अरुणिमा सिन्हा

अरुणिमा सिन्हा — एक पैर खोने के बाद एवरेस्ट जीतने वाली लड़की

12
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

अरुणिमा सिन्हा — एक पैर खोने के बाद एवरेस्ट जीतने वाली लड़की

अरुणिमा सिन्हा का जन्म उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में एक बेहद साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर कुछ अलग करने का जज्बा था और खेलकूद में उनकी गहरी रुचि थी। उनके पिता सेना में थे, जिनका साया उनके सिर से बचपन में ही उठ गया था, लेकिन उनकी मां और भाई ने हमेशा उनके हौसले को नई उड़ान देने का प्रयास किया।

अरुणिमा केवल एक सामान्य लड़की नहीं थीं, बल्कि उनके भीतर राष्ट्रीय स्तर की एक बेहतरीन वॉलीबॉल और फुटबॉल खिलाड़ी बनने की असीम क्षमताएं मौजूद थीं। उन्होंने खेल के मैदान पर कई मेडल जीते और हमेशा अपनी टीम को आगे बढ़ाने के लिए पूरी जान लगा दी।

खेल के प्रति उनका यह समर्पण ही था जिसने उन्हें एक अलग पहचान दी थी, लेकिन नियति ने उनके लिए एक ऐसा रास्ता चुन रखा था जिसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। अरुणिमा का सपना केवल खेल तक सीमित नहीं था, वे अपने परिवार को एक बेहतर जिंदगी देने के लिए सरकारी नौकरी की तलाश में थीं और इसी सिलसिले में उन्होंने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में नौकरी के लिए आवेदन किया था, जिसके कॉल लेटर में हुई एक गलती को सुधारने के लिए उन्हें दिल्ली जाना पड़ा था।

वह भयानक काली रात और जिंदगी को बदलने वाला हादसा

12 अप्रैल 2011 का वह दिन अरुणिमा के जीवन का सबसे भयानक और अंधकारमय दिन साबित होने वाला था, जब वे पद्मावती एक्सप्रेस से लखनऊ से दिल्ली के लिए रवाना हुईं। ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफर कर रहे कुछ शातिर अपराधियों और लुटेरों की नजर अरुणिमा के गले में चमकती हुई सोने की चेन पर पड़ी और उन्होंने उसे छीनने की कोशिश की।

अरुणिमा एक साहसी खिलाड़ी थीं, उन्होंने आत्मसमर्पण करने के बजाय उन बदमाशों का डटकर मुकाबला किया और अपनी पूरी ताकत से खुद को बचाने का प्रयास किया। लेकिन अकेले होने के कारण वे उन कई अपराधियों के सामने टिक नहीं पाईं और दरिंदों ने उन्हें चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया।

अरुणिमा दूसरी पटरी पर जा गिरीं और उसी वक्त वहां से गुजर रही एक अन्य तेज रफ्तार ट्रेन उनके बाएं पैर के ऊपर से गुजर गई। रात के उस सन्नाटे में अरुणिमा पूरी रात असहनीय दर्द से चीखती रहीं, उनका बायां पैर पूरी तरह से कटकर अलग हो चुका था और दाहिने पैर की हड्डियां भी चकनाचूर हो चुकी थीं। पूरी रात करीब 49 ट्रेनें उनके पास से गुजरती रहीं, चूहे उनके कटे हुए पैर को कुतर रहे थे, लेकिन वे बेबस और लाचार होकर सुबह होने का इंतजार करती रहीं।

अस्पताल का संघर्ष और खुद से किया गया ऐतिहासिक वादा

सुबह होने पर कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने अरुणिमा को लहूलुहान हालत में देखा और उन्हें तुरंत पास के बरेली जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में स्थिति इतनी गंभीर थी कि वहां न तो एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) उपलब्ध थी और न ही पर्याप्त खून था, जिसके कारण डॉक्टरों को बिना बेहोश किए ही उनका पैर काटना पड़ा।

इसके बाद उनकी नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां वे कई महीनों तक जिंदगी और मौत के बीच जूझती रहीं। अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए जब उन्होंने अखबारों में अपने बारे में झूठी खबरें पढ़ीं कि वे बिना टिकट यात्रा कर रही थीं या उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की थी, तो उनका दिल पूरी तरह टूट गया।

