रंगों का परीलोक (परी कथा)
बहुत समय पहले, जब इंद्रधनुष हर सुबह धरती को छूने आता था, तब आसमान के ठीक ऊपर एक अद्भुत स्थान था जिसे “रंगों का परीलोक” कहा जाता था। यह कोई साधारण दुनिया नहीं थी, बल्कि खुशियों, रंगों और संगीत से भरी हुई एक जादुई भूमि थी। यहाँ परियाँ रहती थीं जिनके पंख इतने चमकदार थे कि जब वे उड़तीं तो आसमान में रंगों की लहरें फैल जातीं।
इस परीलोक की परियाँ केवल सुंदर ही नहीं थीं, बल्कि उनके दिल भी उतने ही पवित्र थे। उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी—खुशी बाँटना। अगर कोई उदास होता, तो उनकी मुस्कान उसके दिल को हल्का कर देती। अगर किसी की आँखों में आँसू होते, तो वे उसे मोती बनाकर मुस्कान में बदल देतीं।
परीलोक के नीचे एक सुंदर गाँव बसा हुआ था। वहाँ के बच्चे रंग-बिरंगे कपड़े पहनते थे—लाल, नीले, पीले, हरे—हर रंग जैसे प्रकृति ने खुद उन्हें उपहार में दिया हो। सुबह से शाम तक बच्चे खेलते, हँसते और नाचते रहते थे। उनकी हँसी से फूल और भी खिल उठते थे और पक्षी उनके साथ मिलकर गीत गाते थे।
गाँव के बच्चे अपने माता-पिता से बहुत प्रेम करते थे। सुबह होते ही वे दौड़कर उनके पास जाते और उन्हें गले लगाते। उनकी मासूम मुस्कान से घरों में गर्माहट भर जाती थी। दादा-दादी इस गाँव के सबसे अनमोल लोग थे। रात को बच्चे उनके पास बैठकर कहानियाँ सुनते और जीवन का ज्ञान प्राप्त करते। इस तरह प्रेम और स्नेह हर दिल में बस गया था।
एक दिन गाँव की एक छोटी बच्ची कमल बीमार पड़ गई। वह कई दिनों से खेल नहीं पा रही थी, जिससे उसके दोस्त बहुत उदास हो गए। परियों ने यह देखा और सोचा कि अब बच्चों को एक महत्वपूर्ण सीख दी जानी चाहिए।
नीली परी आसमान से उतरकर बोली कि असली खुशी बाँटने में होती है। हरी परी ने समझाया कि दुख तब छोटा हो जाता है जब उसे मिलकर साझा किया जाए। सफेद परी ने कहा कि अगर सभी मिलकर किसी दुखी व्यक्ति के साथ खड़े हों, तो उसका दुख धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
अगले दिन गाँव के सभी बच्चे कमल के घर पहुँचे। कोई फूल लेकर आया, कोई गीत गाने लगा, कोई नाचने लगा और कोई कहानियाँ सुनाने लगा। धीरे-धीरे कमल के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। उसका दुख खुशी में बदलने लगा और वह फिर से स्वस्थ महसूस करने लगी।
यह दृश्य परीलोक से परियाँ देख रही थीं। उनकी आँखों में संतोष था और उनके पंखों से रंगीन रोशनी बरस रही थी। उन्होंने देखा कि बच्चों ने एक महत्वपूर्ण सत्य समझ लिया है—खुशी बाँटने से बढ़ती है और दुख बाँटने से कम हो जाता है।
इसके बाद गाँव में हर वर्ष “खुशियों का त्योहार” मनाया जाने लगा।
उस दिन हर कोई रंग-बिरंगे कपड़े पहनता, नाचता, गाता और एक-दूसरे को गले लगाता। कोई अकेला नहीं रहता था। अगर किसी के मन में दुख होता, तो पूरा गाँव उसे दूर करने में लग जाता। अगर कोई खुश होता, तो उसकी खुशी सभी के साथ बाँटी जाती।
परियाँ हर त्योहार पर आकर गाँव को आशीर्वाद देतीं। वे कहतीं कि सच्ची खुशी वही है जो दूसरों तक पहुँचे। उनकी बातों ने गाँव को और भी सुंदर बना दिया था। वहाँ का वातावरण हमेशा प्रेम, रंग और संगीत से भरा रहता था।
समय बीतता गया, लेकिन परीलोक की यह शिक्षा कभी नहीं बदली। वह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही—कि जीवन का सबसे बड़ा जादू खुशियाँ बाँटने और दूसरों के दुख को कम करने में छिपा है।
फाख्ता के अंडे और मैं – बचपन की एक सच्ची घटना
जब हम छोटे थे, तो हमारे लिए दुनिया का सबसे प्यारा स्थान हमारा ननिहाल होता था। मेरा ननिहाल पंजाब के नाभा के पास रोहटी मौड़ां गाँव में था। वहाँ मेरे नाना जी सरदार हरमील सिंह रहते थे, जो बहुत सरल और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और बाद में गाँव के मुखिया भी बने। उनका घर और खासकर उनका बगीचा, जिसे हम “वाड़ी” कहते थे, हमारे लिए किसी जादुई दुनिया से कम नहीं था।
