नीरजा भनोट — जिसने यात्रियों की जान बचाते हुए अपनी जान दे दी
यह कहानी एक ऐसी असाधारण युवती की है, जिसने मात्र 22 साल की उम्र में वीरता और मानवता की एक ऐसी मिसाल कायम की, जिसे दुनिया कभी नहीं भूल सकती। नीरजा भनोट, जिनका जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ में हुआ था, एक बेहद खूबसूरत, जिंदादिल और संवेदनशील लड़की थीं।
उनके पिता हरीश भनोट एक पत्रकार थे और उनकी मां रमा भनोट एक समर्पित गृहिणी थीं। नीरजा का परिवार बाद में मुंबईस्थानांतरित हो गया, जहाँ उनकी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पूरी हुई। नीरजा बचपन से ही अपनी जिम्मेदारियों के प्रति बेहद गंभीर थीं और उनके चेहरे पर हमेशा एक प्यारी सी मुस्कान तैरती रहती थी।
मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से स्नातक करने के बाद, उन्होंने मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखा और बहुत ही कम समय में कईबड़े ब्रांड्स का चेहरा बन गईं। उनकी खूबसूरती और शालीनता ने उन्हें विज्ञापन जगत में एक जाना-माना नाम बना दिया था। लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही बड़ा और ऐतिहासिक रास्ता चुन रखा था, जो उन्हें केवल एक मॉडल के रूप में नहीं, बल्कि पूरे विश्व की एक महान नायिका के रूप में स्थापित करने वाला था।
नीरजा का शुरुआती जीवन जितना खुशहाल था, उनकी शादीशुदा जिंदगी उतनी ही दर्दनाक रही। मार्च 1985 में उनकी शादी एक अरेंज मैरिज के तहत खाड़ी देश में रहने वाले एक मरीन इंजीनियर से हुई थी। लेकिन शादी के तुरंत बाद ही उन्हें दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा और मानसिक रूप से काफी परेशान किया गया।
नीरजा ने इस अपमान और प्रताड़ना को सहने के बजाय आत्मसम्मान को चुना और शादी के महज दो महीने बाद ही मुंबई वापस लौट आईं। उन्होंने हार मानने के बजाय अपने जीवन को एक नई दिशा देने का फैसला किया। इसी दौरान, पैन एम (Pan Am) एयरलाइंस ने भारत में अपनी उड़ानों के लिए केबिन क्रू की भर्ती निकाली।
नीरजा ने इसके लिए आवेदन किया और अपनी बुद्धिमत्ता, व्यक्तित्व और आत्मविश्वास के बल पर उनका चयन हो गया। उन्होंने मियामी में फ्लाइट पर्सर (फ्लाइट अटेंडेंट की प्रमुख) बनने के लिए कड़ा प्रशिक्षण लिया। इस नौकरी ने नीरजा को एक नया हौसला दिया और वे अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गईं। वे अपनी हर उड़ान को यात्रियों के लिए सुरक्षित और आरामदायक बनाने का पूरा प्रयास करती थीं।
संकट की वह काली सुबह और विमान का अपहरण
5 सितंबर 1986 की वह सुबह अन्य दिनों की तरह ही सामान्य लग रही थी, लेकिन किसी को नहीं पता था कि आज इतिहास की एक सबसे दर्दनाक और वीरगाथा लिखी जाने वाली है। पैन एम फ्लाइट 73 ने मुंबई से उड़ान भरी थी और उसे कराची और फ्रैंकफर्ट होते हुए न्यूयॉर्क जाना था।
नीरजा भनोट इस फ्लाइट में सीनियर पर्सर के रूप में तैनात थीं। विमान जब पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर उतरा, तो सुबह के लगभग 5:00 बज रहे थे। यात्री शांति से अपनी सीटों पर बैठे थे और कुछ विमान में सवार हो रहे थे। अचानक, हवाई अड्डे के सुरक्षाकर्मियों की पोशाक पहने चार भारी हथियारों से लैस आतंकवादी विमान के भीतर घुस आए।
