया था। जेल की उस सलाखों के पीछे मिल्खा सिंह को इस बात का गहरा अहसास हुआ कि अगर वे इसी तरह गलत रास्ते पर चलते रहे, तो वे अपनी जिंदगी और अपने माता-पिता के बलिदान को पूरी तरह से बर्बाद कर देंगे और यहीं से उनके मन में अपने जीवन को एक सही दिशा देने और कुछ बड़ा करने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। उनके बड़े भाई मखन सिंह ने उनके भीतर छिपी इस बेचैनी को पहचाना और उन्हें सेना में भर्ती होने के लिए लगातार प्रेरित किया, जो उस समय किसी भी शरणार्थी युवा के लिए न केवल एक सुरक्षित भविष्य की गारंटी थी, बल्कि समाज में सम्मानपूर्वक जीने का एक बेहतरीन जरिया भी बन सकती थी।

संघर्ष, सेना और दौड़ का पहला कदम

लगातार तीन बार सेना की भर्ती परीक्षा में असफल होने और घोर निराशा का सामना करने के बाद भी मिल्खा सिंह ने हार नहीं मानी और आखिरकार साल 1951 में अपने चौथे प्रयास में वे भारतीय सेना की कोर ऑफ मैकेनिकल एंड इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स (EME) में एक अदना से सैनिक के रूप में भर्ती होने में पूरी तरह सफल रहे। सिकंदराबाद के सेना केंद्र में ट्रेनिंग के दौरान एक दिन जब सभी नए रंगरूटों के बीच एक अनिवार्य क्रॉस-कंट्री दौड़ का आयोजन किया गया, तो मिल्खा सिंह को पहली बार आधिकारिक तौर पर दौड़ने का मौका मिला, जिसमें सबसे खास बात यह थी कि पहले दस विजेताओं को सेना की तरफ से रोज एक गिलास एक्स्ट्रा दूध मिलने का वादा किया गया था।

बचपन से ही भूख और तंगहाली का सामना कर चुके मिल्खा सिंह के लिए वह एक गिलास दूध किसी बेशकीमती खजाने से कम नहीं था, और इसी दूध की चाहत और अपनी अंतर्निहित दौड़ने की क्षमता के दम पर उन्होंने उस दौड़ में छठा स्थान हासिल करके सबको चौंका दिया। इस शुरुआती सफलता ने सेना के खेल प्रशिक्षकों, विशेषकर हवलदार गुरुदेव सिंह का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित किया, जिन्होंने मिल्खा के भीतर छिपे हुए एक असाधारण एथलीट के कच्चे हीरे को पहचान लिया और उन्हें पेशेवर तरीके से एथलेटिक्स की बारीकियां सिखाने तथा उनके दौड़ने की तकनीक को सुधारने का जिम्मा पूरी मुस्तैदी से संभाल लिया। गुरुदेव सिंह की कड़ी निगरानी और सख्त अनुशासन में मिल्खा सिंह की असली ट्रेनिंग शुरू हुई, जहां वे सुबह की पीटी से लेकर रात के अंधेरे तक, जब बाकी सभी सैनिक सो रहे होते थे, सेना के मैदानों और रेलवे ट्रैक के किनारे अकेले ही दौड़ने का अभ्यास करते रहते थे।

सेना की इस बेहद कठिन और अनुशासित जीवनशैली ने मिल्खा सिंह को एक नया जीवनदान दिया और उनके पुराने मानसिक जख्मों को भरने के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा प्रदान की, जिसके कारण वे अपनी पूरी ताकत और ध्यान केवल और केवल अपनी दौड़ने की गति को बढ़ाने में लगाने लगे।

वे अक्सर रात के समय जब चारों तरफ सन्नाटा पसर जाता था, तो चुपके से बैरक से बाहर निकल आते थे और चांद की मद्धम रोशनी में तब तक दौड़ते रहते थे जब तक कि उनके पैर पूरी तरह से जवाब नहीं दे देते थे और वे थककर चूर नहीं हो जाते थे। कई बार अत्यधिक शारीरिक श्रम और अभ्यास के कारण उनके फेफड़ों में तेज दर्द होने लगता था, मुंह से खून आने लगता था और वे मैदान पर ही बेहोश होकर गिर पड़ते थे, लेकिन अगले ही दिन वे फिर उसी दोगुनी ऊर्जा और अटूट संकल्प के साथ दौड़ने के लिए ट्रैक पर खड़े मिलते थे।