उस बगीचे में आम, अमरूद, अनार, अंगूर और नींबू के कई पेड़ थे। हर पेड़ पर पक्षियों की चहचहाहट गूंजती रहती थी और हर कोना जीवन से भरा हुआ लगता था। लेकिन उन सबमें सबसे खास था एक बड़ा आम का पेड़, जिसकी डालियाँ मुझे हमेशा अपनी ओर बुलाती थीं।
उसी पेड़ से जुड़ी एक ऐसी घटना है, जिसने मेरे बचपन की सोच को हमेशा के लिए बदल दिया।
उस आम के पेड़ पर एक फाख्ता ने अपना घोंसला बनाया हुआ था। उसमें उसने अपने अंडे दिए थे। मैं बहुत छोटा था, लगभग पाँच-छह साल का, लेकिन हर दिन उन अंडों को देखने बगीचे में चला जाता था। फाख्ता बहुत सावधानी से अपने अंडों की रक्षा कर रही थी और मैं घंटों उसे देखता रहता था।
एक दिन मैंने देखा कि एक कौआ बार-बार उस घोंसले की तरफ झपटता है। फाख्ता तुरंत उसे भगा देती थी। यह दृश्य देखकर मुझे बहुत डर और दुख हुआ। मुझे लगा कि कौआ उसके अंडों को नुकसान पहुँचाना चाहता है। मेरे मन में अचानक एक भावना जागी कि मुझे उन अंडों की रक्षा करनी चाहिए।
मैंने तुरंत नाना जी से कहा कि मैं बगीचे में बैठकर फाख्ता के अंडों की रक्षा करना चाहता हूँ। नाना जी मुस्कुराए, लेकिन उन्होंने मुझे समझाया भी कि यह आसान काम नहीं है। फिर भी उन्होंने मुझे अनुमति दे दी। उस दिन से मैंने खुद को उस छोटे से घोंसले का रक्षक मान लिया।
मैं रोज़ बगीचे में जाकर उसी पेड़ के नीचे बैठ जाता था। मेरा खाना भी वहीं पहुँच जाता था। मैं घंटों अंडों की निगरानी करता और किसी भी पक्षी को उनके पास नहीं आने देता था। धीरे-धीरे फाख्ता भी मेरी मौजूदगी को समझने लगी और अब वह मुझसे डरती नहीं थी। वह जान गई थी कि मैं उसकी मदद कर रहा हूँ।
हालाँकि यह काम इतना आसान नहीं था। कभी-कभी दूसरे पक्षी घोंसले के पास आ जाते थे। मैं तुरंत दौड़कर उन्हें भगाता था। यह मेरे लिए एक जिम्मेदारी बन गई थी, और मैं इसे पूरी गंभीरता से निभाता था, जैसे कोई बड़ा काम कर रहा हूँ।
कुछ दिनों बाद वह पल आया जिसका मुझे इंतज़ार था। घोंसले में से छोटे-छोटे बच्चे बाहर आने लगे। मैं बहुत खुश हो गया। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी मेहनत सफल हो गई हो और मैंने सच में किसी जीवन की रक्षा की हो।
जब वे छोटे बच्चे बड़े होकर उड़ने लगे, तो वह दृश्य मेरे लिए बहुत अद्भुत था। उनके छोटे-छोटे पंखों से उड़कर आसमान में जाना देखकर मुझे गहरी खुशी और गर्व महसूस हुआ। उस पल मुझे समझ आया कि किसी की रक्षा करना कितना बड़ा और सुखद अनुभव होता है।
उस दिन के बाद मेरी सोच बदल गई। मुझे एहसास हुआ कि बचपन की यह छोटी-सी घटना केवल खेल नहीं थी, बल्कि एक सीख थी—कि हर जीव का जीवन महत्वपूर्ण है। चाहे वह इंसान हो या पक्षी, उसकी रक्षा करना और उसका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।
आज भी जब मैं उस बगीचे और उस फाख्ता को याद करता हूँ, तो दिल में एक शांत खुशी भर जाती है। वह अनुभव मुझे हमेशा याद दिलाता है कि सच्ची खुशी किसी बड़े काम में नहीं, बल्कि किसी छोटे जीवन की रक्षा करने में छिपी होती है।
देवता की सीख (कहानी)

एक छोटे से गाँव में एक सुंदर और शांत मंदिर था। उस मंदिर के पास एक महात्मा जी रहते थे, जो रोज़ देवता की पूजा और आरती करते थे। गाँव के लोग उन पर बहुत श्रद्धा रखते थे और बच्चे भी अक्सर उनके पास बैठकर बातें सुनते थे।
उसी गाँव में एक होनहार और समझदार बच्चा रहता था, जिसका नाम माधव था। वह पढ़ाई में बहुत तेज़ था, लेकिन साथ ही बहुत जिज्ञासु भी था। वह अक्सर महात्मा जी के पास जाकर उनसे तरह-तरह के सवाल पूछा करता था। महात्मा जी उसे बहुत स्नेह करते थे।
एक दिन माधव ने उत्सुक होकर महात्मा जी से पूछा, “बाबा, क्या देवता सच में होते हैं?”
