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रावण और सोने की लंका का अहंकार

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रावण और सोने की लंका का अहंकार

त्रेतायुग के उस पावन काल में, जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए चौदह वर्षों के कठिन वनवास पर निकले थे, तब उनके साथ उनकी अर्धांगिनी माता सीता और परम प्रतापी भाई लक्ष्मण भी थे। वे तीनों पंचवटी के घने और सुरम्य जंगलों में एक छोटी सी कुटिया बनाकर रह रहे थे।

पंचवटी का वह वातावरण अत्यंत शांत, मनोहर और पवित्र था, जहां ऋषि-मुनियों का वास था और चारों ओर प्रकृति अपनी छटा बिखेर रही थी। श्री राम और लक्ष्मण वन के दुष्ट राक्षसों का संहार कर वहां के ऋषियों की रक्षा कर रहे थे, जिससे संपूर्ण क्षेत्र में धर्म की स्थापना हो रही थी। लेकिन इस शांति के पीछे एक बहुत बड़ा तूफान छुपा हुआ था, जो जल्द ही उनके जीवन को बदलने वाला था।

दूर समंदर पार, सोने की भव्य लंका में राक्षसराज रावण का शासन था, जो अपनी शक्ति, ऐश्वर्य और त्रिलोक विजय के अहंकार में डूबा हुआ था। रावण की लंका पूरी तरह से सोने की बनी हुई थी, जिसकी चमक देखकर देवता भी ईर्ष्या करते थे। रावण को अपनी शक्ति और अपनी सोने की लंका पर अटूट विश्वास था, और वह स्वयं को ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली प्राणी समझता था, परंतु उसका यही अहंकार उसकी मति भ्रष्ट करने का कारण बनने वाला था।

इसी दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसने इस पूरी कहानी की पृष्ठभूमि को तैयार कर दिया। रावण की बहन शूर्पणखा पंचवटी के जंगलों में घूम रही थी, तभी उसकी दृष्टि परम सुंदर और तेजस्वी श्री राम पर पड़ी। श्री राम के अद्भुत और सम्मोहक रूप को देखकर शूर्पणखा उन पर पूरी तरह से मोहित हो गई।

उसने अपनी मायावी शक्तियों से एक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और श्री राम के सम्मुख जाकर विवाह का प्रस्ताव रख दिया। श्री राम ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक मुस्कुराते हुए कहा कि वे प्रतिज्ञाबद्ध हैं और उनका विवाह हो चुका है, तथा उनकी पत्नी सीता उनके साथ हैं। उन्होंने शूर्पणखा को अपने छोटे भाई लक्ष्मण के पास भेज दिया, जो कुटिया के बाहर पहरा दे रहे थे।

लक्ष्मण ने भी शूर्पणखा के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और उसे वापस राम के पास भेज दिया। जब शूर्पणखा को समझ आया कि दोनों भाई उसके साथ केवल परिहास कर रहे हैं, तो वह अत्यंत क्रोधित हो गई। अपने असली भयानक राक्षसी रूप में आकर उसने माता सीता पर प्राणघातक हमला करने का प्रयास किया।

माता सीता को संकट में देखकर लक्ष्मण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने तुरंत अपनी तलवार निकाली और शूर्पणखा की नाक और कान काट दिए, जिससे वह लहूलुहान होकर चीखती हुई वहां से भाग खड़ी हुई।

मायावी मारीच और स्वर्ण मृग का कपट

शूर्पणखा रोती-बिलखती और दर्द से कराहती हुई सीधे अपनी सोने की लंका पहुंची और अपने भाई रावण की सभा में जाकर गिर पड़ी। उसने रावण को धिक्कारते हुए कहा कि उसके जैसा महाप्रतापी राजा होते हुए भी उसकी बहन की यह दुर्दशा हुई है।