वे ‘अबू निदाल संगठन’ के फिलिस्तीनी आतंकवादी थे, जिनका मकसद इस विमान को हाईजैक करके साइप्रस ले जाना था, ताकि वहां कैद अपने साथियों को रिहा करवा सकें। विमान के अंदर आते ही उन्होंने अंधाधुंध हवाई फायरिंग शुरू कर दी और चिल्लाते हुए विमान को अपने नियंत्रण में ले लिया। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई और यात्री डर के मारे कांपने लगे, लेकिन नीरजा ने तुरंत स्थिति की गंभीरता को भांप लिया।
जैसे ही आतंकवादियों ने विमान पर कब्जा किया, नीरजा ने अपनी सूझबूझ और अद्भुत फुर्ती का परिचय दिया। आतंकवादियों की नजरों से बचते हुए, उन्होंने तुरंत कॉकपिट क्रू को एक विशेष ‘हाईजैक कोड’ के जरिए इस संकट की सूचना दे दी। इस कोड को मिलते ही विमान के पायलट, को-पायलट और फ्लाइट इंजीनियर ने तय प्रक्रिया के तहत कॉकपिट के ऊपरी हिस्से से भागने के रास्ते का इस्तेमाल किया और विमान से बाहर निकल गए।
उनका विमान से निकलना बेहद जरूरी था, क्योंकि बिना पायलट के आतंकवादी विमान को उड़ाकर कहीं और नहीं ले जा सकते थे। हालांकि, पायलटों के जाने के बाद अब विमान के भीतर मौजूद 360 से अधिक यात्रियों और चालक दल की पूरी जिम्मेदारी 22 वर्षीय नीरजा भनोट के कंधों पर आ गई थी।
जब आतंकवादियों को पता चला कि पायलट भाग चुके हैं, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने नीरजा को ढूंढ निकाला और उनके सिर पर बंदूक तान दी। इस भयानक स्थिति में भी नीरजा का धैर्य नहीं डोला और उन्होंने खुद को शांत रखते हुए यात्रियों की सुरक्षा की योजना बनानी शुरू कर दी।
आतंकवादियों का क्रूर चेहरा और नीरजा की सूझबूझ

आतंकवादियों ने अपनी ताकत दिखाने और प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए तुरंत क्रूरता दिखाना शुरू कर दिया। उन्होंने सबसे पहले एक भारतीय-अमेरिकी यात्री राजेश कुमार को आगे बुलाया और उन्हें घुटनों के बल बैठने को कहा। जब पाकिस्तानी अधिकारियों ने उनकी मांगें मानने में देरी की, तो आतंकवादियों ने बेरहमी से राजेश कुमार को गोली मार दी और उनके शव को विमान के दरवाजे से नीचे रनवे पर फेंक दिया।
इस भयानक दृश्य ने विमान के भीतर बैठे हर व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद, आतंकवादियों ने नीरजा और अन्य चालक दल के सदस्यों को आदेश दिया कि वे विमान में मौजूद सभी यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करें। आतंकवादी विशेष रूप से अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाना चाहते थे ताकि वे अमेरिकी सरकार पर दबाव बना सकें।
नीरजा तुरंत समझ गईं कि अगर आतंकवादियों को अमेरिकी यात्रियों का पता चल गया, तो वे उन सबको एक-एक करके मार डालेंगे। यहीं पर नीरजा ने अपनी अद्वितीय बुद्धिमत्ता और मानवता का परिचय दिया, जिसने इतिहास में उनका नाम अमर कर दिया।
नीरजा ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पासपोर्ट इकट्ठा करना शुरू किया, लेकिन उन्होंने एक बेहद साहसी और गुप्त योजना पर काम किया। उन्होंने आतंकवादियों की नजर बचाकर चालाकी से विमान में सवार सभी 41 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्टों को छुपा दिया। कुछ पासपोर्टों को उन्होंने सीटों के नीचे सरका दिया, तो कुछ को कचरे के डिब्बे में डाल दिया। जब आतंकवादियों को पासपोर्ट सौंपे गए, तो उनमें से एक भी अमेरिकी पासपोर्ट नहीं था।