महात्मा जी मुस्कुराए और बोले, “हाँ बेटा, देवता होते हैं।”
माधव ने फिर पूछा, “और वे क्या करते हैं?”
महात्मा जी ने कहा, “वे सब कुछ कर सकते हैं और अपने भक्तों को सब कुछ दे सकते हैं।”
यह सुनकर माधव के मन में देवता के प्रति एक गहरी श्रद्धा और उत्सुकता पैदा हो गई। वह मंदिर जाने लगा और मन ही मन देवता से अपनी इच्छाएँ माँगने लगा। उसे लगने लगा कि शायद देवता उसकी हर इच्छा पूरी कर देंगे। धीरे-धीरे वह पढ़ाई की ओर थोड़ा लापरवाह होने लगा और खेलकूद में अधिक समय बिताने लगा।
कुछ समय बाद एक रात माधव को एक बहुत ही स्पष्ट और अद्भुत सपना आया। उसने देखा कि स्वयं देवता उसके सामने खड़े हैं। उनका चेहरा शांत और तेजस्वी था। देवता ने उससे कहा, “यह सच है कि मैं सब कुछ दे सकता हूँ, लेकिन मैं केवल उन्हीं को देता हूँ जो मेहनत करते हैं।” देवता ने आगे समझाया, “यदि मैं बिना मेहनत करने वालों को सब कुछ देने लगूँ, तो वे आलसी हो जाएँगे। मेहनत ही सफलता की असली कुंजी है। खेलना अच्छा है, लेकिन पढ़ाई पर भी ध्यान देना ज़रूरी है। अगर तुमने मेहनत नहीं की, तो दूसरे बच्चे तुमसे आगे निकल जाएँगे।”
यह सुनकर माधव को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि केवल प्रार्थना करने से नहीं, बल्कि मेहनत करने से ही सफलता मिलती है। जब वह नींद से जागा, तो उसने तुरंत महात्मा जी को अपना सपना बताया।
महात्मा जी मुस्कुराए और बोले, “देवता हमेशा मेहनत करने वालों के साथ रहते हैं। वे केवल उन्हीं की मदद करते हैं जो अपने प्रयासों में ईमानदार होते हैं।”
उस दिन के बाद माधव ने अपनी आदत बदल दी। वह मन लगाकर पढ़ाई करने लगा और खेलकूद को भी संतुलित रूप से समय देने लगा। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई और परीक्षा के परिणाम में वह अपनी कक्षा में प्रथम स्थान पर आया।
माधव बहुत खुश हुआ, लेकिन उसे अब यह समझ आ चुका था कि उसकी सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ उसकी मेहनत का था, न कि केवल इच्छाओं का।
रंगों का परीलोक (परी कथा)
बहुत समय पहले, जब इंद्रधनुष हर सुबह धरती को छूने आता था, तब आसमान के ठीक ऊपर एक अद्भुत स्थान था जिसे “रंगों का परीलोक” कहा जाता था। यह कोई साधारण दुनिया नहीं थी, बल्कि खुशियों, रंगों और संगीत से भरी हुई एक जादुई भूमि थी। यहाँ परियाँ रहती थीं जिनके पंख इतने चमकदार थे कि जब वे उड़तीं तो आसमान में रंगों की लहरें फैल जातीं।
इस परीलोक की परियाँ केवल सुंदर ही नहीं थीं, बल्कि उनके दिल भी उतने ही पवित्र थे। उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी—खुशी बाँटना। अगर कोई उदास होता, तो उनकी मुस्कान उसके दिल को हल्का कर देती। अगर किसी की आँखों में आँसू होते, तो वे उसे मोती बनाकर मुस्कान में बदल देतीं।