सेना के सीनियर अधिकारियों ने जब इस युवा सैनिक के भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने की ऐसी बेमिसाल दीवानगी और जुनून देखा, तो उन्होंने मिल्खा सिंह को विशेष खेल सुविधाएं प्रदान कीं और उन्हें ड्यूटी से छूट देकर पूरा समय केवल एथलेटिक्स के अभ्यास के लिए समर्पित करने की विशेष अनुमति दे दी। इस तरह, सेना के उस सख्त और मददगार माहौल में एक साधारण शरणार्थी लड़का धीरे-धीरे भारत के एक बेहद पेशेवर और खतरनाक धावक के रूप में तब्दील होने लगा, जिसके कदमों में बिजली की सी तेजी थी और जिसकी आंखों में पूरी दुनिया को जीतने का एक अनूठा और अजेय सपना पल रहा था।

राष्ट्रीय क्षितिज पर उदय और वैश्विक चुनौतियां

साल 1956 के पटियाला राष्ट्रीय खेलों में मिल्खा सिंह ने अपनी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए 200 मीटर और 400 मीटर की स्पर्धाओं में तत्कालीन स्थापित धावकों को पछाड़कर नए राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किए और देश के शीर्ष एथलीट के रूप में अपनी पहचान मजबूत की। इस शानदार प्रदर्शन के आधार पर उनका चयन उसी वर्ष आयोजित होने वाले मेलबर्न ओलंपिक खेलों के लिए भारतीय दल में किया गया, जो उनका पहला अंतर्राष्ट्रीय मंच था और जहां उन्हें दुनिया के सबसे बेहतरीन और अनुभवी धावकों के साथ मुकाबला करने का पहला बड़ा अवसर मिलने जा रहा था।

हालांकि, मेलबर्न ओलंपिक में अनुभव की कमी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के भारी दबाव के कारण वे शुरुआती दौर में ही बाहर हो गए, लेकिन इस असफलता ने उन्हें निराश करने के बजाय उनके भीतर सीखने की एक नई और बेहद शक्तिशाली ललक पैदा कर दी। वहां उनकी मुलाकात 400 मीटर के अमेरिकी स्वर्ण पदक विजेता चार्ल्स जेनकिंस से हुई, जिनसे मिल्खा ने बड़े ही विनीत भाव से उनकी ट्रेनिंग की तकनीकों, खान-पान और दौड़ने की रणनीतियों के बारे में विस्तार से जानकारी हासिल की और उसे अपने डायरी में नोट कर लिया।

भारत वापस लौटकर मिल्खा सिंह ने जेनकिंस द्वारा बताए गए सुझावों के अनुसार अपनी ट्रेनिंग को और अधिक कठोर और वैज्ञानिक बनाया, जिसमें वे रोजाना पांच से छह घंटे तक ऊंचे पहाड़ों, रेत के टीलों और भारी जूतों के साथ दौड़ने का अभ्यास करते थे ताकि उनकी शारीरिक क्षमता और सहनशक्ति दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धावकों के समकक्ष पहुंच सके।

मिल्खा सिंह की इस कड़ी मेहनत और अटूट साधना का फल साल 1958 के कटक राष्ट्रीय खेलों में देखने को मिला, जहां उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर दोनों ही स्पर्धाओं में पुराने सभी रिकॉर्ड्स को पूरी तरह से ध्वस्त करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किए। इसके बाद उसी वर्ष कार्डिफ, वेल्स में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स (राष्ट्रमंडल खेल) में मिल्खा सिंह ने वह ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया जिसने रातों-रात उन्हें वैश्विक खेल जगत का एक चमकता हुआ सितारा बना दिया, जब उन्होंने 400 मीटर की दौड़ में दक्षिण अफ्रीका के प्रसिद्ध धावक मैल्कम स्पेंस को एक बेहद रोमांचक मुकाबले में हराकर स्वर्ण पदक जीता।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में एथलेटिक्स में यह पहला राष्ट्रमंडल स्वर्ण पदक था, जिसने पूरे देश को गर्व और जश्न के माहौल में सराबोर कर दिया था और इस महान उपलब्धि की महत्ता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मिल्खा के अनुरोध पर पूरे देश में एक दिन के राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा की थी।

इसी वर्ष टोक्यो में आयोजित एशियाई खेलों में भी मिल्खा सिंह का दबदबा पूरी तरह से कायम रहा, जहां उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर की दौड़ों में एशिया के सबसे तेज धावकों को धूल चटाते हुए दो स्वर्ण पदक भारत की झोली में डाले और खुद को एशिया का निर्विवाद रूप से सबसे तेज और सर्वश्रेष्ठ धावक साबित कर दिया।

“फ्लाइंग सिख” का खिताब और पाकिस्तान का दौरा

साल 1960 में मिल्खा सिंह के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनके अतीत के पुराने जख्मों को एक बार फिर से हरा कर दिया, जब उन्हें पाकिस्तान के लाहौर में आयोजित होने वाले भारत-पाक इंडो-पाक द्विपक्षीय खेल प्रतियोगिता में भाग लेने का एक विशेष निमंत्रण मिला।

भारत के विभाजन के दौरान अपने पूरे परिवार को अपनी आंखों के सामने खो देने के खौफनाक दर्द के कारण मिल्खा सिंह किसी भी कीमत पर दोबारा पाकिस्तान की धरती पर कदम नहीं रखना चाहते थे, क्योंकि वहां की हवाएं और रास्ते उन्हें उनके जीवन के सबसे भयानक दुःस्वप्न की याद दिलाते थे।

उनकी इस गहरी हिचकिचाहट और मानसिक पीड़ा को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खुद मिल्खा सिंह को अपने पास बुलाया और उन्हें समझाया कि खेल दो देशों के बीच नफरत की दीवारों को गिराने और शांति स्थापित करने का एक बेहतरीन माध्यम होते हैं, इसलिए उन्हें देश के गौरव के लिए इस दौरे पर जरूर जाना चाहिए। नेहरू जी के समझाने पर और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए मिल्खा सिंह ने भारी मन से पाकिस्तान जाने का फैसला किया, जहां उनका मुकाबला पाकिस्तान के सबसे तेज और चहेते धावक अब्दुल खालिद से होना था, जिन्हें उस समय पूरे एशिया का सबसे तेज धावक माना जाता था और जिन्हें हराना किसी भी धावक के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी।

लाहौर के विशाल स्टेडियम में जब यह ऐतिहासिक दौड़ शुरू हुई, तो पूरा स्टेडियम अपने घरेलू हीरो अब्दुल खालिद के समर्थन में नारे लगा रहा था और वहां का माहौल बेहद तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धी था, लेकिन जैसे ही रेस की बंदूक चली, मिल्खा सिंह ने अपनी जिंदगी की सारी नफरत, दर्द और ताकत को अपने पैरों में समेटकर ऐसी अविश्वसनीय दौड़ लगाई कि देखने वाले दंग रह गए। मिल्खा सिंह ने अब्दुल खालिद को इतने बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया कि पूरा स्टेडियम सन्न रह गया और खेल के मैदान में नफरत की जगह भारतीय धावक की अद्भुत कला और गति के प्रति सम्मान ने ले ली।

इस रेस को स्टैंड्स में बैठकर देख रहे पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अय्यूब खान मिल्खा सिंह की इस अमानवीय और जादुई गति से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान मिल्खा को मेडल पहनाते हुए ऐतिहासिक शब्दों में कहा, “मिल्खा, आज तुम लाहौर में दौड़े नहीं हो, बल्कि तुम तो उड़े हो, इसलिए आज से हम तुम्हें ‘फ्लाइंग सिख’ का खिताब देते हैं।” यह केवल एक उपाधि नहीं थी, बल्कि एक कट्टर प्रतिद्वंदी देश द्वारा भारत के एक महान खिलाड़ी को दिया गया सर्वोच्च सम्मान था, जिसके बाद से मिल्खा सिंह पूरी दुनिया में हमेशा-हमेशा के लिए ‘फ्लाइंग सिख’ के नाम से अमर हो गए।

रोम ओलंपिक की त्रासदी और शाश्वत विरासत

मिल्खा सिंह के खेल करियर का सबसे महत्वपूर्ण, रोमांचक और साथ ही सबसे दुखद क्षण साल 1960 के रोम ओलंपिक खेलों में आया, जहां वे 400 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक के सबसे प्रबल दावेदार के रूप में ट्रैक पर उतरे थे और पूरा भारत देश उनसे ओलंपिक पदक की उम्मीद लगाए बैठा था।