आतंकवादी इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ रहे कि नीरजा ने अपनी जान जोखिम में डालकर दर्जनों अमेरिकी नागरिकों की जान बचा ली थी। अगर आतंकवादियों को इस चालाकी का जरा सा भी अंदाजा हो जाता, तो वे नीरजा को उसी वक्त जान से मार देते। पूरे 17 घंटों तक विमान कराची हवाई पट्टी पर खड़ा रहा।
इस दौरान न तो यात्रियों को पानी दिया गया और न ही ठीक से सांस लेने की आजादी थी। नीरजा लगातार विमान में घूम-घूम कर यात्रियों को सांत्वना दे रही थीं, बच्चों को दूध और बिस्कुट बांट रही थीं और आतंकवादियों को शांत रखने की कोशिश कर रही थीं।
जब विमान में छाया अंधेरा और शुरू हुआ खूनी खेल
समय बीतने के साथ विमान का ईंधन खत्म होने लगा, जिसके कारण विमान की बिजली गुल हो गई और अंदर पूरी तरह से अंधेरा छा गया। विमान के भीतर वातानुकूलन (AC) बंद होने से घुटन बढ़ने लगी और यात्रियों का धैर्य जवाब देने लगा। इधर, बिजली जाने से आतंकवादी भी बौखला गए। उन्हें लगा कि पाकिस्तानी सेना विमान पर धावा बोलने वाली है।
शाम के करीब 9:00 बजे, जब विमान के अंदर पूरी तरह से सन्नाटा और अंधेरा था, आतंकवादियों के सब्र का बांध टूट गया। उन्होंने चिल्लाते हुए विमान के बीच वाले हिस्से में सभी यात्रियों को इकट्ठा होने का आदेश दिया। अचानक, उन्होंने बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी और यात्रियों पर हथगोले फेंकने लगे।
विमान के भीतर का नजारा किसी नरक जैसा हो गया था। गोलियों की तड़तड़ाहट, बमों के धमाके और मासूम बच्चों व महिलाओं की चीखें गूंज रही थीं। चारों तरफ खून ही खून बिखरा हुआ था और लोग अपनी जान बचाने के लिए सीटों के नीचे छिपने की कोशिश कर रहे थे।
इस खौफनाक माहौल में भी नीरजा भनोट एक चट्टान की तरह खड़ी रहीं। जहां कोई भी सामान्य इंसान डर से सुन्न हो जाता, वहां नीरजा ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आपातकालीन निकास द्वारों (Emergency Exits) की तरफ छलांग लगाई।
उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगाकर विमान के आपातकालीन दरवाजों को खोल दिया और यात्रियों को बाहर निकलने के लिए चिल्लाने लगीं। उन्होंने खुद बाहर भागने के बजाय, सबसे पहले डरे हुए यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने का फैसला किया। वे लगातार गोलियों की बौछार के बीच खड़ी होकर यात्रियों को एक-एक करके आपातकालीन रास्ते से नीचे धकेल रही थीं।
उनकी इस हिम्मत को देखकर अन्य क्रू मेंबर्स ने भी यात्रियों की मदद करना शुरू किया। अंधेरे का फायदा उठाकर कई यात्री विमान से कूदकर अपनी जान बचाने में सफल रहे। नीरजा चाहतीं तो सबसे पहले खुद कूदकर अपनी जान बचा सकती थीं, क्योंकि वे दरवाजे के सबसे पास खड़ी थीं, लेकिन उनके भीतर के कर्तव्यबोध और मानवता ने उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं दी।
सर्वोच्च बलिदान और अमर शहादत
जब अधिकांश यात्री विमान से बाहर निकल चुके थे, तब नीरजा की नजर तीन छोटे बच्चों पर पड़ी जो डर के मारे एक सीट के नीचे छिपे हुए थे और रो रहे थे। नीरजा उन बच्चों को बचाने के लिए आगे बढ़ीं और उन्हें सुरक्षित निकास द्वार की तरफ ले जाने लगीं। इसी दौरान एक आतंकवादी की नजर नीरजा पर पड़ गई।
उसने देखा कि यह लड़की उसकी सारी योजना को नाकाम कर रही है और यात्रियों को भगा रही है। गुस्से में पागल होकर आतंकवादी ने सीधे उन मासूम बच्चों पर अपनी बंदूक तान दी। जैसे ही आतंकवादी ने गोली चलाने के लिए ट्रिगर दबाया, नीरजा ने एक पल की भी देरी नहीं की और वे उन बच्चों के सामने ढाल बनकर खड़ी हो गईं।