परीलोक के नीचे एक सुंदर गाँव बसा हुआ था। वहाँ के बच्चे रंग-बिरंगे कपड़े पहनते थे—लाल, नीले, पीले, हरे—हर रंग जैसे प्रकृति ने खुद उन्हें उपहार में दिया हो। सुबह से शाम तक बच्चे खेलते, हँसते और नाचते रहते थे। उनकी हँसी से फूल और भी खिल उठते थे और पक्षी उनके साथ मिलकर गीत गाते थे।
गाँव के बच्चे अपने माता-पिता से बहुत प्रेम करते थे। सुबह होते ही वे दौड़कर उनके पास जाते और उन्हें गले लगाते। उनकी मासूम मुस्कान से घरों में गर्माहट भर जाती थी। दादा-दादी इस गाँव के सबसे अनमोल लोग थे। रात को बच्चे उनके पास बैठकर कहानियाँ सुनते और जीवन का ज्ञान प्राप्त करते। इस तरह प्रेम और स्नेह हर दिल में बस गया था।
एक दिन गाँव की एक छोटी बच्ची कमल बीमार पड़ गई। वह कई दिनों से खेल नहीं पा रही थी, जिससे उसके दोस्त बहुत उदास हो गए। परियों ने यह देखा और सोचा कि अब बच्चों को एक महत्वपूर्ण सीख दी जानी चाहिए।
नीली परी आसमान से उतरकर बोली कि असली खुशी बाँटने में होती है। हरी परी ने समझाया कि दुख तब छोटा हो जाता है जब उसे मिलकर साझा किया जाए। सफेद परी ने कहा कि अगर सभी मिलकर किसी दुखी व्यक्ति के साथ खड़े हों, तो उसका दुख धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
अगले दिन गाँव के सभी बच्चे कमल के घर पहुँचे। कोई फूल लेकर आया, कोई गीत गाने लगा, कोई नाचने लगा और कोई कहानियाँ सुनाने लगा। धीरे-धीरे कमल के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। उसका दुख खुशी में बदलने लगा और वह फिर से स्वस्थ महसूस करने लगी।
यह दृश्य परीलोक से परियाँ देख रही थीं। उनकी आँखों में संतोष था और उनके पंखों से रंगीन रोशनी बरस रही थी। उन्होंने देखा कि बच्चों ने एक महत्वपूर्ण सत्य समझ लिया है—खुशी बाँटने से बढ़ती है और दुख बाँटने से कम हो जाता है।
इसके बाद गाँव में हर वर्ष “खुशियों का त्योहार” मनाया जाने लगा।
उस दिन हर कोई रंग-बिरंगे कपड़े पहनता, नाचता, गाता और एक-दूसरे को गले लगाता। कोई अकेला नहीं रहता था। अगर किसी के मन में दुख होता, तो पूरा गाँव उसे दूर करने में लग जाता। अगर कोई खुश होता, तो उसकी खुशी सभी के साथ बाँटी जाती।
परियाँ हर त्योहार पर आकर गाँव को आशीर्वाद देतीं। वे कहतीं कि सच्ची खुशी वही है जो दूसरों तक पहुँचे। उनकी बातों ने गाँव को और भी सुंदर बना दिया था। वहाँ का वातावरण हमेशा प्रेम, रंग और संगीत से भरा रहता था।
समय बीतता गया, लेकिन परीलोक की यह शिक्षा कभी नहीं बदली। वह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही—कि जीवन का सबसे बड़ा जादू खुशियाँ बाँटने और दूसरों के दुख को कम करने में छिपा है।
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बालकथाएँ बच्चों के लिए रोचक, सरल और प्रेरणादायक कहानियाँ होती हैं। ये उनकी कल्पनाशक्ति, नैतिक मूल्यों, भाषा कौशल और रचनात्मक सोच को विकसित करती हैं। मनोरंजन के साथ-साथ जीवन की महत्वपूर्ण सीख भी प्रदान करती हैं।
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प्रस्तुति: Saying Central Team