रेस की शुरुआत बेहद शानदार रही और मिल्खा सिंह ने अपनी रणनीति के तहत शुरुआती 250 मीटर तक दुनिया के सभी धावकों पर एक मजबूत और स्पष्ट बढ़त बना रखी थी, जिससे ऐसा लग रहा था कि भारत का पहला एथलेटिक्स पदक पक्का होने वाला है। लेकिन तभी दौड़ के एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर मिल्खा सिंह से एक छोटी सी रणनीतिक भूल हो गई; उन्होंने यह देखने के लिए कि उनके प्रतिद्वंद्वी उनसे कितने पीछे हैं, अपनी गर्दन घुमाकर पीछे की तरफ देखा और इसी एक सेकंड के सौवें हिस्से की चूक ने उनकी दौड़ की लय और गति को थोड़ा सा धीमा कर दिया।

इस मामूली सी चूक का फायदा उठाते हुए जर्मनी के कार्ल कॉफमैन और अमेरिका के ओटिस डेविस ने तेजी से आगे निकलते हुए रेस को क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर समाप्त किया, जबकि दक्षिण अफ्रीका के मैल्कम स्पेंस ने मिल्खा को बेहद कड़े मुकाबले में पछाड़ते हुए तीसरा स्थान हासिल कर लिया।

मिल्खा सिंह ने इस ऐतिहासिक और बेहद तेज दौड़ को 45.73 सेकंड के समय में पूरा किया था, जो कि उस समय का एक नया विश्व रिकॉर्ड समय से भी बेहतर और एक शानदार राष्ट्रीय रिकॉर्ड था, लेकिन फोटो फिनिश के अत्यंत सूक्ष्म और बारीक नतीजों में वे तीसरे स्थान के धावक से महज 0.1 सेकंड के अंतर से पिछड़कर चौथे स्थान पर रहे और ओलंपिक पदक जीतने से चूक गए।

इस मामूली अंतर से पदक चूकने का गम मिल्खा सिंह के दिल में जीवन भर एक ऐसी गहरी फांस की तरह चुभता रहा जिसे वे चाहकर भी कभी भुला नहीं पाए, और वे अक्सर अपने साक्षात्कारों में भावुक होकर कहते थे कि यह हार उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल और कभी न भरने वाला जख्म थी।

इस बड़ी निराशा के बावजूद मिल्खा सिंह ने देश के लिए दौड़ना जारी रखा और साल 1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में उन्होंने एक बार फिर अपनी बादशाहत साबित करते हुए 400 मीटर और $4 \times 400$ मीटर रिले रेस में दो शानदार स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम पूरे विश्व में ऊंचा किया। खेल से संन्यास लेने के बाद वे पंजाब के खेल निदेशक के रूप में काम करते रहे, जहां उन्होंने ग्रामीण और युवा प्रतिभाओं को तराशने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं चलाईं और खेल संस्कृति को बढ़ावा देने में अपना अमूल्य योगदान दिया।

मिल्खा सिंह का पूरा जीवन इस बात का एक जीवंत और जलता हुआ प्रमाण है कि यदि इंसान के भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति, अटूट कड़ा परिश्रम और अपने सपनों को सच करने का पागलपन हो, तो वह दुनिया की बड़ी से बड़ी त्रासदी, गरीबी और विपरीत परिस्थितियों को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है।

साल 1959 में भारत सरकार ने उनकी इन असाधारण खेल उपलब्धियों और राष्ट्र की अद्वितीय सेवा के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाजा, जो उनकी महानता को आधिकारिक मान्यता प्रदान करता है। जून 2021 में कोरोना महामारी के कारण इस महान और अमर धावक ने हमेशा के लिए दुनिया से विदा ले ली, लेकिन उनकी प्रेरणादायक कहानी, उनका अदम्य साहस और देश के प्रति उनका अगाध प्रेम आज भी करोड़ों युवाओं के दिलों में एक नई ऊर्जा और देशभक्ति का जज्बा पैदा करता है।

मिल्खा सिंह आज भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद न हों, लेकिन जब भी दुनिया में संघर्ष, जिजीविषा और शून्य से शिखर तक पहुंचने की बात होगी, तो ‘फ्लाइंग सिख’ मिल्खा सिंह का नाम हमेशा खेल इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में चमकता रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि “भाग मिल्खा भाग” केवल एक दौड़ नहीं, बल्कि जीवन की हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करने का एक महामंत्र है।

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मिल्खा सिंह
प्रस्तुति: Saying Central Team

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