आतंकवादी की चलाई हुई कई गोलियां सीधे नीरजा के सीने और पेट में जा लगीं। गोली लगने के बाद भी नीरजा ने अपनी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने दर्द से तड़पते हुए भी उन तीनों बच्चों को आपातकालीन दरवाजे से नीचे सुरक्षित धकेल दिया।
गोलियों से छलनी होने के बाद नीरजा विमान के फर्श पर गिर पड़ीं। उनके शरीर से तेजी से खून बह रहा था। कुछ ही देर में पाकिस्तानी कमांडो विमान के अंदर दाखिल हुए और उन्होंने आतंकवादियों को काबू में कर लिया।
घायल नीरजा को तुरंत अस्पताल ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन रास्ते में ही इस वीर बेटी ने अपनी आखिरी सांसें लीं। मात्र 22 साल और 11 महीने की उम्र में नीरजा भनोट ने मानवता की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया। उनकी इस बहादुरी की बदौलत विमान में सवार 380 यात्रियों में से करीब 360 यात्रियों की जान बच गई।
जिन तीन बच्चों को नीरजा ने अपनी जान देकर बचाया था, उनमें से एक बच्चा बड़ा होकर एक प्रसिद्ध विमान पायलट बना, जिसने हमेशा कहा कि उसका यह जीवन नीरजा भनोट की देन है। नीरजा की शहादत ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया और वे वीरता का एक वैश्विक प्रतीक बन गईं।
नीरजा की विरासत और कभी न मिटने वाली पहचान
नीरजा भनोट के इस अदम्य साहस और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया। वे इस सम्मान को पाने वाली सबसे कम उम्र की नागरिक और पहली महिला बनीं। केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य देशों ने भी उनकी वीरता को सलाम किया।
पाकिस्तान सरकार ने उन्हें ‘तमगा-ए-इंसानियत’ से नवाजा, जबकि अमेरिकी सरकार ने उन्हें ‘जस्टिस फॉर क्राइम्स अवॉर्ड’ और ‘फ्लाइट सेफ्टी फाउंडेशन हीरोइज्म अवॉर्ड’ प्रदान किया। नीरजा के माता-पिता ने उनकी याद में मिलने वाली बीमा की राशि और पैन एम से मिले मुआवजे से ‘नीरजा भनोट पैन एम ट्रस्ट’ की स्थापना की।
यह ट्रस्ट हर साल दो पुरस्कार प्रदान करता है: एक पुरस्कार दुनिया भर के उस फ्लाइट क्रू मेंबर को दिया जाता है जो संकट के समय कर्तव्य से बढ़कर काम करता है, और दूसरा पुरस्कार उस भारतीय महिला को दिया जाता है जिसने सामाजिक अन्याय का डटकर मुकाबला किया हो।
नीरजा भनोट की कहानी आज भी करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का एक बहुत बड़ा स्रोत है। उन्होंने हमें सिखाया कि जिंदगी लंबी नहीं, बल्कि बड़ी और सार्थक होनी चाहिए। उनके जीवन पर साल 2016 में ‘नीरजा’ नाम से एक बॉलीवुड फिल्म भी बनाई गई, जिसमें सोनम कपूर ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म ने उनकी वीरता की कहानी को घर-घर तक पहुँचाया।
नीरजा आज हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनका साहस, उनकी मुस्कान और उनका निस्वार्थ बलिदान हमेशा इतिहास के पन्नों में और हर संवेदनशील इंसान के दिल में जिंदा रहेगा। कराची एयरपोर्ट की वह खूनी सुबह नीरजा के अमर होने की गवाह बनी।
जब भी दुनिया में वीरता, कर्तव्यनिष्ठा और मानवता की बात की जाएगी, तब-तब नीरजा भनोट का नाम सबसे ऊंचे और आदरणीय स्थान पर लिया जाएगा। वे भारत की एक ऐसी अनमोल बेटी थीं, जिसने मौत के सामने खड़े होकर भी मुस्कुराना और दूसरों की जिंदगी बचाना नहीं छोड़ा।
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नीरजा भनोट
प्रस्तुति: Saying Central Team