उसने रावण को श्री राम की शक्ति और माता सीता की अलौकिक सुंदरता के बारे में बताया। शूर्पणखा ने रावण के अहंकार को भड़काते हुए कहा कि सीता जैसी अद्वितीय सुंदरी तो केवल लंका के राजा की रानी होने के योग्य है, वनवासियों की नहीं। अपनी बहन के अपमान की बात सुनकर और सीता के सौंदर्य का वर्णन पाकर रावण के भीतर प्रतिशोध और वासना की अग्नि सुलग उठी।

उसने तुरंत श्री राम से बदला लेने और माता सीता का हरण करने की एक भयंकर योजना बनाई। इस कुटिल योजना को अंजाम देने के लिए रावण अपने एक अत्यंत बुद्धिमान और मायावी राक्षस मामा मारीच के पास पहुंचा, जो उस समय वन में साधु का जीवन जी रहा था और श्री राम की शक्ति से भली-भांति परिचित था।

जब रावण ने मारीच को अपनी योजना बताई और उसकी सहायता मांगी, तो मारीच थर-थर कांपने लगा। मारीच ने रावण को बहुत समझाने का प्रयास किया कि श्री राम कोई साधारण मानव नहीं हैं, बल्कि वे साक्षात नारायण के अवतार हैं और उनसे शत्रुता मोल लेना लंका के विनाश को निमंत्रण देना है।

परंतु रावण का अहंकार सातवें आसमान पर था, उसने मारीच की एक न सुनी और उसे धमकी दी कि यदि उसने सहायता नहीं की, तो वह स्वयं उसका वध कर देगा। विवश होकर मारीच ने रावण की बात मान ली, क्योंकि वह जानता था कि रावण के हाथों मरने से कहीं बेहतर भगवान श्री राम के हाथों मृत्यु पाकर मोक्ष प्राप्त करना है।

मारीच ने अपनी मायावी शक्ति का उपयोग किया और एक अत्यंत सुंदर, अलौकिक सोने के हिरण का रूप धारण कर लिया, जिसके शरीर पर चांदी के बिंदु चमक रहे थे। वह मायावी स्वर्ण मृग पंचवटी में श्री राम की कुटिया के आसपास जाकर अठखेलियां करने लगा, ताकि माता सीता की दृष्टि उस पर पड़ सके।

कुटिया के आंगन में घूमते हुए उस अद्भुत और चमकीले सोने के हिरण को देखकर माता सीता मंत्रमुग्ध हो गईं। उन्होंने अपने जीवन में कभी ऐसा सुंदर जीव नहीं देखा था। उन्होंने अत्यंत स्नेहपूर्वक श्री राम से अनुरोध किया कि वे उस सुंदर हिरण को उनके लिए पकड़ लाएं।

यदि वह जीवित हाथ आ जाए तो वे उसे लंका से वापस अयोध्या ले जाकर पालेंगी, और यदि वह मारा जाए तो उसकी सुंदर स्वर्ण त्वचा उनकी कुटिया की शोभा बढ़ाएगी। श्री राम अपनी प्रिय पत्नी की इस इच्छा को टाल न सके, हालांकि वे जानते थे कि इस घने वन में ऐसा सोने का हिरण होना असंभव है और यह अवश्य ही राक्षसों की कोई माया है।

फिर भी, सीता के मुख पर प्रसन्नता देखने के लिए उन्होंने लक्ष्मण को कुटिया और माता सीता की सुरक्षा का कड़ा दायित्व सौंपा और स्वयं धनुष-बाण लेकर उस मायावी हिरण के पीछे घने जंगलों की ओर चल दिए। स्वर्ण मृग श्री राम को छकाते हुए वन में बहुत दूर ले गया, और जब राम को आभास हुआ कि इसे जीवित पकड़ना असंभव है, तो उन्होंने एक बाण छोड़कर उसका वध कर दिया।

लक्ष्मण रेखा और रावण का भिक्षुक रूप

जैसे ही श्री राम का बाण मारीच को लगा, वह अपने असली राक्षस रूप में आ गया। मरते-मरते उसने रावण की योजना के अनुसार श्री राम की आवाज की हूबहू नकल करते हुए ऊंचे स्वर में चिल्लाकर पुकारा, “हा लक्ष्मण! हा सीते! रक्षा करो!” यह भयानक और दर्दभरी आवाज गूंजती हुई सीधे पंचवटी की कुटिया तक पहुंची।

उस आवाज को सुनकर माता सीता अत्यंत भयभीत और व्याकुल हो गईं। उन्हें लगा कि उनके स्वामी किसी महान संकट में फंस गए हैं और उन्हें सहायता की आवश्यकता है। उन्होंने तुरंत लक्ष्मण से कहा कि वे वन में जाएं और अपने भाई की रक्षा करें। परंतु लक्ष्मण अपने भाई की असीम शक्ति को जानते थे, वे समझ गए कि यह किसी राक्षस की मायावी चाल है।

उन्होंने माता सीता को आश्वस्त करने का प्रयास किया कि भैया राम को त्रिलोक में कोई भी पराजित नहीं कर सकता, वे सुरक्षित हैं। लेकिन सीता जी का हृदय आशंकाओं से घिर चुका था, उन्होंने अत्यंत व्याकुलता और क्रोध में आकर लक्ष्मण को कुछ ऐसे कटु वचन कह दिए, जिससे लक्ष्मण का हृदय छलनी हो गया।

माता सीता के वचनों से आहत होकर और उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए लक्ष्मण वन में जाने को तैयार हो गए। परंतु जाने से पहले उन्होंने माता सीता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपने बाण की नोक से कुटिया के चारों ओर एक अभेद्य और पवित्र रेखा खींची, जिसे इतिहास में ‘लक्ष्मण रेखा’ के नाम से जाना जाता है।

लक्ष्मण ने माता सीता से हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि वे चाहे जो हो जाए, इस रेखा के बाहर कदम न रखें, क्योंकि कोई भी आसुरी शक्ति इस रेखा को पार करके भीतर नहीं आ सकती। लक्ष्मण के जाते ही झाड़ियों के पीछे छुपा हुआ रावण सही अवसर देखकर बाहर आ गया।

उसने एक अत्यंत सौम्य, वृद्ध और भूखे ब्राह्मण भिक्षुक का रूप धारण कर रखा था। वह हाथ में कमंडल लेकर कुटिया के द्वार पर आया और ऊंचे स्वर में “भिक्षाम देही” की पुकार लगाने लगा। माता सीता हाथ में अन्न का पात्र लेकर कुटिया से बाहर आईं और लक्ष्मण रेखा के भीतर से ही उस ब्राह्मण को भिक्षा देने का प्रयास करने लगीं।

कपट की मूर्ति बने रावण ने देखा कि वह लक्ष्मण रेखा के कारण कुटिया के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि जैसे ही वह उस रेखा के समीप जाता, उसमें से अग्नि की लपटें निकलने लगती थीं। तब रावण ने अपनी कुटिल बुद्धि का प्रयोग किया और अत्यंत क्रोधित होने का नाटक करते हुए कहा कि एक सन्यासी का इस तरह दूर से भिक्षा लेना अपमानजनक है।

उसने माता सीता से कहा कि यदि वे रेखा पार करके बाहर आकर आदरपूर्वक भिक्षा नहीं देंगी, तो वह बिना भिक्षा लिए ही वहां से चला जाएगा और उनके कुल को श्राप दे देगा। भारतीय संस्कृति में अतिथि और सन्यासी का अपमान बहुत बड़ा पाप माना जाता था, इसलिए माता सीता भयभीत हो गईं।

वे ब्राह्मण देव के श्राप के डर से और मर्यादा का पालन करने के लिए भूलवश उस पवित्र लक्ष्मण रेखा को पार कर बाहर आ गईं। जैसे ही माता सीता का पैर उस रेखा से बाहर निकला, रावण के चेहरे पर एक कुटिल और भयानक मुस्कान तैर गई, क्योंकि उसका आधा काम पूरा हो चुका था।

सीता माता का हरण और जटायु का पराक्रम

जैसे ही माता सीता ने लक्ष्मण रेखा को पार किया, रावण ने तुरंत अपना साधु का भेष त्याग दिया और अपने असली भयानक, दस सिर और बीस भुजाओं वाले विशाल राक्षस रूप में प्रकट हो गया। रावण के इस भयंकर और डरावने रूप को देखकर माता सीता थर-थर कांपने लगीं और भय के मारे चीखने लगीं।

रावण ने अट्टहास करते हुए कहा कि वह लंका का अधिपति रावण है और वह उनका हरण करने आया है। सीता जी ने उसे बहुत धिक्कारा और श्री राम के प्रताप की चेतावनी दी, परंतु काम और अहंकार के अंधे रावण पर किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने अत्यंत क्रूरतापूर्वक माता सीता के केश पकड़े और उन्हें जबरन खींचकर अपने दिव्य और तीव्र गति से चलने वाले पुष्पक विमान में बैठा लिया।

पुष्पक विमान हवा की गति से आकाश में उड़ने लगा, और माता सीता असहाय होकर आकाश से नीचे देखते हुए “हा राम! हा लक्ष्मण!” कहकर विलाप करने लगीं, परंतु उस घने वन में उनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था।

जब पुष्पक विमान आकाश मार्ग से लंका की ओर तेजी से बढ़ रहा था, तब माता सीता का करुण विलाप सुनकर वहां के वृक्ष, नदियां और पशु-पक्षी भी रोने लगे। उसी समय, एक ऊंचे पर्वत की चोटी पर बैठे वृद्ध पक्षीराज जटायु ने माता सीता के रोने की आवाज सुनी। जटायु श्री राम के पिता राजा दशरथ के परम मित्र थे।

जब उन्होंने आकाश में देखा कि दुष्ट रावण एक अबला स्त्री का हरण करके ले जा रहा है, तो उनका रोंगटे खड़े हो गए। जटायु ने बिना अपनी वृद्धावस्था और रावण की अपार शक्ति की परवाह किए, अत्यंत वीरता के साथ रावण को ललकारा। उन्होंने हवा में छलांग लगाई और अपने विशाल पंखों तथा तीखे पंजों से रावण के पुष्पक विमान पर हमला कर दिया।

जटायु और रावण के बीच आकाश में एक अत्यंत भयंकर और अभूतपूर्व युद्ध छिड़ गया। पक्षीराज ने अपनी चोंच और पंजों से रावण के रथ को क्षतिग्रस्त कर दिया, उसके सारथी को मार गिराया और रावण के शरीर को भी लहुलुहान कर दिया।

वृद्ध होने के बावजूद जटायु ने रावण को नाको चने चबवा दिए और कुछ समय के लिए माता सीता को उसके चंगुल से मुक्त कराने की स्थिति में आ गए। परंतु रावण अत्यंत कुटिल और मायावी योद्धा था, जब उसने देखा कि वह साधारण युद्ध में इस विशाल पक्षी को परास्त नहीं कर पा रहा है, तो उसने अपनी चंद्रहास तलवार निकाली और क्रूरतापूर्वक जटायु के दोनों विशाल पंख काट दिए।

पंख कटते ही लहूलुहान होकर पक्षीराज जटायु “राम-राम” जपते हुए धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़े और अपने प्राणों को रोककर श्री राम की प्रतीक्षा करने लगे ताकि वे उन्हें इस घटना की सूचना दे सकें। जटायु को धराशायी करने के बाद रावण पुनः माता सीता को लेकर आकाश मार्ग से लंका की ओर बढ़ गया।

रास्ते में माता सीता ने सूझबूझ से काम लिया और अपने शरीर के बहुमूल्य आभूषणों को एक वस्त्र में बांधकर नीचे पर्वत पर बैठे कुछ वानरों (सुग्रीव और उनके साथी) के बीच गिरा दिया, ताकि श्री राम को उनके मार्ग का संकेत मिल सके।

सोने की लंका का वैभव और अशोक वाटिका का शोक

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विशाल समुद्र को पार करके रावण अंततः माता सीता को लेकर अपनी सोने की भव्य नगरी लंका में पहुंच गया। लंका का वैभव अत्यंत अकल्पनीय था, चारों ओर सोने के ऊंचे-ऊंचे महल, रत्नजड़ित द्वार और विशाल प्राचीरें थीं, जो सूर्य की किरणों में दिव्य रूप से चमक रही थीं।

रावण ने माता सीता को अपने वैभव से प्रभावित करने के लिए उन्हें अपना विशाल राजमहल दिखाया और दासी-दासों की लंबी फौज खड़ी कर दी। उसने सीता जी से कहा कि यदि वे उसकी पटरानी बनना स्वीकार कर लें, तो वे इस समस्त ऐश्वर्य और त्रिलोक की स्वामिनी बन जाएंगी और उनकी सभी दासियां उनके चरणों में रहेंगी। परंतु माता सीता के लिए वह सोने की लंका एक जलते हुए श्मशान के समान थी।

उन्होंने रावण के ऐश्वर्य को तिनके के समान तुच्छ समझा और उसकी ओर देखना भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने रावण को स्पष्ट कह दिया कि उनके प्राण केवल श्री राम के हैं और राम का एक ही बाण इस पूरी सोने की लंका को राख में बदलने के लिए पर्याप्त है।

जब रावण ने देखा कि माता सीता उसके महलों के सुख-वैभव और धमकियों से तनिक भी विचलित नहीं हो रही हैं, तो वह अत्यंत कुंठित और क्रोधित हो गया। उसने माता सीता को अपने मुख्य राजमहल में रखने के बजाय लंका के सबसे सुंदर और सुरक्षित उपवन “अशोक वाटिका” में ले जाकर बंदी बना दिया।

अशोक वाटिका सुंदर अशोक के वृक्षों, लताओं और सुगंधित पुष्पों से सुसज्जित एक अत्यंत मनोहर स्थान था, परंतु माता सीता के लिए वह घोर दुःख का केंद्र बन गया। रावण ने वहां भयानक, विकराल और डरावनी शक्लों वाली राक्षसियों का एक कड़ा पहरा बिठा दिया।

उसने उन राक्षसियों को आदेश दिया कि वे सीता को दिन-रात डराएं, धमकाएं और मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित करें कि वे विवश होकर रावण के विवाह प्रस्ताव को स्वीकार कर लें। उन राक्षसियों में केवल ‘त्रिजटा’ नाम की एक राक्षसी थी, जिसके हृदय में दया और धर्म की भावना थी, और वह माता सीता को अपनी पुत्री के समान मानकर उन्हें सांत्वना देती थी।

अशोक वाटिका में माता सीता एक विशाल सिंशपा (अशोक) वृक्ष के नीचे, धूल भरी भूमि पर बैठकर अत्यंत दीन-हीन अवस्था में दिन-रात केवल श्री राम का स्मरण करती रहती थीं। उन्होंने अपने शरीर के बचे हुए आभूषण त्याग दिए थे, उनके केश बिखर चुके थे और उनकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहती रहती थी। वे पूरी तरह से निराहार रहकर केवल अपने पति की दीर्घायु और उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं।

रावण प्रतिदिन अशोक वाटिका में आता और अपनी तलवार दिखाकर उन्हें डराने का प्रयास करता, उन्हें एक वर्ष की समय-सीमा देता कि यदि इसके भीतर उन्होंने उसकी बात नहीं मानी, तो उसका रसोइया उनका वध करके भोजन बना देगा।

परंतु माता सीता घास के एक तिनके को अपने और रावण के बीच ओट बनाकर अत्यंत निर्भीकता से उसका सामना करती थीं और उसे याद दिलाती थीं कि उसका यह पाप ही उसकी सोने की लंका और उसके समस्त राक्षस कुल के समूल विनाश का कारण बनेगा।

श्री राम का विलाप और वानर सेना का संगठन

इधर पंचवटी के वन में जब श्री राम मायावी मारीच का वध करके कुटिया की ओर लौट रहे थे, तो रास्ते में उन्हें लक्ष्मण आते हुए दिखाई दिए। लक्ष्मण को अकेला देखकर श्री राम का हृदय किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि वे सीता को अकेली छोड़कर क्यों आए, क्योंकि वन दुष्ट राक्षसों से भरा पड़ा है।

लक्ष्मण ने अत्यंत दुःखी मन से पूरी परिस्थिति और माता सीता के कटु वचनों के बारे में बताया। जब दोनों भाई तीव्र गति से भागते हुए अपनी कुटिया पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। कुटिया पूरी तरह से सूनी पड़ी थी, बर्तन बिखरे हुए थे और माता सीता कहीं नहीं थीं। श्री राम अपनी प्रिय पत्नी के वियोग में अत्यंत व्याकुल हो गए।

वे पागलों की तरह वन के पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, हिरणों और पत्थरों से रो-रोकर पूछने लगे, “हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम्ह देखी सीता मृगनैनी?” राम का ऐसा मानवीय और करुण विलाप देखकर लक्ष्मण भी अपने आंसू नहीं रोक पाए और वे अपने बड़े भाई को संभालने का प्रयास करने लगे।

सीता जी की खोज में दोनों भाई घने जंगलों में भटकते हुए आगे बढ़े, जहां उनकी मुलाकात मरणासन्न अवस्था में पड़े पक्षीराज जटायु से हुई। जटायु के कटे हुए पंखों और शरीर से बहते खून को देखकर श्री राम अत्यंत द्रवित हो गए। जटायु ने अपनी अंतिम सांसें रोकते हुए श्री राम को बताया कि लंका का दुष्ट राजा रावण माता सीता का हरण करके दक्षिण दिशा की ओर ले गया है और उसने ही उनके यह पंख काटे हैं।

इतना बताने के बाद जटायु ने श्री राम की गोदी में अपने प्राण त्याग दिए। श्री राम ने परम भक्त जटायु का अपने हाथों से अंतिम संस्कार किया, जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

यहां से आगे बढ़ते हुए श्री राम और लक्ष्मण की मुलाकात शबरी नाम की एक वृद्ध भीलनी भक्त से हुई, जिसने उन्हें अत्यंत प्रेम से अपने जूठे मीठे बेर खिलाए। शबरी ने ही श्री राम को आगे बढ़कर ऋष्यमूक पर्वत पर रहने वाले वानर राज सुग्रीव से मित्रता करने की सलाह दी, जो उनकी इस खोज में सहायता कर सकते थे।

शबरी के कथनानुसार श्री राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक

पर्वत पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार पवनपुत्र हनुमान जी से हुई। हनुमान जी ने अपने आराध्य श्री राम को तुरंत पहचान लिया और उनके चरणों में गिर पड़े। हनुमान जी ने श्री राम और सुग्रीव की अग्नि को साक्षी मानकर अटूट मित्रता करवाई।

श्री राम ने सुग्रीव के दुष्ट भाई बाली का वध करके सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया और उनका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाया। इसके बाद, कृतज्ञ सुग्रीव ने माता सीता की खोज के लिए चारों दिशाओं में अपनी विशाल वानर सेना की टुकड़ियां भेजीं।

दक्षिण दिशा की ओर जाने वाली टुकड़ी का नेतृत्व अंगद कर रहे थे, और उसमें हनुमान जी, जांबवंत और अन्य प्रतापी वानर शामिल थे। इसी टुकड़ी को समुद्र तट पर संपाती (जटायु के बड़े भाई) मिले, जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर यह सुनिश्चित किया कि माता सीता समुद्र पार लंका की अशोक वाटिका में पूरी तरह सुरक्षित हैं, जिसके बाद हनुमान जी समुद्र लांघकर लंका जाने के लिए तैयार हुए।

हनुमान जी का लंका गमन और सीता ढांढस

माता सीता का पता लगाने और श्री राम का संदेश उन तक पहुंचाने के लिए परम प्रतापी हनुमान जी ने अपने शरीर को एक विशाल पर्वत के समान विस्तृत किया और महेंद्र पर्वत से एक गगनभेदी हुंकार भरकर समुद्र के ऊपर से आकाश में छलांग लगा दी।

मार्ग में सुरसा, सिंहिका और मैनाक पर्वत जैसी अनेक बाधाओं और परीक्षाओं को अपनी बुद्धि और पराक्रम से पार करते हुए हनुमान जी रात के समय सोने की लंका नगरी में प्रविष्ट हुए। लंका की अभूतपूर्व चकाचौंध, सोने के महलों और विशाल सुरक्षा व्यवस्था को देखकर वे भी अचंभित रह गए, परंतु उनका एकमात्र लक्ष्य माता सीता को खोजना था।

वे अत्यंत छोटा रूप (मच्छर के समान) धारण करके रावण के महल, अंतःपुर और अन्य स्थानों पर खोज करने लगे। अंततः वे ढूंढते हुए सुंदर अशोक वाटिका में पहुंचे। वहां उन्होंने एक ऊंचे वृक्ष की शाखाओं के पीछे छुपकर देखा कि एक अत्यंत तेजस्वी परंतु दुःखी देवी धूल से सनी भूमि पर बैठी हुई निरंतर “राम-राम” का विलाप कर रही हैं। हनुमान जी समझ गए कि यही साक्षात जगज्जननी माता सीता हैं।

उसी समय रावण अपनी राक्षसियों के साथ वहां आया और उसने पुनः माता सीता को डराने-धमकाने का नीच प्रयास किया, परंतु माता सीता अडिग रहीं। रावण के जाने के बाद, जब सभी राक्षसियां सो गईं, तब हनुमान जी ने वृक्ष के ऊपर से अत्यंत मधुर स्वर में श्री राम के जन्म से लेकर वनवास और सीता हरण तक की पूरी पावन कथा का गान करना शुरू कर दिया।

अपने प्रभु की महिमा सुनकर माता सीता ने चकित होकर ऊपर देखा। तब हनुमान जी ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक नीचे आकर उनके सम्मुख श्री राम द्वारा दी गई दिव्य मुद्रिका (अंगूठी) रख दी। उस अंगूठी को पहचानकर माता सीता की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। हनुमान जी ने हाथ जोड़कर अपना परिचय श्री राम के दूत के रूप में दिया।

प्रारंभ में सीता जी को थोड़ा संदेह हुआ कि कहीं यह रावण की कोई नई माया तो नहीं है, परंतु जब हनुमान जी ने अपनी असीम भक्ति और श्री राम के गुणों का वर्णन किया, तो माता सीता का सारा संदेह दूर हो गया और उन्होंने हनुमान जी को अपने पुत्र के समान मानकर ढेर सारा आशीर्वाद दिया।

हनुमान जी ने माता सीता को ढांढस बंधाया और कहा कि प्रभु श्री राम उनके वियोग में अत्यंत दुःखी हैं और वे शीघ्र ही एक विशाल वानर सेना के साथ समुद्र पार करके लंका आएंगे और रावण का वध करके उन्हें ससम्मान वापस ले जाएंगे। हनुमान जी ने यह भी प्रस्ताव रखा कि यदि माता की आज्ञा हो, तो वे उन्हें इसी क्षण अपनी पीठ पर बैठाकर समुद्र पार श्री राम के पास पहुंचा सकते हैं।

परंतु माता सीता ने अत्यंत मर्यादापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि एक परपुरुष की पीठ पर बैठकर जाना उनकी मर्यादा के विरुद्ध होगा, और वे चाहती हैं कि उनके स्वामी श्री राम स्वयं अपने बाणों के बल पर दुष्ट रावण का पराभव करके इस सोने की लंका का अहंकार नष्ट करें और उन्हें यहां से मुक्त कराएं।

हनुमान जी ने माता की इस उच्च मर्यादा को शीश झुकाकर स्वीकार किया और विदा लेने से पहले उनसे अपनी भूख शांत करने के लिए अशोक वाटिका के मधुर फलों को खाने की अनुमति मांगी।

लंका दहन और दुष्ट रावण के विनाश का प्रारंभ

माता सीता की अनुमति पाकर हनुमान जी ने अशोक वाटिका के वृक्षों पर चढ़कर फल खाने शुरू कर दिए और देखते ही देखते रावण के उस प्रिय उपवन को उजाड़ना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने बड़े-बड़े विशाल वृक्षों को उखाड़ फेंका, जिससे वाटिका की सुरक्षा में तैनात राक्षसियों में हाहाकार मच गया।

जब रावण के सैनिकों और उसके प्रतापी पुत्र अक्षय कुमार ने हनुमान जी को पकड़ने का प्रयास किया, तो हनुमान जी ने क्षण भर में अक्षय कुमार का वध कर दिया और पूरी राक्षस सेना को तहस-नहस कर दिया। अंततः रावण के सबसे बड़े और मायावी पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ने आकर हनुमान जी पर ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग किया।

ब्रह्मास्त्र का सम्मान करने के लिए हनुमान जी स्वयं बंधन में बंध गए और उन्हें रावण की विशाल राजसभा में ले जाया गया। सोने के सिंहासन पर बैठे अहंकारी रावण के सामने हनुमान जी निर्भीकता से खड़े रहे और उन्होंने रावण को चेतावनी दी कि वह अब भी समय रहते माता सीता को श्री राम को सौंपकर अपने कुल की रक्षा कर ले, अन्यथा उसका विनाश निश्चित है।

हनुमान जी के इन निर्भीक वचनों को सुनकर रावण अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने हनुमान जी के वध का आदेश दे दिया। परंतु रावण के विभीषण नामक धर्मात्मा भाई ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि नीति के अनुसार किसी दूत का वध करना घोर पाप है।

तब रावण ने हनुमान जी को अपमानित करने के लिए आदेश दिया कि बंदरों को अपनी पूंछ से सबसे अधिक प्रेम होता है, इसलिए इसकी पूंछ में कपड़ा और घी लपेटकर आग लगा दी जाए। राक्षसों ने वैसा ही किया, परंतु हनुमान जी ने अपनी माया से अपनी पूंछ को बहुत लंबा करना शुरू कर दिया, जिससे लंका का सारा कपड़ा और घी कम पड़ गया।

जैसे ही राक्षसों ने उनकी पूंछ में आग लगाई, हनुमान जी ने एक विशाल रूप धारण किया, अपने बंधनों को कड़ाके से तोड़ दिया और सोने की लंका के महलों पर कूदना शुरू कर दिया। उन्होंने एक महल से दूसरे महल पर छलांग लगाते हुए अपनी जलती हुई पूंछ से पूरी सोने की भव्य लंका नगरी में आग लगा दी।

देखते ही देखते रावण की वह अजेय और चमचमाती सोने की लंका धू-धू करके जलने लगी। चारों ओर हाहाकार मच गया, राक्षस अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे, और रावण का सारा घमंड उस आग की लपटों में पिघलने लगा।

हनुमान जी ने केवल विभीषण के घर और अशोक वाटिका में माता सीता के स्थान को छोड़कर पूरी लंका को भस्म कर दिया। इसके बाद उन्होंने समुद्र के पानी में अपनी पूंछ की आग बुझाई I

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 लेखक / मूल रचनाकार : पौराणिक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

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