समाज के इन तानों और अपनी शारीरिक लाचारी के बीच अरुणिमा ने हार मानने के बजाय एक ऐसा फैसला किया जिसने पूरे चिकित्सा जगत को हैरान कर दिया। उन्होंने अपने मन में संकल्प लिया कि वे अपनी इस लाचारी का जवाब दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर, माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर देंगी। लोगों ने उन्हें पागल समझा और डॉक्टरों ने कहा कि वे कभी सीधे खड़ी भी नहीं हो पाएंगी, लेकिन अरुणिमा का इरादा पूरी तरह अटल हो चुका था।

बछेंद्री पाल का साथ और पर्वतारोहण का कठिन प्रशिक्षण

अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही अरुणिमा अपने घर जाने के बजाय सीधे जमशेदपुर में भारत की पहली महिला एवरेस्ट विजेता बछेंद्री पाल से मिलने पहुंच गईं। बछेंद्री पाल ने जब अरुणिमा के कटे पैर और उनकी आंखों में एवरेस्ट फतह करने का अटूट विश्वास देखा, तो उन्होंने भावुक होकर कहा कि तुमने तो अपने मन में एवरेस्ट फतह कर ही लिया है, अब बस दुनिया को तारीख बताना बाकी है।

इसके बाद टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन में अरुणिमा का बेहद कठिन और दर्दनाक प्रशिक्षण शुरू हुआ, जहां उन्हें कृत्रिम पैर (प्रोस्थेटिक लेग) के साथ चलने और चढ़ाई करने का अभ्यास करना था। शुरुआत में कृत्रिम पैर के कारण उनकी चमड़ी छिल जाती थी, घाव से खून बहने लगता था और असहनीय दर्द होता था, लेकिन उन्होंने एक दिन भी आंसू नहीं बहाए।

जब अन्य सामान्य पर्वतारोही अपनी चढ़ाई पूरी कर आराम कर रहे होते थे, तब अरुणिमा घंटों अतिरिक्त अभ्यास करती थीं ताकि वे अपने शरीर को पहाड़ों के अनुकूल ढाल सकें। बर्फ पर चलते समय उनका नकली पैर बार-बार घूम जाता था और वे नीचे गिर जाती थीं, लेकिन हर बार गिरकर खड़े होने की उनकी इस जिद ने उनके ट्रेनर्स को भी हैरान कर दिया था।

माउंट एवरेस्ट पर विजय और इतिहास के पन्नों में अमरता

अरुणिमा सिन्हा

आखिरकार वह ऐतिहासिक दिन आ ही गया जब 21 मई 2013 को सुबह 10:55 पर अरुणिमा सिन्हा ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर कदम रखकर इतिहास रच दिया। उनकी इस अंतिम चढ़ाई के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब उनका ऑक्सीजन सिलेंडर लगभग खत्म होने की कगार पर था और उनके शेरपा ने उन्हें वापस लौटने की सलाह दी थी।

लेकिन अरुणिमा ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आगे बढ़ना जारी रखा क्योंकि उन्हें पता था कि अगर वे आज पीछे हट गईं तो कोई भी दोबारा किसी विकलांग पर भरोसा नहीं करेगा। एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर उन्होंने पूरी दुनिया के सामने भारत का तिरंगा झंडा लहराया और वहां की बर्फ में अपनी कुछ तस्वीरें और वीडियो सुरक्षित किए ताकि वे दुनिया को दिखा सकें कि हौसले के सामने कोई भी पहाड़ ऊंचा नहीं होता।

माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली वे दुनिया की पहली महिला दिव्यांग पर्वतारोही बन गईं, जिन्होंने अपनी कमजोरी को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया था। इसके बाद भी वे रुकी नहीं और उन्होंने दुनिया के सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने का मिशन पूरा किया, जिसमें अफ्रीका का किलिमंजारो, यूरोप का एल्ब्रस और अंटार्कटिका का विंसन मैसिफ शामिल है। अरुणिमा सिन्हा की यह पूरी कहानी हमें सिखाती है कि इंसान शरीर से नहीं, बल्कि हमेशा अपने मन और विचारों से विकलांग होता है।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

अरुणिमा सिन्हा
प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES