कंस

कंस: मथुरा में कंस द्वारा देवकी के बच्चों की हत्या

5
Join WhatsApp
Join Now
Join Facebook
Join Now

कंस: मथुरा में कंस द्वारा देवकी के बच्चों की हत्या

द्वापर युग के उत्तरार्ध में मथुरा नगरी केवल भारतवर्ष की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण आर्यावर्त की सबसे वैभवशाली और समृद्ध राजधानियों में गिनी जाती थी। यमुना नदी के पावन तट पर बसी इस नगरी की सुदृढ़ प्राचीरें, गगनचुंबी अट्टालिकायें और विशाल बाज़ार इसके ऐश्वर्य की गवाही देते थे।

यहाँ यादव वंश का शासन था, जिसके न्यायप्रिय राजा उग्रसेन प्रजा के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते थे। मथुरा की भूमि आध्यात्मिक रूप से जितनी पवित्र थी, उतनी ही राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील भी थी। इस समृद्ध राज्य की प्रजा अत्यधिक सुखी, धार्मिक और अपने राजा के प्रति पूरी तरह निष्ठावान थी।

परंतु, इस सुख और शांति के पीछे एक गहरा और भयानक अंधकार धीरे-धीरे पनप रहा था, जो पूरी नगरी को निगलने के लिए आतुर था। राजा उग्रसेन का एक अत्यंत पराक्रमी परंतु क्रूर, महत्त्वाकांक्षी और अधर्मी पुत्र था, जिसका नाम कंस था। कंस की शारीरिक शक्ति अद्भुत थी और उसका व्यक्तित्व जितना विशाल था, उसका हृदय उतना ही संकीर्ण और निर्दयी था। उसने बाल्यावस्था से ही धर्म और नीति के विरुद्ध आचरण करना प्रारंभ कर दिया था।

कंस के मन में सत्ता की भूख इस कदर हावी थी कि वह संपूर्ण आर्यावर्त पर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करना चाहता था। उसने मगध के शक्तिशाली सम्राट जरासंध की दो पुत्रियों, अस्ति और प्राप्ति से विवाह करके अपनी सैन्य शक्ति को कई गुना बढ़ा लिया था।

इस विवाह ने कंस को न केवल असीमित शक्ति प्रदान की, बल्कि उसके भीतर छिपे हुए क्रूर राक्षस को भी पूरी तरह जगा दिया था। वह मथुरा के सिंहासन पर स्वयं बैठने के सपने देखने लगा था और इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार था, चाहे उसे अपने सगे संबंधियों का रक्त ही क्यों न बहाना पड़े।

कंस की इस बढ़ती हुई निरंकुशता और दुष्टता से राजा

उग्रसेन भी अत्यंत चिंतित रहते थे, परंतु मगध के समर्थन के कारण वे लाचार थे। कंस ने धीरे-धीरे मथुरा के प्रशासनिक और सैन्य तंत्र पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया था। उसके क्रूर साथियों, जैसे प्रलंब, बकासुर, अघासुर और पूतना ने चारों ओर आतंक मचा रखा था। प्रजा अब कंस के नाम से ही कांपने लगी थी, क्योंकि उसके शासन में न्याय का कोई स्थान नहीं था।

कंस केवल शक्ति की भाषा समझता था और जो भी उसके मार्ग में आता था, उसे वह क्रूरतापूर्वक समाप्त कर देता था। वह अपनी इस अपार शक्ति के मद में इतना अंधा हो चुका था कि वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसके राज्य में यज्ञ, अनुष्ठान और वेदों के पाठ पर धीरे-धीरे प्रतिबंध लगने लगे थे, जिससे ऋषि-मुनि अत्यंत भयभीत और दुखी थे।

मथुरा की जो प्रजा कभी आनंद और उल्लास में जीवन व्यतीत करती थी, वह अब भय के साए में जीने को विवश थी। हर कोई इस बात से परिचित था कि कंस की महत्त्वाकांक्षा की कोई सीमा नहीं है और वह बहुत जल्द कोई ऐसा कदम उठाएगा जिससे पूरी मथुरा का इतिहास बदल जाएगा।

चारों ओर फैले इस गहरे अधर्म के बीच, लोग किसी ऐसे चमत्कार या रक्षक की प्रतीक्षा कर रहे थे जो उन्हें इस क्रूर शासक के चंगुल से मुक्त करा सके, परंतु अभी कंस के पाप का घड़ा पूरी तरह भरना बाकी था।

देवकी का विवाह और आकाशवाणी

मथुरा के इस अशांत वातावरण के बीच, राजा उग्रसेन के छोटे भाई देवक की अत्यंत सुंदर, शीलवान और गुणी पुत्री देवकी के विवाह का समय आया। देवकी न केवल रूपवती थी, बल्कि उसका हृदय अत्यंत कोमल, धार्मिक और ममता से परिपूर्ण था। कंस अपनी इस चचेरी बहन देवकी से अत्यंत प्रेम करता था, या यूँ कहें कि वह उसके प्रति एक विशेष स्नेह का प्रदर्शन करता था।

देवकी के विवाह के लिए शूरसेन के प्रतापी पुत्र वसुदेव को चुना गया, जो अपनी सत्यनिष्ठा, वीरता और धर्मपरायणता के लिए संपूर्ण आर्यावर्त में विख्यात थे। वसुदेव और देवकी का यह विवाह न केवल दो महान कुलों का मिलन था, बल्कि यह मथुरा की राजनीति में एक नई स्थिरता लाने का एक प्रयास भी माना जा रहा था। विवाह का उत्सव अत्यंत भव्य तरीके से आयोजित किया गया।

चारों ओर शहनाइयों की गूंज थी, महलों को दीपकों और फूलों से सजाया गया था, और संपूर्ण प्रजा इस शुभ विवाह के अवसर पर आनंदित थी। कंस ने स्वयं इस विवाह की कमान संभाली थी और वह अपनी बहन की विदाई को ऐतिहासिक बनाना चाहता था।

विवाह के सभी पवित्र संस्कार संपन्न होने के पश्चात, जब देवकी की विदाई का क्षण आया, तो कंस ने अत्यंत भावुक होकर घोषणा की कि वह स्वयं अपनी प्रिय बहन के रथ का सारथी बनेगा और उसे उसके ससुराल तक छोड़कर आएगा। यह दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग अत्यंत भावुक हो गए और उन्होंने कंस के इस रूप की सराहना की।

कंस अत्यंत गर्व और उल्लास के साथ रथ पर सवार हुआ
और घोड़ों की लगाम थामकर रथ को आगे बढ़ाया। रथ अभी मथुरा की सीमाओं के पास एक घने वन के मार्ग से गुजर ही रहा था कि अचानक प्रकृति का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। तेज हवाएं चलने लगीं, आकाश में काले-घने बादल छा गए और बिजली कड़कने लगी।

इस अप्रत्याशित मौसमी परिवर्तन से रथ के घोड़े सहम कर रुक गए। इससे पहले कि कंस कुछ समझ पाता, आकाशमंडल से एक अत्यंत गंभीर, मेघ गर्जना जैसी और दिव्य आकाशवाणी गूंज उठी। उस अदृश्य वाणी ने कंस को संबोधित करते हुए कहा, “हे मूर्ख कंस! तू जिस बहन को इतने प्रेम से रथ पर बिठाकर ले जा रहा है, जिसे तू अपनी सबसे प्रिय मानता है, उसी के गर्भ से उत्पन्न होने वाली आठवीं संतान तेरा काल बनेगी।

वह तेरा वध करके इस पृथ्वी को तेरे पापों और अत्याचारों से मुक्त करेगी।” यह भयंकर और स्पष्ट चेतावनी सुनकर कंस के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसका जो चेहरा क्षण भर पहले प्रसन्नता से दमक रहा था, वह अब अत्यधिक क्रोध और भयंकर भय से विकृत हो उठा।

उस अदृश्य दैवीय वाणी ने कंस के भीतर के उस सोए हुए राक्षस को जगा दिया जो अपनी मृत्यु के भय से किसी भी सीमा को लांघ सकता था। उसकी आँखों में सगे-संबंधों का सारा प्रेम पल भर में जलकर राख हो गया।

कंस का क्रोध और कारागार का निर्माण

आकाशवाणी के शब्द कंस के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह चुभ रहे थे। मृत्यु के भय ने उसे पूरी तरह पागल कर दिया था। उसने बिना एक क्षण गंवाए अपनी म्यान से चमचमाती हुई तलवार निकाल ली और अपनी ही सगी बहन देवकी के केश पकड़कर उसे रथ से नीचे खींच लिया। कंस ने चिल्लाते हुए कहा, “यदि इस देवकी की आठवीं संतान मेरी मृत्यु का कारण बनेगी, तो मैं इस कारण को ही समूल नष्ट कर दूंगा।

न यह जीवित रहेगी, न इसकी कोई संतान होगी और न मेरी मृत्यु आएगी।” कंस जैसे ही देवकी का सिर धड़ से अलग करने के लिए अपनी तलवार उठाने लगा, वसुदेव ने तुरंत आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया। वसुदेव अत्यंत शांत, बुद्धिमान और नीतिज्ञ थे। उन्होंने कंस को शांत करने का प्रयास करते हुए कहा, “हे कंस! तुम आर्यावर्त के सबसे प्रतापी योद्धा हो।

एक अबला स्त्री, जो तुम्हारी अपनी सगी बहन है और जिसका अभी-अभी विवाह हुआ है, उसकी हत्या करना तुम्हारे जैसे वीर को शोभा नहीं देता। तुम्हें देवकी से कोई भय नहीं है, तुम्हें भय तो उसकी आठवीं संतान से है। मैं तुम्हें धर्मपूर्वक यह वचन देता हूँ कि देवकी के गर्भ से जो भी संतान उत्पन्न होगी, उसे मैं स्वयं लाकर तुम्हें सौंप दूंगा। तुम अपनी बहन के प्राणों की रक्षा करो।” वसुदेव की यह सत्यनिष्ठा और उनका दृढ़ वचन सुनकर कंस असमंजस में पड़ गया। वह जानता था कि वसुदेव कभी अपना वचन नहीं तोड़ेंगे।

कंस ने कुछ क्षण विचार किया और फिर अपनी तलवार
म्यान में डाल ली, परंतु उसका भय पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। उसने देवकी को जीवित छोड़ने का निर्णय तो ले लिया, लेकिन उसने उनके लिए एक अत्यंत क्रूर व्यवस्था सुनिश्चित की। उसने वसुदेव और देवकी को तुरंत बंदी बनाने का आदेश दिया।

कंस ने मथुरा के सबसे सुरक्षित, गहरे और अंधकारमय तहखाने को एक विशेष कारागार में परिवर्तित करवा दिया। इस कारागार की दीवारें अत्यंत मोटी थीं और इसके चारों ओर लोहे के भारी दरवाजे लगे हुए थे। कंस ने इस कारागार की सुरक्षा में सैकड़ों खूंखार और वफादार सैनिकों को तैनात कर दिया, जिन्हें यह सख्त निर्देश थे कि वे दिन-रात बंदी गृह पर कड़ी नजर रखें।

वसुदेव और देवकी को भारी लोहे की जंजीरों और बेड़ियों से जकड़ दिया गया। इस प्रकार, जिस नवविवाहित जोड़े को एक सुखद जीवन की शुरुआत करनी थी, वे कंस के भय और क्रूरता के कारण कालकोठरी के अंधेरे में धकेल दिए गए। कंस का अत्याचार यहीं नहीं रुका।

उसने अपने इस नए रूप और शक्ति के बल पर अपने वृद्ध पिता राजा उग्रसेन को भी सिंहासन से हटाकर उसी कारागार के एक अन्य हिस्से में बंदी बना दिया और स्वयं को मथुरा का निरंकुश सम्राट घोषित कर दिया। अब कंस का कोई विरोध करने वाला नहीं था, और वह पूरी तरह से एक क्रूर तानाशाह बन चुका था।

नवजातों की निर्मम हत्या

कंस
कंस

समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा और कारागार के उस अंधकारमय वातावरण में देवकी ने अपनी प्रथम संतान को जन्म दिया। वह एक अत्यंत सुंदर और स्वस्थ पुत्र था। वसुदेव ने अपने दिए गए वचन का पालन करते हुए, अत्यंत भारी मन और रुंधे हुए गले से उस नवजात शिशु को अपनी गोद में उठाया और पहरेदारों के साथ कंस के राजदरबार की ओर चल पड़े।

जब वसुदेव ने उस सुंदर बालक को कंस के हाथों में सौंपा, तो कंस ने देखा कि बालक अत्यंत निर्दोष था। उस समय कंस के मन में थोड़ी दया जागी, और उसने कहा, “वसुदेव, मुझे इस प्रथम बालक से कोई भय नहीं है। आकाशवाणी ने तो केवल आठवीं संतान के विषय में कहा था। इसलिए तुम इस बालक को वापस ले जा सकते हो।”

वसुदेव उस बालक को लेकर वापस कारागार आ गए, जिससे देवकी के प्राणों में कुछ सांत्वना मिली। परंतु, जब यह बात कंस के परम दुष्ट सलाहकार और असुर राज नारद को पता चली, तो उन्होंने कंस के पास आकर उसे सचेत किया। नारद मुनि ने कंस को समझाया, “हे राजन! देवताओं की चाल अत्यंत सूक्ष्म होती है।

तुम कैसे जान सकते हो कि कौन सी संतान पहली है और कौन सी आठवीं? यदि वे गणना विपरीत दिशा से शुरू करें, तो पहली संतान ही आठवीं सिद्ध हो सकती है। तुम्हें किसी भी शिशु पर विश्वास नहीं करना चाहिए।” नारद की इस बात ने कंस के मन में छिपे भय को दोबारा जगा दिया और वह पूरी तरह क्रोध से पागल हो गया।

कंस तुरंत भारी कदमों से कारागार की ओर दौड़ा। उसने देवकी की गोद से उस रोते हुए प्रथम नवजात शिशु को अत्यंत क्रूरता से छीन लिया। देवकी और वसुदेव रोते-बिलखते रहे, कंस के पैर पकड़कर भीख मांगते रहे कि उनके निर्दोष बच्चे को छोड़ दिया जाए, परंतु कंस पर ममता या दया का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

उसने उस नन्हे शिशु के दोनों पैरों को पकड़ा और कारागार की कठोर पत्थर की दीवार पर पूरी शक्ति से पटक दिया। एक तीव्र चीख गूंजी और वह निर्दोष जीव क्षण भर में शांत हो गया। कारागार की दीवारें उस नवजात के रक्त से सन गईं। यह क्रूरता का अंत नहीं था, बल्कि एक अंतहीन सिलसिले की शुरुआत थी।

जैसे-जैसे वर्ष बीतते गए, देवकी ने एक के बाद एक छह पुत्रों को जन्म दिया। कंस ने हर बार उसी अमानवीय क्रूरता का परिचय देते हुए, सभी छह शिशुओं को देवकी के सामने ही पत्थर की दीवारों पर पटक-पटक कर मार डाला। हर बार कारागार का वह अंधेरा कमरा बच्चों की चीखों और देवकी के आर्तनाद से गूंज उठता था।

देवकी का हृदय अपनी आँखों के सामने अपने ही बच्चों के इस तरह छलपूर्वक छीने गए जीवन को देखकर पूरी तरह टूट चुका था, परंतु वे दोनों असहाय थे। कंस को लगता था कि वह हर हत्या के साथ अपनी मृत्यु को पीछे धकेल रहा है, परंतु वास्तव में वह अपने पापों के घड़े को तेजी से भर रहा था, जो उसके समूल नाश का कारण बनने वाला था।

दिव्य योगमाया और सातवां गर्भ

छह पुत्रों की निर्मम हत्या के पश्चात, संपूर्ण मथुरा नगरी में शोक और भय की लहर व्याप्त थी। देवकी और वसुदेव का जीवन केवल एक जीवित लाश की भांति हो गया था, परंतु उनके भीतर धर्म और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास अभी भी जीवित था। जब देवकी ने सातवीं बार गर्भधारण किया, तो कंस की चिंता और सुरक्षा व्यवस्था कई गुना बढ़ गई।

वह जानता था कि अब वह समय अत्यंत निकट आ रहा है जब उसका काल जन्म ले सकता है। परंतु इस बार स्थिति कुछ अलग थी। यह सातवां गर्भ कोई साधारण बालक नहीं था, बल्कि वह स्वयं भगवान विष्णु के परम सेवक और साक्षात् शेषनाग के अंश थे, जिन्हें संसार में बलराम के नाम से जाना जाने वाला था।

भगवान विष्णु ने अपनी परम शक्ति, दिव्य योगमाया को आदेश दिया कि वे इस सातवें गर्भ को देवकी के उदर से अत्यंत गुप्त रूप से स्थानांतरित करके वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दें, जो उस समय कंस के डर से गोकुल में नंदबाबा के यहाँ अत्यंत सुरक्षित रह रही थीं। योगमाया ने अपनी अलौकिक शक्तियों का प्रयोग किया और कारागार के सभी सैनिकों को गहरी निद्रा में सुला दिया। उन्होंने बिना किसी को भनक लगे उस गर्भ का संकर्षण कर दिया।

अगली सुबह जब कंस के चिकित्सक और पहरेदार

देवकी के कक्ष में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि देवकी का गर्भ पूरी तरह समाप्त हो चुका था। मथुरा में यह समाचार फैल गया कि अत्यधिक मानसिक तनाव, शोक और शारीरिक कष्ट के कारण देवकी का सातवां गर्भ स्वतः ही नष्ट हो गया है। कंस को इस समाचार से अत्यंत संतुष्टि और प्रसन्नता हुई।

उसे लगा कि प्रकृति भी अब उसका साथ दे रही है और उसकी मृत्यु का जो संकट था, वह एक कदम और दूर हो गया है। वह पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि अब अगला गर्भ ही वह आठवां गर्भ होगा, जिसके बारे में आकाशवाणी ने उसे सचेत किया था। कंस ने कारागार की सुरक्षा को पहले से भी दस गुना अधिक कड़ा कर दिया।

नए, अधिक क्रूर और वफादार सैनिकों को तैनात किया गया, जो चौबीसों घंटे बिना पलक झपकाए पहरा देने लगे। लेकिन कंस यह नहीं जानता था कि देवताओं की योजना अत्यंत सूक्ष्म और अचूक होती है। सातवें गर्भ के इस दिव्य अंतर्धान ने यह सिद्ध कर दिया था कि कंस की बुद्धि और उसकी सुरक्षा व्यवस्था भगवान की माया के सामने अत्यंत तुच्छ और बौनी थी।

कारागार के उस घोर अंधकार में अब उस परम पुरुष के अवतरण की पृष्ठभूमि पूरी तरह तैयार हो चुकी थी, जो इस पृथ्वी से कंस के अत्याचारों का सदा के लिए अंत करने वाले थे।

आठवें गर्भ का रहस्य और अवतरण

अंततः वह प्रतीक्षित समय आ ही गया जब देवकी ने आठवीं बार गर्भधारण किया। इस बार देवकी के चेहरे पर कोई भय नहीं था, बल्कि एक अलौकिक, दिव्य और शाश्वत तेज चमक रहा था। कारागार का वह अंधकारमय और सीलन भरा कमरा भी उस तेज से आलोकित हो उठा था।

कंस ने जब देवकी के इस अद्भुत और अलौकिक रूप को देखा, तो वह भीतर तक कांप गया। उसका भय अब अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका था। उसे सोते-जागते, उठते-बैठते हर क्षण केवल अपनी मृत्यु ही दिखाई देती थी। उसने कारागार के चारों ओर लोहे के नए द्वार लगवाए और स्वयं भी रात-रात भर जागकर पहरा देने लगा।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि आई। उस रात मथुरा में अत्यंत भयानक बवंडर चल रहा था। यमुना नदी उफान पर थी, आकाश में बिजली इस कदर कड़क रही थी मानो ब्रह्मांड टूटने वाला हो और मूसलाधार वर्षा हो रही थी।

ठीक अर्धरात्रि के समय, जब संपूर्ण सृष्टि मौन थी, भगवान विष्णु अपने चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए देवकी और वसुदेव के सम्मुख प्रकट हुए। उनके इस अत्यंत मनोहारी और दिव्य रूप को देखकर वसुदेव और देवकी के सारे कष्ट पल भर में समाप्त हो गए और वे भावविह्वल होकर स्तुति करने लगे।

भगवान ने उनसे कहा, “हे माता-पिता! अब घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं इस बालक के रूप में आपके दुखों का अंत करने आया हूँ। आप तुरंत मुझे इस रूप से एक साधारण नवजात शिशु के रूप में परिवर्तित देखें और वसुदेव मुझे इसी समय गोकुल में नंदबाबा के घर छोड़ आएं, जहाँ यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया है।

उस कन्या को लेकर आप तुरंत इस कारागार में वापस आ जाएं।” भगवान के वचन समाप्त होते ही वे एक अत्यंत सुंदर, नीलकमल के समान आभा वाले शिशु के रूप में परिवर्तित हो गए। उसी क्षण भगवान की योगमाया के प्रभाव से कारागार के सभी भारी लोहे के दरवाजे स्वतः ही खुल गए, पहरेदार गहरी और अचेतन निद्रा में चले गए और वसुदेव की पैरों की बेड़ियां अपने आप पिघल कर गिर गईं।

वसुदेव ने उस दिव्य शिशु को एक सूप में रखा और उसे अपने सिर पर उठाकर उस भयंकर तूफानी रात में गोकुल की ओर चल पड़े। उफनती हुई यमुना नदी ने भी भगवान के चरणों का स्पर्श करके वसुदेव को सुरक्षित मार्ग दे दिया।

गोकुल पहुंचकर वसुदेव ने चुपचाप यशोदा के पास सो रहे शिशु कृष्ण को रख दिया और उनकी नवजात पुत्री (जो वास्तव में स्वयं योगमाया थीं) को उठाकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए। जैसे ही वे कारागार में लौटे, सभी दरवाजे स्वतः बंद हो गए, जंजीरें दोबारा उनके पैरों में जकड़ गईं और पहरेदार अपनी निद्रा से जाग गए।

महामाया की चेतावनी और कंस का अंत

सुबह होते ही उस नवजात शिशु के रोने की ध्वनि सुनकर पहरेदारों की नींद खुली। उन्होंने देखा कि आठवां बच्चा जन्म ले चुका है। समाचार मिलते ही कंस पागलों की तरह भागता हुआ कारागार में आया। उसकी आँखों में खून उतरा हुआ था।

देवकी ने रोते हुए कंस के पैर पकड़ लिए और कहा, “भैया! आकाशवाणी ने तो पुत्र के बारे में कहा था, यह तो एक निर्दोष कन्या है। यह तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी? कृपया इसके प्राणों की रक्षा करो, इसे मत मारो।” परंतु कंस पूरी तरह अंधा हो चुका था। उसने देवकी की एक न सुनी और उस कन्या को पैर से पकड़कर जैसे ही कारागार की उसी खूनी दीवार पर पटकने के लिए हाथ ऊपर उठाया, वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर अचानक आकाश में उड़ गई।

आकाश में जाते ही उस कन्या ने अष्टभुजाधारी साक्षात् महामाया दुर्गा का विशाल और अत्यंत डरावना रूप धारण कर लिया। उनके हाथों में त्रिशूल, तलवार और अनेक अस्त्र-शस्त्र चमक रहे थे। सिंह पर सवार देवी ने अट्टहास करते हुए कंस से कहा, “हे मूर्ख कंस! तू मुझे क्या मारेगा? तुझे मारने वाला, तेरे पापों का अंत करने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है और वह अत्यंत सुरक्षित है। तू अब अपने पापों का फल भोगने के लिए तैयार हो जा।” इतना कहकर देवी अंतर्धान हो गईं।

देवी की यह भयंकर वाणी सुनकर कंस का पूरा शरीर डर से थर-थर कांपने लगा। उसकी सारी शक्ति, सारा अहंकार और सारा घमंड पल भर में हवा हो गया। उसे समझ आ गया कि नियति को बदला नहीं जा सकता और उसकी मृत्यु अब निश्चित हो चुकी है।

उसने तुरंत कारागार से देवकी और वसुदेव को मुक्त कर दिया और उनसे क्षमा मांगी, परंतु उसका यह पश्चाताप केवल अस्थायी था। इसके बाद कंस ने गोकुल में कई भयंकर असुरों को भेजा ताकि वे उस बालक को ढूंढकर मार सकें, परंतु बालक कृष्ण ने पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, बकासुर और अघासुर जैसे सभी क्रूर राक्षसों का खेल-खेल में ही वध कर दिया।

कंस का भय दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया और अंततः वह समय भी आया जब गोकुल के जनप्रिय कान्हा और बलदाऊ ने मथुरा की धरती पर कदम रखा। उन्होंने कंस के राजदरबार में प्रवेश करके उसके सभी शक्तिशाली मल्लों, जैसे चाणूर और मुष्टिक का संहार किया। अंत में, कृष्ण ने कंस के ऊंचे सिंहासन पर छलांग लगाई, उसकी चोटी पकड़ी और उसे जमीन पर पटक दिया।

कृष्ण ने कंस की छाती पर बैठकर घूंसे मारकर उसके प्राण हर लिए। इस प्रकार, कंस का वध करके कृष्ण ने माता देवकी के उन छह बच्चों की आत्माओं को शांति प्रदान की, जिनका जीवन कंस ने अत्यंत छलपूर्वक और क्रूरता से छीना था, और संपूर्ण मथुरा को इस भयानक अधर्म के साम्राज्य से सदा के लिए मुक्त कराया।

अगर आपको यह कहानी पसंद आई, तो अन्य ज्ञानवर्धक और नैतिक कहानियाँ भी ज़रूर पढ़ें।

पौराणिक कहानियों का विशाल संग्रह पढ़ें, जिनमें देवताओं, ऋषि-मुनियों, अवतारों, महाभारत, रामायण और भारतीय संस्कृति से जुड़ी प्रेरणादायक, रोचक एवं ज्ञानवर्धक कथाएं शामिल हैं। हर कहानी जीवन मूल्यों, धर्म और नैतिक शिक्षा का संदेश देती है।

 लेखक / मूल रचनाकार : पौराणिक कथाएँ
 प्रस्तुति: Saying Central Team

दिलचस्प कहानियों का सफर यहीं खत्म नहीं होता, ये भी ज़रूर पढ़ें:
Share:
WhatsApp
Facebook

Leave a Comment

Feature corner

चाणक्य नीति
Chanakya Neeti Explained

नीति और सफलता के अमूल्य सूत्र।

Book Summaries Explained

लोकप्रिय किताबों के मुख्य विचार।
Read More »

Child Psychology Explained

बच्चों की सोच और मनोविज्ञान।
Read More »

Moral Values Explained

छोटी कहानियाँ और नैतिक शिक्षा।

Inspirational Lives

महान व्यक्तियों के प्रेरणादायक जीवन।

CATEGORIES